ब्राह्मणवाद से कैसे बचें TPSG Wednesday, August 14, 2019, 08:25 AM ब्राह्मणवाद से कैसे बचें ? जब विदेशी आर्यों ने भारत में प्रवेश यिका तो यहां के मूल निवासियों को चिरकाल तक अपना दास बनाए रखने के उद्देश्य से वर्ण व्यवस्था का निर्माण किया। इस व्यवस्था में उन्होंने ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान दिया, दूसरे स्थान पर क्षत्रिय, तीसरे स्थान पर वैश्य और चैथे अर्थात् सबसे नीचे स्थान पर ‘शूद्र’ वर्ण को रखा। इस वर्ण व्यवस्था को तथाकथित ब्राह्मणों ने ईश्वरकृत बताया ताकि कोई भी इस व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह न कर सके, इसलिए यह व्यवस्था लम्बे समय तक इस देश में चलती रही। यह व्यवस्था अस्वाभाविक, अविश्वसनीय अंधकार पूर्ण तथा गैर-बराबरी पर आधारित है। इसे धर्म के साथ जोड़कर 85 फीसदी मानव जाति को उसके चंगुल में फंसा लिया, यह ‘मानो’ पर आधारित है ‘जानो’ पर नहीं। आर्य वैदिक ‘जानो तब मानो’ से घबराता है, इसलिए वह देवी-देवताओं की आराधना पर जोर देता है। यह अंधविश्वासां, रूढ़ियों तथा तर्कहीन झूठी आस्थाओं पर चलाया जा रहा है। सामान्यतः वर्ण का अर्थ रंग होता है, अर्थात रंगो की कल्पना करते समय ब्राह्मण गोरा, क्षत्रिय, लाल, वैश्य, पीला तथा शूद्र काले वर्ण का होना चाहिए। इस व्यवस्था में तथा कथित ब्राह्मण निकम्मा रहकर रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था के साथ सभी प्रकार के भोगविलास के सामान जूटाता है। क्षत्रिय को लाल तथा वैश्य को पीला तो शूद्र का रंग काला बताया गया है, क्योंकि शूद्र मेहनत कश होता है, धूप आदि में कड़ी मेहनत करने से उसका रंग काला होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को द्विज कहा गया है। इनको संस्कार वाला बताया गया तो शूद्रों को संस्कारहीन शूद्र का यज्ञो पवीत संस्कार नहीं किया जाता। ब्राह्मण गले में जनेऊ पहनता है, जबकि शूद्र गले में काला डोरा, काला डोरा यह उसके शूद्र होने की पहचान है। ताकि उपर के तीन वर्ण शूद्रों को पहचान सके और उनसे परहेज करते रहे। शूद्र आज भी दास है, गुलाम है, अछूत है। इसका प्रमुख कारण - ‘ब्राह्मणवाद’ है। इसने भारत के लोगों को इस कदर बाॅट रखा है कि वे कभी संगठित न हो सके। भारत में कभी उसके खिलाफ क्रांति नहीं हो सकी क्योंकि ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था को ईश्वरकृत बताया गया। अगर कोई गरीब है, गुलाम है, भूखमरी का शिकार है तो वह उसके पिछले जन्मों के कर्मभोग है, इसलिए गरीबों, दलितों ने इसे अपना मुकद्दर समझकर पुरूषार्थ से मुख मोड़ लिया और तीनों वर्णों की गुलामी करने में अपने को धन्य मानने लगा। जिसने भी ब्राह्मण वाद के खिलाफ आवाज उठायी उसे कुचल दिया गया। आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क, पुर्नजन्म-भाग्यवाद, जाति-व्यवस्था, वर्ण उँच-नीच, छुआछूप, भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ, हवन-यज्ञ, तीर्थ, मूर्ति में विश्वास का नाम ब्राह्मणवाद