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भारतीय समाज एवं धर्म

Seema Meshram

Monday, May 6, 2019, 07:19 AM
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भारतीय समाज एवं धर्म
भारतीय समाज एक ऐसा समाज है जिसमें सभी समाज व वर्ग के धर्म के लोग निवास करते हैं। हमारे लोकतांत्रिक समाज में धर्म की स्वतंत्रता है। अपने मजहबों को मानने, भाषण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। परंतु इन सबसे ऊँचा स्थान देश का होता है। और हमारी संस्कृति में विश्व कुटुम्बकम की भावना आ रही है तो उसकी देन है हमारे लोगों की सरल सीधी, सहज आस्थागत मानस/लेकिन हमारे भारतीय मानस की विचार प्रणाली सभी समाजों में अलग होती है। परंतु सबसे अच्छा इंसान वही जिसमें मानव के प्रति प्रेम व भाइचारा हैं सभी धर्मों को मानना व आचरण करना मनुष्य के बश की बात नहीं है। यह तो व्यक्तिगत आचरण व स्वतंत्रता है। वरना इसके अभाव में अन्य कुछ कट्टरपंथियों के समान हो जाते व खून खराबे में शामिल होते ये जो आतंकी संगठन है वे ऐसा नहीं है कि व निरक्षर, असभ्य है यह हत्या करना उनका धर्म है। यह तो इंसान के वर्चस्व की लड़ाई है। हक डर पैदा करके साम्राज्य करने की साजिश है। धर्म के नाम पर पैगम्बरों को बदनाम करना। कोई इनमें या कोई सांम्प्रदायिक सोच रखने वाले इंसानों से पूछे क्या इन्होंने स्वयं परमात्मा को देखा है। उसके सामने प्रत्यक्ष कभी ईश्वर/खुदा ने कहा है कि तुम मुसलमान/हिन्दू/इसाई/सिख/बौद्ध हो। असली इंसान हो मेरे प्यारे हो। किसी बात धर्म व व्यक्ति को इस खुदा नामक अस्तित्व ने उलझाकर रख दिया है। क्या किसी को कहां है या चमत्कार से पुराण, हर धार्मिक किताब भरी पड़ी है। क्या इस समय वर्तमान में हम उन्हें साबित कर सकते हैं शायद पूरी तरह नहीं। क्या हम पृथ्वी को हां हम रहते हैं, स्वर्ग बनाना चहते हैं। शायद अन्दर से नहीं। क्या हम अपने को एक अच्छा इंसान बनान चाहते हैं कभी नहीं शायद यह विचार खुदा ही दे सकता है जो मानव को प्यार करता है। या हम ही स्वयं पैदा कर सकते हैं। हम अपने ईष्ट देव, देवी देवता से प्यार करते हैं, लेकिन वहीं हम घातक बनकर दूसरो पर अपने विचार व धर्म थोपना चाहते हैं। धर्म का मतलब भी जानते हैं धर्म का मतलब ये पूजा प्रार्थना कर्मकाण्ड या उत्सव मनाना नहीं है। यह तो हमारा व्यक्तिगत मनोभाव है। जिसका हम कसी दैवीय शक्ति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं उसे सर्वोसर्वा मानकर, शांति प्राप्त करते हैं। आतंकवादी जो हत्या करते हैं। 
वे इसे अपने धर्म साम्राज्य के लिये खुदा को तोहफा देना मानते हैं। परंतु सभी बुद्धिजीवी या रहम दिल इंसान जो निरक्षर भी हो, तो इसे सही स्वीकार नहीं कर सकता कि उसके सामने किसी व्यक्ति की गोली मारे कोई बच्चा तड़पकर दम थोड़ दे। ऐसा तो पशु ही कर सकते हैं। जिनके भावना नहीं करुणा नहीं विचारशक्ति नहीं। सिर्फ पाखंड व भूख है जिसे वह दिखाना जानते हैं व मारना व खाकर पेट भरना। परंतु जानवर भी पेट भरा होने पर कोई चाह शिकार की नहीं रखते न किसी प्राणी को अकारण सताते हैं, परंतु यहाॅ तो पूरी बुद्धिजीवी कौमों में कुछ इंजीनियर से लेकर सुपर एजूकेशन वाले हत्यायें करते हैं।
