बावरी बौद्ध विहार TPSG Friday, August 7, 2020, 07:35 PM प्रति, मा. आंद्रे एंजोले सर, महानिदेशक यूनेस्को, यूनेस्को (UNESCO) 'संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संघटन UNESCO संस्था कार्यालय:पेरिस, फ़्रांस. संदर्भ:_"बावरी बौध्द विहार"साकेत भूमि सरयू नदी परिसर उतर प्रदेश भारत। (84 एकड़ "साकेत") विषय:_ बौद्ध धरोहर पर "अयोध्या मंदिर" का कब्जा तथा अतिक्रमण क्यों..? अपिल:_ युनेस्को यह विश्व विरासत स्थल या ऐसे खास स्थानों को सर्वधन व संरक्षन संस्थान हैं जो विश्व विरासत स्थल समिति द्वारा चयनित होते हैं; तो हम भारतीय बौद्ध समाज युनेस्को समिति को एक निवेदन के तह भारतीय बौद्ध स्थलों की पुन: देख रेख युनेस्को के तत्वाधान में करने की विनंम्र अपिल करते है। इस कार्यक्रम के उद्देश्य एवं ध्येय के तह भारतीय बौद्ध सभ्यता के भारतीय बौद्ध धरोहरो, विहारों, स्थलो, चैत्यों और स्मारकों को पून: चयनित एवं संरक्षित करना चाहिए। जो विश्व सभ्यता तथा संस्कृतिय की दृष्टि से मानवता के लिए महत्वपूर्ण हैं और भारतीय बौद्ध धरोहर के संर्वधन और संरक्षन की नयी सूची तयार की जाए। क्योंकि आज, कल और भविष्य में भारतीय बौद्ध धरोहरो,विहारो, स्तूपो, चैत्यों और बौद्ध स्मारको पर धर्मांध ब्राह्मण समाज का कब्जा व अतिक्रमण खतरे,धोके बढ़ रहें हैं उसे जल्द से जल्द समय में रोखाँ जाएं। मा महोदय सर, हमं यूनेस्को (UNESCO) 'संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संघटन UNESCO संस्था कार्यालय: पेरिस, फ़्रांस की सेवाओं में "एक अपिल" युनेस्को (UNESCO) यह विश्व विरासत स्थल या ऐसे खास स्थानों को सर्वधन व संरक्षन संस्थान हैं जो विश्व विरासत स्थल UNESCO समिति द्वारा चयनित होते हैं; तो हम भारतीय बौद्ध समाज युनेस्को (UNESCO) समिति को "एक निवेदन" के तह भारतीय बौद्ध स्थलों की पुन: देख रेख युनेस्को के तत्वाधान में करने की विनंम्र अपिल करते है। इस कार्यक्रम के उद्देश्य एवं ध्येय के तह भारतीय बौद्ध सभ्यता के भारतीय बौद्ध धरोहरो,विहारों, स्थलो, चैत्यों और स्मारकों को पून: चयनित एवं संरक्षित करना चाहिए। जो विश्व सभ्यता तथा संस्कृतिय की दृष्टि से मानवता के लिए महत्वपूर्ण हैं और भारतीय बौद्ध धरोहर के संर्वधन और संरक्षन की नयी सूची तयार की जाए। क्योंकि आज, कल और भविष्य में भारतीय बौद्ध धरोहरो,विहारो, स्तूपो, चैत्यों और बौद्ध स्मारको पर धर्मांध ब्राह्मण समाज का कब्जा व अतिक्रमण खतरे,धोके बढ़ रहा हैं उसे जल्द से जल्द रोखा जाए। (उत्तर प्रदेश क्षेत्र में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को कोई "अंतरराष्ट्रीय विश्व कोर्ट" में अब चूनौती खड़ी करने वाली "पुर्नविचार याचिका" कोई दाखिल करेंगाँ क्या? कि यूँ ही अब ऐ, विश्व बौध्द भिक्ख्क्षु,भिक्ख्क्षनी, बौध्द विव्दान या डा.