है। जो भी व्यक्ति इन बातों में यकीन करता हो वह ब्राह्मणवाद है। चूंकि शूद्रों ने ब्राह्मणवादी का पोषण किया इसलिए तथाकथित ब्राह्मणों के अलावा वह भी ब्राह्मणवादी है। ब्राह्मणवाद में चारों वर्णो के अधिकार कर्तव्य अलग-अलग विभाजित है, तथाकथित ब्राह्मणों ने अपने हिस्से में दान लेना, यज्ञ करना, कराना, पढ़ना-पढ़ाना आदि कर्म बाँट लिए। क्षत्रियों को पढ़ना, पढ़ाना दान देना, यज्ञ कराना। कृषि और व्यापार जैसे कार्य बाँटै जो वैश्यों के लिये थे। शूद्रों को एक ही काम दिया वह है तीन वर्णों की सेवा करने का जिसे वह आज भी बखूबी करता आ रहा है। ब्राह्मणवाद के दुष्परिणाम ब्राह्मणवाद के दुष्परिणाम भारत को लंबे समय से झेलने पड़ रहे हैं, इसके कारण ही भारत में राष्ट्रीय एकता और अखंडता का अभाव रहा। तीनों वर्ण परजीवी बनकर हराम का माल खाने लगे। शूद्र बेचारे मेहनत करके चारों को खिलाते रहे। इससे समाज की आर्थिक सरंचना असंतुलित हो गई, तीनों वर्ण कृषि व्यवसाय से दूर रहे, इसलिए देश इस क्षेत्र में पिछड़ गया। विदेशी हमलावरों ने जब भारत पर आक्रमण किया तो ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र चूपचाप खड़े तमाशा देखते रहे और रक्षा का भार क्षत्रियों पर था, इसलिये वे अकेले हमलावरों से लड़ते रहे और पराजित हुए। देश गुलाम बना, ढाई हजार साल का भारत का इतिहास गुलामी की लंबी दास्तान है, यहां पर यूनानियों, शको, हूणो, तुर्को, मंगोलो, जाटों, अमीरों, मुसलमानों, और अंग्रेजों ने हमले किए और सब विजयी हुए। समता और एकता के अभाव में बहुसंख्य हिन्दू अल्पसंख्यक हमलावरों से पराजित होते रहे। जब बाहरी हमलावर भारत पर आक्रमण करते थे तो भारत के लोग उससे लड़ने मुकाबला करने की बजाय भगवान भरोसे, हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते थे, मानवता और समता में विश्वास रखने वाले मुसलमान 800-900 वर्ष तथा इसाईयों ने 200 वर्ष तक इन विषमता वादियों पर शासन किया। विदेशी हमलावर शासकों ने इनकी सुंदर बहू बेटियाँ छीन ली। इस ब्राह्मणवाद के कारण ही देश जातिवाद, सम्प्रदायवाद और आतंकवाद के गर्त में डूबा जा रहा है। देश खण्डित होने तथा बर्बादी की कगार पर है। ब्राह्मण और ब्राह्मण की जिस श्रेष्ठता और उच्चता का राग अलापा गया है, वह तथाकथित ब्राह्मणों की झूठी आत्म प्रशंसा के और कुछ नहीं है। इस धारणा का यथार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं है। ब्राह्मण को जिस ज्ञान का ठेकेदार कहा जाता रहा है। वह महान मूर्ख के अलावा कुछ नहीं रहा है। विद्या का सम्बन्ध ज्ञान से है और विद्या प्राप्ति के साधनों में कागज, कलम, स्वाही प्रेस छपाई का ज्ञान आवश्यक है। भारत में कागज, कलम, स्वाही, छापखाना प्रेस मशीन का आविष्कार नहीं हुआ। इन सारी चीजों का आविष्कार विदेशों में हुआ। विदेशों में आविष्कार किए जा रहे थे, तब भारत में किताबों के श्लोको को रटा जा रहा था, जो जितना रट्टू होता था। वहीं सबसे बड़ा विद्वान माना जाता था। इनके वेद, पुराण