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हिन्दू सभ्यता

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Tuesday, August 13, 2019, 06:32 PM
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हिन्दू सभ्यता
हिन्दू सभ्यता ने तीन सामाजिक वर्गो को पैदा किया है, जिनकी ओर जितना ध्यान देना चाहिए था नहीं दिया गया। ये तीन सामाजिक वर्ग हैं: (1) जरायम पेषा जातियां (2) आदिवासी जातियां और (3) अछूत
    इन वर्गो का अस्वित्व एक घृणित-वस्तु है। यदि हिन्दू सभ्यता को इन वर्गो के जनक के रूप में देखा जाए, तो वह सभ्यता ही नहीं कहला सकती। यह तो मानवता को दबाए रखने तथा गुलाम बनाने के लिए शैतान का षडयंत्र है। इसका ठीक नाम तो कलंक होना चाहिए।
    करोड़ों इन्सानों को छूना व देखना पाप! करोड़ों ऐसे भी जिनकी परछाई लेना अधर्म!! ऐसा अमानवीय व्यवहार शताब्दियों तक जारी रहा और कुछ हद तक छुआछात अब भी देष भर में किसी न किसी रूप में जारी है।
    सैकड़ों वर्ष गुलाम रहा हिन्दोस्तान! इस गुलाम हिन्दोस्तान में करोड़ों हिन्दोस्तानी ऐसे भी थे जो गुलामों के भी गुलाम थे। जिनको अछूत, अन्त्यज और पददलित आदि नामों से पुकारा गया। ये गुलाम भी ऐसे थे जो नाना प्रकार के अत्याचार, अन्याय, दमन और शोषण सह कर भी क्रूरता करने वालों के यष गाते रहे।
    भारत के इतिहास को शासकों, धर्मो व संस्कृतियों की दृष्टि से मुख्यतः निम्नलिखित युगों में बांटा जाता है:
(1) हिन्दू राज का युग (2) मुस्लिम राज का और (3) अंग्रेजी राज का युग।

हिन्दू राज: सर्वप्रथम हिन्दू-राज में अछूतो की हालत का वर्णन किया जाता है। हिन्दू राज में अछूतो की हालत का उल्लेख करते हुए डाॅ. भीमराव अंबेडकर ने लिखा है: 
‘‘मराठा राष्ट्र में पेषवाओं के राज्य काल में ऐसा था कि यदि एक हिन्दू किसी सार्वजनिक मार्ग पर जा रहा तो उस पर अछूत को चलने की आज्ञा नही थी ताकि कही उसकी परछाई हिन्दू को भ्रष्ट यानी अषुद्ध व अपवित्र न कर दे। अछूत को चिन्ह  के रूप में अपनी कलाई या गर्दन के गिर्द एक काला धागा बांधने का आदेष था ताकि हिन्दू गलती से भी उसके साथ छू न जाए और उसे अपवित्र होने से बचाया जा सके। पेषवा की राजधानी पूना में अंछूत को अपनी कमर के गिर्द एक झाडू लटका कर चलाया पड़ता था ताकि वह मिट्टी, जिस पर उसके कदम पड़े, झाडू से साफ होती जाए और कही ऐसा न हो कि कोई हिन्दू उस पर चल कर अपवित्र न हो जाए। पूना में अंछूत कही भी जाए उसे मिट्टी का एक बर्तन अपनी गर्दन में लटका कर रखना पड़ता था ताकि अपना थूक उसमें डाले और कही ऐसा न हो कि वह थूक उस धरती पर गिर कर, उस पर चलने वाले किसी हिन्दू को अनजाने में अपवित्र न कर दे।’’

हिन्दूओ ने अपना इतिहास नही लिखा। इसके दो कारण हो सकते हैः एक तो यह कि हिन्दू संसार को माया यानी मिथ्या समझते है। दूसरे यह कि उनका इतिहास इतना शर्मनाक है कि उन्होने इतिहास लिखकर खुद को कलंकित जाहिर करना नही चाहा होगा।


प्राचीन हिन्दू राजाओं के अधीन भारत की असली हालत का अनुमान लगाना कठिन है। इतना तो स्पष्ट है कि समस्त महाद्वीप संकीर्णत का षिकार था, पूरी तरह अस्तव्यस्त, उसमें राजनीतिक जीवन और एकता का अभाव था।

प्रसिद्ध इतिहासकार डाॅ. आर. सी. मजूमदार भी यही कहना हैः
‘‘इतिहास लेखन के प्रति भारतीयों की विमुखता भारतीय संस्कृति का भारी दोष है। उनहोने कभी गम्भीरतापूर्वक इतिहास लेखन की ओर ध्यान नही दिया’’

इस कठिनाई के बावजूद निम्नलिखित तीन तथ्य ऐसे है जिन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है:
(1) ऋग्वेद का पुरूष सूक्त (2) राजा बृहद्रथ मौर्य की हत्या और (3) मनु-स्मृति काल।
सर्वप्रथम ऋग्वेद के पुरूष-सूक्त को देखिए। डाॅ. अंबेडकर ने इसकी बाबत इस प्रकार लिखा है।

अर्थात्ः यह बात माननी पड़ेगी कि पुरूष सूक्त अद्वितीय है। पुरूष सूक्त के वे कौन से सामाजिक-आदर्ष है जो इसे अद्वितीय अर्थात् अनोखा बनाते है। यद्यपि प्रत्येक समाज में वर्ग विद्यमान होते है, लेकिन कोई भी समाज उन्हे आदर्भ-समाज के विधानानुकूल नही ठहराता। यह पुरूष सूक्त की योजना ही है, जो उसे आदर्ष की पदवी तक बुलन्द करती है। पुरूष सुक्त ही एक ऐसा उदाहरण है जिसमें कानून की प्रमाणिकता का सहारा लेकर आदर्ष की वास्तविकता बना देने यत्न किया गया है।
शूद्र को जन्मदाता के पांवो के समान बताया गया है। पांवो को इन्सानी शरीर के सबसे नीचे के और बदनाम अंग माना गया है। अतः शूद्र को सामाजिक-व्यवस्था में अन्तिम स्थान दिया गया है और उसे सबसे गन्दा काम यानी दूसरो की चाकरी व सेवा का काम सौंपा गया है।
पुरूष सूक्त के दूरगामी प्रभावों का उल्लेख करते हुए डाॅ. अंबेडकर ने आगे लिखा है:

अर्थात: पुरूष सूक्त में निर्धारित सामाजिक-व्यवस्था को बुद्ध के बिना किसी अन्य व्यक्ति ने नही ललकारा। बुद्ध भी उसे मंद नही कर पाए। इसका सहज कारण यह था कि बुद्धइज्म के पतन के बाद और बुद्धइज्म के काल में भी ऐसे बहुत से कानून-निर्माता थे, जिन्होने न केवल पुरूष सूक्त के आदर्ष को बचाया बल्कि इसका प्रचार किया और इसकी व्याख्या भी की।
पुरूष सूक्त चातुर्वण्र्य-व्यवस्था का आधार बना। हिन्दू समाज ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैष्य और शूद्र चार वर्णो में विभाजित हुआ।
चूंकि वेदो को ‘ईष्वरीय’ घोषित कर दिया गया था, इसलिए उन पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को भी चुनौती नही दी सकती थी। जो कोई उस व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह करता, उसके लिए मृत्यु-दण्ड अनिवार्य बना दिया गया। इस प्रकार चातुर्वण्र्य व्यवस्था स्थिर व दृढ बनती चली गई।
इतिहास का दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य है राजा बृहद्रथ की हत्या।
‘‘इतिहासकारों ने इस घटना को दो व्यक्तियों के व्यक्तिगत झगडे का-सा रूप देकर एक सामान्य-सी घटनामान लिया है। इसके परिणामों की ओर ध्यान दे, तो पता चलता है कि यह एक युगांतरकारी घटना थी। इस घटना का महत्व इस बात से नही मापा जा सकता कि यह दो राजवंषो का परिवर्तन था-षंगांे द्वारा मौर्य का स्थान-ग्रहण। यह फ्रास की राज्यक्रांति ये यदि बडी नही तो, उतनी ही बडी राजनीतिक-क्रांति जरूर थी। यह एक क्रांति थी-एक खूनी इन्कलाब। इसका उद्देष्य था बौद्ध राजाओं का तख्या उल्ट देना। इसके सूत्र-संचालक थे: ब्राम्हण, पुष्यमित्र द्वारा बृहद्रथ की हत्या केवल इस तथ्य की द्योतक है।’’
मनु का रोल: ऐन्तेरेय ब्राम्हण और मत्स्य पुराण के अनुसार ब्राम्हा ने अपनी ही पुत्री शतरूपा के साथ मैथुन करके मनु को जन्म दिया था।
श्री बूहलर के मत से मनुस्मृति जो हमें आज मिलती है, ईसा की दूसरी शताब्दी में अस्तित्व में आई। केवल प्रो. बूहलर ने मनुस्मृति के लिए इतना समीप का समय निष्चित नही किया। श्री दफतरी भी इसी परिणाम पर पहुंचे है। उनका मत है कि मनुस्मृति 185 ई. पूर्व के बाद अस्तित्व में आई, इससे पहले नही प्रो. दफतरी का तर्क है कि मौर्य-वंष के नरेष बौद्ध महाराज बृहद्रथ की हत्या से, जो कि उसके ब्राम्हण सेनापति पुष्यमित्र ने की थी, इसका सीधा सम्बन्ध है क्योकि यह दुर्घटना 185 ई. पूर्व में हुई, इसलिए मनुस्मृति 185 ई. पूर्व के बाद लिखी गई होगी।
मनु ने दो बाते की। पहली तो यह कि उसने पुरूष सूक्त को एक बार फिर से दैवी निर्देष घोषित किया। उसने कहाः
लोकानां त् विवृद्धयर्थ मुखबाहूरपादतः।
ब्राम्हणं क्षत्रिय य शुद्र च निरवर्तयत्।।
(मनुस्मृति अध्याय 1, श्लोक 31)
अर्थात्: लोक वृद्धि के लिए ब्रम्हा ने मुख, बहु, उरू और पैर से क्रमषः ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैष्य और शूद्र की सृष्टि की।

