Taksh Pragya Sheel Gatha
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जीवन-अर्थ

Siddharth Bagde
tpsg2011@gmail.com
Saturday, August 31, 2019, 12:34 PM
Jivan Arth

जीवन-अर्थ
    धरती का जन्म आज से करोड़ो वर्ष पूर्व हुआ। धरती जो काफी गर्म थी, धीरे-धीरे ठंडी हुई जिससे इस धरती पर समुद्र, पहाड़, नदी, नाले की रचना हुई। पेड़ो की उत्पत्ति हुई तभी से जीवन का प्रारंभ हुआ। हवा ने मानो जीवन की उत्पत्ति में जान डाल दी हो। सूरज जो धरती से लाखो किलोमीटर दूर है वहां से धरती को गर्मी पहुंचाता रहा। चांद ने अपनी ठंडक दी तो तारो ने धरती के अंधेरों को दूर करने की कोशिश की।
    हवा, पानी, अग्नि (सूर्य की गर्मी), मिट्टी व आकाश से जीव की उत्पत्ति हुई। लाखों वर्ष बीत जाने पर ना जाने कितने रूप बदलकर उस जीव ने मानव जीव के रूप में अपना रूप धरा उस जीव ने मानव के अतिरिक्त कई प्रकार के जानवर, पक्षी, जलचर आदि रूप में जीवन प्राप्त किया। जीवन जीने के बाद इन्हीं पांच तत्व में विलिन हो गया।
    इस धरती पर सभी जीवो में श्रेष्ठ जीवन है तो वह है मानव जीवन। जिसमें सोचने की अद्भूत शक्ति होती है, मनुष्य को दसों इन्द्रियां प्राप्त होती है और वह इसका उपयोग अपनी क्षमता के अनुसार करता है।
    मनुष्य की दस इन्द्रियां है:- 
(1)    मन (2) आंख (3) कान (4) नाक (5) स्पर्शता (6) अतीन्द्रिय (7) जनेन्द्रियां (नर - नारी) (8) हाथ (9)    पैर (10) जीभ (जिव्हा)
    इसका उपयोग मनुष्य अपने स्वस्थ जीवन शैली के लिये करता है। सभी इन्द्रियों का अपना अपना महत्व है। 
    जीवन की चार प्रकार की शक्तियां जिसमें इन्द्रिय-शक्ति (शरीर), समय-शक्ति (जीवन), विचार-शक्ति (बुद्धि) और साधन-शक्ति (सम्पत्ति) हैं। मनुष्य के संयम और असंयम की सारी बाते इन्ही चार शक्ति पर लागू होती है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई शक्ति नही है, ना ही इसके अतिरिक्त अन्य कोई शक्ति पैदा हो सकती है।
1.    इन्द्रिय-शक्ति में आंख से देखना, कान से सुनना, जीभ से स्वाद लेना, नाक से सुंघना, आभासद से वस्तु के होने का अहसास करना, स्पर्शता से वस्तू को महसूस करना, इत्यादि शामिल है।
    - एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य से कहा गया है कि वह वस्तु जो आपके सामने लाकर मेरे द्वारा रखी गई है वह बडी ही स्वादिष्ट है, तो इस पर पहले मनुष्य की मन से कानो ने उस मनुष्य की बात सुनी (मन) को संकेत किया फिर मन ने आंखों को संकेत भेजा फिर आंखों ने देखा फिर मन को संकेत किया मन ने फिर नाक को संकते किया नाक ने सुंघा और मन को अच्छी सुंगध का संकेत किया मन ने फिर संकेत मुंह को किया जीभ ने स्वाद चखा और मन को स्वादिष्ट भोजन होने का संकेत मिला। यह इन्द्रिय-शक्ति (शरीर) का कार्य था।
2.    समय-शक्ति समय के 24 घंटे या वर्ष के 365 दिन की दिनचर्याये मनुष्य के द्वारा नियमानुसार किया जाना जैसे समय पर भूख लगे खाना खाना, प्यास लगे तो पानी पीना, समय की गति के अनुसार चलना अर्थात कार्य करना।
