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अंधविश्वास के कारण हत्याएं

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Monday, January 10, 2022, 06:31 PM
andhvishvash

अंधविश्वास के कारण हत्याएं

ईश्वर और अंधविश्वास का गहरा संबंध है!..जहाँ-जहाँ ईश्वर है वहां-वहां अंधविश्वास पाया जाता है और अंधविश्वास के कारण ही ईश्वर का आस्तित्व है!!

ईश्वर या मोक्ष की प्राप्ति के लिए लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया, जिसके निम्नलिखित उदाहरण हैं--

@#रथयात्रा : जगन्नाथ यात्रा में रथयात्रा के समय कितने ही भक्तगण रथ के पहिए के नींचे अपनी जान इस अभिप्राय से दे दिया करते थे कि ऐसा करने से उन्हें मरने के बाद ईश्वर या मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी।

@#काशी_करबट : इस प्रथा के अंतर्गत कांशी धाम में आदि विश्वेश्वर के मंदिर के पास कुंआ है, जिसमें ईश्वर की प्राप्ति के अभिलाषा से भक्तगण कूदकर अपनी जांन दे दिया करते थे।

@#गंगा_प्रवाह : अधिक अवस्था बीत जाने पर भी कोई संतान न हुई तो कितने माता पिता यह मनौती माना करते थे कि यदि उन्हें कोई संतान हुई, तो वे अपने पहले बच्चे को गंगा-सागर की भेंट चढ़ाएंगे।

@#चरक_पूजा :इस प्रथा में काली की मोक्षाभिलाषी उपासक की रीड़ की हड्डी में दो लोहे की हुंक हथौड़े से धंसाकर उसे रस्सी के द्वारा चरखी के एक छोर से लटका देते थे और चरखी को खूब जोर से तब तक नचाते थे, जब तक उपासक के प्राण-पखेरू न उड़ जाए।

@#नरमेध_यज्ञ : यह पैशाचिक प्रथा ऋग्वेदीय शून:शेफ सूक्त को आधार मानकर उत्तर और दक्षिण भारत में प्रचलित थी!..इसमें किसी अनाथ या निर्धन मनुष्य को दीक्षित करके उसकी बलि चढ़ाई जाती थी।

@#महाप्रस्थान : यह एक प्रकार की आत्महत्या है। इस व्रत को करनेवाला ईश्वर के पास पहुंचने के लिए जल में डूबकर अथवा अग्नि में जलकर अपनी जांन दे दिया करते थे।

@#तुषानल : इस प्रथा में व्यक्ति किसी पाप के प्रायश्चित स्वरूप एवं ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए अपने आपको भूसा अथवा घांस में आग लगाकर भस्म कर लिया करते थे।

@#हरिबोल : यह प्रथा बंगाल में प्रचलित थी!..असाध्य रोग से ग्रसित मरनासन्न व्यक्ति को गंगा में ले जाकर उसे गोते दे-देकर स्नान कराते तथा उसे कहते कि "हरि बोल, बोल हरि" यदि वह गोते खाते-खाते मर गया, तो बड़ा भाग्यवान और सीधा ईश्वर को प्राप्त करनेवाला समझा जाता था और यदि नहीं मरा, तो उसे वहीं पर तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता था।

@#नरबलि : आज भार त को स्वतंत्र हुए 74 वर्ष पूरे हो चुके हैं। लेकिन एक-दो माह के बाद समाचार पत्रों में देवी-देवताओं के मूर्तियों और ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए नरबलि चढ़ाने के समाचार आते रहते हैं!...कभी किसी भक्त ने अपने बच्चे की बलि चढ़ा दी, तो कभी किसी अन्य के बच्चे की!..अनेक बार भक्तों ने अपनी जीभ काटकर देवी पर चढ़ा दी।

इसे पागलपन नहीं तो और क्या कहा जा सकता है?.. ब्राह्मणवाद और हिंदू धर्म के घोर अंधविश्वासों ने अनेक लोगों की हत्याएं की हैं तो अनेकों को पागलखाने भेज दिया है!!

@#पशुबलि : प्राकृतिक जगत में, प्रत्येक प्राणी प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है!..लेकिन लोगों ने अपने जीव्हा स्वाद के लिए ईश्वर, खुदा और देवी-देवताओं पर पशुओं की बलि चढ़ाने का प्रावधान रखा हैं।

#मुसलमान #बकरीद पर धर्म का नाम लेकर बकरे, ऊंट, भैंसे और बैल काटना पुण्य का कार्य समझते हैं, लेकिन दुनिया में एक भी ऐसा नहीं मिलेगा कि वह सीना ठोंककर कहे कि उसको अल्लाह ने जानवरों की कुर्बानी का हुक्म दिया है!!

यहीं स्थिति हिंदुओं की है!..इनके हजारों छोटे-बड़े स्थानीय, प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर के देवी-देवता हैं जो पशुओं की बलि से ही प्रसन्न होते है

- पूजा अमरोही





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