ब्राम्हणः क्षत्रिय वैष्यस्त्रयो वर्णो द्विजातयः।
चतुर्थ एक जातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पञचतः।।
अर्थात्ः ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैष्य ये तीन वर्ण ‘द्विजाति’ या (द्विज) है और चैथा एक जाति शूद्र है: पांचवां (वर्ण कोई भी) नही है।
ऐसा कहते हुए मनु ने निस्संदेह अपने से पूर्व के स्मृतिकारों की पैरवी की। किन्तु उसने एक ओर सिद्धांत भी स्थापित किया जिसमें उसने कहाः
‘‘वेद धर्म का एकमात्र और अंतिम प्रमाण है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि पुरूष सूक्त वेद का एक भाग है, यह जानना कठिन नही है कि मनु ने पुरूष सूक्त में प्रतिपादित चातुर्वण्र्य की सामाजिक-व्यवस्था को दैवी और अभ्रान्त बना डाला। पहले वह ऐसी न थी।’’ डाॅ. अंबेडकर के शब्दो मे:
अर्थात्ः विजयी ब्राम्हणवाद को अनेक चीजो की आवष्यकता थी, स्वाभाविक तौर पर इसके लिए यह आवष्यक था कि यह चातुर्वण्र्य को देष का कानून बना दे। बौद्ध इसे अस्वीकार करते ही थे। इस बात की भी आवष्यकता थी कि जिस पशु-बलि को बौद्धों ने रोक दिया था। उसे कानून का रूप दे दिया जाए। लेकिन इसे इसके अतिरिक्त और भी कुछ चाहिए था। बौद्ध नरेषों के विरूद्ध यह क्रांति लाकर ब्राम्हणवाद ने देष के ऐसे दो प्रचलित नियमों का उल्लंघन कर दिया जिन्हे सभी लोग पवित्र और अनुल्लंघनीय मानते थे। पहला नियम तो यह था कि ब्राम्हण के लिए शस्त्र का स्पर्ष भी पाप था। दूसरे नियम के अनुसार राजा का शरीर पवित्र था और उसकी हत्या पाप। विजयी ब्राम्हणवाद को अपने पापों का समर्थन करने के लिए एक पवित्र ग्रंथ की भी आवष्यकता थी जो सभी के लिए प्रमाण स्वरूप  हो। मनुस्मृति की एक ध्यान आकर्षित यह है कि यह न केवल चातुर्वण्र्य को देष का कानून बनाती है, न केवल पशुबलि को कानून की दृष्टि से उचित ठहराती है, किन्तु वह यह भी बताती है कि ब्राम्हण को कब हाथ में शस्त्र लेना चाहिए और कब वह राजा की हत्या करके भी अधर्म नही करता। इस मामले में मनुस्मृति ने वह काम किया है जो पहले की किसी स्मृति ने नही किया। यह एकदम नया रास्ता है। यह एकदम नवीन सिद्धान्त है। मनुस्मृति को ऐसा करने की क्या आवष्यकता थी? इसका एक ही उत्तर है कि पुष्यमित्र ने जो राज्य-क्रांति की थी, उसका दार्षनिक समर्थन करने के लिए।
मनुस्मृति के अनुसार जैसी सामाजिक-व्यवस्था भारत में स्थापित हुई, उसकी कुछ ऐसी विषेषताएं है जो संसार में अन्य कही नही मिलती।
ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैष्य और शूद्र सवर्ण है जबकि अछूत और अतिषूद्र अवर्ण है। ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैष्य और शूद्र चातुर्वण्र्य में है, जबकि अछूत और अतिषूद्र चातुर्वण्र्य से बाहर है।
द्विज का अर्थ है दो बार जन्मा और अद्विज से अभिप्राय हैः वह जो केवल एक बार जन्म लेता है। जनेऊ पहनने पात्र द्विज और जिसे जनेऊ पहनने का अधिकार नही वह अद्विज। चार वर्णो के स्थान पर हिन्दू समाज हजारों जातियों-उपजातियों में बंट गया। शुद्र वर्ग ही में तीन सामाजिक वर्ग अर्थात् (1) जयराम-पेषा (अपराध करके जीवन निर्वाह करने वाले) (2) आदिवासी जातियसं और (3) अछूत जातियां-अस्तित्व में आए। शुद्र वर्ण भी कायम रहा।
वर्ण व्यवस्था और जाति धर्म के सवाल पर हिन्दू लेषमात्र भी समझौता करने को तैयार नही थे। ईष्वर को चाहे तो घर के बाहर फेंक दीजिए, पर जाति धर्म का यदि यत्किंचित् भी उल्लंघन हुआ तो फिर तुम्हारी खैर नही। इस मामले में कोई समझौता नही, इस पाप के लिए कोई क्षमा नही।
जाति-पाति और उसके भयानक रूप अछूतपन के परिणामों व दुष्प्रभावों की चर्चा आगे की जाती है। सर्वप्रथम यह बताया जाता है कि ‘अछूतपन’ क्यो कर पैदा हुआ।

अछूतपनः अछूतपन की उत्पत्ति के बारे में........ मुख्य बाते ये हैः
(1) हिन्दूओं और अछूतपन और अछूतों में नसल की कोई भिन्नता नही।
(2) अछूतपन की उत्पत्ति से पहले अपने मूल रूप में हिन्दूओं और अछूतों का भेद एक दल के आदमियों तथा पराए दल के छितरे हुए आदमियों का विभेद था। से छितरे हुए आदमी ही आगे चल कर अछूत कहलाए।
(3) जिस प्रकार नसल की भिन्नता अछूतपन का आधार नही है, उसी प्रकार पेषों की भिन्नता भी अछूतपन का आधार नही है।
(4) अछूतपन की उत्पत्ति के मूल कारण दो हैः
(क) ब्राम्हणों की छितरे हुए बौद्धों के प्रति घृणा।
(ख) दूसरों के गोमांस भक्षण छोड़ देने पर भी छितरे हुए आदमियों का गोमांस खाते रहना।
(5) अछूतपन के मूल का पता लगाने के प्रयत्न में हमंे यह सावधानी रखनी चाहिए कि हम ‘अछूत’ और ‘अपवित्र’ को एक न बना दे। जितने रूढ़िवादी हिन्दू लेखक है उन्होने अछूत और अपवित्र को एक कर दिया है, यह एक गलती है ‘अछूत’ और है तथा ‘अपवित्र’ और।
(6) यद्यपि एक वर्ग के तौर पर धर्म शास्त्रों के ही समय में ‘अपवित्र’ लोगों का जन्म हो गया था, किन्तु ऐसा लगता है कि, ‘अछूतपन’ 400 ईस्वी के आसपास अस्तित्व मे आया
स्ंसार के अनेक देषों जैसे कि अमेरिका, आस्ट्रेलिया, मलाया, रोम, न्यूजीलैंड, फीजी, ईरान, यूनान, यूगांडा, पूर्व अफ्रीका, दक्षिण अफ्रीका, मिस्त्र आदि के आरम्भिक व प्राचीन दोनों समाजों, हीब्रो व पोलीनेषियन लोगो मे ‘ पवित्रता’ के विभेद मौजूद थे। आरम्भिक मनुष्य विष्वास करता था कि (1) कुछ विषेष घटनाओं के घटने (2) कुछ विषेष वस्तुओं के स्पर्ष से और (3) कुछ विषेष व्यक्तियों के स्पर्ष से ‘ अपवित्रता’ होती है। जीवन की जिन घटनाओ को आरम्भिक मानव ‘अपवित्रता’ का कारण मानता था, उनमें निम्नलिखित मुख्य थीः

(1) जन्म (2) दीक्षा (3) बालिगपन (4) विवाह (5) संभोग और (6) मृत्यु ‘अपवित्रता’ की कल्पना के साथ आरम्भिक समाज ने  ‘पवित्र’ बना सकने वाले रीति-रिवाजो की भी कल्पना कर ली थी, जो अपवित्रता को दूर भगा सकें। पवित्र बनाने वाले रीति-रिवाजों में वस्त्रों का बदलना, बालों तथा नाखुनों आदि का काटना, पसीना निकालना, आग तापना, धूनी देना, सुगन्धित पदार्थो का जलाना और किसी शाखा से झाड़-फूंक करना शामिल था।

‘‘प्राचीन समाज की ‘अपवित्रता’ की कल्पना आरम्भिक समाज की ‘ अपवित्रता’ की कल्पाना से कुछ विषेष भिन्न न थी। ‘अपवित्रता’ के स्त्रोतों अथवा कारणों में भेद है। ‘पवित्र’ बनाने वाले रीति-रिवाज भी भिन्न-भिन्न हो सकते है किन्तु इन भेदों के अतिरिक्त आरम्भिक समाज और प्राचीन समाज में ‘अपवित्रता’ तथा ‘पवित्रता’ का जो ठप्पा है, वह वही है। संसार भर अपवित्रता व अछूतपन मिट गया किन्तु भारत में यह अभी तक भयानक रूप में विद्यामन है।

‘‘दुनिया कि आरम्भिक तथा प्राचीन समाजों में जो ‘अछूतपन’ विद्यामन था, वह भारत-व्यापी करोडो लोगों के वंषानुगत ‘अछूतपन’ के मुकाबले में नगण्य ठहरता है।
‘‘हिन्दूओ का ‘अछूतपन’ अद्वितीय है, संसार के इतिहास में इसका मुकाबला नही। ‘अछूत’ बना देने वाली हिन्दूओं की ‘अछूतपन’ की पद्धति में अनेक ऐसी विषेषताएॅ है, जो अहिन्दू जातियों के ‘अछूतपन’ में, चाहे वे आरम्भिक हो अथवा प्राचीन, नही पाई जाती।

‘‘अहिन्दू समाज में ‘अपवित्रता’ से बचे रहने के लिए पृथक-करण (बहिष्कार, बलगाना) के जो नियम मान रखे है, ये यदि तर्क-संगत न भी माने जाएं तो भी समझ में आते है। वह पृथक्-करण जन्म, विवाह, मृत्यु आदि विषेष अवसरों पर होता है, किन्तु हिन्दू समाज का यह पृथक्-करण यह ‘अछूतपन’ स्पष्टतया निराधार ही है।

‘‘आरम्भिक समाज जिस ‘अपवित्रता’ को मानता था वह थोडे समय रहती थी और खाने-पीने आदि प्राकृतिक कृत्यों अथवा जीवन में जन्म, मृत्यु मासिक धर्म आदि, जो असाधारण अवसर होते है, उन्ही पर पैदा होती  थी। ‘अपवित्रता’ का समय बीत जाने पर और ‘पवित्र’ बना देने वाला संस्कार हो चुकने पर आदमी की ‘अपवित्रता’ नष्ट हो जाती थी और वह फिर ‘पवित्र’ तथा समाज में मिलने-जुलने योग्य हो जाता था। किन्तु यह पाॅच-छः करोड़ आदमियों का ‘अछूतपन’ जन्म, मृत्यु आदि के ‘अछूतपन’ से सर्वथा भिन्न है। यह स्थायी है। जो हिन्दू उनका स्पर्ष करते है वे स्नानादि के द्वारा ‘पवित्र’ हो सकते है, किन्तु ऐसी कोई चीज नही जो ‘अछूत’ को ‘पवित्र’ बना सके। वे ‘अपवित्र’ ही पैदा होते है, वे जन्म भर ‘अपवित्र’ बने रहते है, वे रहते है, वे अपवित्र’ बने ही मर जाते है और वे जिन बच्चों को जन्म देते हैं वे बच्चे भी ‘अपवित्रता’ का कलंक माथे पर लगाए ही जन्म ग्रहण करते है। यह एक स्थायी, वंषानुगत कलंक है जो किसी तरह धुल नही सकता।

‘‘और तीसरी बात यह है कि अहिन्दू जो ‘अपवित्रता’ से पैदा होने वाले पृथक्-कारण को मानते थे, वे उन व्यक्तियों को अथवा उनसे निकट सम्पर्क रखने वाले ही पृथक् करते थे, लेकिन हिन्दूओं के इन ‘अछूतपन’ ने एक वर्ग के वर्ग को ही अस्पृष्य बना रखा है- एक वर्ग जिसकी जनसंख्या 5-6 करोड़ है।


‘‘चैथी बात यह है कि अहिन्दू उन व्यक्तियों को जो ‘अपवित्रता’ से प्रभावित हो गए हो कुछ समय के लिए पृथक् भर कर देते थे। वे उन्हे एकदम पृथक् बसा नही देते थे, हिन्दू समाज का आग्रह है कि सब ‘अछूत’ पृथक् बसे। हिन्दू खुद अछूतो केे मुहल्लो में नही रहेगे और अछूतों को अपने मोहल्लों में नही रहने देगे। हिन्दू जिस ‘अछूतपन’ को मानते है उसका यह महत्वपूर्ण अंग है। यह सामाजिक बहिष्कार मात्र नही है। थोडे समय के लिए सामाजिक व्यवहार का बन्द कर देना मात्र नही है। यह तो प्रदेष पृथक्-करण (इलाके को अलग करने) का उदाहरण है, अछूतो को एक कांटेदार तार के घेरे में बन्द कर देना है। हिन्दू गांव में रहते है, अछूत गांव से बाहर उसी जगह पर!!