और हैरानी की बात ये है कि ये सोच समझकर प्लानिंग के साथ करते हैं। मेरे ध्यान से इसका विरोधाभास धर्म से ही है।
धर्म इनके लिये बड़ा है बाकि नगण्य। किसी की जान भी। मानव जात कभी खुश नहीं रह सकती है। जब धर्मों पर बवाल हो। इस मामले में पाकिस्तानी आतंकी बिलकुल भी धर्म का अर्थ नहीं जानते। इसके जिम्मेदार सिर्फ वे ही नहीं भारत के संदर्भ में हम भी हैं। यहाॅ के धर्मों के ठेकेदार व कहना चाहिये धार्मिक कट्टरवाद व साम्प्रदायिकता है क्या यह आश्चर्य नहीं कि भारत में सभी कालों से धर्म व राजनीतिक व्यवस्थायें बदलती गई। मौर्य/गुप्त, सातवाहन से लेकर शुंग मुगलराज्य कायम रहे। फिर फिरंगी धमका बिट्रेन ने राज्य किया तब भी क्या धार्मिक बवाल नहीं थे।
आज भी हमारे देश में हिन्दू मुसलमान/इसाई/बौद्ध/सिख/भला भला जातियों व उपजातियों में नहीं बंटे हैं। बौद्ध सिखों इसाई को छोड़ दे तो सारी एस.सी., एस.टी., ओ.बी.सी. जनता ब्राम्हण धर्म को मानती है। जिसे हिन्दू धर्म कहते हैं। हिन्दू साम्प्रदायिकता का ठप्पा भी विरोधी पार्टियां एक दूसरे की लगाती रहती है। सभी जैसे महाभारत कर रहे है, एक दूसरे को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए।
और फिर भारत में 2 असमानतायें क्यों हैं। गरीबी/भुखमरी का विस्तार होता जा रहा है। ब्राम्हणग्रंथों ने अपने वर्चस्व का कायम रखने जिन पुराणों व महाभारत/उपनिषद का सहारा लिया है वह सिर्फ एस.सी., एस.टी., ओ.बी.सी. समाज को गुमराह करने के लिये ही है। भारत की अर्थव्यवस्था तीन लोग चला रहे हैं। बिजनेसमेन/लीडर व षिक्षावादी लोग। जिससे वर्गाश्रम के अनुसार ब्राम्हण शिक्षा, वैश्य विजनेस, क्षत्रिय सैनिक क्षेत्र में आते हैं। राजा की उपाधि पाते थे पहले। परंतु इसका उल्टा पुल्टा हो गया है। सभी बिजनेस करते हैं। सवर्ण बिजनेस करते है। भारत में सबसे ज्यादा प्रमुख उन्हीं का है जो जातियां बिजनेस करती है। या जिनके दादा परदादा बिजनेस करते आये हैं। ये सोने चांदी, हीरे जवाहरात का व्यवसाय का बिजनेस ये लोग करते हैं। अब तो कई जातियां भी बिजनेस करने लगी हैं। यहाॅ तक कि दलित शूद्र कही जाने वाली जातियां भी। पंडित वर्ग भी इस क्षेत्र में उतर चुका है। अब पुरानी जाति व्यवसाय धंधे के नाम पर टूट चुकी है। परंतु सवाल यह नहीं कि भारत के लोग तरक्की कर रहे हैं। सवाल है कौन तरक्की कर रहा है कौन नहीं। शिक्षा में बिजनेस मेन बैठे हैं जो गरीबों के षिक्षा अधिकारों पर कुंडली मारे बैठे हैं। जिनके कारण नये नये स्कूल तैयार हो रहे हैं। माडर्न शिक्षा। सरकारी शिक्षा ये जमीन आसमान का अंतर है। गरीब ऊंची मोटी फीस नहीं दे सकते है तो वह वही बेसिक हिन्दी मीडियम शिक्षा पायेंगे। अगर अलग से कोशिश भी करें तो गरीबी आड़े