शास्त्र, स्मृतियाँ, धर्मसूच, रामायण और महाभारत में ऐसा कोई ज्ञान नहीं है, जिसमें कोई भौतिक प्रगति के सूत्र हो। भौतिक आविष्कार में शून्य भारतीय बन्दूक तोप भी नहीं पैदा कर सके और इसके स्थान पर भगवान के सहारे बैठे रहे। परिणाम स्वरूप विदेशी हमलों के समय ब्राह्मण, क्षत्रिय ढोल, मंजीरे बजाते हुए भगवान का कीर्तन करते रहे। विदेशी आते रहे, हमें लूटते रहे और हमारे उपर शासक बन बैठे। तथाकथित नैतिकता के पुजारी व्याभिचारी साबित हुए। ‘समरथ को नहीं दोष गुसाई’ यह निलज्र्जता की पराकाष्ठा थी। भारत में ईसाई, मुसलमानों का आना हमारे देश के लिए वरदान साबित हुआ। भारत में जो कुछ प्रगति हम देखते हैं, वह मुसलमान और अंग्रेजों की देन है। ब्राह्मणवादियों का इसमें कुछ भी नहीं है। ब्राह्मणवाद की देन क्या है? जातिवाद के नाम पर चार वर्ण और चार हजार जातियाँ ‘ब्राह्मणवाद’ ने देश को दी है। इन चार हजार जातियों में द्वेष, नफरत, घृणा, फूट और एक दूसरे के विनाश की प्रतिस्पर्धा ब्राह्मणवाद की देन है। धर्म के नाम पर निरपराध पशुओं की हत्या, यज्ञ के नाम पर गोवध, अश्ववध और नरवध, जानवरों के साथ-साथ मानव प्राणि की हत्या, छुआछूत के नाम पर आदमी की छाया से भी नफरत, पत्थरों, पशुओ, पेड़ो, पर्वतों की पूजा, धर्म के नाम पर अंधविश्वास और पाखण्ड, वैश्यावृत्ति, देवदासी और योगिनी प्रथा के रूप में व्याभिचार विधवा विवाह निषेध और बाल विवाह के नाम पर नारी शोषण की प्रथा ब्राह्मणवाद की देन है। ब्राह्मणवाद की समाप्ति में रोडा बनी न्यायपालिका यद्यपि संविधान ने विधायिका और कार्यपालिका को ब्राह्मणवाद के विरूद्ध कार्यान्वय के लिए विवश तो किया किन्तु इसमें न्यायपालिका सबसे बड़ा रोड़ा बनी हुई है। जहाँ ब्राह्मणवादी शैतानी मस्तिष्क आज भी दलित/बहुजनो के विरूद्ध काम कर रहा है। यहाँ निम्नवर्ग को न्याय नहीं मिलता है, क्योंकि न्यायपालिका क्रांतिकारी कदमों को रोकती है, इसलिए, हमें भारत की न्यायपालिका, जो कि ब्राह्मणवाद पर आधारित है, विश्वास नहीं करना चाहिए। ब्राह्मणवाद से बचने के उपाय ब्राह्मणवाद से बचने का उपाय है कि संस्कृत भाषा को नष्ट कर देना चाहिए, क्योंकि समाज में विषमता फैलाने वाला सारा साहित्य ब्राह्मणवादियों ने संस्कृत में लिखा है यह आम लोगों की भाषा न होकर कुछ खास लोगों की भाषा है। इसके साहित्य को ही नष्ट कर देना चाहिए। संक्षिप्त में ब्राह्मण से मुक्ति के उपाय 1. ब्राह्मणवादी साहित्य पर प्रतिबंध - ब्राह्मणवादी ग्रंथवेद, शास्त्र, पुराण, भागवत, मनुस्मृति, रामायण, महाभारत पढ़ना, सुनना, रखना प्रतिबंधित किया जाय। 2. ब्राह्मणवादी दर्शन के स्थान पर आम्बेडकरवादी दर्शन का प्रचार पाठ्यक्रम में परिवर्तन:- महिला शिक्षा की अनिवार्यता, जाति, गोत्र के उपनाम समाप्त किए जाए, ज्योतिषि, राजपुरोहित शाही समाप्त की जाए, धार्मिक आयोजनों का उद्घाटन करने पर रोक लगे, शिक्षा सभी के लिए अनिवार्य की जाए। Tags : Shudra Vaishya second Kshatriya Brahmin position system inhabitants aim India foreign