Taksh Pragya Sheel Gatha
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ढ़ाल

Sumedh Ramteke

Thursday, July 4, 2019, 06:40 PM
two brother

ढ़ाल
मेरा अनुज ‘‘कमल’’ ऐसे हैरत अंगेज कारनामे करता था कि मैं विस्मय से ठगा रह जाता। बचपन में एक बार सिर्फ दो रूपये की शर्त पर मालगाड़ी के नीचे दुबककर निकल गया। आश्यर्च की बात यह थी कि शर्त तब लगी थी, जब ट्रेन सीटी दे चुकी थी। सर्दी में एक बार अलाव तापते हुए किसी के उकसाने पर अंगारे हाथ में लेकर नाचने लगा। एक अंगारा उछलकर उसकी शर्ट के काॅलर में गिर गया, पाॅच दिन तक अस्पताल में मरहम पट्टी करवानी पड़ी। जब भी कोई उसे जोखिमभरा कार्य करने को कहता, वह उसे चुनौती की तरह लेता। यही नहीं, इन कार्यो को वह पूरे उत्साह से अंजाम देता।
कई बार आगा-पीछा बिल्कुल नहीं सोचता, जोेखिम भरे कार्य करना उसकी फितरत थी। बिच्छु का मंत्र न जाने, पर साँप की पिटारी में हाथ डाले। उसके कारनामे सुन-सुनकर अम्मा-पापा के रोंगटे खड़े हो जाते। सबको वह आफत की पुड़िया नजर आता। जब भी कोई विपत्ति या पेचीदगी में उलझ जाता, वह मेरे पास आकर खड़ा हो जाता। उसे पूरा विश्वास था, दादा के पास उसकी हर मुसीबत का हल है। दादा के होते हुए उसको कोई तकलीफ आ ही नहीं सकती।
वह मुझसे एक अजीब-सी आश्रय पाता। मुझसे दो जमात नीचे था। जब मैं पांचवी में था, वह तीसरी में। दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे। स्कूल समाप्त होते ही वह मुझे ढूंढने लगता। कई बार मेरे सहपाठी साथ होते, तो मैं उसे झिड़क भी देता। वह चुपचाप सुन लेता, फिर मुझसे पांच कदम पीछे चलता रहता। घर आकर मैं अम्मा से शिकायत करता - ‘‘अम्मा, यह चिपकू की तरह मेरे पीछे लगा रहता हैं। अम्मा मेरे सर पर स्नेह से हाथ फेरती - ‘‘ठीक ही तो करता है। तू इंजन है, यह डिब्बा है। तेरी उंगली पकड़कर नहीं चलेगा, तो किसकी पकड़ेगा। कमल की आँखे चमक जाती जैसे उसके किसी अभीष्ट कार्य का अनुमोदन हो गया है।
रात में कई बार न जाने कहाँ-कहाँ से भूतप्रेतों की कहानियाँ सुनकर आता। उसका बिस्तर अलग लगा होता, पर जैसे-तैसे मुझे मनाकर मेरे बिस्तर में घुस जाता - ‘‘दादा! मुझे आपके साथ नींद अच्छी आती है।’’ उसकी मोर-सी मीठी बोली मेरा मन हर लेती। दरअसल, मैं खुद भी रातों में बहुत डरता था, पर कमल की नजरों में मैं एक निर्भीक, निडर व्यक्ति था, जो भूत-प्रेत के हौसले भी पस्त कर सकता है। उसका भ्रम कई बार मेरे मन में अजीब-सी गुदगुदी पैदा करता, बचपन में ही कहीं मुझे बुजुर्गियत का बोध होने लगता।
सावन के महिने में एक बार हम दोनों स्कूल से आ रहे थे। अम्मा ने दोनों को अलग-अलग छतरी खोलने को कहाँ। आष्चर्य उसे तो यह बात सूझी ही नहीं, वह तो बस मेरे छाते के नीचे ही चलने लगा। उसे पूरा विश्वास था, दादा की छतरी के नीचे वह भीग ही नहीं सकता।