आती है। ऊपर से इनका सारा पैसा पंडित पुरोहित व सवर्ण वर्ग, धर्म के नाम पर चढ़ावे के नाम पर इनसे बटोरते रहते हैं। दुकानदार हर त्यौहार हर सीजन पर इन्हें इनके अनुसार बेचते रहते हैं। एक गरीब घर में बरतन झाड़ू पोछा, गलियों में झाडू लगने वाला भी किसी व्रत त्यौहार के दिन कमाई का 5 प्रतिषत हिस्सा इन खरीदारी में लगाता है। भले ही वह एक टाइम भोजन अपने बच्चों को नहीं खिलायेगा। ढंग के कपड़े बच्चों के लिए नहीं खरीदेगा। अच्छी पुस्तक पर खर्च नहीं करेगा पर इन त्यौहारों के नाम पर पुराहितों पर खर्च जरूर करेगा पूजन सामग्री विधि विधान पर खर्च जरूर करेगा। क्योंकि उसकी श्रद्धा व आस्था इन पंडित पुराहित व बुद्धिजीवी भक्तो व ज्ञानी तपस्वियों संत कहलाने वाले बाबाओं से भी सच्ची व सरल है कोई पाखड नही है। दूसरी बातों से उनके दिल दिमाग में अशिक्षा का अंधेरा है जो उनके दो दीवारों के मकान में हरदम फैला रहता है।
सारी दुकाने चल इसलिए रही है कि ये लोग खरीदते है, एक धनाढ्य वर्ग खरीदता है बचामाल ये सेल में सस्ते में लेते है। परंतु ये बिजनेस नहीं कर सकते इनके बच्चे अच्छे मंहगे स्कूल में नहीं पड़ सकते, क्योंकि अभी वह समक्ष नहीं है, उठने का मौका इन सवर्णों ने नहीं दिया है। शिक्षा अधिकारी इस विषय पर मौन है जाति का क्षेत्र भावना से आत्ममुग्ध है। अग्निप्रथा नहीं बना है जब स्वयं ये प्रतिष्ठित जातियां जान जायेगी कि यह एक वर्ग के साथ अन्याय है तभी सब शांत हो सकता है।
अगर प्रधानमंत्री अमेरिका जाते है तो भारत का सिर ऊँचा हो जाता है, वहां हम प्रगति का गुणगान करते है तो दुनिया हमरे नेताओं की जय जयकार करती है हमे इससे भाव विभोर नहीं होना चाहिए। नीचे जमीन पर रेंग रहे उन लाखांे पीडितों की ओर देखना चाहिये जिन्हें सम्मान से जीने का हक हैं ऐशो आराम भोगने का हक है नलाली से निकलकर अच्छे सभ्य इंसान की तरह रहने का हक है। हम उन्हें शिक्षा से अच्छी शिक्षा भोजन से महरूम नहीं रख सकते। कैसे सिर ऊँचा होगा हमारा। अगर ये स्वर्ग पर्व इस दिषाा से आखें मूदे रहेगा तो वे संपूर्ण भारत को अपना नहीं मानते गैर शोषित दलित गरीब जनता से नफरत करते है या फिर इन्हें कर्म के फल के सिद्धांत पर देखते है जो उचित नहीं है। फिर आप उनके सर्वेसवा नहीं बन सकते हैं। अनेक मसीहा, पंडित/पुराहित, सम्मानित व्यक्ति नहीं बन सकते हैं। अब ऐसा होना चाहिए। मंदिरों से सारे पंडित व पुरोहित वर्ग का नियंत्रण हट जाये व देवी देवता इनके बन्धन से आजाद हो जायें। सारी दान राशि पर सरकार का नियंत्रण हो। मदिर के लिये पूजा व कर्मकाण्ड की शिक्षा सभी वर्गों व जातियो के व्यक्तियों को दी जाये व मंत्र तंत्र का प्रयोग अपनी आस्था के धर्म के अनुसार सभी व्यक्ति अपने हाथों से ही करें। हम ये पूजा पाढ श्राद्ध कर्म के लिये उसे ही विमुक्त करे जो आजीवन ब्रम्हचारी हो, व्याभिचारी न हो, जो संपत्ति जमा न रखता हो सादगी से रहता हो। ध्यान साधना करता हो।। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष चाहे कोई भी जाति का हो। करोड़ों का चढ़ावा जो मदिरो में रखा है भारत के उन अविकसित ग्रामीण कमजोर शिक्षा प्रणाली में लगाये, अस्पताल, काॅलेज व सिस्टेमेटिक कालोनी के निर्माण में लगाये जहाॅ ये वर्ग रहे तो कम किराये पर रहे व शासन को आय हो इसी से इन्हें मूलभूत सुविधायें दी जाये। अब जमाना बदल रहा है। इन वर्गों को अपना सर्वश्रेष्ठ साबित करने का ढोग छोड़ना होगा। मेहनत का खाना होगा। भारत के सभी मंदिरों में हर साल हर जाति का व्यक्ति पुजारी बने हमेशा बदलता रहे एक ट्रस्ट रहे जिसमें लेखा जोखा रहे व साफ सफाई मरम्मत पूजा पाठ का जिम्मा हर एक सरकारी व्यक्ति पर रहे जो गृहस्थी में नहीं। उसका पद अलग से सरकारी आदेश कर निकाला जाय। जो योग्य हो उनका टेस्ट लिया जाय। उसे उसकी तन्ख्वाह दी जाय। परंतु किसी भी हालत में चढ़ावे की सामग्री व दान, आभूषणों पर सिर्फ केन्द्रीय सरकार या उस जिले की राज्य सरकार का कब्जा रहे। वह भी मानवीय जरूरती पूरी करने की बजाय सड़कों, बिजली, पानी, धर्मशालाओं की व्यवस्था पर खर्च किये जाये। इससे कोई तूफान नहीं उठेगा। बस पंडितों को सर्वश्रेष्ठ कहलाने की पद्धति पर विराम लग जायेगा। आखिर सारे देवी देवता उन्हीं के इशारों पर चलने के लिए थोड़े पैदा हुए हैं। वे सामान्य इंसान कहलायेंगे। जातिप्रथा टूट जायेगी। बाकी सब ठीक है। परंतु इन वर्गों को स्वयं आगे आकर आत्ममुग्ध वाली छबि से बाहर निकलकर भारत के लिय करना होगा। 
    दूसरी बात इन दलित शोषित कही जाने वाली समाजों के बुद्धिजीवीकारों नेताओं छात्रों, युवक युवतियों को भी सोचना होगा। केवल ब्राम्हण व सवर्ण विरोधी नारे लगाने व इन्हें जमकर कोसने से कुछ नहीं होगा। इन्हें अपने पिछड़े भाई बहनों को मिशन बनाकर सरकारी योजनाओं की जानकारी देनी होगी। चाहे वह कला का क्षेत्र हो, तकनीकी क्षेत्र हो, या बिजनेस या अन्य कोई हर जानकारी से इन्हें अपडेट रहना होगा। साथ ही अपने बेरोजगार, गरीबी में झुग्गी में रहने वाले डिशोवय लोगों तक ये स्ववित्तीय योजनायें, स्वरोजगार योजनाएं की जानकारी पहुंचानी होगी। जिस तरह से सवर्ण जातियां अपनी मेहनत/चालाकी से ऊपर तक पहुंची भारत का नाम ऊंचा किया सम्भावित जीवन जी रहे हैं उनके लिये उन्होंन जी तोड़ मेहनत की है। तो आपको उनसे डबल मेहनत करना है। भारत को महान बनाने में जहां अधिकार छीनना पड़े, छीनों, जहां लड़ना पड़े शांतिपूर्ण तरीके से लड़ो, स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ो। क्योंकि देश को चलाना मामूली बात नहीं हैं भारत के योगदान से सभी वर्गों का साथ होना जरूरी है। कुछ काम स्वयं इन जातियों को स्वयं करना है। सोचना है इन्हें इसी अवस्था में रहना है या आगे जाना है। क्योंकि भारत में कितनी ही अवरोध हो पर गुणी व योग्य लोगों की हमेशा कदर होती है। सत्य ही आँधी देवता भी नहीं रोक पाते। तो जय भारत जय जय भारत। 
- सीमा मेश्राम

 





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