‘‘ऐसी है यह हिन्दू ‘अछूतपन’ की पद्धति। इससे कौन इन्कार कर सकता है कि जो चीज अहिन्दूओं मे देखी जाती है वह उससे सर्वथा भिन्न है। यह निर्विवाद है कि हिन्दूओ का अछूतपन एक अनोखी ही वस्तु है। अहिन्दू समाज में लोगों को अपवित्र माना गया, किन्तु केवल कुछ व्यक्तियों को, सारी जाति को कभी कही अपवित्र नही माना गया और उनकी अपवित्रता अल्पकालीन होती थी और किसी न किसी ‘क्रिया’ (संस्कार) द्वारा नष्ट हो सकने वाली भी। एक’ अपवित्रजन, सदा के लिए अपवित्र है’ सिद्धान्त पर आश्रित इस प्रकार की स्थायी अपवित्रता कही देखने में नही आई। अहिन्दू समाज में लोगों को अपवित्र माना गया और उनका सामाजिक व्यवहार भी बन्द हुआ है। लेकिन ऐसा कही न हुआ कि आदमियों को सदा के लिए पृथक् बसा दिया जाए। हिन्दूओं ने एक जमात को अपवित्र मान कर उनके साथ बर्ताव किया है, लेकिन वे ‘बाहर’ के रहे है, रक्त-सीमा के सम्बन्धों के घेरे से बाहर। ऐसा कभी हुआ ही नही है किसी ने अपने ही आदमियों को पीढ़ी दर पीढ़ी और स्थायी रूप से अपवित्र बना कर रखा हो। इस प्रकार हिन्दूओं का अछूतपन एक अनहोनी घटना है, संसार के किसी दूसरे भाग में मानवता से आज तक कभी इसका सामना नही हुआ, किसी दूसरे समाज में इस जैसी कोई चीज नही दीखतीः न आरम्भिक समाज में, न प्राचीन समाज में और न ही वर्तमान समाज में।’’

श्रुति यानी वेदों (पुरूष सुक्त) स्मृति यानी मनुस्मृति आदि और हिन्दू आचार-संहिता इस आधारित नियमों व आदेषों द्वारा जाति-पाति व अछूतपन के माध्यम से करोड़ों लोगों को किसी प्रकार मानवीय दर्जे से नीचे गिराया गया, कैसे उनका दमन किया गया और कैसे उनसे हर किस्म के नागरिक अधिकार छीने, इसका वर्णन आगे किया जाता है।

गुलामी के अनेक रूप
गुलामी क्या होती है? इस प्रष्न का उत्तर अनेक विद्वानों व बुद्विजीवियों ने अपनंे- अपने ढंग से दिया है। प्लैटों के शब्दो में, ‘‘गुलामी उसे समझा जाता है जो दूसरों द्वारा अपनी आकांक्षओं, लक्ष्यो व संकल्पों पर नियन्त्रण और शासन करने को स्वीकारता है।’’ डाॅ. अंबेडकर ने गुलामी की परिभाषा शब्दो में दी है:

अर्थात्ः गुलामी से अभिप्राय केवल कानूनी बना दी गई दासता नही है। समाज की ऐसी दषा जिसमें कुछ लोगों को दूसरे लोगों का ऐसा शासन स्वीकारने को विवष हो जाना पड़े, जिससे उनके आचार-विचार नियन्त्रित हो जाएं।

सामाजिक दासता: भारत में अछूत करार दिए गए करोड़ों लोगों को ईष्वर व धर्म की प्रामाणिकता से गुलामी की जंजीरों से जकड़ दिया गया।
अछूतपन 400 ईसवी के आसपास पैदा हुआ। अछूतो गांवो से बाहर और शहरों के अन्त में बसाया गया, इसीलिए उन्हें ‘अन्त्यज’ (अन्त में निवास करने वाला) भी कहा गया। उन्हे सुन्दर कपड़े व आभूषण पहनने, अच्छा भोजन, जहां तक कि घी खाने, बढ़िया बर्तन इस्तेमाल करने तक की मनाही कर दी गई। ‘‘वे मिट्टी के बर्तनो में भोजन करे, वह भी जूठन का, पशु रखना चाहे तो गधा रखे, चीथड़े पहने, आभूषण हो तो लोहे के पहने’’ आदि कानून उन पर जबरन ठांेस दिए गए।
चूंकि राजा ब्राम्हण के अधीन होता था और अछूतपन के कानून उस (ब्राम्हण) ने घड़े थे, इसलिए ‘अछूतपन’ को शासकीय संरक्षण प्राप्त था। इसीलिए तो राम चन्द्र ने एक ब्राम्हण की षिकायत पर शूद्र शम्बूक की हत्या कर दी थी। उसने नीच वंष का होते हुए ईष्वर-भक्ति करने का दैवी-अपराध किया था।
अछूत के लिए किसी भी हिन्दू-मंदिर में प्रवेष करने की मनाही थी। वह किसी देवी-देवता की पूजा व शोभा यात्रा में अकेला या समूह के साथ शामिल नही हो सकता था। वह हिन्दू चिन्ह व संस्कार जैसे माथे पर तिलक लगाना और जनेऊ पहनना आदि, धारण न कर सकता था। उसके पानी पीने के स्त्रोत जैसे कि कुएं, तालाब और नदी नालों के घाट सवर्ण हिन्दूओं से सर्वथा पृथक् थे। हिन्दूओं के श्मषानघाटों में अपने मुर्दे जलाना या दबाना तो एक ओर, अछूत अपने किसी शव को लेकर हिन्दू-बस्ती में से गुजर तक नही सकते थे।
अछूत को छूना, यहां तक उसकी परछाई लेना अधर्म व पाप था। शताब्दियों तक अछूत इस प्रकार की क्रूर सामाजिक गुलामी के षिकार बनाए गए।