अम्बेडकर-राईट राष्ट्रीय-अंतरराष्टीय बौध्द संघ का लक्ष ऐसे भट़कता रहेंगाँ क्या!) "निगण्ठ-नाथपुत्त" (समन महावीर स्वामी) एवं महान धम्म-रा़ज सिद्धार्थ गौतम बुध्द के सम्राट प्रसेनजीत समकालिन व्यक्तित्व रहें हैं। कोसल नरेश प्रसेनजीत का शासन ''साकेत प्रदेश" पर सम्पूर्ण था। "भगवान गौतम बुध्द" ने बोधिप्राप्ति के कुछ वर्षपूर्व "बावरी बौद्ध विहार" से "फेणसुत्त व दारुक्खन्ध सुत्त" के व्दारा "साकेत" के लोगों को सम्बोधित कर धम्म कि मार्मिक शिक्षा का उपदेश दिया हैं। "संयुक्त निकाय" व "अंगुत्तर निकाय" के बहुसंख्य सुत्त साकेत के निवासीयों में धम्म कि यथार्थ शिक्षा का आदर्श को दर्शाते हैं। देवानंपिय पियदसी राञो असोक के कार्यकाल 267-232 ईसा पूर्व में परिपूर्ण हूँआ ऐसे इतिहास के उल्लेख तथा साक्ष्य प्रमाणित करते हैं कि साकेत प्रदेश में "बावरी बौध्द विहार" स्तूप का पूर्ण विकास हो चूँका था। जिस को सुप्रीम कोर्ट के झूठे निर्णय व दाँवों पर अब अयोध्या मंदीर कि नींव खड़ी हूँई हैं। वह "बावरी बौध्द विहार" (तीन वृतकार-Circle) स्तूप पर अब समतलीकरण के दौरान मिलें "बुध्द विहार स्थापत्य अवशेष चैत्य, स्तूप-थुप, बुध्द मूर्ति, शिलालेख, भग्न अवशेष, स्तंभ, रेलिंग ई. कलात्मक वस्तुओं" जैसे प्रमाण पुरातात्विक स्त्रोत, स्थापत्य अवशेष सामग्रि, वस्तुओं को निर्माण कन्स्ट्रक्शन भूमि से बाहर "वैशाख माह" के 2020 में बाहर आ रहें हैं। भारत के प्राचीन बौध्द नगरों में से एक साकेत हैं। "साकेत सरयू नदी" के परिसर में "बावरी बौद्ध विहार" स्थल हैं यह भी तीनों प्रेरणा स्थल जैसे बौद्ध सभ्यता का महत्वपूर्ण प्रमुख केंद्र है। "साकेत" "बौद्ध नगरी शिक्षा" और "शिक्षण का केंद्र" और "विश्व महाविद्यालयों का क्रांतिकारी" स्थल भी रहा है। दर असल,1981-1982 ईस्वीं में "साकेत प्रदेश" में अयोध्या क्षेत्र के लिए एक उत्खनन किया गया था। यह उत्खनन मुख्यत: काल्पनिक अयोध्या के लिये हनुमानगढ़ी और लक्ष्मणघाट क्षेत्रों में हुआ था जहां पर वहा भगवान गौतम बुद्ध के बौद्ध कालिन समय के कलात्मक विहार, स्तूप, चैत्य के अवशेष प्राप्त हूँए। तो माना जाता है कि यहां बहूसंख्य, अनेक बौद्ध विहार, स्तूप, चैत्य, कलात्मक स्मारक और बौद्ध कलाकृतीया मौजूद हैं। इसलिए यह स्थान कभी भी राम जन्मभूमि पर नहीं हो सकता है। आज भी "साकेत" (अयोध्या) के आसपास एक नहीं लगभग "20" से जादा "बौद्ध विहार", स्तूप, चैत्य या बौद्ध स्मारक, स्थल होने का उल्लेख इतिहास में मिलता है। ऐसा कहते हैं कि "भगवान गौतम बुद्ध" की प्रमुख उपासिका "विशाखा" ने " महान विञान के आविष्कारक धम्म-राज सिद्धार्थ गौतम बुद्ध" के सानिध्य में "साकेत" (अयोध्या) नगर में "धम्म की दीक्षा" ली थी। इसी के स्मृतिस्वरूप में विशाखा ने "सरयू नदी" प्रदेश (अयोध्या) में मणि पर्वत के परिसर समीप "बौद्ध विहार" की स्थापना करवाई थी। यह भी कहते हैं कि बुद्ध के "महापरिनिर्वाण" के बाद इसी "बावरी बौद्ध विहार" में "बुद्ध के दांत" रखे गए थे। "कौशल नरेश प्रसेनजित" काल में बौद्ध भिक्ख्क्षु व भिक्ख्क्षुनी संघ के लिए "बावरी विहार बौद्ध" बनवाया था। इस विहार को पुष्यमित्र शुंग ने ध्वस्त कर दिया था। बाद में इस स्थान पर 78 ईसा शताब्दी "सम्राट कनिष्क" एवं सम्राट हर्षवर्धन 606-645 ई़.