    - मनुष्य वर्ष के 365 दिनों का उपयोग या अपने पूर्ण जीवन काल का उपयोग नियमानुसार करता है यह उसकी समय-शक्ति है जो उसे ऐसा करवाती है - जैसे समय पर भोजन करना, पानी पीना, सोना, सुबह उठना यह सब समय शक्ति के अंश है।
3.    विचार-शक्ति मन के विचारना को बताना, दर्शाना, कहना, जिसमें बुरा-भला, अच्छा-बुरा, विचार-शक्ति के अंतर्गत आता है।
    इसी प्रकार विचार-शक्ति विचारण है, जिसमें एक मनुष्य रास्ते से गुजरते हुये अपने स्थान की ओर प्रस्थगत है, रास्ते में उसे विचार होता है कि कोई बैल पीछे की ओर से दौड़ता चला आ रहा है, विचार-शक्ति के अनुसार वह पीछे देखता है, बैल के पास आते देख उस रास्ते से अन्य रास्ते की ओर दौड लगाता है और अपने आपको बचाता है यह उसकी विचारन शक्ति है।
4.    साधन-शक्ति - इससे तात्पर्य है जीवन जीने के लिये समस्त साधन का उपयोग अपने प्रकार से किया जाना जैसे रूपये का उपयोग- साधन क्रय करने, जमीन का उपयोग - आवासीय, व्यवसाय हेतु करना, जो कि साधन शक्ति के अंग है।
    - बिना साधन के मनुष्य अपना जीवन जीने में असमर्थ है वह साधन के बिना अधुरा है इसलिये मनुष्य को साधन की आवश्यकता होती है जिससे पर अपना पूर्ण जीवन साधनयुक्त होकर जीयें - कोई मनुष्य बिना अन्न के ज्यादा दिन जीवित नहीं रह सकता है इसके लिये मनुष्य खेती करता है और अन्न उगाता है यह भोजन का साधन है। अन्न क्रय करने के लिये मनुष्य को रूपये की आवश्यकता होती है जिसके लिये वह कार्य करता है और बदले में रूपये प्राप्त करता है उस रूपये से अन्न क्रय करता है, इसके बाद उसे बाहरी आवरण, जिसमें आंधी, तुफान, बरसात, धूप से बचने के लिये आवास की आवश्यकता होती है, जिसमें आवास का निर्माण या तो वह स्वयं की कर लेता है या प्राकृतिक रूप से मिली गुफाओं का उपयोग करता है या निर्माण किये हुये आवास को क्रय करता है। 
    इस प्रकार शरीर की समस्त प्रकार की शक्ति समस्त इन्द्रियों में सर्वश्रेष्ठ मन है - मन यदि आंख को संकेत नही करेगा तो वह देख नहीं पायेगा। आंख के देखने के बाद कोई वस्तु फायदेमंद है नुकशान दायक है कोई वस्तु ठंडी है या गर्म इसके अंदाजे के लिये स्पर्श के साथ अहसास कराता है। कोई जानवर मनुष्य के पीछे भागे तो मन पैरो को संकेत देता है जिससे वह दौड़ पड़ता है, अपने शरीर को बचाने के लिये। मानव शरीर के दो हिस्से - प्रथम सिर - जिसमें आंख, कान, नाक, मुंह, दांत, जीभ, गर्दन, है द्वितीय धड़ जिसमें हाथ, पीठ, पेट, जनेन्द्रिया (नर - नारी) पैर शामिल है।
    मनुष्य की दस इन्द्रियां है जिनके कार्य संक्षेप में वर्णन है:-
1.    मन - मनुष्य की यह इंद्री सभी इन्द्रियों में मुख्य इन्द्री है, जो अन्य सभी शेष इन्द्रियों को संकेत भेजती है, ओर शेष इन्द्री उसी अनुसार अपना कार्य करती है, कोई कार्य करने से पहले मन से होकर गुजरना पड़ता है, जब मन जाॅच परख करने के बाद तत्काल निर्णय लेता है कि वह कार्य करना उचित है या अनुचित।
2.    आंख - मन के बाद आंख का कार्य होता है वह वस्तु जिसे मन ने देखने का संकेत किया है वह वस्तू शरीर को नुकशान पहुंचाने वाली तो नहीं या शरीर को फायदा पहुंचाने वाली है। आंख रोशनी में राह दिखाती है तो लाभ-हानि का मन को अहसास भी कराती है।