बेगार: सामाजिक भेदभाव के साथ-साथ जो उन पर सबसे बड़ा जुल्म ढाया गया वह था उनसे बेगार लेना यानी बिना वेतन दिए अथवा जीवित रहने लायक मामूली भोजन देकर अमानवीय हालतों तक में मेहनत-मजदूरी करवाना। सभी गन्दे काम जैसे मृत-पशु उठाना, गांवो व नगरों की सफाई करना और गन्दगी उठाना उन पर थोंप दिए गए।
प्राचीन काल में ब्राम्हणों को विषेष अधिकार प्राप्त थे। धार्मिक मामलों में तो उसका एकाधिकार था ही, सामाजिक व आर्थिक विषयों में भी उनका प्रभुत्व था। उनकी आज्ञा व अनुमति के बगैर राजकाज का एक पत्ता तक नही हिलता था। ब्राम्हणों के विषेष अधिकारों का विवरण देते हुए डाॅ. भीमराव अंबेडकर ने अपने एक भाषण में इस प्रकार टिप्पणी की हैः
‘‘किसी सभ्यता के नेतृत्व और उसको षिक्षित करने की जिम्मेदारी बुद्धिजीवी वर्ग पर होती है जिसे इस देष में ब्राम्हण कहा जाता है। पुराने हिन्दू कानून के अनुसार ब्राम्हणों को कई प्रकार की सुविधाएं प्राप्त थी। उदाहरण के तौर पर हत्या का अपराध करने पर भी ब्राम्हण कों फांसी का दण्ड नही दिया जा सकता था। ईस्ट इडिया कम्पनी ने 1817 ईसवी तक उसे यह विषेषाधिकार दिए रखा।  इसमें कोई सन्देह नही कि उनको धरती का नमक समझा जाता था। किन्तु क्या उसमें नमक की कोई खूबी शेष रह गई थी? जहां तक उसके व्यवसाय का सम्बन्ध है उसमें कोई आदर नही रह गया था। वह तो एक महामारी बनकर रह गया था। ब्राम्हणों बड़े ढंग से बड़े धर्म के नाम पर समाज का खून चूसना था। पुराण और शास्त्र जिन्हे ब्राम्हणों ने टनों की मात्रा में पैदा किया, उन हजारों रीतियों व रिवाजो से भरे पड़े है जिन्हे गरीब, अनपढ़, अन्धविष्वासों की षिकार हिन्दू जनता को मूर्ख बनाने के लिए ब्राम्हण इस्तेमाल करते रहे। यहां उनका विवरण देना सम्भव नही। मै केवल कुछ एक ऐसे दबाव डालने वाले तरीकें की बाबत बातऊंगा जिन्हे ब्राम्हणों ने अपने विषेषाधिकारों और सुविधाओं की प्राप्ति के लिए हिन्दूओं के विरूद्ध इस्तेमाल किए। जो लोग इस सम्बन्ध में ज्यादा जानने के इच्छुक है, उनसे मैं कहूंगा  िकवे 1795 के रैगूलेषन संख्या 21 की भूमिका पढ़कर देखे। इसके अनुसार यदि एक ब्राम्हण कोई ऐसी चीज प्राप्त करना चाहता था जो उसका षिकार व्यक्ति अपनी इच्छा से देने को तैयार न होता था तों वह दबाव डालने अनेक तरीके काम मे लाता था। अपने शरीर को चाकुओं और उस्तरों से काटना अथवा विष खाकर मर जाने की धमकी देना वे साधारण ढंग थे, जो ब्राम्हण इस्तेमाल करता था। इसके अतिरिक्त और भी कई ढंग जो हिन्दूओं लूटने के लिए ब्राम्हण इस्तेमाल करते थे। वे जितने असाधारण थे उतने ही ज्यादा शर्मनाक थे।  एक तरीका जो आम तौर पर अपने षिकार हिन्दू यजमानों पर दबाव डालने के लिए ब्राम्हण इस्तेमाल करते थे वह यह था कि वह किसी व्यक्ति के घर के बाहर एक घेरा सा बना देते थे जिसे कूढ़ कहा जाता था। इस पूर्व चक्कर के अन्दर लकड़ियों का एक ढेर लगा दिया जाता था। इस पर एक बूढी स्त्री को बिठा दिया जाता था। जिस व्यक्ति को डराना होता था उसे ‘कूढ’ में बैठी औरत को जला डालूंगा की धमकी दी जाती। दूसरा तरीका जो ब्राम्हण इस्तेमाल करते थे वह यह था कि अपनी पत्नी और बच्चों को अपना वचन पूरा न करने वाले हिन्दू के घर के बाहर बिठा कर ब्राम्हण कहता था कि यदि वह अपना वचन पूरा नही करेगा तो वह उनकी हत्या कर डालेगा। तिसरा तरीका धरना देने का था। ब्राम्हण अपने षिकार (हिन्दू) के द्वार पर मरणव्रत रखकर बैठ जाता था। ये तरीके तो कुछ भी नही। इनसे भी ज्यादा तरीके ब्राम्हणों ने अपनाए। ब्राम्हण गैर-ब्राम्हणों की औरतों का विवाह के बाद पहली रात को शील भंग करने के अधिकार का दावा करने लगे थे। यह रीति कालीकाट के जामोरिन और वैष्णव मत के वल्लभाचारी सम्प्रदाय में प्रचलित रही है। ब्राम्हण इस सीमा तक पतन के गहरे गढ़े में गिर चुके थे। यदि बाईबल के कथनानुसार नमक अपना नमकीनपन छोड दे तो वह बाकी चीजों को नमकीन क्यों कर बना सकेगा? कोई आष्चर्य नही कि हिन्दू समाज नैतिक तौर पर खतरनाक सीमा तक कमजोर हो चुका था। ईस्ट इंडिया कम्पनी को, 1819 ईसवी में, इस नैतिक पतन को रोकने के लिए एक कानून-रैगूलेषन-7 पास करना पड़ा। इस रैगूलेषन की भूमिका में लिखा है कि औरतों को लोगों की पत्नियों और छोटी आयु की लड़कियों को वेष्यावृति हेतु अपहरण करने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। मर्दो के लिए अपनी पत्नियों और बच्चों को त्याग देने का आम रिवाज हो गया था। जनचेतना नाम की कोई चीज नही थी और सामाजिक-बुराइयों के विरूद्ध विद्रोह करने का किसी में भी साहस नही था। सच्चाई तो यह है कि ब्राम्हण सभी सामाजिक बुराइयों का समर्थन व उनकी सुरक्षा करते थे क्योकि उनकी आजीविका उन्ही पर निर्भर थी। ब्राम्हणों ने छुआछुत का समर्थन व सुरक्षा की, उस छुआछुत की जिसके कारण लाखों इन्सान अपराधियों व गुलामांे जैसा जीवन व्यतीत कर रहे थे। वह बाल-विवाह और जबरी विधवापन के समर्थन थेः यही दोनों जाति-पाति को कायम रखने वाले दो मजबूत स्तम्भ है। ब्राम्हणों ने विधवाओं को जलाने का समर्थन किया, उन्होने क्रमवार असमता की सामाजिक व्यवस्था का समर्थन किया, उन्होने पुत्री-वध के नियम का समर्थन किया, जिस पर अमल करते हुए राजपुतों ने अपनी हजारो बच्चियो को उनके जन्म लेते ही मौत के घाट उतार दिया। कितना शर्मनाक है यह सब!!’’
पुराने जमाने में राजा को भूस्वामी और ब्राम्हण को भूदेव माना जाता था। राजा को भूदेव का आदेष था कि वह शुद्र और अछूत का धन भी, यदि उसके पास हो तो, छीन ले।
यो लोभादधमों जात्या जीवेदुत्कृष्टकर्मभिः।
तं राजा निर्धन कृत्वा क्षिप्रमेव प्रवासयेत्।।
अर्थात ्ः नीच जाति वाला जो मनुष्य ऊंची जाति वाले की वृत्ति को लाभ से 
ग्रहण कर आजीविका चलाए, राजा उसे निर्धन कर, सब संपत्ति छीन कर, राज्य से बाहर निकाल दे।
जब ऐसे आदेष थे तो वह उन्हे जमीन का स्वामी बनने की आज्ञा कैसे दे सकता था? अतः अछूत सवर्णो की भूमि पर बंधक-मजदूरों के रूप में शताब्दियों तक काम करते रहे। इस प्राचीन व्यवस्था का बचाखुचा प्रभाव इन दिनों भी देष में लाखों की संख्या में विद्यमान बन्धक-मजदूरों के रूप में देखा जा सकता है।
अछूत जीहवत रहने के लिए खाद्य पदार्थ कर्ज के रूप में सवर्णो से लेते रहे है और अब भी लेते है। इस कर्ज को उतारने के उद्देष्य स ेउपजी बन्धक मजदूरी की प्रथा का उल्लेख करते हुए श्री बी. सैन ने लिखा हैः ‘‘कर्ज चुकाने के लिए दास प्रथा ने भारत में जाति-पाति व्यवस्था को विषेष स्थिरता प्रदान की, दक्षिण भारत के अछूत अथवा पददलित वर्ग कर्ज चुकाने के लिए दासता-पद्धति का बदतरीन षिकार हुए है।’’
‘‘यदि शूद्र वेद-पाठ को जानबूझ कर सुनता है तो उसके कानों में सीसा (सिक्का) या लाख डाल देनी चाहिए। यदि वह वेद-पाठ करे तो उसकी जुबान काट दी जाए। यदि वह वेद मंत्र याद करता है तो उसके शरीर के दो टुकडे कर दिए जाए।’’
‘‘चातुर्वण्र्य के कारण वे कोई विद्या प्राप्त नही कर सकते थे। वे अपनी आजादी का मार्ग सोच और पा नही सकते थे। वे नीच बने रहने को मजबूर थे और बच निकलने का मार्ग न पाकर और बच निकलने के साधन न होने के कारण उन्होने शाष्वत-दासता से समझौता कर लिया और इस सनामन-गुलामी को उन्होने अपना ऐसा भाग्य मान लिया, जिससे छुटकारा नही पाया जा सकता। यह सही है कि यूरोप में भी कमजोरों के शोष्सण्स, बल्कि उनको दूषित करने से संकोच नही किया, किन्तु यूरोप में बलवानों ने ऐसी बेषर्मी से कमजोरों को लूटपाट व ठगी के मामले में उन्हे लाचार और बेबस बनाने का प्रबन्ध नही किया जैसे कि भारत में हिन्दुओ ने किया।

दयानन्द ने वर्ण-व्यवस्था के मानने और प्रचालन में मनु की पैरवी की है। उन्होने मनुस्मृति के अध्याय एक श्लोक 91 की नकल करते हुए अपने ‘सत्यार्थ प्रकाष’ नामक ग्रंथ में लिखा हैः
‘‘षूद्र निन्दा, ईष्र्या, अभियान आदि दोषों को छोड कर, ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैष्यों की यथावत् सेवा करना और उसी से अपना जीवन करना, यह एक शूद्र का गुण कर्म है।’’
आपस्तम्ब धर्मसूत्र प्रपाठक 2, पटल 2, खण्ड 2, सूत्र 4, की नकल करते हुए स्वामी दयानन्द आगे लिखते हैः
‘‘आर्यो के घर में शूद्र अर्थात् मूर्ख स्त्री-पुरूष पाकादि सेवा करे, परन्तु वे शरीर, वस्त्र आदि से पवित्र रहे, आर्यो के घर में जब रसोई बनाये तब मुख बांध के बनावें क्योकि उनके मुख से उच्छिष्ट और निकला हुआ श्वास भी अन्न में न पड़े।’’
आर्य समाज को प्रायः यह चिन्ता सताती रही की अछूत हिन्दू धर्म का त्याग कर मुसलमान या ईसाई धर्मो में दीक्षित न हो जाए। इसी संदेह से भयभीत अछूतोद्धार का काम अपने तौर तरीके से करते रहे। किन्तु जब कभी अछूतो व आदिवासियों को राजनीतिक अधिकार देने का अवसर आया, इन्ही आर्य समाजी नेताओं ने डट कर उनका विरोध किया।
गौतम बुद्ध द्वारा संचालित सामाजिक क्रांति के सैकड़ो वर्षो बाद तक वर्ण-व्यवस्था दबी रही। इसीलिए मौर्य राजवंष के शासन काल को ‘भारत का स्वर्ण-युग’ कहा गया। इसके जो छुआछुत का जनक है, पैदा हुआ और हिन्दूवाद एक मिषनरी धर्म न रह कर क्रूरता व शोषण का स्त्रोत व साधन बन गया।
बुद्ध धम्म के समानता व करूणा के सिद्धान्तों को बहुत सारे सन्तो ने अपनी समझ व सीमाओं और हालात के मुताबिक छुटपुट रूप में कायम रखा और उन्हे बुलन्द भी किया। किन्तु उनकी आवाज ब्राम्हणवाद के नक्कार खाने में तूती की आवाज बन कर रह गई। वे स्वंय भी जिस जाति व धार्मिक परम्परा में पैदा हुए थे, उसी में जीए और उसी में मेरे। नतीजा वही ढाक के तीन पात! हालात बद से बदतर बल्कि बदतरीन हो गए।
क्या हत्यारे, क्या मठाधीष और क्या न्यायाधीष सब एक साथ हो गए और कमजोरों पर अमानवीय अत्याचार ढाने लगे और उनको मानवता के दर्जे से नीचे ही गिरा दिया।
विश्लेषण के कुछ बिन्दू
धार्मिक कारण: दलित वर्गो के निरादर, उनकी दरिद्रता, उनकी कंगाली और उनके बहुपक्षीय पिछड़ेपन की जड़े, हिन्दूवाद में है, जिसका ठीक नाम ‘ब्राम्हणवाद’ है। इस तथ्य को डाॅ. अंबेडकर ने निम्नलिखित शब्दो में उजागर कियाः
‘‘संसार के बहुत से भागों में अपनी किस्म के, बार्ड के शब्दो मे, नीच लोग थे। रोमनों के यहां स्लेव थे और स्पार्टवासियों के हेटल, अंग्रेजो के विलेन और अमेरिकावासियों के नीग्रो तथा जर्मनी वालों के जूं परन्तु इनमें से किसी के साथ भी अछूतो से बढ़कर दुव्र्यवहार नही हुआ। उक्त देषों में मिलने वाले दासता के विभिन्न रूप समाप्त हो चुके है। परन्तु अछूतपन अभी भी है और लगता है कि जब तक हिन्दू धर्म रहेगा तब यह बरकरार रहेगा। अछूत का जीवन एक जूं अर्थात् यहूदी के जीवन से बदतर है। जूं के दुःख उसके अपने पैदा किए हुए है, परन्तु अछूतो के दुःख उनके अपने पैदा किए हुए नही है। वे तो हिन्दू धर्म जो पाषविक शक्ति की तरह ही दुःख और कष्ट पैदा करने में समर्थ है कि नियोजन षड्यन्त्र का परिणाम है। जूं से घृणा की जाती है परन्तु उसे प्रगति के अवसरों से वंचित नही किया जाता, जबकि अछूत से न सिर्फ घृणा की जाती है बल्कि उसे उन्नति के मौकों से भी दूर रखा जाता है।’’

