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बामसेफ के जनक

Siddharth Bagde
tpsg2011@gmail.com
Saturday, March 30, 2019, 03:52 PM
BAMCEF

हमारे समाज के लोग गोलवलकर, हेडगेवार और मोहन भागवत का नाम खूब अच्छे से जान गए और चर्चा करने लगे। मगर अपने माँ बाप और गुरुओ तथा महापुरुषो को भूल गए। इसी कड़ी में हमारे महान गुरु का नाम आता है। ’’मान्यवर दीनाभाना साहब‘‘ ये महापुरुष भंगी जाति के थे।
बात है उस समय की जब बाबासाहेब हमारे बहुजन आजादी आंदोलन को हमारे समाज के कंधे पर आगे बढ़ाने के लिए छोड़ गए। मान्यवर दीनाभाना साहब ‘‘बाबा साहेब’’ के कट्टर अनुयायी थे और वे Explosive Research and Development Laboratory (आज के डिफेन्स रिसर्च डेवलॅपमेंट आर्गेनाईजेशन) में एक चतुर्थ श्रेणी के पद पर कार्यरत थे और भंगी जाति से थे। उस समय सभी विभागों के मुख्य अध्यक्ष ब्राह्मण ही थे। उस समय मान्यवर दीनाभाना जी बाबा साहेब से प्रेरित होकर जयंतिया मनाते थे एक था ‘‘14 अप्रैल‘‘ और दूसरा था ‘‘बुद्ध जयंती’’।
मगर उस ब्राह्मण के कार्यकाल में उसने दोनों जयंतियों पर बैन लगा दिया और छुट्टी Cancle कर दी और उसकी जगह मालवीय और तुलसी दिवस की घोषणा कर दी। यह बात मान्यवर दीनाभाना जी को बर्दाश्त नहीं हुई और उन्होंने प्रतिक्रिया की और नौकरी की परवाह न करके जयंती मनाने के लिए संघर्षरत रहे जिसके चलते उस ब्राह्मण ने मान्यवर को Suspend कर दिया (एक जयंती मनाने के लिए इतनी बड़ी कुर्बानी जरा सोचो ऐसा क्या जूनून था जो आज हम महसूस नहीं कर पा रहे)। और कहा कि तू तो भंगी जाति से है और आंबेडकर तो महार जाति से था जब महार जाति के लोग शांत है तो तू भंगी होकर उनका पक्ष क्यों लेता है। बस फिर क्या था उनको Court का दरवाजा खटखटाना पड़ा। मगर न तो उनके पास पैसे थे और न ही कानून का ज्ञान। फिर मा. दीनाभाना जी अपने सहयोगी D. K. Khaparde के पास गए जो उन्ही के साथ SC ST ASSOCIATION में कार्यरत थे। फिर विचार विमर्श किया और कहा कि इसमें हमारी मदद अगर कोई कर सकता है तो वो अपने ही समाज के अधिकारी।
यह प्लान बनाकर वे लोग अपने ही कार्यालय में अधिकारी Post पर कार्यरत ‘‘मान्यवर काशीराम जी’’ के पास मदद के लिए गए मगर जैसा कि सामान्य रूप से होता है उन्होंने भी यह कह कर टाल दिया कि जाओ तुम लोग मुझे नेतागिरि पसंद नही यह बात मा. दीनाभाना जी और D. K. Khaparde जी को बड़ी बुरी लगी। मगर हार नहीं मानी। दूसरे दिन वे लोग फिर मान्यवर कांशीराम साहेब के पास आये और बोले कि Sir एक बात आपसे कहना चाहते है कि आप आज जो इस कुर्सी पर बैठे हो वो आपकी मेहनत से नहीं बल्कि बाबासाहेब के जीवन संघर्ष से मिली है और उसी बाबासाहेब की जयंती के लिए हम लड़ रहे है, हम कोई नेता नहीं बल्कि बाबासाहेब के लिए मर मिटने वाले लोग है। आपको बाबासाहेब के संघर्ष के बारे में क्या पता।
इन बातो ने कांशीराम साहेब का ध्यान आकर्षित किया और फिर बाद में मिलने को कहा। जब वे लोग कांशीराम साहेब से मिले तो उन्होंने बाबासाहेब के संघर्षों को बताया और उस ब्राह्मण Officer की मानसिकता बताई और जाते जाते 2 किताबे दे गए कांशीराम साहेब को -
1) Annihilation of caste
2) Who are Shudras
कांशीराम साहेब उन किताबो को पढ़ते गए पढ़ते गए और कई बार पढ़ गए। वो दिन था वह स्वाभिमान का दिन था पता नहीं मान्यवर कांशीराम जी को क्या हुआ जैसे कि बाबा साहेब साक्षात उन्हें ज्ञान दे गए हो। उसके बाद उन्होंने दीनाभाना जी और खापर्डे जी को बुलाया और कहा कि अब मुझे समझ आया कि आप लोग बाबा साहेब के लिए नौकरी क्यों दाँव पर लगाए हो चलो मैं तुम्हारे साथ हूँ। फिर वे लोग उस ब्राह्मण ऑफिसर के कमरे में गए और उसकी वो सुताई की और कहा की जयंती की छुट्टी तो हम लेकर रहेंगे और फिर कांशीराम साहेब ने अपने घर पर अपनी माँ को सबसे लंबी चिट्ठी लिखी और कहा कि मेरी Engagement Cancle कर देना मैं कभी शादी नहीं करूंगा और कभी घर नहीं आऊंगा।
फिर BAMCEF से वे जीते और जयंती भी मनाई गई और उसके बाद से कांशीराम साहेब ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। और मान्यवर दीनाभाना जी D. K. Khaparde साहेब के साथ मिलकर BAMCEF की स्थापना की और आधुनिक युग में बाबा साहेब के कारवां को यहाँ तक लाये।
अगर मान्यवर दीनाभाना जी अपना संघर्ष नहीं दिखाते अपना गुरु ज्ञान कांसीराम साहेब को नहीं देते तो आज न तो BAMCEF होती और ‘‘बहुजन समाज पार्टी’’ का अस्तित्व भी ना होता। - संग्रहक - निलेश वैद्य





Tags : BAMCEF Kashiram Dinabhai D. K. Khaparde