3.    स्पर्शता - शरीर के किसी भी भाग से स्पर्श होने वाली वस्तु ठोस, नर्म, गर्म, मूलायम, ठंडी होने का अहसास ही स्पर्शता हैं, स्पर्श से मनुष्य के दुख सुख का पता चलता है।
4.    कान - किसी भी प्रकार की हलचल को सुनने के लिये कान एक इन्दी है, कान सुनकर मन को संकेत देता है, और मन कार्य करने के लिये आदेश देता है।
5.    नाक - नाक सुंघने की शक्ति का रूप है, स्वादिष्ट भोजन को दूर से सुंघकर मस्तिष्क को संकेत भेजता है, मन अंदाजा लगाता है कि इस प्रकार का कोई भोजन है जो स्वादिष्ट है। नाक हमेशा  तीखा, कड़वा, मीठा, खट्टा, बे-स्वाद, स्वादिष्ट भोजन का फर्क कर लेता है।
6.    जीभ - जीभ मन को ज्यादा संतुष्ट करने वाली इन्द्री है, जो भोजन के बाद खट्ठा हो या मीठा, तीखा हो या कड़वा स्वाद का अंदाजा लगाता है। अच्छे भोजन से मन को तृप्ति देता है।
7.    अतीन्द्रिय - यह वह इन्द्री है जो हार न मानने वालों को जीतने का अहसास कराती है। न होने वाली वस्तू को होने का अहसास कराती है। मनुष्य को आभास होता है कि वह होगा या यह चीज है कुछ होने की संभावना ही अतीन्द्रिय है।
8.    हाथ - शरीर की वह इन्द्री जिससे हर कार्य जल्दी किया जा सकता है, हाथ से अपने शरीर की सफाई की जाती है तथा हाथ से भोजन मूंह में ग्रहण किया जाता है तथा सभी आवश्यक कार्य हाथ से संभव है।
9.    पैर - पैर इन्द्री का वह रूप है जो हमें मंजिल तक पहुंचाता है, मंजिल तक तभी पहुंचा जा सकता है, जब पैर हमें वहां तक ले जाना चाहें मन इसे संकेत देता है।
10.    जनेन्द्रिया (नर - नारी) - जनेन्द्रियां हर मनुष्य के शरीर में है, जिसका पहला कार्य है - स्त्रावों का परित्याग और दूसरा कार्य है - रतिक्रिया।
मनुष्य के इन इन्द्रियों में किसी की भी कमी पाये जाने पर उस मनुष्य को अपंग कहा जाता है, लेकिन किसी भी इन्द्रियों की कमी पाये जाने पर उस मनुष्य में अपनी ओर से बढ़ाये जाने वाली एक शक्ति जो विचारन शक्ति का रूप है बढ़ जाती है जो विल पावर (इच्छा शक्ति) होती है।
    इन इन्द्रियों पर संयम रखना आवश्यक होता है। इन्द्रियों का असंयम दुःख का एक कारण बन सकता है। उदाहरण के तौर पर - जीभ का असंयम दो प्रकार से होता है एक स्वाद (रसना) का असंयम और दूसरा वाणी का असंयम।
    जीभ के स्वाद को लोग अधिक महत्व देकर ऐसे स्वादिष्ट भोजन के लालच में कई हानिकारक तत्व ले लेते है, जिसका उन्हे ज्ञान नहीं होता है बाद में उन्हें अपच, बीमारियां, दुर्बलता होती है और कई रोगो के शिकार बनते है। अधिकांश बीमारी की जड़ पेट की बीमारी है, जिसका सीध सम्बन्ध आहार से है।
    जीभ का दूसरा असंयम का उदाहरण है - वाणी की कठोरता यदि किसी व्यक्ति से कोई बात क्रोध से कही जाये तो उसका प्रतिकूल असर क्रोध के रूप में होगा किन्तु उसी वाणी का प्रयोग मीठी वाणी से करे तो उसका प्रतिकूल असर मुस्कान या हंसी के रूप में होगा।
मन की क्रियाये
    (1) खुशी, (2) दुःख, (3) भावना, (4) इच्छा, (5) डर, (6) क्रोध, (7) ईष्र्या, (8) प्रेम, (9) क्षमा, (10) उदारता, (11) दया, (12) पश्चाताप, (13) कल्पना, (14) ध्यान (15) शक, (16) विश्वास (17) संकोच।