करोड़ों लोगों का मजहब के आधार पर, भगवान और  भाग्य की आड़ में जीवन रस चूस लिया गया था किन्तु इस पर भी वे जुबान रखते हुए गूंगे बने हुए थे। इस वजह से भारत में जो उनकी दुर्दषा व दयनीय हालात थी, उसका वे उल्लेख तक न कर पाते थेः
जीवन उद्देष्य: डाॅ. अंबेडकर ने कहा कि प्रत्येक के जीवन का एक उद्देष्य होना चाहिए। उद्देष्य विहीन-जीवन जीना व्यर्थ है। उन्होने कहाः
‘‘मनुष्य नष्वर है। सभी ने एक न एक दिन मृत्यु का ग्रास बनना है। किन्तु हर किसी को मानवता की भलाई और स्वाभिमान के उच्च आदर्षो को विकसित करने के लिए अपना जीवन न्योछवर करने का निष्चय करना चाहिए। हम दास नही है। हम योद्धओं के वंषज है। किसी शूरवीर के लिए स्वाभिमान और राष्ट्र-प्रेम से शून्य जीवन व्यतीत करने से अधिक लज्जाजनक बात और क्या हो सकती है? जीवन को लटकाए रखना और कौवे की भान्ति हजारों वर्ष जीते रहना, इस संसार में, जीवित रहने का एकमात्र ढंग नही है, जीवन की सत्यता, आदर अथवा देषभक्ति जैसे ऊंचे आदर्षो की प्राप्ति के लिए बलिदान करके अमर और अजर बनाया जा सकता है। मानवीय अधिकारों की बलि पर कितने ही महापुरूष अपना बलिदान दे चुके है। बलूत (फलहीन) वृक्ष की भांति निरर्थक जीते जाने से किसी बड़े मन्तव्य और उद्देष्य के लिए अपने भर यौवन मे ही आत्मोत्सर्ग कर देना कही अच्छा है।’’
अपनी गुलामी की बेड़िया तुम खुद ही काटो। अपमानित होकर जीवित रहना धिक्कार है। स्वाभिमान जीवन के लिए आवष्यक है। इसके बिना जीवन निकम्मा है। स्वाभिमान के साथ जीवित रहने के लिए मनुष्य को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कठिन एवं तीव्र संघर्ष से ही शक्ति, विष्वास और आदर प्राप्त होते है।
छिने हुए अधिकार अत्याचारियों से विनय-प्रार्थना करने से नही मिला करते अपितु वे तो कठिन संघर्ष से ही उनसे छीने जाया करते है और तुम्हे अपनी कथनी और करनी में योद्धा का सा व्यवहार अपनाना चाहिए और प्रत्येक स्थान पर अपने मानवीय अधिकार प्राप्त करने के लिए बल-प्रयोग करना चाहिए।’’
डाॅ. अंबेडकर ने केवल भाषण ही नही दिए, बल्कि उन्होने अपने मानवीय अधिकार जितलाने की गरज से महाड के चोदार तालाब से पानी भरने और नासिक के कालाराम मन्दिर में प्रवेष का अधिकार जितलाने के लिए मोर्चे लगाए, खुद उन मोर्चो का नेतृत्व किया, जिनमे उन्होने चोटे तक खाई।
बाल गंगाधर तिलक, जिन्हे सवर्ण हिन्दुओ ने ‘ लोकमान्य’ की उपाधि दी, स्वतन्त्रता को तो अपना जन्म सिद्ध अधिकार घोषित करते थे किन्तु अछूतपन मिटाने के लिए एक प्रस्ताव पर अपने हस्ताक्षर करने के लिए तैयार न थे। तिलक को ललकारते हुए डाॅ. अंबेडकर को कहना पड़ा थाः
‘‘यदि तिलक एक अछूत परिवार में जन्मे होते तो वह ‘स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है’ का नारा लगाने की अपेक्षा यह कहते, ‘‘ छूतछात की समाप्ति मेरा जन्म- सिद्ध अधिकार है।’’
गांधी जी खुद को ‘सनातनी हिन्दू’ कहते थे। उन्होने ‘सनातन धर्म’ की इस प्रकार व्याख्या की हैः
‘‘मै अपने आपको सनातनी हिन्दू इसलिए कहता हूं किः
1. मै वेदों, उपनिषदों, पुराणों और हिन्दू-धर्म ग्रंथो के नाम से प्रचलित सारे साहित्य में विष्वास रखता हूं और इसलिए अवतारो और पुनर्जन्म में भी।
2. मै वर्णाश्रम धर्म के उस रूप  मे विष्वास रखता हूं, जो मेरे विचार में विषुद्ध वैदिक है, लेकिन उसके आजकाल के लोक-प्रचलित  और स्थूल रूप में मेरा विष्वास नही है।
3. मै गो-रक्षा के उसके लोक प्रचलित रूपों से कही अधिक व्यापक रूप में विष्वास करता हूं।
4. मै मूति-पूजा में अविष्वास नही करता।’’
इसलिए डाॅ. अंबेडकर ने हिन्दू समाज में मूल सुधार करने का बीड़ा उठा लिया। इस संबंध में उनका पहला कदम था हिन्दू कोड यानी हिन्दू विधि-संग्रह में सुधार लाना। इस मकसद के लिए सर्वप्रथम उन्होने भारतीय संसद् (संविधान सभा) में 11 अप्रैल, 1947 को हिन्दू कोड बिल पेष किया।
हिन्दू कोड बिल इतना महत्त्वपूर्ण था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से एक पत्रकार ने पूछाः ‘‘आपके शासनकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि यानी सफलता क्या है?’’ तो उनका उत्तर थाः हिन्दू कोड बिल।’’
एक लेखक के साथ वार्तालाप में भी डाॅ. अंबेडकर ने यह माना थाः ‘‘ हिन्दू कोड बिल भारत के संविधान की अपेक्षा देष के लिए सौ गुणा ज्यादा लाभकारी सिद्ध होगा।’’
5. हिन्दू कोंड में निम्नलिखित मददों संबंधी प्रावधान किए गए।
(1) विवाह (2) गोद लेने (3) संयुक्त परिवार की जायदाद (4) नारी की जायदाद (5) संरक्षण (6) मृत द्वारा वसीयत के न होने संबंधी विरासत (7) वसीयत होते हुए विरासत (8) भरण पोषण आदि।
धाराएंः आगे हिन्दू कोड बिल की विभिन्न धाराओं की व्याख्या की जाती हैः
जायदादः जो कोई हिन्दू वसीयत छोड़े बिना मर जाता है। उसकी सम्पत्ति के अधिकारों को निष्चित किया गया।
हिन्दू कोड बिल में वसीयतहीन मृत पिता की जायदाद में पुत्री, विधवा, पुत्र की विधवा को बेटे के बराबर हिस्सा (अधिकार) दिया गया।
किसी स्त्री द्वारा जो भी सम्पत्ति प्राप्त की जाएगी, वह निष्चयात्मक व निजी उसकी सम्पत्ति होगी।

दाय भागाधिकार के अनुसार विरासत में मां की तुलना में पिता को पहल दह जाती है। किन्तु हिन्दू कोड बिल में पिता की बजाय मां को विरसे में पहल दी गई।
स्त्री धन को एकमात्र स्वामी (मालिक) बनाया गया। स्त्रीधन को पति अथवा कोई सगा संबंधी न तो बर्बाद करेगा और उस अमानत में खयानत (बेईमान) करेगा।

विवाह: हिन्दू कोड बिल में विवाह संबंधी क्रांतिकारी उपबंध किए जाए, जैसेः 
1.  दोनो प्रकार के विवाहों-संस्कारिक (धर्मानुसार) और सिविल (कानूनी) को मान्यता दी गई, जबकि कोड से पूर्व केवल संस्कारिक मान्यता (वैधता) प्राप्त थी। इस तरह विवाह करने के ‘ब्राम्हणी’ एकाधिकार को समाप्त किया गया।
2. संस्कारिक (षास्त्रिय) यदि निम्नलिखित शर्ते पूरी हो जाती है तो किन्ही भी दो हिन्दुओ में शास्त्रीय रीति के अनुसार विवाह सम्पन्न हो सकेगाः

1. यदि दोनों पक्षों में विवाह के समय पर कोई पक्ष भी पति अथवा पत्नी नही रखता।
2. यदि दोनों पक्षों में विवाह के समय कोई जड़ बुद्धि या पागल नही है।
3. यदि विवाह के समय पर अठारह वर्ष की आयु पूरी कर चुका है और वधु 14 वर्ष आयु पूरी कर चूकि है।
4. यदि दोनों पक्ष परम्पर निषेधात्मक सम्बन्ध की कोटियों के अन्तर्गत नही आते।
5. यदि दोनों पक्ष आपस में परम्पर सपिण्ड नही है और यदि पारम्परिक आचार और परम्परा के अन्तर्गत दोनो पक्षों में ऐसा संस्कार जायज (वैध) मानने की प्रथा न हो।
6. जहां वर या वधु 16 वर्ष की आयु पूरी नही कर चुकी है, उसके संरक्षण को स्वीकृति प्राप्त की जा चुकी है।

सपिण्ड सम्बन्ध की परिभाषा और व्याख्या करते हुए धारा 5 मंे कहा गया है कि, (1) (क) सपिण्ड का अर्थ अपने मातृकुल की तीन पीढ़ी तक और पितृकुल की 5 पीढ़ी तक होगा।
(ख) दो व्यक्ति उसी व्यवस्था में परस्पर सपिण्ड कहे जाते है यदि वे, एक दूसरे के वंष-परम्परा से सपिण्ड सम्बन्धी की सीमा के भीतर समवंषज है अथवा यदि वे दोनों सपिण्ड सम्बन्ध की सीमा के भीतर सम्मिलित वंष परम्परागत आपस में एक-दूसरे के साथ समान वंषज के रूप में है।
(ग) पिषिद्ध सम्बन्ध का क्रम....दो व्यक्तियों का उस अवस्था में निषिद्ध सम्बन्ध कहा जाता है। यदि दोनो में से एक वंषानुक्रम से दूसरे का पुरखा हो, अथवा वंषानुक्रम से पुरखे या संतति की पत्नी या पति रहा हो, अथवा वे दोनों, भाई-बहन, चाचा-भतीजी और चाची-भजीता अथवा भाईयों व बहनो की सन्तति हों।

संस्कारिक  (धर्मानुसार विवाह) में जाति और उपजाति की सर्वसभिका (पहचान) जरूरी होती है। हिन्दू कोड बिल के जाति-पाति की पहचान को मूलतः समाप्त कर दिया गया।

गोत्रों की पहचान तो समाप्त कर दी गई।
(3) सिविल-विवाह में सपिंड यानी समान पिंड के वर-वधु में विवाह को वैध ठहराया गया। पुराने हिन्दू कानून में बहु विवाह की आज्ञा थी किन्तु हिन्दू कोड बिल द्वारा बहु विवाह-प्रथा को समाप्त कर दिया गया। कोड द्वारा केवल एक-विवाह प्रथा का उपबंध किया गया।
छूसरे शब्दो में पुराना कानून कई विवाहों और कई पत्नियां रखने की अनुमति देता था किन्तु हिन्दू कोड बिल में पुरानी प्रथा को खत्म कर दिया गया।