शताब्दी के मध्य तथा "सम्राट हर्षवर्धन" द्वारा बावरी बौद्ध विहार" के केन्द्र में उक्त ("तीन स्वतंत्र अर्धगोलाकार ईंट निर्मित ढांचा" था) स्तूप का जिर्णोधारकार्य तथा पुर्नःर्निर्माण प्रक्रिया करायी गई। दरअसल, "फ़ाहियान" एक चीनी पर्यटक बौद्ध भिक्ख्क्षु 399-412 ईसवी तक भारत, सिरियलंका-सिलोन राष्ट्र और नेपाल (आधुनिक) में स्थित भगवान गौतम बुद्ध की बौद्ध सभ्यता के पर्यटण अध्ययन और अध्यापन के दृष्टि से भारत आए। उनका महान ध्येय यहाँ से बौद्ध ग्रन्थ संग्रह एकत्रित करके उन्हें वापस चीन ले जाना था। उन्होंने अपनी बौद्ध पर्यटण अध्ययम व अध्यापन का वर्णन अपने वृत्तांत में लिखा जिसका नाम "बौद्ध राज्यों का एक अभिलेख : चीनी भिक्षु फ़ाहियान" की बौद्ध अभ्यास-पुस्तकों की खोज में भारत और सीलोन की यात्रा था। यहां पर 629-645 ई.शताब्दी के बीच में चीनी पर्यटक "ह्वेनत्साण्ग" बौद्ध धम्म अध्यापन को आया था। "ह्वेनत्साण्ग लिखित: सी-यू-की भारत" प्रवास वृतन्त ग्रंथ अनुसार यहां 20 से अधिक भव्य बौद्ध विहार स्मारक थे तथा 3000 भिक्ख्क्षु रहते थे और यहां "बौद्ध विहार विश्वविद्यालयो"ं का एक प्रमुख सहाय्यक केंद्र और "भव्य तीन वृत्तकार" "बावरी बौद्ध विहार" था। "डा.मललसेकर, डिक्शनरी ऑफ पालि प्रापर नेम्स", भाग 1, के अनुसार "साकेत"वासी उपासक "भगवान गौतम बुद्ध" के बहुत बड़े प्रशंसक अनुयायी थे और उन्होंने उनके निवास के लिए वहां पर अनेक भव्य विहार, बौद्ध स्मारक का निर्माण भी करवाया था। "संयुक्तनिकाय" में उल्लेख आया है कि भगवाम गौतम बुद्ध ने साकेत नगर बहुत बार गए। इस उक्त सुत्त में भगवान गौतम बुद्ध को सरयू नदी के तट पर विहार करते हुए बताया गया है। इसी "निकाय की अट्ठकथा" में कहा गया है कि यहां के निवासियों ने "सरयू नदी" परिसर क्षेत्र के तट पर अनेक रमनिय विहार बनवाकर "संघ प्रमुख भिक्ख्क्षु व भिक्ख्क्षुनी" को "धम्मदान" कर दिया था। वर्तमान मे साकेत सरयू नदी परिसर क्षेत्र के तट पर स्थित हीं है। अयोध्या के संदर्भ में इन 1.आर्कियोलॉजिकल सर्वेक्षण उत्खनन की रिपोर्ट, 2.पुरातत्व स्थापत्य वास्तुओं के कार्बन डेटिण्ग अँनालिसिस रिपोर्ट 3.पुरातत्वविद संशोधक व्यक्तित्व के शोध अनुसार, 4.प्राचीन अवशेषों के आधार और 5.रामायण के 114 संस्कृत किताबों के विविध संस्करण में वर्णन अन्य स्थान एवं मूलनिवासी इतिहासकार और संशोधक व्यक्तित्व के अनसुार वैदिक या पौराणिक सामग्री के आधार पर पुरातात्विक साक्ष्यों का कोई समीकरण न तो ग्राह्य है और न ही प्रमाण। साकेत नगर (''बावरी बौद्ध विहार" के केन्द्र में उक्त "तीन अर्धगोलाकार ईंट निर्मित ढांचा") परिसर को सन 2018 में [(फैजाबाद=अयोध्या में उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने अयोध्या के रूप में "फैजाबाद" जिले का नाम बदलने और जिले के प्रशासनिक मुख्यालय को "अयोध्या शहर" में स्थानांतरित करने की मंजूरी दी थी। "फैजाबाद राज्य" की "राजधानी लखनऊ" से लगभग 130 किलोमीटर पूर्व में घाघरा नदी (जिसे "साकेत" सरयू नदी तट के नाम से जाना जाता है) के तट पर स्थित है। )] क्षेत्र का सर्वप्रथम आजादी के पुर्व भारतीय आर्कियोलॉजीकल सर्वे डिपार्टमेंट के द्वारा सर्वेक्षण हूँआ उस उत्खनन रिपोर्ट से साकेत बावरी बौद्ध विहार तथा बौद्ध स्तूप का इतिहास बाहर आया हैं। प्रोफेसर अवध किशोर नारायण के नेतृत्व में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के एक दल ने सन 1967-1970 में सर्वे किया था। यह उत्खनन मुख्यत: जैन घाट के समीप