एक बार किसी के उकसाने पर मोहल्ले के एक गुंडे लड़के ‘‘सोमदत्त’’ से भिड़ गया। दोनों में अच्छी गुत्थम-गुत्था हुई, पर यह तिनखैया, सोमदत्त जैसे कसरती शरीर वाले लड़के के आगे कहाँ तक टिकता। सोमदत्त ने उसकी अच्छी धुनाई की जब बस नहीं चला, तो उसने मेरा अवलंब लिया ‘‘छोटा देखकर दादागिरी करता है! दम है, तो सुनील दादा से लड़कर बता। कच्चे घड़े की तरह फोड़ डालेंगे। दो घूसों में ही छठी का दूध याद आ जाएगा। एक पटकी देते ही रेत की दीवार की तरह गिरेगा। पराजय की खिन्नता ने उसके क्रोध के अंगारे और दहका दिए थे।
‘‘इतनी सी जान, गजभर की जुबान! डींग मत मार! वह कौन-सा सूरमा है। ‘राग्ये का भाई पराग्ये’ उसे भी ले आओ। चटनी नहीं बना दूँ, तो सोमदत्त नहीं कहना। सोमदत्त आँखें फाड़े चिल्ला रहा था।
वह संसार में किसी की भी बुराई सुन सकता था, पर कोई दादा का नाम नीचा करें, यह उसे असहय था। आँखों के आगे पलकों की बुराई कौन सहेगा। रोते-रोते मेरे पास आया - ‘दादा’! सोमदत्त ने मुझे बिना मतलब मारा है। मैंने उसे साफ कह दिया हिम्मत हो, तो दादा से लड़ो। आप मेरे साथ चलो, अभी धूल चाटते नजर आएगा।‘
लड़ाई के नाम से ही मेरे हाथ पांव कांपने लगे। यह अकलमंद की दुम एक दिन इज्जत धूल में मिलाएगा। कैसा अजीब भाई है, जिसका गोद में बैठे, उसी की दाढ़ी नोचे। 
लेकिन यह प्रतिष्ठा व आस्था का प्रश्न था। मेरी स्थिति सांप-छदूंदर जैसी थी - उगले तो अंधा, निकले तो कोढ़ी। मैंने अपने भीतर के सारे साहस को इकट्ठा किया - ‘चल! देखें, कौन तुझे हाथ लगा सकता है।’ उसकी आँखे, वीरोन्मत, उत्साह से चमक उठीं। उसके उत्साह ने मुझे हौसला दिया। कुल-प्रतिष्ठा की ध्वजा हाथ में लिए मैंने कूच किया। उसके कंधे पर हाथ रखे मैं ऐसे चलने लगा जैसे वीर-रस से पगा कोई रणधीर जा रहा हो। भय की पराकाष्ठा व इज्जत को दावेदारी कभी-कभी इंसान को असीम साहस से भर देती है। रंगों में तेजी व तबीयत में नशा छा जाता है।
सोमदत्त को देखते ही कमल ने उसे ललकारा - ‘अब, लड, दम हो तो। बच्चों को कोई भी आँख दिखा सकता है।‘ सोमदत्त की भुजाएं फड़क उठी। मुझे देखते ही उसने धमाधम चार घूसे लगाए व टांग में एड़ देकर एक पटकी दी कि मुझे दिन में ही तारे दिखने लगे। मैं उस वक्त को कोसने लगा, जब कमल के उकसावे में मैं आ गया। ये कमबख्त तो कुछ भी मदद नहीं कर रहा। ‘लंगड़े-लूले  गए बारात, दो-दो जूते, दो-दो लात’ वाली हालत थी। वापस उठने के पहले ठाकुरजी से मनौती मांग रहा था, प्रभु कमल के सामने तो ऐसी दुर्गत मत करवा। मैं इसे क्या मूंह दिखाऊंगा। मैं किसी भी हालत में उसकी आँखों में नहीं गिरना चाहता था।