तलाक: हिन्दू समाज में आदर्ष विवाह उसे माना जाता है, जिसमें विच्छेद यानी तलाक न हो। हिन्दू कोड बिल में इस प्रथा को खत्म किया गया। कोड में विवाह के खात्मे (तलाक) के लिए निम्नलिखित उपबंध किए गएः
‘‘कोई ऐसा विवाह, चाहे वह इस कोड के आरम्भ होने से पहले अथवा बाद में संपूर्ण हो चुका है, निम्नाकिंत आधारों मे से किसी एक के कारण खत्म हो जाएगा।
(1) यदि ऐसे विवाह के समय पर और तब से लेकर लगातार इस सम्बन्धी अदालती कार्यवाही के आरम्भ तक विवाह के दोनों पक्षों मे से कोई एक नपुंसक था।
(2) यदि पति किसी स्त्री को रखेली के रूप में रख रहा है अथवा पत्नी किसी पर पुरूष की रखेली बन कर रह रही है या वेष्या का जीवन व्यतीत कर रही है।
(3) यदि विवाह के दोनों पक्षों मे से कोई पक्ष दूसरा धर्म ग्रहण कर लेता है और हिन्दू धर्म को त्याग देता है।
(4) यदि विवाह के दोनो पक्षों में एक पक्ष असाध्य रूप  में उन्मत्त या पागल है और ऐसे प्रार्थना पत्र के देने के पहले निरन्तर पांच वर्ष के लिए उसका इलाज किया जा चुका है।
(5) यदि दोनों पक्षों में कोई एक बडे भयानक और असाध्य प्रकार के कुष्ठ से पीड़ा उठा रहा है।
(6) एक दूसरंे से होने वाले यौन-रोग, और
(7) निर्दयता।

दत्तकः गोद लेने और संरक्षक नियुक्त करने संबंधी उपबंध।
अभी तक हिन्दूओं में गोद लेने विषयक भिन्न-भिन्न प्रकार रहे है। हिन्दू कोड में उन्हें एकरूपता देने का यत्न किया गया।

‘गोद लेने के विषय में योग्यता’ शीर्षक मंे कहा गया है कि कोई भी ऐसा हिन्दू पुरूष जिसके होष व हवास (स्वस्थ मानसिक अवस्था) कायम है और अपनी आयु के 18 वर्ष पूरे कर चुका है, वह पुत्र गोद (दतक) लेने की योग्यता रखता है। किन्तु शर्त यह है कि कोई भी हिन्दू पुरूष अपनी पत्नी की अनुमति ग्रहण किए बिना गोद नही लेगा। माता को दत्तक लेने का अधिकार दिया है, यदि बच्चे के पिता ने हिन्दू-धर्म को त्याग दिया हो।

यदि विधवा ने हिन्दू धर्म त्याग दिया हो तो उसके गोद लेने के अधिकार को समाप्त माना गया है।

कोई भी व्यक्ति तब तक गोद लिए जाने योग्य क्षमता नही रखेगा, जब तक कि निम्नलिखित शर्तो के सम्बन्ध में संतुष्टि नही हो जातीः
(1) यह हिन्दू है।
(2) वह विवाहित नही है।
(3) वह पहले से ही गोद नही लिया जा चुका है।
(4) वह अपनी आयु के 15 वर्ष पूरंे नही कर चुका है।

हिन्दू विधान (कानून) में विद्यमान जाति विषयक प्रतिबन्ध को हटा दिया गया है। वर्तमान कानून के अनुसार केवल उसी बालक को दत्तक के रूप में लिया जा सकता है, जो गोद लेने वाले की अपनी जाति का हो। अब जाति-उपजातियों के प्रतिबंध को हटा दिया गया है। किन्तु इतना ही प्रतिबंध रखा गया।

(उ) किसी विवाहत लड़की के मामलंे में उसका पति किन्तु शर्त यह है कि कोई भी ऐसा व्यक्ति इस धारा के विधानों के अधीन किसी नाबालिग का संरक्षक होने का अधिकार नही रखेगा।
(अ) यदि वह हिन्दू धर्म को त्याग चुका है।
(इ) यदि वह पूर्णतया और अन्तिम संसार रूप में धारा 110 को उपधारा (1) में वर्णित रीतियों में से किसी रीति अनुसार संसार को त्याग चुका है।

जहां स्वाभाविक संरक्षक हिन्दू धर्म को त्याग चुका है वहां उसकी अधिकार सत्ता का खण्डन हो जाएगा। ‘किसी नाबालिग हिन्दू के संरक्षक का कत्र्तव्य होगा कि वह ऐसे नाबालिग का हिन्दू के रूप में पालन पोषण करे।’ नाबालिग बच्चों पर माता के अधिकार की स्वीकृति विषयक है। अब तक के विधान में यह ज्ञात हुआ है कि इसकी उपेक्षा की जाती थी। किसी भी ऐसे बात का होना नही विचारा जाएगा जो किसी भी व्यक्ति के संरक्षक का कार्य पूरा करने के लिए साधिकार कर सके यदि नाबालिक की माता जीवित है और अपने ऐसे नाबालिग बच्चे की स्वाभाविक संरक्षिका होने की क्षमता व योग्यता रखती है।

भरण पोषणः हिन्दू कोड बिल में भरण-पोषण संबंधी निम्नलिखित उपबंध किए गएः
(1) मृत यदि कोई वसीयत छोड़ जाता है अथवा नही, तो उस पर निर्भर व्यक्तियों के भरण पोषण के वे व्यक्ति जिम्मेवार होगे जो विरसे में मृत की जायदाद को प्राप्त करते है। हिन्दू कोड बिल में ऐसे 11 व्यक्तियों के भरण पोषण किए जाने का अधिकार है। भरण पोषण के हकदार व्यक्तियों में यानी रखेल को भी शामिल किया गया है।
(2) यदि पत्नी अपने पिता से अलग रह रही है तो उसे भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार होगा। यदि पत्नी इन कारणों (1) पति रोग से पीडित है। (2) यदि उसने रखेल रखी हुई है। (3) यदि पति अत्याचार ढाने का दोषी है। (4) यदि पति ने पत्नी को दो वर्षो से छोडा हुआ है। (5) यदि पति ने धर्म परिवर्तन कर लिया है और (6) यदि किसी अन्य कारण से पत्नी पति से अलग रह रही है। (7) यदि पति-पत्नी में तलाक हो जाता है, तो उनकी सन्तान को वैध माना जाएगा और उसे सभी प्रकार के अधिकार प्राप्त होंगे।

संयुक्त परिवार प्रथाः परिवार में जन्म सम्पत्ति पर अधिकार स्थापित नही करता। इस कोड के आरम्भ होने पर तथा उसके बाद, पूर्वज के जीवन काल के दरम्यान उसकी सम्पत्ति में हित रखने का दावा करने का अधिकार जो कि इस तथ्य पर निर्धारित है कि दावेदार का जन्म उक्त पूर्वज के परिवार में हुआ था, किसी भी अदालत में स्वीकृत नही होगा।

संयुक्त आसामी का स्थान सम्मिलित आसामी के रूप में बदल जाएगाः
कोड के आरम्भ पर तथा उसके बाद कोई भी आदलत, संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में हित रखने के किसी ऐसे अधिकार को मान्य नही करेगा, जो कि उत्तरधिकार के नियम पर अवलम्बित है और समस्त व्यक्ति जिनके जिस दिन यह कोड कार्यान्वित हो जाएगा उस दिन कोई संयुक्त परिवार की सम्पत्ति है वह उक्त सम्पत्ति बतौर सम्मिलित आसामियों के टेनेन्ट्स इन कामन अपने पास रखते है ऐसा विचार जाएगा। मानो कि कोड के आरम्भ हो गया था और उनमें से प्रत्येक व्यक्ति अपना भाग एक परिपूर्ण स्वामी के रूप में अपने पास अलग रखते है, इत्यादि।

हिन्दू पुत्र के धार्मिक कर्तव्य का पायस आब्लिगेषन का नियम खंडित किया जाता है।
(1) इस कोड के आरम्भ के प्ष्चात् कोई भी अदालत सिवाय उसके जैसा कि उपाधारा 2 में चिहित किया गया है, किसी पुत्र, पौत्र के विरूद्ध, उसके पिता, पितामह और प्रपितामह द्वारा लिए गए ऋण की वसूली के लिए और ऐसे किसी ऋण की अदायगी के सम्बन्ध में किसी सम्पत्ति को अधिकार में लेने के लिए इस आधार पर कि ऐसे किसी ऋण को चुका देगा उक्त पुत्र, पौत्र अथवा प्रपौत्र का धार्मिक कर्तव्य है, कानून कार्यवाही करने के अधिकार को स्वीकृत नही करेगी।
(2) इस कोड के प्रयोग में आने से पहले यदि कोई ऋण लिया गया है तो उस हालत में उपधारा 1 में उल्लिखित कोई भी बात निम्नांकितोे पर प्रभाव नही डालेगी।
(अ) किसी भी लेनदार का पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र जैसे कि सूरत हो, के विरूद्ध कानूनी कार्यवाही दायर करने का अधिकार या ऐसे किसी देन की वसूली के सम्बन्ध में किया गया किसी सम्पत्ति का स्वत्वार्पण या इन्तकाल और ऐसा कोई अधिकार या स्वत्वापूर्ण धार्मिक कत्र्तव्य के नियम के अधीन उसी प्रकार और उसी सीमा तक प्रयोग में लाया जाएगा जैसा कि यह कोड पास न होने की अवस्था में किया जाता। 
संयक्त-परिवार के सदस्यों की कोड के पहले की क्षण विष्यक जिम्मेदारियों में परिवर्तन नही होगा- जहा इस कोड के आरम्भ से पहले संयुक्त परिवार के नियामक एवं कत्र्ता द्वारा परिवार के प्रयोजनार्थ कोई कर्जा लिया गया हो तो उस अवस्था में इस कोड में उल्लिखित कोई भी संयुक्त परिवार की किसी भी सदस्य उक्त ऋण चुका देने की जिम्मेदारी पर लागू नही होती और ऐसी कोई जिम्मेदारी ऐसे समस्त या किन्ही भी व्यक्तियों पर जो उसके लिए उत्तरदायी है। इसी प्रकार और इसी सीमा तक आएद की जाएगी जैसी वह कोड पास न होने की सूरत में की जाती, इत्यादि।

हिन्दू कोड बिल में समर्थकः महाराष्ट्र सरकार के षिक्षा विभाग द्वारा प्रकाषित ‘डाॅ. बाबा साहब अंबेडकर राईटिगस ऐंड स्पीचेज’ नामक पुस्तक माला के 14वें खंड के दो भाग है। इन दो भागों की पृष्ठ संख्या 1385 है। ग्रथ के दोनो भागों का अध्ययन करने से मालूम होता है कि बहस से भाग लेने वाले अपनी-अपनी तूतियां बोल रहे है। उनको न तो समय सीमा का कोई ख्याल है और न संदर्भ व संबंद्धता का कोई पास है, वे बस बोलते ही जाते थे।

सवर्ण हिन्दूओं ने मुसलमान सदस्य नजीरूउद्दीन अहमद को हिन्दू कोड बिल का विरोध करने के लिए आगे किया। एक बार तो डाॅ. अंबेडकर को उसे कहना ही पड़ा ‘‘तुम समय बर्बाद कर रहे हो।’’ तो भी वह बहु ढीठताई से बिल की बहस में अड़चने डालता ही गया।
बिल के समर्थन में डाॅ. बी. पट्टा, सीतरामईया, श्रीमती हंसा मेहता, श्रीमती सुचेता कृपलानी, श्रीमती रेणुका रे, श्रीमती दुर्गाबाई, कुमारी पद्याजा नायडों आदि अनेक सदस्यांे ने जोरदार वकालत की।
बिल के संदर्भ में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की स्थिति की बाबत खुद डाॅ. अंबेडकर ने इस प्रकार टिप्पणी की है।
अर्थात्ः मुझे ऐसा महसूस हुआ कि प्रधानमंत्री चाहे सचे थे, किन्तु वह हिन्दू कोड बिल को पारित कराने के लिए न तो गंभीर थे और न ही कृतसंकल्प।
तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद ने हिन्दू कोड बिल का खुला विरोध किया और त्यागपत्र देने की धमकी दे डाली। ऐसे में बिल पारित होता तो कैसे?