    खुशी- इंसान के लिए वो पल कितना कठिन होता है, जब जिंदगी की सबसे बडी खुशी पास होती है और इंसान उस खुशी को संभालने के लिए पता नहीं कैसे-कैसे जतन करता हैं व मंद-मंद मुस्कराता है, असलियत में खुशी का कोई पैमाना नही होता है।
    खुशी जीवन की अनमोल धरोहर होती है, वैज्ञानिक दृष्टि से खुशी जीन में होती है। खुशीयां, सुख, आनंद ये सब हैं ही ऐसे, जिसकी हम सबको हमेशा से तलाश है और जिसे हम ज्यादा से ज्यादा मात्रा में हासिल करना चाहते है। दुनिया में शायद ही ऐसा कोई हो जो दुःख चाहता हो।
    पहले मानव गुफाओं में, पेडो पर तथा जमीन में गड्डा खोदकर उसमें रह लेता था, इसी खुशी की खोज का ही तो यह परिवर्तन है कि मानव आज सुख-सुविधाओं से युक्त महलों में रह रहा है और आगे भविष्य में इसी खुशी की खोज में अनगिनत परिवर्तन होना निश्चित है।
    खुशियों की खोज सुकरात से लेकर बुद्ध तक अनेक दार्शनिकों ने की तथा इसके पश्चात भी कई विद्वानों ने खुशियों को जानना चाहा और लोगों को बताने की कोशिश की कि स्वैच्छिक क्रियाकलापों से अपनी खुशी के स्तर को बढ़ाया जा सकता है। लेखक सिद्धार्थ बागडे का मत है कि जिस खुशियों की तलाश हम कर रहे है वह आपके भीतर से ही आएगी। कोई व्यक्ति आपको व्यंग सुनाता है तो उसकी व्यंग्यता को आप कितना ग्रहण करते है, यह आप पर है यदि आप दुःखी है तो आप खुशी अपने आप ग्रहण नही कर सकते इसे आपके अंदर स्वयं करना होगा।
    जीवन में सकारात्मक विचार और व्यवहार का खुशियों पर बहुत प्रभाव पड़ता है, यदि आप सकारात्मक है तो खुशी आपके साथ पल-पल है। यदि आपके विचार नकारात्मक है तो खुशी का पैमाना कम हो जाता है। जीवन में सफलता हासिल करने के लिये आशावादी नजरिया होना बहुत जरूरी है।
    समय के साथ व्यक्ति व्यस्त होते जा रहा है, हो सकता है भविष्य में व्यक्ति के पास समय भी हो, लेकिन यह हमेशा जरूरी है कि रोज के कार्यो को नियमावली के आधार पर तय करें। अपने मनोरंजन के लिये समय निकाले।
    व्यक्ति में उम्मीद और आशा की किरण हो तो वह जिंदा रखने में सहयोग करती है और यह चीजे ना हो तो जीवन निर्थक है। उम्मीद और आशा की किरण कुछ नया करने के लिये प्रेरित करती है।
    खुशी आपको सफलता का रास्ता दिखाती है और मंजिल तक ले जाती है। खुश मिजाज लोग नए अवसरों को तलाश कर लक्ष्य निर्धारित करते है।
    अक्सर मनुष्य अपने लिये या परिवार के लिय करता है, कभी-कभी किसी जरूरत मंद की मदद करने पर, किसी को सही रास्ता दिखाने पर, आवश्यकता होने पर दान कर मन से खुशी मिलती है। इस आनंद को तभी अनुभव किया जा सकता है जिसमें कोई दिखावा नही हो स्वयं की खुशी के लिये किया गया हो।
    मन शरीर के भीतर का वह अदृश्य भाग है, जिससे विचारों की उत्पत्ति होती है। यह मस्तिष्क की कार्य शक्ति का द्योतक है। यह कार्य शक्ति कई तरह की होती है, जैसे- चिंतनशक्ति, स्मरणशक्ति, निर्णयशक्ति, बुद्धि, भाव, इंद्रियाग्राह्ाता, एकाग्रता, व्यवहार, परिज्ञान इत्यादि। मन को चित्त भी कहते है। 