घोड़े का गिरा संभल सकता है, आँख का गिरा नहीं। बिल्ली के भाग्य का छींका टूटा, मेरा सौभाग्य! उसी वक्त सोमदत्त के पिता उधर से निकले। उसे लड़ते देख उसे दो तमाचे रसीद किए - ‘जब देखो लड़ता रहता है। सिवाय गुंडागर्दी के कुछ आता है? पिछले तीन साल से एक ही जमात में बैठा है।’ सोमदत्त के पिता उसे कान पकड़कर घसीट ले गए। अंधा क्या चाहे दो आँखे। प्रभु इतने कृपालु हो सकते हैं, यह मुझे उसी दिन समझ में आया। मैंने तुरंत मौके का फायदा उठाया व तमककर बोला - ‘आज बाप ने बचा लिया, कल तो इसी मोहल्ले में मिलेगा। आज के बाद कमल को हाथ भी लगाया, तो टांग तोड़ दूंगा। कमल का चेहरा गर्व-ज्योति से जगमगा रहा था।
बचपन अब मात्र एक अतीत की स्मृति है। वह दिन हवा हुए। बचपन एक नन्हीं चिड़िया की तरह फुर्र से उड़ गया। कौन जानता था कि कल के उन छोटे-छोटे जोखिमों को जीने वाला कमल शहर का एक प्रमुख उद्योगपति होगा। काॅलेज छोड़ने के बाद मेरी रेलवे में नौकरी लग गई। कमल ने बहुत प्रयास किए, पर वह किसी प्रतिस्पर्धी परीक्षा में नहीं निकला। जब भी किसी परीक्षा में असफलता की सूचना मिलती, वह मेरे पास आकर कुछ समय बैठ जाता, जैसे मैं ही उसका अवलंब हूँ।
हताश होकर उसने टेक्सटाइल प्रिंटिग के एक कारखाने में नौकरी की। वहीं जोखिम लेने की पुरानी आदत उसे पुकारने लगी। ऋण लेकर स्वयं की एक छोटी-सी फैक्ट्री खोली, फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
हम दोनों की शादी हुए भी अब बीस वर्ष से ऊपर होने को आए बच्चे भी बड़े हो गए। कमल अब एक धनी व्यक्ति था, शहर के कई उच्चाधिकारीयों से उसके घरेलू संबंध थे। कई लोग उससे कारोबार के सम्बन्ध में राय लेने आते व उसकी सलाह को मानकर निहाल हो जाते। वह जब भी विपत्ति में होता, तो सीधे मेरे घर आ जाता। मेरी हैसियत के हिसाब से मैं उसकी किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकता था, पर मात्र मेरी उपस्थिति से ही उसे सुकून व सहारा मिल जाता। व्यावसायिक जगत में उसके सटीक निर्णयों की सर्वत्र सराहना होती पर अपनी छोटी-से-छोटी समस्याओं को भी वह मुझसे टेलीफोन पर डिस्कस करता।
वक्त का रथ सदैव अविरल गति से चलता रहता है। इन्हीं दिनों मेरी पोस्टिंग हमारे शहर से तीन सौ किलोमीटर दूर गोपीपुर शहर में स्टेशन मास्टर के पद पर हुई। प्रमोशन के साथ ट्रांसफर था, अतः जाना ही था। कमल अपनी पत्नी मालती व दोनों बच्चो के साथ मुझे स्टेशन छोड़ने आया। एक अजीब सी उदासी व विषाद उसके चेहरे पर उभर रही थी, जैसे किसी नामी तलवारबाज से उसकी ढ़ाल छीन रही हो। कोई हिरण का बच्चा, मृगी से बिछुड़ रहा हो। अब मेरी उम्र पचास के करीब थी और वह सैंतालीस का। दोनों के आधे से ऊपर बाल सफेद हो चुके थे, फिर भी वह बार-बार मेरे समीप आकर खड़ा हो जाता। मेरा विह्ल मन फूट-फूटकर रोने को करता, पर मुझे मालूम था मेरे एक आँसू के बहते ही उसकी आँखो से गंगा जमुना बह उठेगी। ट्रेन जब स्टेशन छोड़ने लगी, तो वह तब तक मेरे डिब्बे के साथ चलता रहा, जब तक की उसके पाँवो की गति ने उसका साथ नहीं छोड़ दिया।