हिन्दू कोड बिल के विरोधी
हिन्दू कोड बिल के विरोध में नाना प्रकार की तूतियां बोली गई। विरोध के कुछेक उदाहरण यहां प्रस्तुत किए जाते हैः

नजीरूद्दीन अहमदः रूढीवादी हिन्दूओं ने संविधान सभा के मुसलमान सदस्य नजीरूद्दीन अहमद को हिन्दू कोड बिल का विरोध करने के लिए आगे किया। अपने एक भाषण में उसने कहाः

‘‘हिन्दू कोड बिल संयुक्त परिवार की प्रथा को समाप्त कर देगा। कहा जा रहा है कि ये बिल वैदिक स्मृतियों में दर्ज साहित्य, जांे दैवी-मूल के है, के विरूद्ध है। यह हिन्दूओं की धार्मिक नींव और धार्मिक रचना को बर्बाद कर देगा।’’

बाबू राम नारायण सिंहः अपने आलोचनात्मक भाषण में बाबू राम नारायण सिंह ने कहाः ‘‘डाॅ. अंबेडकर ने कलम के एक ही वार से वेदों का तिरस्कार कर दिया है। उनकों एक अपराध बता दिया है। डाॅ. अंबेडकर वर्तमान के मनु है।’’ श्री झुनझुनवाला ने भी कहाः ‘डाॅ अबंेडकर कलयुग के मनु है।’’ ‘‘(डाॅ. अंबेडकर ने जवाब में कहाः मै मनु की उपाधि को स्वीकार नही करता।)’’

श्याम नंदन सहायः अपने भाषण से सहाय ने कहाः ‘‘हिन्दू कोड को एक गोली के रूप में किया गया है। इसके एक ही वार से दो हत्यांए होंगी-एक हिन्दू समुदाय की और दूसरी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की।’’

डाॅ. श्याम प्रसाद मुकर्जीः डाॅ. मुकर्जी का मानों सारा परिवार ही हिन्दू कोड बिल के विरोध में उठ खडा हुआ। डाॅ. मुकर्जी की माता ने औरतों को साथ लेकर संसद् के बाहर विरोध किया तो डाॅ. मुकर्जी ने ससद् के अन्दर बिल का जबरदस्त विरोध किया। उन द्वारा किए गए विरोध का सार इस प्रकार थाः
‘‘इस देष के इतिहास में, हिन्दू कोड बिल जैसे बिल का देष भर में समर्थन या विरोध हुआ। पहले कभी नही।
हिन्दू कोड बिल में सांस्कृतिक विवाह को ‘धार्मिक विवाह’ बना दिया गया है। हिन्दू समाज अनेक कठिनाईयों और भयंकर विषमताओं के बावजूद हजारों वर्षो से जीवित है। क्या विष्व में ऐसा कोई देष है जिसके समाज का, जबरदस्त हमलों के बावजूद, ढांचा बदला नही। (कोड के समर्थन) हिन्दू धर्म के उस स्त्रोत ही को समाप्त कर रहे है, जिसने अनेक पीढियों को जीवन व्यतीत करने का इतना विषाल मौका दिया। आप कहते होः यह एक प्रगतिषील कदम है। मै कहता हूं कि यह एक पिछाड़ने वाला उपाय है। सभी लोगों पर हिन्दू कांेड बिल को मत थोपों, इसें सभी पर मत लागू करो।

मै यह मानता हूं कि हिन्दू कोड बिल तैयार करने में डाॅ. अंबेडकर ने बहुत शानदार तथा बहुत अद्भुत कार्य किया है। हिन्दू विधि एक पेचीदा विषय है, जिसे डाॅ. अंबेडकर ने बड़ी योग्यता से समझा है। तभी तो मैं कहता हूं कि हिन्दू सारे के सारे कोड बिल कर दो किन्तु इसे यानी ऐच्छिक रखों। दूसरे शब्दो में चाहे कोई हिन्दू कोड को अपने ऊपर लागू कराना चाहे, या न कराना चाहे, ये उसकी इच्छा पर निर्भर हांे।’’

हिन्दू कोड बिल के विरोधियों को उत्तर
डाॅ. अंबेडकर हिन्दू कोड बिल पर बहस को अकारण लटकाए जाने से बहुत रूष्ट हो गए थे। उनको कहना पड़ाः अर्थात् (विरोधी) सभी पागल है।’’

आचार्य कृपलानीः इस नारे के उत्तर में कि ‘‘हिन्दू धर्म खतरे में है।’’ इस नारे के उत्तर में वरिष्ठ कांग्रेस नेता आचार्य जे. बी. कृपलानी ने अपने भाषण में कहाः

अर्थात्ः हिन्दू धर्म खतरे में है, इस बाबत बहुत कुछ कहा गया है। मुझे इसमें कोई तुक नजर नही आती। जब हिन्दू चोर होते है, जब वे बदमाषी करते है, जब वे काला बाजारी करते है, जब वे रिष्वतें लेते है तब हिन्दू धर्म खतरे में नही पड़ता किन्तु जब किसी विषेष कानून को सुधारने का यत्न किया जाता है, तो सुधारको के बारे में कहा जाता है कि वे हिन्दू धर्म को खतरे में डाल रहे है।

श्यामा प्रसाद मुकर्जी जवाहरलाल नेहरू के मन्त्रिमंडल में 4 वर्ष तक मंत्री रहे। उन्होने मन्त्रिमंडल की बैठक में हिन्दू कोड बिल का कभी विरोधनही किया किन्तु जब संसद् में बिल पर बहस हुई तो उन्होने बिल का विरोध करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उसे उत्तर देते हुए।

डाॅ. अंबेडकर ने कहा:
अर्थात्ः जहांतक डाॅ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी का संबंध है, मै महसूस करता हूं कि उनके (विरोध को) कदापि गंभीरता से नही लेना चाहिए। मुझे प्रतीत होता है कि उनका अपना निजी कोई मत नही है। मेरे विचार में उनका मामला बहुत दुःखद है, कारूणिक है। यह दुःखद मामला एक ऐसे पुरूष का है, जो संतुलित है, संयमी है, भला, अच्छा बर्ताव करने वाला है किन्तु जो शराबियों की संगत में पड़कर, इधर से उधर पासा पलटते हुए, खुद पियक्कड़ यानी मतवाला बन गया है।

हिन्दू कोड बिल का हश्र
हिन्दू कोड बिल, अक्टूबर 1951 तक किस अंजाम को पहुंचा, इसका उल्लेख डाॅ. अंबेडकर ने अपने त्यागपत्र दिनांक 10 अक्टूबर, 1951 में निम्नलिखित शब्दो में किया है।
‘‘..मै 4 वर्ष 1 महिने और 21 दिन तक कानूनी मंत्री रहा। जब राष्ट्र के निर्माण का प्रष्न आया तो मैने, हालांकि मुझे सन्देह था, नेहरू मन्त्रिमंडल में मंत्री बनने से इन्कार नही किया... बतौर कानून मंत्री मै कैसा करम कर पाया हूं यह निर्णय तो मैं दूसरों पर छोड़ता हूं।

हिन्दू कोड बिल संसद् में 11 अपै्रल, 1947 को पेष किया गया था। 4 वर्षो के बाद केवल चार कलाज पारित करके इसे बिना रोए-धोए मार डाला गया।
बिल पर बहस के दौरान प्रधानमंत्री ने मुझे कहा कि हिन्दू कोड बिल के विवाह और तलाक के हिस्सों को अलग करके पेष करना चाहिए। मैने यह मान लिया, उस कहावत की तरह कि सारा जाता देखा जो कुछ बच सकता है उसे ही बचाओं। फिर प्रधानमंत्री ने कहा कि बनारस व अलीगढ़ विष्वविद्यालय संबंधी बिलों को पृथकजा देना है, इसलिए हिन्दू कोड बिल के विवाह व तलाक के हिस्सों को भी विचाराधीन न लाया जाए।

संसदीय मामलों के मंत्री का व्यवहार भी बहुत असाधारण था। वह कांग्रेस का चीफ विहित भी था। वह हिन्दू कोड बिल का सख्त विरोधी थी। बिल पर बहस के समय वह लगातार गैर हाजिर रहता था। बिल की एक-एक कलाज को लम्बे-लम्बे भाषण देकर लटकाया गया। चीफ विहित का काम होता है सरकार के समय को बचाना किन्तु चीफ विहित ने अपना काम नही किया। मैने कभी ऐसा चीफ विहित नही देखा, जो प्रधानमंत्री के प्रति इतना बेवफा हो और जिसके प्रति प्रधानमंत्री की इतनी वफादारी हो। चीफ विहित के इस प्रकार की गैर वफादारी के बावजूद उसकी कांग्रेस में पदोन्नति की गई।
मैने यह सब इसलिए बताया है ताकि यह न कहा जाए कि मैने सेहत की खराबी के कारण त्याग पत्र दिया है। सेहत की खराबी के कारण मै अपने कत्र्तव्य पालन करने को कभी नही छोड़ने वाला।’’
इस तरह हिन्दू कोड बिल को दफना दिया गया। डाॅ. अंबेडकर ने नेहरू मन्त्रिमंडल से 10 अक्टूंबर, 1951 को त्याग पत्र दे दिया।

हिन्दू कोड बिल टुकडे होकर कानून बना

डाॅ. अंबेडकर के कानून मंत्री के पद से त्यागपत्र देने और 1952 के आम चुनाव के बाद हिन्दू कोड बिल के अनेक भाग करके उसे इस प्रकार पारित किया गया और चार कानून बने, जैसेः
(1) हिन्दू उत्तराधिकार कानून 1956।
(2) हिन्दू विवाह विषयक विधि 1955।
(3) हिन्दू दत्तक ग्रहण तथा भरण पोषण कानून 1956।
(4) हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता कानून 1956।

