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चैत्य

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Sunday, August 8, 2021, 02:43 PM
Chetya

साथियों मेरा एक नया रिसर्च आपके सामने रखते हुए बहुत खुशी हो रही है।वह यह है कि चर्च यह चैत्य की कॉपी है।चर्च  यह शब्द भी चैत्य से बना है।चैत्य इस शब्द का ही अपभ्रंश है चर्च।चैत्य-चेच्च-चर्च!

 सभ्य व श्रेष्ठ वर्ग की लोग अक्सर कॉपी करते है।यह एक मनोवैज्ञानिक बात है। यूरोप के लोग प्राचीन काल में भारतीय संस्कृति से प्रभावित हुए। क्योंकि भारत उस समय का अमेरिका  था।बौद्ध धम्म यूरोप तक सम्राट अशोक के समय ही पहुँच चुका था। यूनानी राजा मिनांडर व उसकी पीढियां बौद्ध थे।

  युरोपयन्स बौद्ध लोगों के आकर्षक चैत्यों को देखते थे।क्योंकि धम्म उस समय यूनान पहुँच चुका था ईरान व रशिया की सीमाओं तक!चैत्यों में राजा और प्रजा के द्वारा होते क्रियाकलापों को वे देखते थे।धम्म की अनेक बातों को उन्होंने अपनाया उन बातों की कॉपी की। चैत्य की कॉपी युरोपयन्स ने  ईसाई धर्म के जन्म के पहले की हो सकती है या बाद में की हो सकती है।बाबासाहब अंबेडकर ने सही कहा था कि ईसाई धर्म की अधिकांश बाते बौद्ध धर्म से ली गई है।

     इतिहासकार प्रोपेसर राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने कुछ वर्ष पहले इस बात को सामने लाया  कि अंग्रेजी में सप्ताह के दिनों के नाम भी बौद्ध परंपरा की कॉपी है। अंग्रेजी में उपदेश को sermon श्रमण इसलिए कहते है क्योंकि बौद्ध भिक्खुओं को श्रमण कहते है और उपदेश वही देते थे।अंग्रेजी में थेरी या थ्योरी शब्द भी भिक्खुओं का शब्द है।सीनियर भिक्खुओं को थेरो कहते है। सिद्धांत और तत्वज्ञान वही लोग सिखाते थे।

     आप चैत्य और चर्च को गौर से जांचे तो पता चलेगा कि दोंनो की एक समान इंजीनियरिंग है। दोनों का डिजाइन लंब आयताकार है। दोनों की छत अर्धगोलाकार या त्रिकोणी है। दोनो का अंत्येष्टि के समय विशेष महत्व है। दोनों अक्सर स्मशान के नजदीक बनाएं जाते है। दोनों के अंदर खड़े पिलर यह योगायग नही हो सकता। दोंनो के नाम मे समानता है। युरोपयन्स के उच्चारण में अंतर से ऐसा होना स्वाभाविक है।जैसे हम मिलिंद कहते है तो युरोपयन्स उसे मिनांडर कहते है। विदेशियों के उच्चारण में बदलाव का दूसरा उदाहरण है ब्राह्मण! ब्राह्मण जब भारतीयों की प्राकृत भाषा के शब्दों को बोलते थे तो वे भी उच्चारण में बदलाव करते थे। जैसे कम्म को कर्म ,धम्म को धर्म! वैसे ही चैत्य का चेच्च और चेच्च का चर्च हुआ।

एस.के.खंडेराव

अभ्यासक, बुद्धिस्ट इंटरनेशनल नेटवर्क

 

माथे पर लगाएं जानेवाले U आकार में गोले का चिन्ह यह बौद्ध धम्म के चैत्य का प्रतीक है।

 

साथियों आज मेरा एक नया रिसर्च आपके सामने रख रहा हूँ इसवजह से काफी उत्साहित हुँ।भारतीय लोग अपने माथे पर जो धार्मिक चिन्ह लगाते है लगभग वह सारे चिन्ह बौद्ध प्रतीक है यह वह रिसर्च है।

 माथे पर U आकार में एक गोला हो या तीन भस्म या चंदन की आड़ी रेखाएं हो या लम्बाकार खड़ा तिलक हो यह सभी बौद्ध प्रतीक है।

जैसे काले बादलों के आने से सूर्य ढक जाता है वैसे हर एक बौद्ध चीज के पीछे का इतिहास दबा देने के लिए ब्राह्मणों ने उस चीज की नई काल्पनिक कहानी खड़ी कर दी।हर एक बौद्ध चीज की बौद्ध यह पहचान मिटाने के लिए ब्राह्मणों ने उस जिच को नया नाम दिया।सारे बौद्ध उत्सव व प्रतीकों की बोद्ध पहचान ऐसे ही दबा दी गई।माथे पर लगने वाले इन सारे चिन्हों के पीछे के असली कारणों को दबा देने के लिए ही कई सारी हास्यास्पद दन्तकथा और काल्पनिक कहानियां गढ़ी और प्रचारित की गई है।

 माथे पर लगाने वाले चीन्हों में U आकार में गोला यह चिन्ह पवित्र चैत्य का डिजाइन है।तो आड़ी तीन रेखाएं यह स्तूप के तोरणद्वार का प्रतीक है।तो लम्बाकार खड़ा तिलक का चिन्ह यह विहार का प्रतीक है।

 इसके पहले हमने देखा था कि लगभग सारे भारतीय उत्सव व प्रतिक यह बौद्ध धम्म के ही है।प्रतिकांति के बाद गुलाम बनाये गए भारतीयों के धम्म व धम्मस्थलों का ब्राह्मणों ने अतिक्रमण-अधिग्रहण-ब्राह्मणीकरण व नामांतरण किया।साम्राज्यवादी देश गुलाम देशों के,उसके शहरों के,चौराहों के नाम बदलते है तो साम्राज्यवादी ब्राह्मणी धर्म गुलाम धर्मों का,उस धर्म के हर चीज का!

एस.के.खंडेराव

अभ्यासक,बुद्धिस्ट इंटरनेशनल नेटवर्क





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