    सचेतन- यह मन का दसवां हिस्सा होता है, जिसमें स्वयं तथा वातावरण के बारे में जानकारी (चेतना) रहती है। दैनिक कार्यो में मन के इसी भाग को व्यवहार में लाता है।
    अचेतन-यह मन का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा है, जिसके कार्य के बारे में व्यक्ति को जानकारी नही रहती है। यह मन की स्वस्थ एवं अस्वस्थ क्रियाओं पर प्रभाव डालता है। इसका बोध व्यक्ति को सपनों से हो सकता है। इससे व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति से जुड़ी इच्छाए जैसे कि भूख, प्यास, काम-इच्छाएं दबी रहती है। मनुष्य मन के इस भाग का सचेतन उपयोग नही कर सकता है। यदि इस भाग में दबी इच्छाए नियंत्रण शक्ति से बचकर प्रकट हो जाएं तो कई लक्षण उत्पन्न हो जाते है, जो बाद में किसी मनोरोग का रूप ले लेते है।
    अर्धचेतन या पूर्व चेतन- यह मन के सचेतन तथा अचेतन के बीच का हिस्सा है, जिसे मनुष्य चाहने पर इस्तेमाल कर सकता है, जैसे स्मरण शक्ति का वह हिस्सा जिसे व्यक्ति प्रयास करके किसी घटना को याद करने में प्रयोग कर सकता है।
    इच्छाओं का इंसान से बहुत गहरा संबंध है। इनका झरना हमारे अंदर बहुत गहरे तक बहता रहता है। इनका संबंध अवचेतन मन से होता है। क्या अच्छा है और क्या बुरा, जानते हुए भी इंसान मन के प्रवाह में बह जाता है। वो होता ही इतना प्रबल है कि सारे बंधन तोडकर अविरल बहता ही जाता है और कभी-कभी सब कुछ बहा ले जाता है। एक भयावह तूफान की तरह। कितना अच्छा हो कि वह निर्मल, स्वच्छ, शांत पानी की धार बन बहता रहे और धरती को एक नया जीवन प्रदान करें।
मन और समय
    अधिकांश लोग आलस्य और प्रमोद में पड़े हुए जीवन के बहुमूल्य क्षणों को युं ही बर्बाद करते रहते है। एक-एक दिन करके सारी आयु व्यतीत हो जाती है और अंतिम समय वे देखते है कि उन्होनंे कुछ भी प्राप्त नही किया, जिंदगी के दिन यूं ही बिता दिये। कुछ लोगों की जिंदगी जरूर संघर्ष में गुजर जाती है और संघर्ष करने में समाप्त होती है, ऐसी जिंदगी को सफल जिंदगी कहा जा सकता है, क्योंकि उन्होने लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश की लेकिन जो लोग अपनी जिंदगी को बिना लक्ष्य से बिना संघर्ष किये गुजारते है, वे वाकई में अंतिम समय में देखते है कि उन्होनें कुछ प्राप्त नही किया। बहुत ही कम लोग समय की कीमत को समझ पाते है। समय ही जीवन है, वे एक-एक क्षण को कीमती मोती की तरह खर्च करते है और उसके बदले में बहुत कुछ प्राप्त कर लेते है। अपनी समझ के अनुसार जो अच्छे से अच्छा उपयोग हो सकता था, उसमें उस समय को उनके द्वारा लगाया जाता है। इस प्रकार समय का उपयोग करने से अंतिम समय में इस बात का संतोष होता है कि हमने अपने एक-एक क्षण का उपयोग सही किया है। जीवन का महल समय की घंटे मिनटो की ईंटो से चिना गया है। यदि हमें जीवन से प्रेम है, तो यही उचित है कि समय को व्यर्थ नष्ट न करें। मरते समय एक विचारशील व्यक्ति ने अपने जीवन के व्यर्थ चले जाने पर अफसोस प्रकट करते हुए कहा था- मैने समय को नष्ट किया, अब समय मुझे नष्ट कर रहा है। खोई दौलत फिर से कमाई जा सकती है, लेकिन गया हुआ समय वापस लौटकर  नही आता। प्रतिदिन एक घंटा समय यदि मनुष्य नित्य लगाया