के क्षेत्र, लक्षण टेकड़ी एवं नल टीले के कुछ समीपवर्ती क्षेत्रों में हुआ। वह उत्खनन सर्वे बावरी बौद्ध विहार साकेत स्थल की रिपोर्ट नहीं हैं। "सनातन ब्राम्हण के हिंदू" और "बौद्ध" में कोई भी एक समानता नहीं हैं। इसका कोई वास्तविक सत्य आज भी प्रमाण नहीं हैं? दरअसल, "बौद्ध काल क्रांति" का रहा हैं और "धर्मांध ब्राम्हण प्रतिक्रांतिवादी" थे। "बौद्धों" के बीच क्रांति तत्व बौद्धिक विकास का नीति क्षेत्र रहा हैं। तो "धर्मांध ब्राम्हण यह प्रतिक्रांतिवादी" रहें और ऐ "अन्ध-श्रद्धा, कर्म-काण्ड और अन्ध-विश्वास" की भ्रम भावना से "षड़यंत्र दृष्टि" के "जाति" देखने वाले हैं "कुटिलनीति के धर्मांध ब्राह्मण" जनों के बीच लढ़ाई झगड़े लगाने वाले रहें हैं व आज भी मिलती है। इस भावना के ही चलते जब कोई अल्पसंख्या समाज का प्राचीन बौद्ध विहार, स्तूप, चैत्य धरोहर पर बौद्ध का नियंत्रण हट़ा या लक्ष ना रहा तो उसमें ब्राम्हण हिन्दूओं ने कब्जा कर अतिक्रमण किया हैं? और बौद्ध धर्म से जुड़े प्रतीकों को स्तंभों पर अंकित मानवीय यक्ष लोक, गंधर्व लोक, नाग लोक और देव लोक कि मूर्तिमुद्रा का विकृतिकरण किया जाता रहा हैं। आज भी भारत में भगवान गौतम बुद्ध को ऐ कुटनीति के तह अवतार बता कर बुद्ध को श्री विष्णु, श्री शिव, तिरुपती, विठ्ठल जैसे में बदलने के खुप प्रयोग हूँए हैं। ऐसे प्राचीन बुद्ध मूर्तियों को बदलने के बहू विविध उपाय धर्मांध ब्राम्हणों द्वारा किये गए हैं। बौद्ध विहार को मंदिर बनाया गया है। भारतीय प्रदेश में बहुसंख्य विहार, स्तूप, चैत्य, गुफाएं हैं जहां ब्राम्हण सनातन हिंदूओं का अतिक्रमण होते रहा हैं? ऐसे कई अतिक्रमण बौद्ध विहारों, स्तूपों चैत्यों और बौद्ध स्मारक के धरोहर पर देखे जा सकते हैं! अब भारत में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखण्ड, कर्नाटक....... जम्मू कश्मिर ऐसे 29 राज्य तथा 6 संघशासित प्रदेश हैं? एवं नेपाल, थाईलैंड, म्यांमार, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि देशों में इसे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। गुप्तकाल में भी राजाओं के द्वारा बौद्धों विहारो, स्तूपों तथा चैत्यों पर अतिक्रमण होते रहें हैं। कुछ अक्ल बेच खाए धर्मांध ब्राम्हण लोगों को इतिहास को विकृत कर के पढ़ने की आदत हैं और दुर्भावनावश टशंट में सभी ब्राम्हणवादी ईष्यावश अनाप शनाप बक ही देते हैं। ऐसे धर्मांध ब्राम्हण सनातन लोगों का पर्दाफाश करना चाहिए कि वे वास्तविकता को दूषित कर मूलनिवासी भारतीय व्यक्तित्व को भ्रमित करते रहते हैं। इस कुटिलनीति को भांपकर बौद्ध ने विचार करना चाहिए! जहां तक सवाल साकेत (अयोध्या) का हैं तो वहां बौद्ध सभ्यता का पवित्र दार्शनिक विचार केन्द्र था। जैसे1.कपिलवस्तु के लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) का जन्म हुआ, 2.बोधिगया में सिद्धार्थ गौतम को पीपल वृक्ष के नीचे सम्बोधि प्राप्त हुई हैं,3.सारनाथ में इषिपत्तनम-मृगदाव वन में धम्मचक्र प्रवर्तन और 4.