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शील, समाधि और प्रज्ञा धम्म

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Thursday, October 3, 2019, 08:51 AM
Pragya Dhamm

शील, समाधि और प्रज्ञा धम्म

प्राचीनकाल से आत्मा और विश्व के आरंभ की निरर्थक चर्चा चली आ रही हैं। 

ऐसी उद्देश्यहीन चर्चा मानव समाज के लिए कल्याणकारी नहीं हैं, निरर्थक है।

तथागत बुद्ध के अनुसार भूतकाल में आचार्य आत्मा के बारे में या स्वयं के बारे में कुछ प्रश्न उठाते थे।

वे पूछते थे :-

*1) क्या मैं पहले था?*

*2) क्या मैं पहले नहीं था?*

*3) उस समय मैं क्या था?* 

*4) मैं क्या होकर क्या हुआ?*

*5) क्या मैं भविष्य में होऊंगा?* 

*6) क्या मैं भविष्य में नहीं होऊंगा ?*

*7) तब मैं क्या होऊंगा ?*

*8) तब मैं कैसे होऊंगा ?*

*9) मैं क्या होकर क्या होऊंगा?*

या तो वह अपने वर्तमान के विषय में संदेहशील होते थे :- 

*1) क्या मैं हूँ ?* 

*2) क्या मैं नही हूँ ?*

*3) मैं हूँ क्या ?*

*4) मैं कैसे हूँ ?*

*5) यह प्राणी कहां से आया हैं?* 

*6) यह किधर जायेगा?*

दूसरों ने विश्व के आरंभ के विषय में प्रश्न पूछे। 

*विश्व को किसने पैदा किया?* *क्या संसार अनंत हैं ?*

*जो शरीर हैं, वही जीव हैं ?*

*शरीर अन्य हैं, जीव अन्य हैं?*

ऐसे प्रश्न और ऐसी चर्चा निरर्थक हैं। इनसे प्राणीयों का कोई कल्याण होने वाला नहीं हैं।

आज के वैज्ञानिक युग में भी अधर्मी लोग उन निरर्थक प्रश्नो में भोली-भाली जनता को उलझाए रखते है और उनका शोषण करते है।

*मनुष्य के कल्याण के लिए,सुख व शान्ति के लिए आवश्यक है सदाचार का जीवन।*

अधर्मी और पाखंडी धर्म के ठेकेदार समाज को काल्पनिक आत्मा और परमात्मा को ढूंढने के लिए ललचाते है। जो नहीं है, वह भला कहाँ से मिले? इसलिए अधर्मी ठेकेदार बार बार काल्पनिक कहानी बनाकर,उसी कहानी को बदलकर लोगों को बेवकूफ बनाते है। इसलिए सावधान। सावधान होना ज़रूरी है।

*मनुष्य के सुख के लिए शील, समाधि और प्रज्ञा ही उत्तम मार्ग है।*





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