उपरोक्त दर्ज कानूनों व अन्य कानूनों से सब ज्यादा लाभ हिन्दू नारी को हुआ। उसे जायदाद पाने की मालिकी का, दत्तक लेने का, भरण-पोषण प्राप्त करने का और जाति-पाति तोड़कर विवाह करने जैसा अधिकार प्राप्त हुए, जिनमें से अधिकांष उसे पहले प्राप्त नही थे।

डाॅ. अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल बनाया, उसकी खातिर कानून मंत्री पद से त्याग पत्र भी दिया-इतना बलिदान करके उन्होने हिन्दू नारी की आजादी और प्रगति के मार्ग खोले जो उस पर शताब्दियों से बंद थे।

इसलिए तो डाॅ. अंबेडकर को ‘नारी-मुक्ति का योद्धा’ कहा जाता है और ठीक ही कहा जाता है।


छुआछातः देष की आजादी कि वर्षो बाद भी छुआछात का रोग जारी है।
छुआछात है क्या?ः छुआछात की व्याख्या करते हुए डाॅ. अंबेडकर ने राज्यसभा में 6 सितंबर, 1954 को दिए अपने भाषण में इस प्रकार विचार प्रस्तुत किए थेः

‘‘छुआछात क्या है? इसे गंभीरता से समझना चाहिए। जहां तक मै समझता हूं यह हिन्दूओ का मानसिक-रोग है। यह ऐसा रोग नही जिससे मैं बीमार हूं, न यह मेरी कोई ट्यूमर यानी गांठ-गिल्टी है। छुआछात न कोई दर्द है, न ही कोई शारीरिक अयोग्यता है जिसे दूर किया जा सकता है, यह तो मानसिक मुड़मान (गूंथन-ऐंठन) है। हरेक हिन्दू समझता है कि छुआछात करना ठीक है। मै नही समझता कि जब तक हजारों वर्षो से पड़ी इस गूंथन को नही खोला जाता, इनका किसी प्रकार के मानसिक रोग दूर करने वाले हस्पताल में नही, उनको रोगमुक्त करना कठिन है। मैं नही चाहता कि उनको ऐसे हस्पताल में भेजा जाए। अतः (छुआछात के खात्मे कि लिए) हमें यह सोचना होगा कि हम क्या कहते है और हम क्या कर रहे है। इसके अतिरिक्त सभी को यह समझ लेना चाहिए कि छुआछात का आधार धर्म है। इसमें कोई संदेह नही और हमें ऐसे महसूस करने में शर्मसार नही होना चाहिए। मनु ने अपनी पुस्तक (मनुस्मृति) में निष्चित तौर पर छुआछात करने का आदेष दिया है। मनु ने कहा है कि अछूत गांव से बाहर बसे, वे मिट्टी के बर्तन इस्तेमाल करे, वे साफ-सुथरे वस्त्र नही पहनेंगे, वे अपना भोजन मांग कर प्राप्त करेंगे आदि। मैं नही समझता कि आप हिन्दूओं के सिर दोष कैसे मढ़ सकते है। हजारों वर्षो से इस गंदे कानून की षिक्षाओं के कारण उनके मन में यह सिद्धान्त घर कर चुका है कि छुआछात करना एक अत्यंत पवित्र कार्य है। हिन्दूओ को सिखाया गया है कि सर्वोत्तत व पवित्र जीवन चूहे जैसा ही है जो अपने बिल में रहता है और किसी से कोई संपर्क नही रखता। हिन्दू को सिखाया जाता है तुम मत छुओ, उसे मत छुओ, वह (हिन्दू) यह न खाए, वह न खाए, चूहा अपने बिल में इसी प्रकार का जीवन जीता है। एक चूहा अपने घर (बिल) में किसी दूसरे चूहे को घुसने नही देता। ऐसी है हालत। हम यह कह सकते है कि छुआछात, जिसे मैने हिन्दूओं की मानसिक गूंथन कहा है, सार्वजनिक जीवन में खुद को इतना न थोंपे कि वह लोगों के नागरिक-अधिकारों ही को लपेट ले, दुर्बोध कर दे।’’ 
छुआछात के अनेक रूप रंगः दुनिया भर में दासता का प्रचलन हुआ है किन्तु छुआछात केवल हिन्दू समाज की विषेष उपज है। 1925 ईसवी सन् तक छुआछात को कानूनी मान्यता प्राप्त थी। न्यायालय ने महाराजा काहलापुर बनाम सुन्दरम और आत्माराम बना सम्राट् के मामलों में यह निर्णय दिया था कि जब सवर्ण हिन्दू ‘अछूत’ की छूत को नही करना चाहिए और यदि वह जानबूझ कर ऐसा करता है तो भारतीय दंडावली की धारा 295 के अधीन करता है। (जिस पर दंड दिया जाना चाहिए।)

(3) डाॅ. भीमराव अंबेडकर मुस्लिम-हकूमत बाबत लिखते हैः
अर्थात्ः भारत के मुसलमान शासको ने हिन्दू को नगरी (दीवानी) मामलों में अपने ही कानूनी को बताए रखने की आज्ञा दे दी थी।
(4) प्राचीन हिन्दू राजाओं के अधीन भारत की असली हालत का अनुमान लगाना कठिन है। इतना तो स्पष्ट है कि समस्त महाद्वीप संकीर्णता का षिकार था, पूरी तरह अस्तव्यस्त, उसमें राजनितिक जीवन और एकता का अभाव था।
अकबर के राजकाल में जिन ब्राम्हणों ने अल्लाह-उपनिषद लिख डाला, वे अछूतो के साथ समता व सम्मान का व्यवहार कैसे कर सकते थे।

जहांगीर के राजकाल में हालात ‘तोजके-जहांगीरी’ में बयान किए गए है। उसमें हिन्दूओं की जाति-पाति की बाबत इस प्रकार लिखा गया हैः
‘‘हिन्दू चार जातियों में बंटे हुए है- ब्राम्हण, क्ष्त्रिय, वैष्य और शूद्र। शूद्र सबसे छोटी जाति है। ये सबकी सेवा करते है। वे उन सभी सुविधाओं से वंचित है जो दूसरे समुदायों को प्राप्त है।’’
अछूतो में से जो मुसलमान बने भी उनको कमतरी यानी नीचता का दर्जा दिया गया। इन चर्चा से यही नतीजा सामने आता है कि मुसलमानों के सैकड़ो वर्षो के राज में अछूतो की हालत में कोई सुधार, कोई बेहतरी नही हुई!
मुसलमान के बाद अंग्रेज आए और उन्होने भारत पर अपना राज स्थापित किया। विभिन्न रियासतों और जातियों-उपजातियों में बंटे हुए भारत में अपने राज को स्थाई बनाने के लिए अंग्रेजो ने साप्रदायिक-भावनाओ को उभारा, उन्होने फारसी-उर्दू की बजाए अंग्रेजी भाषा का प्रचलन किया, जातीय-अदालतों कायम की। उनके शासन में ईसाईयत का बोलबाला हुआ और मजहबी उन्माद को बढ़ावा मिला।
अंग्रेजी-राज में कई प्रकार के कानूनी सुधार जरूर हुए किन्तु भारतीय समाज में कोई मूल-परिवर्तन नही हुआ, क्योकि उनका मकसद भी धन-दौलत कमाना था। इस उद्देष्य की पूर्ति के लिए उन्होने बडे-बडे भूस्वामियांे का तबका पैदा किया जिसके द्वारा जनता को आर्थिक-मोहताजी की जंजीरों में जकड़े रखते थे।
‘‘भारत सरकार उन सामाजिक बुराइयों को दूर करने की आवष्यकता को समझती है, जो भारतीय समाज को घुन की तरह खाए जा रही है, जिनके कारण दलित वर्ग अनेक वर्षो से अभिषाप्त जीवन जीने को विवष है। भारत सरकार जानती है कि जमीदार जनता का खून चूस रहे है और पूंजीपति कामकरों को जीवनयापन के लिए उचित मजदूरी नही दे रहे है तथा उनके लिए काम की बेहतर स्थिति भी पैदा नही करते है। बड़े दुःख की बात है कि सरकार ने इन बुराइयों को दूर करने के लिए उसके पास कानूनी शक्ति का अभाव है? नही, यह बात नही है। इसका कारण है कि उसे भय है कि वर्तमान सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन करने से उसका विरोध होगा।’’
अर्थात्ः हिन्दूवाद जहांतक कि वह एक धर्म है, अस्पष्ट है, बेढंगा है। इसके कई पहलू है और ऐसा है कि जो चाहे इसे जिस तरह का मान ले। इसकी परिभाषा दे सकना या निष्चित रूप में कह सकना कि साधारण अर्थ में यह एक धर्म है, कठिन है।

डाॅ. अंबेडकर ने हिन्दूओ को 20 वर्षो का समय दिया कि वे अपने धर्म की क्रूरतापूर्ण व्यवस्था को ठीक करे, जाति-पाति, छुआछात को मिटांए और नारी व दमन को समाप्त करे, किन्तु हिन्दू समाज ने उनके परामर्षो को बहरे कानो से सुना और अपने धर्म में कई बेहतरी नही की।
निरंतर 21 वर्ष उन्होने धर्म की संस्था का गहन अध्ययन किया और अंत में हिन्दूवाद को त्यागने का निर्णय किया।
अर्थात्ः मै हिन्दू अछूत पैदा हुआ। इसे रोक सकना मेरे बस में नही है। किन्तु ये मेरे अधिकार में है कि मै नीचता और अवमानना के हालात में जीवन व्यतीत करने से इन्कार करूं। मै आपको निष्चयपूर्वक यकीन दिलाता हूं कि मै बतौर हिन्दू मरूंगा नही।
काम की बाते, यानी देष के विकास व प्रगति के कार्य तभी हो सकते है यदि पुरोहिताई के रूप में लाखों की संख्या में बेकार पाखण्डियों की सेना को जनता को भटकाने से रोका जाए और उनके प्रभाव में अपना समय, शक्ति व धन व्यर्थ गंवाने से हटाया जाए।
किन्तु हिन्दू समाज में पुरोहिताई के बगैर कोई काम ही नही होता-जन्म से लेकर मरने तक एक हिन्दू अपने पुराहित की पकड़ में बुरी तरह जकड़ा हुआ है। सच तो यह है कि पुराहित से अपना लहू चुसवाने का हिन्दू को चस्का पड़ चुका है। डाॅ. अंबेडकर को पुरोहिताई की दासता मंजूर नही।

हिन्दूवाद पर ऐतिहासिक निर्णय
तुलनात्मक अध्ययन के कारण धर्मो संबंधी बहुत सारे विचार झूठे सिद्ध हो गए है। झूठे साबत हुए इन विचारों में एक मत यह भी है कि ‘‘सभी धर्म समान रूप में अच्छे है औी उनमे भेद करने की कोई जरूरत नही है। यह कहना कि सभी धर्म समान है, सभी अच्छे है, बिल्कुल गल्त है। इससे बड़ी कोई भूल नही हो सकती। धर्म एक ऐसा संस्थान अथवा प्रभाव है जो अन्य संस्थानों व प्रभावों की भाति उसे मानने वाले समाज का सहायक सिद्ध हो सकता है।
- टीपीएसजी संग्रहक

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