कुशीनारा में शालवृक्ष के नीचे महापरिनिब्बाण-महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था। "शाक्यमुनि भगवान गौतम बुद्ध" द्वारा "साकेत प्रदेश" के "बावरी बौद्ध विहार" में "फेनसुत्त" की पृष्ठ-भूमि में "एक सर्व-व्यापक जीवन-तत्व का विस्तृत मार्गदर्शन विद्यमान" हैं जिसे हम स्वयं में देख सकते हैं। उस काल में "सरयू नदी" के परिसर के इन नगर को "साकेत" कहा जाता था। भगवान गौतम बुद्ध का जन्म ईसापूर्व 563 में हुआ था। शाक्य वंश में जन्में भगवान गौतम बुद्ध ने कभी भी खंडन-मंडन या नफरत के आधार पर अपने सिद्धांत या धर्म को खड़ा नहीं किया। महान विज्ञान के आविष्कार धम्म-राज भगवान गौतम बुद्ध के व्यक्तित्व में संघर्ष की समय सीमा के उपरान्त परिपूर्ण परिक्षन के बाद असिम ज्ञान की बोधि प्राप्त हूँई हैं । प्राचीन भारतीय ज्ञान को सिद्धार्थ गौतम बुद्ध ने श्रेणीबद्ध किया था। इस बात को तभी समझा जा सकता हैं जब कि कोई व्यक्ति पालि ती-पिटिका और पालि-अठ्ठकथा जैसी ग्रंथ संपदा का गहन अध्ययन करना चाहिए। जो बौद्ध हैं उन्होंने, "द बुद्ध और उनका धम्म" का पूर्ण अध्ययन करने पर तो उन्हें "पालि ती-पिटिका" और "पालि अठ्ठकथा" क्या हैं? इससे "भारत देश के भूगोल" को समझ बौद्धों की भूमि, स्थल, प्रदेश, राज्य, जिला, नगर और ग्राम या गाँव ई. का सम्पूर्ण ज्ञान हो जाएगां और "भूगोल एवं मानव भूगोल" यदि से "बौद्धों के प्राकृतिक तत्वों" के अंतर्संबंधों का सम्यक ज्ञान हो जाएगां। ऐसा होता हैं तो अस्पृश्य और कुटिलनीति धर्मांध ब्राह्मणों का पर्दाफाश हो जाएगा। 6 अगस्त से 16 अक्टूबर तक इस मामले पर 40 दिनसुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुप्रीम कोर्ट पीठ द्वारा शनिवार को 45 मिनट तक पढ़े गए 1045 पन्नों के फैसले ने देश के इतिहास के सबसे अहम और एक सदी से ज्यादा पुराने विवाद का कैसे अंत कर दिया? चीफ जस्टिस गोगोई, जस्टिस एसए बोबोडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ ने स्पष्ट किया कि मंदिर को अहम स्थान पर ही बनाया जाए। विवादित जमीन का स्वामित्व केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगा। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने जब कहा-राम जन्मभूमि स्थान न्यायिक व्यक्ति नहीं है, जबकि श्री राम न्यायिक व्यक्ति हो सकते हैं ऐ कैसे.? नेपाल प्रधानमंत्री "केपी शर्मा ओली" ने दावा कि "असली अयोध्या" नेपाल के "बीरगंज" के पास एक गाँव हैं जहाँ श्री राम का जन्म हुआ था।श्री राम, "अयोध्या" और इनसे जुड़े विभिन्न स्थानों को लेकर तथ्यों की जानकारी के लिए केवल उस "विशाल सांस्कृतिक भूगोल" के "अध्ययन," "शोध" और संशोधन के महत्व का उल्लेख कर रहे थे जिसे रामायण प्रदर्शित करती है।' बता दें कि नेपाल के प्रधानमंत्री "केपी शर्मा ओली" ने सोमवार को एक कार्यक्रम में कहा था कि असली "अयोध्या" नेपाल में है और "भारत (धर्मांध ब्राह्मण लोगो) ने सांस्कृतिक कब्जा,अतिक्रमण" करने के लिए वहां "फर्जी अयोध्या" का निर्माण कराया। मुस्लिमों ने ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं ही किया, जो यह दर्शाता हो कि वे 1857 से पहले मस्जिद पर पूरा अधिकार रखते थे। "बावरी बौद्ध विहार" अपभ्रंश "बाबरी मस्जिद" विध्वंस सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह एकदम स्पष्ट है कि 16 वीं शताब्दी का "तीन गुंबदों"-बावरी बौद्ध