करें, तो उतने छोटे समय से भी वह कुछ ही दिनों में बडे महत्वपूर्ण कार्य पूरे कर सकता है। एक दिन में पच्चीस पृष्ठ पढने से महीने में सात सौ पचास पृष्ठ और साल में करीब नौ हजार पृष्ठ यह क्रम दस वर्ष तक चलता रहे तो नब्बे हजार पृष्ठ हो जाते है जिसमें कई ग्रंथो को पढ़ा जा सकता है और कई ग्रंथो को पढ़ने के पश्चात् उनमें ग्रंथो का ज्ञान आ जाता है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति एक दिन में केवल दो पृष्ठ किताब लिखता है तो एक वर्ष में सात सौ तीस पेज लिखा जा सकता है, जिसमें एक लेखक एक बुक या दो बुक लिख सकता है, ग्रंथ लिखने का ज्ञान आ गया तो एक ग्रंथ को अपनी जीवन काल में कभी भी लिखा जा सकता है, बस समय का उपयोग उस व्यक्ति को ठीक से करना होगा। यदि कोई व्यक्ति एक ही विषय के बारे में दस वर्ष तक पढ़ता रहे और जानकारी एकत्रित करते रहे तो वह व्यक्ति उस विषय का विशेषज्ञ बन जाता है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति रोज एक घंटा विदेशी भाषाये लिखने में लगाये तो वह तीन वर्ष में संसार की सब भाषाओं का ज्ञाता बन सकता है। इसी प्रकार कोई भी मनुष्य एक घंटे का समय रोज व्यायाम में लगाये तो अपने जीवन काल में 10 से 15 वर्ष उम्र बढा सकता है।
    मन की सकारात्मकता समय के उपयोग करने में सहायक होती है, मन को हमेशा प्रफुल्लित करती है और हम जो भी कार्य करते है, इसमें मन मनोरंजन की दृष्टि से काम करता है, जिसका लाभ हमें कार्य की सफलता से प्राप्त होता है। इसी प्रकार यदि मन नकारात्मक रूप में है तो आपको किसी भी कार्य में मन नही लगेगा, यदि किसी मजबूरी वश किया भी जा रहा हो तो वह आपको बोझ के अलावा कुछ भी नही लगेगा। यदि आपने कोई लक्ष्य बनाया भी है तो उसकी सफलता की कोई गारंटी नही हो सकती है। यदि आपकी किस्मत लकी है तभी आपको सफलता मिलेगी और आपकी किस्मत को बनाने वाले भी आप ही है।
    अवसाद ग्रस्त लोग अपने अंदर सकारात्मक भावनाओं को बनाए नही रख सकते। अवसाद के कारण लोगों के सकारात्मक भावनाओं को बनाए रखने की क्षमता अत्यंत कमजोर पड जाती है। अवसादग्रस्त लोग सकारात्मक भावनाओं से जुडी गतिविधियों को लेकर दिमागी रूप से कम सक्रिय होते है। अवसाद ग्रस्त लोगों में भी सकारात्मक भावनाए उतनी ही उठती है, जितनी एक स्वस्थ इंसान के मस्तिष्क में उठती है। यह अलग बात है कि अवसादग्रस्त लोग इन भावनाओं को ज्यादा देर तक अपने अंदर बनाए रखने में नाकाम होते है।
    खुशी- कुछ लोगों के लिए सेहत महत्वपूर्ण होती है, तो कुछ लोगों को पैसे महत्वपूर्ण होते है। कुछ लोग रिश्ते दोस्ती निभाते है तो कुछ लोग रिश्ते दोस्ती से कोई मतलब नही रखते। इन सभी में जो बात है वह खुशी पाने की है। चाहे वह किसी भी रूप में पायें।
    एक खास प्रकार का व्यवहार हमें भाग्यशाली बनाता है, बशर्त वह कलाकार के रूप में न हो अर्थात उसमें ढोंग छूपा न हो, भाग्यशाली व्यवहार बनाने के लिये सदैव हर परिस्थितियों में खुश रहना होगा।