स्टेशन मास्टर की भी कोई नौकरी है। रात दिन जागकर जनता की सेवा करो, पर पब्लिक तो फिर भी खरी-खौटी ही सुनाती है। मैं शहर छोडकर यहां आ तो गया, पर न तो मेरा मन, यहां लगता था, न परिवार का। नौकरी की मजबूरी न होती, तो कब का छोड़ देता। कमल ने मुझे कहा भी था - ‘‘दादा यहीं, कुछ मिलकर काम कर लेगें। अब मुझसे भी कारोबार अकेले नहीं संभलता।’ पर मुझे लगा, उसके सहारे कोई भी काम करके मैं मेरा बड़प्पन ही खो दूंगा। माँ-बाबूजी के निधन के बाद तो मैं उसका भगवान ही हो गया था।
चंन्द्रमा को भी ग्रहण लगता है। मेरे शहर छोड़ने के बाद से ही जैसे कमल के दिन फिर गए। भरे-पूरे परिवार के बीच वह अजीब-सी उदासी में रहने लगा। घंटो अकेले बैठा आकाश में किसी को ढूंढता। एक अजीब से अवसाद ने उसे आवृत कर लिया। रात में घबराकर नींद से उठ जाता, कभी रात को ही गाड़ी लेकर घूमने निकल जाता। इन दिनों वह नशा भी करने लग गया था। धीरे-धीरे वह कमजोर होने लगा, एक दिन खून की उल्टी हुई, तो उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। इलाज की कहाँ कमी थी, नामी डाक्टरों ने प्रयास किया, पर वह किसी मेडिसीन को रिस्पाॅन्स ही नहीं कर रहा था। उसकी आँखे तो अस्पताल की दीवारों, पंखों में कुछ और ही खोजतीं। ह्दय का ह्दय से संबंध होता है, लहू को लहू पुकारता है। कुछ रिश्ते अटूट डोर से बंधे होते है।
बांद्रा एक्सप्रेस अभी-अभी गोपीपुर स्टेशन से होकर निकली थी। मैं वापस आकर सीट पर बैठा ही था कि टेलीफोन की घंटी बजी। उधर से कमल की पत्नी मालती का फोन था - ‘भाई साहब! आज तुरंत आ जाओ, इनकी तबीयत सीरियस है।’ मेरे हाथ से चोगा छूट गया, पांव तले जमीन सरक गई! मैंने तुरंत अपने जुनियर को चार्ज दिया व अपने शहर की राह ली। एक प्राइवेट टैक्सी कर मैं तुरंत परिवार सहित वापस अपने शहर आया। ड्राइवर को मैंने गाड़ी सीधे अस्पताल ले जाने को कहा।
अस्पताल काॅरीडार में मेरे पांव लम्बे-लम्बे डग भर रहे थे। इस छोटे से रास्ते में ही मैंने हजारों मनौतियां मांग डाली। ज्यों ही मैं उसके रूम में घूसा, सभी अपना स्थान छोड़कर हट गए। कमल मुझे देखते ही एक नई आशा से भर उठा, जैसे अरूणोदय के साथ ही कमल खिल उठते हैं, उसका चेहरा नए नूर से दमक उठा। उसकी सारी बीमारी, सारा अवसाद, सारी निराशा क्षणभर में काफूर हो गई। टिमटिमाते दीये को जैसे किसी ने यकायक घी से पुनः भर दिया हो। डाॅक्टर, नर्स सभी उसके चेहरे की चमक को देखकर हतप्रभ थे।
उसने मुझे कसकर पकड़ लिया - ‘‘दादा! वादा करो कि अब मुझे छोड़कर कभी नहीं जाओगे।’ स्नेह की निर्झर धारा मेरी आँखों से फूट पड़ी। शरीर पुलकित हो गया। शरीर में स्नेह समाता नहीं था। दोनों के नेत्रों से बरसते जलबिंदु जैसे अमृत छलका रहे थे।
दूसरे दिन मैंने अपना त्यागपत्र भेज दिया।
- संग्रहक - सुमेध रामटेके





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