विहार" के केन्द्र में उक्त("तीन अर्धगोलाकार) ईंट निर्मित ढांचा" था,(अर्ध वृतकार -Circle भव्य अर्ध वृत्त-गोलाकार) वाला ढांचा सनातन ब्राह्मण हिंदूओं के कारसेवकों ने ढहाया था, जो वहां श्री राम का मंदिर बनाना चाहते थे। यह ऐसी अमानवीय भयानक गलती थी, जिसे न्याय के पक्ष में सुधारा कर दोषियों को सक्त शिक्षा-दण्ड़ दे सुधारा जाना चाहिए था। कानून के हिसाब से चलने के लिए प्रतिबद्ध धर्मनिरपेक्षतः देश में पूर्णतः लागू हैं। सम्राट हर्षवर्धन के शासन-काल 606-645 ई. शताब्दी के बीच में ही चीनी-यात्री "ह्वेनसाण्ग" भारत आए। "ह्वेनसाण्ग" द्वारा लिखी "सी-यू-की" किताबें,भारत प्रवासवृत्त विवरण और प्राचीन पर्यटक प्रवासियों के ग्रंथ दर्शाते हैं कि "साकेत" (अयोध्या) भगवान गौतम बुद्ध के बौद्ध सभ्यता की भूमि रही हैं। ऐतिहासिक उद्धहरणों से संकेत मिलते हैं कि काल्पनिक अयोध्या वास्तविकता में कोई भूमि नहीं है।" इस तथ्य की पुष्टि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) कर चुका है। कि पुरातात्विक प्रमाणों को महज एक ओपिनियन करार दे देना एएसआई का अपमान होगा। हालांकि, एएसआई ने यह तथ्य स्थापित नहीं किया कि "अयोध्या में ना कोई मंदिर" था और "ना कोई वास्तुनिर्माण को गिराकर मस्जिद" बनाई गई। मौजूदगी तो इस स्थान की बौद्ध धार्मिक विहार, स्तूप, चैत्य जैसे भव्य स्मारक के वास्तविक सबूत हैं। हालांकि,धर्मांध आस्था और अन्ध विश्वास के आधार पर कोई भी "मालिकाना हक" तय नहीं किया जा सकता है।" बौद्ध ग्रन्थों में इन नगरों को पहले मूल "साकेत" और बाद में अपभ्रंश "अयोध्या" कहा जाने लगा। "अयोध्या=फैजाबाद" भारत के राज्य उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर हैं, एक नगर निगम है। यह "6 नवंबर 2018" तक फैजाबाद जिला और फैजाबाद मंडल का मुख्यालय था,उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने "अयोध्या" के रूप में "फैजाबाद जिले" का नाम बदलने और जिले के प्रशासनिक मुख्यालय को "अयोध्या शहर" में स्थानांतरित करने की मंजूरी दी थी। इस देश के इतिहास में "प्राचीन बौद्ध विहारों", एवं स्तूपों, चैत्यों, विश्व धरोहर पर कब्जा कर उस पर ब्राम्हण धर्मांध लोगों द्वारा मंदिर जैसे "अतिक्रमण" करने के अगणित सत्य हैं। विद्वान व्यक्ति भले ही भूल जाते हैं कि "बौद्ध धर्म" पर "प्रतिक्रांति ब्राम्हण सनातन" परंपरा का ही एक हिस्सा हैं जो "भगवान गौतम बुद्ध" को धर्मांध ब्राम्हण नाम मात्र काल्पनिक श्री राम की ही तरह श्री विष्णु का अवतार माना जाता हैं,ऐ धोकेबाजी ही शुद्रो और अस्पृश्य लोगोें से मानसिक गुलामी निर्माण करने में साधक शस्त्र हैं । सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठते रहेंगे की "न्याय" व्यवस्ता में "ब्राम्हणों" का कोई "न्यायिक चरित्र" नहीं हैं ऐ ऐसे इतिहास के पन्नो का अंश मात्र हैं। परंतु उक्त तर्क को किसी ने आज तक छुआ ही नहीं हैं, क्योंकि सभी विचारवंत "बावरी बौद्ध विहार" शब्द के बारे में आई ऐतिहासिक खोज और संशोधन से "बावरी बौद्ध विहार" शब्द की उत्पती का अध्ययन व अध्यापन "बौद्ध सभ्यता" कि दृष्टि से ही वास्तविक शोध की सामग्री अब "अंतरराष्ट्रिय विश्व न्यायालय" को बहाल