    यदि आप यह मानते है कि आप खुश किस्मत है, तो आपका व्यवहार ऐसा हो जाएगा कि लोग आपको स्वीकारने लगेंगे। आप सोचे कि भाग्य आपके साथ है, हर दिन ऐसा व्यवहार करे, मानों आपके साथ सब कुछ अच्छा ही होने वाला हैं। यह आशावाद ही तो भाग्य को अपनी ओर खींचता है।
    अपनी नकारात्मक भावनाओं पर लगाम कसने की कोशिश करे। बेवजह की झिझक, गुस्से और कुढ़न से लोग आपके विरोधी हो सकते है। इसके लिये आप स्वयं खोज करे कि आपके साथ ऐसा क्यो हो रहा है और यदि इसकी खोज में कुछ पता लगे तो उसका हल सकारात्मक रूप से स्वयं करना होगा। ऐसा करने से आपका नजरिया बदल जायेगा और आप आशावादी हो जायेंगे और लोग आपको स्वीकार करने लगेंगे।
    अक्सर लोग अपने आप में सिमटे रहते है जबकि होना यह चाहिये कि खुले दिल से हर मौके को आनंद में बदल कर जीवन जीना चाहिये। जो व्यक्ति घर में घूसे रहते है, उनकी मानसिकता घर के दायरे तक ही सीमित रहती है, यदि भाग्य से मुलाकात करना है, तो हर कार्य का आनंद ले। अधिक लोगों से जान पहचान बनाये और जिनसे अधिक मनोरंजन होता है, खुशी मिलती है, उनसे अक्सर मुलाकात करें, अपनी मर्यादाओं के दायरे में रहकर।
    व्यक्ति अपनी तूलना दूसरो के साथ करता है, कभी-कभी दूसरों से अधिक अपने आपको दर्शाता हैं, जबकि दूसरों की तारिफ करने के साथ सही दिशा भी दिखाये, उसमें अपनी खुशी तलाश करें, दुसरों कि बुराई करके, दूसरों का नुकसान करके, उसमें मिलने वाली खुशी क्षण भर की होती है, जिसका असर अपने जीवन पर हमेशा होता है, जबकि दूसरों की मदद कर मिलने वाली खुशी किसी अमूल्य वस्तू से कम नही हो सकती।
    यदि जो लोग दुसरों को नुकसान पहुंचा चुके है और बाद में उन्हें पश्चाताप होता है और उनके जीवन में यह बात याद आकर दुःखदाई होती है या अपने जीवन में किसी की भलाई न कर पाने का दुःख होता है, वे लोग सकारात्मक नजरिया अपनाये और वर्तमान में आशावादी बनें।
    यह सच है कि दुनिया का हर आदमी खुशी चाहता है, शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जो दुःख को पसंद करता हो।
    दुःख - दुःख का प्रमुख कारण इन्द्रियो पर नियंत्रण न रखना। यही कारण है कि जो हमें दुःख देता है। इन्द्रियों का नियमपूर्वक उपयोग करने से हमें सुख प्राप्त होता है। यघपि इसमें कुछ इच्छायें जरूर शेष रह जाती है, किंतु उस शेष इच्छाओं को स्वयं की छोड़ दे तो संतुष्टि जरूर प्राप्त हो सकती है। लेकिन इन्द्रियों में अनियमित उपयोग हमें दुःख के शिवा और कुछ नहीं दे सकता। यह जरूर है कि कुछ समय के लिए इन्द्रियों की अनियमितता आनंद देती ै, लेकिन उससे सुख तो प्राप्त नहीं हो जाता, दुःख की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार जीभ का संयम शरीर के लिए लाभदायक है, किंतु जीभ का अंसयम शरीर के लिए हानिकारण है, जैसे - अधिक स्वादिष्ट भोजन ज्यादा खा लेने पर पेट खराब हो जाता है। इसके अतिरिक्त यदि जीभ कड़वे बोल का प्रयोग करती है तो व्यवहार में दोष माना जाता है और लोग उसे नफरत की दृष्टि से देखते है।