कर प्रस्तूत कर सकते हैं! जब की विश्व ग्रंथगार इतिहास के विविध काल में "बावरी बौद्ध विहार" का सिधा अस्थित्व सर्वे आर्कियोलाँजिकल्स डिपार्टमेंन्ट की विश्व विद्वानों कि रिपो़र्ट में भी इसका प्रमाण समझकर उल्लेख किया हैं। सर अलेक्झेण्डर कनिंघम जैसे खोजिओं के आर्कियोलॉजी रिपोर्ट तथा डिस्ट्रिक्ट गँझेटीटरी पर हजारो उल्लेखित ग्रंथ संपदा और बावरी बौद्ध विहार "बुध्द विहार, चैत्य-थुप, बुध्द मूर्ति, बुद्ध धातू, शिलाओं, शिलालेख, अवशेष,स्तंभ, रेलिंग" जैसे प्रमाण पुरातात्विक स्त्रोत, अवशेष सामग्रि, वस्तुएँ" उपलब्ध हैं। "साँची बौद्ध स्तूप" की समानत: "बावरी बौद्ध विहार" बहूत हद्द तक समान हैं जब हम "साँची बौद्ध स्तूप" के "स्थल", "फोटो" एवं "पाषाण स्टोन" का तैलिक अध्ययन करे तो स्पष्ट हो जाता हैं कि "साँची का महान मुख्य स्तूप", मूलतः "सम्राट अशोक महान" ने तीसरी शती, ई.पू. में बनवाया था। "साँची बौद्ध विहार" के केन्द्र में उक्त "एक अर्धगोलाकार ईंट निर्मित ढांचा" था, जिसमें भगवान बुद्ध के कुछ अवशेष रखे थे। इसके शिखर पर स्मारक को दिये गये ऊंचे सम्मान का प्रतीक रूपी "एक छत्र"था। साँची बौद्ध स्तूप यद्यपि "पाषाण निर्मित" हैं, किंतु "काष्ठ की शैली" में गढ़े हुए तोरण, वर्णात्मक शिल्पों से परिपूर्ण हैं वैसे बावरी बौद्ध स्तूप साकेत की निर्माण शैली एक समान नक्काशियों की है। (इन में बुद्ध की जीवन की घटनाएं, दैनिक जीवन शैली से जोड़कर दिखाई गईं हैं। इस प्रकार देखने वालों को भगवान गौतम बुद्ध का जीवन और उनकी वाणी भली प्रकार से समझ में आती है। साँची और अधिकांश अन्य स्तूपों को संवारने हेतु स्थानीय लोगों द्वारा भी धम्म-दान दिये गये थे, जिससे उन लोगों को धम्म-दार्शनिक तत्व की प्राप्ति हो सके। "कोई सीधा राजसी आश्रय" नहीं उपलब्ध था। धम्म-दानकर्ता, चाहे स्त्री या पुरुष हों, सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) के जीवन से संबंधित कोई भी घटना चुन लेते थे और अपना नाम वहां खुदवा देते थे। कई खास घटनाओं के दोहराने का, यही कारण था।) इन "पाषाण नक्काशियों" में, बुद्ध को कभी भी मानव आकृति में नहीं दर्शाया गया है। बल्कि कारीगरों ने उन्हें कहीं घोड़ा, जिस पर वे अपने वैभवशाली पिता के घर का गृहत्याग कर के गये थे, तो कन्ही के स्मृति पादचिन्ह, कहीं बोधि वृक्ष के नीचे का चबूतरा, जहां उन्हें बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी, के रूप में दर्शाया है। महान दार्शनिक धम्म-राज भगवान गौतम बुद्ध के लिये मानव शरीर अति तुच्छ माना गया था।साँची की दीवारों के बॉर्डरों पर बने चित्रों में जातक कथा एवं बौद्ध पर्यटण अध्ययनकर्ताओं में यूनानी पहनावा भी दर्शनीय है। इसमें यूनानी लोगों के संबंध वस्त्र, मुद्रा और वाद्य हैं जो कि स्तूप के अलंकरण रूप में प्रयुक्त हुए हैं। बौध्द "सम्राट बृहद्रथ" 191-187 ई.पू.कि षङयंत्र से हत्या के उपरान्त "साकेत" को हि अयोध्या जैसे भ्रमित नाम पुष्यमित्र शुंग ने शुंगकाल में ब्राह्मण व्यवस्था व्दारा किया होगा ऐसे "दन्तश्रुति या श्लोक निर्माण" उत्तर प्रदेश क्षेत्र में हूँऐ हैं। परन्तू "फायह्यान" व "ह्वेनत्साण्ग" के "भारत प्रवास वृत्तन्त" विवरण कि ग्रंथ में "बावरी बौध्द विहार, स्तूप "साकेत प्रदेश" स्पष्ट लिखित साक्ष्य प्रमाण प्रस्तुत हैं। वास्तविक "बावरी बौध्द विहार", स्तूप साकेत भूमि का मूद्दा आगे न आए ऐसे षङयंत्र को न्याय शब्दों में दफन करके इतिहास को दबाकर नष्ट किया जा रहा हैं। ऐ न्याय कैसे सर्वोच्च हैं? क्या "बौध्दों के ऐतिहासिक विश्व धरोहर" को सुप्रीम कोर्ट के ब्राह्मणी धर्मांध जजों कि भ्रष्ट व्यवस्था व्दारा नष्ट करती रहेंगीं? सारनाथ भगवान गौतम बुध्द ने प्रथम उपदेश दिया जिसे धम्मचक्र प्रवर्तन कहते हैं। कुशीनारा में भगवान गौतम बुध्द ने निब्बाण प्राप्त किया जिसे महापरिनिर्वाण कहते हैं। सर्वोत्तम धम्म क्रांति पर आज धर्मांध ब्राह्मणों के प्रतिक्रांति का नाम "अयोध्या मंदिर" कब्जा, अतिक्रमण हैं? 2018 में उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने "अयोध्या" के रूप में "फैजाबाद" जिले का नाम बदलने और जिले के प्रशासनिक मुख्यालय को "अयोध्या शहर" में स्थानांतरित करने की मंजूरी दी थी। "फैजाबाद राज्य" की "राजधानी लखनऊ" से लगभग 130 किलोमीटर पूर्व में घाघरा नदी (जिसे साकेत सरयू नदी के नाम से जाना जाता है) के तट पर स्थित है। हमं चंद शब्दों में निषेध कह चेन कि निन्द ले ऐसे हि सोते रहेंगे और डा.अम्बेडकर-राईट बोलते बोलते हि मर जाएँगे? लगातार पोस्ट करने का मतलब ऐ नहीं कि मैं फुर्सत में हूँ, बस एक जुनून हैं बौध्दों में "अम्बेडकरराईट" अग्नि जलती रहें। काल आज तथा भविष्य में बौध्दों के सम्यक दृष्टी के रुप का और "पाखंडवाद" को रोखने का माध्यम संवाद हैं। हमं यूनेस्को (UNESCO) 'संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संघटन UNESCO संस्था कार्यालय: पेरिस, फ़्रांस की सेवाओं में "एक अपिल" युनेस्को (UNESCO) यह विश्व विरासत स्थल या ऐसे खास स्थानों को सर्वधन व संरक्षन संस्थान हैं जो विश्व विरासत स्थल UNESCO समिति द्वारा चयनित होते हैं; तो हम भारतीय बौद्ध समाज युनेस्को (UNESCO) समिति को "एक निवेदन" के तह भारतीय बौद्ध स्थलों की पुन: देख रेख युनेस्को के तत्वाधान में करने की विनंम्र अपिल करते है। इस कार्यक्रम के उद्देश्य एवं ध्येय के तह भारतीय बौद्ध सभ्यता के सम्पूर्ण भारतीय बौद्ध (29 राज्य प्रदेश एवं 6 संघ शासित प्रदेश) धरोहरो, विहारों, स्थलो, चैत्यों और स्मारकों को पून: चयनित एवं संरक्षित करना चाहिए। जो विश्व सभ्यता तथा संस्कृतिय की दृष्टि से मानवता के लिए महत्वपूर्ण हैं और भारतीय बौद्ध धरोहर के संर्वधन और संरक्षन की नयी सूची तयार की जाए। क्योंकि आज, कल और भविष्य में भारतीय बौद्ध धरोहरो,विहारो, स्तूपो, चैत्यों और बौद्ध स्मारको पर धर्मांध ब्राह्मण समाज का कब्जा व अतिक्रमण के खतरे,धोके बढ़ रहें हैं उसे जल्द से जल्द रोखा जाए। साके़त "बावरी बौद्ध विहार" धरोहर पर "अयोध्या मंदिर" का कब्जा तथा अतिक्रमण क्यों..? जल्द से जल्द जाच कार्य बौध्द राष्ट्र प्रतिनिधीयों व्दारा कराई जाए। 5 अगस्त 2020 काला दिन निषेध... निषेध.. निषेध. धम्मानंद एल.वासनिक द बुद्धिस्ट सोसायटी अॉफ इंडिया. अमरावती शहर शाखा,अमरावती. जय भीम। जय भारत।। Tags : Buddhist Society Committee universal special places World Heritage UNESCO