    इस दुनिया में कोई ऐसा मनुष्य नहीं है जो दुःख को पाना चाहता है, दुःख को दूर जरूर करना चाहता है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि किसी को भी कोई दुःख न हो, ऐसे बहुत ही कम बिरले लोग होंगे जिन्हें दुःख न हो। किसी को बच्चे का दुःख है तो किसी को बच्चे न होने का दुःख है। किसी को गरीबी का दुःख है तो किसी को अमीरी से दुःख है। कोई दूसरो से जलन के मारे दुःखी है तो कोई दूसरे के सुख से दुःखी है। लेकिन सबसे दुःख के कारण अलग है। ये दुःख का कारण कुछ अच्छा पाने की इच्छा है। जब इस इच्छा पर नियंत्रण कर लिया जाये तो दुःख से बचा जा सकता है।
    भावना - इंसान सपनो को सजाता रहता है यहीं सपने भावना से ही उठते है। भावनाओं पर किसी का नियंत्रण नहीं होता। हम लाख प्रयास करें, लेकिन जब भी परिस्थिति या समस्या हमारे समक्ष खड़ी होती हैं, हमारे भीतर भावनाओं का जन्म होने लगता है। ठीक उसी तरह, जैसे कोई तालाब के ठहरे पानी से पत्थर फेंकता है, तो पानी की बूंदे बाहर आ ही जाती है।
    यदि मनुष्य भावनाओं में खो जाये तो एक मुर्ती के रूप जैसा लगता है लेकिन यही भवनायें उसे जिंदा रखती है। यह भावनायें अंतिम सांस तक चलती रहती है।
    मनुष्य के अंदर यदि भावना न हो तो वह किसी की खुशी या दुःख का अहसास नहीं कर सकेगा और ना ही उसे अपने लिये कुछ करने की इच्छा जागेगी।
    भावना ही तो मनुष्य को चलाती है, दुःख होने पर आंसूओं के रूप में तथा सुख प्राप्त होने पर हंसी के रूप में भावना अंदर से निकलती है। कोई व्यक्ति यदि हमें रोता दिखता है तो उसके दर्द को समझने की कोशिश करते है यही तो भावना है कोई व्यक्ति खुश हो रहा है तो उसकी खुशी का राज जानने की कोशिश करते है यही तो भावना है जो खुशी दे रही है या वह कौन सी बात है जो दुःख दे रहा है। भावना व्यक्ति को जिंदा रखती है।
    अक्सर ऐसा है कि व्यक्ति अपनी सफलता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है यह उस व्यक्ति का भगवान के प्रति भाव है वह उसे सर्वशक्तिमान मानता है और यह उसकी भावना होती है कि ईश्वर उस समय उसकी मदद कर सकता है।
    इच्छा - यदि कामयाबी चाहिए तो मन में इच्छा होना जरूरी है। कल भी संघर्ष का युग था, आज भी संघर्ष का युग है और आने वाले अनंत कालों, तक संघर्ष जारी रहेगा। यह सारे संसार में व्याप्त है। संघर्ष से ही तरक्की का मार्ग खुलता है। इसलिये मन में इच्छा होगी तो संघर्ष करने की क्षमता खुद व खुद आ जायेगी। जो संघर्ष से घबराता है, जीवन में कुछ नहीं कर सकता।
    ऐसे कई उदाहरण है, जिन्होेने अपने जीवन में संघर्ष किया और सफलता प्राप्त की है, यह उनकी इच्छाशक्ति ही थी कि मुझे कुछ करना है, वही इच्छाशक्ति उन्हेे अपनी मंजिल तक ले गई।
    संसार में जितने भी महान कार्य हुए हैं, वे प्रबल इच्छाशक्ति का संयोग पाकर ही हुए है। दृढ़ इच्छाशक्ति सम्पन्न व्यक्ति ही नवसृजन व नवनिर्माण में समर्थ होते हैं। अपने और दूसरों के कल्याण, विकास व उत्थान का मार्ग, खोजते हैं। जीवन का सुख, स्वास्थ्य सौन्दर्य, प्रसन्नता, शांति उसके सदैव साथ रहते हैं। जीवन की विरोधी परिस्थितियां उसकी मन स्थिति नहीं डिगा पाते।
    इच्छा के तीन रूप है (1) दृढइच्छा, (2) संकल्प (3) चाहत
    दृढ़इच्छा - जिन्होंने असफलता से कभी हार नहीं मानी, निराशा को पास आने नहीं दिया, ऐसे व्यक्तियों के संकल्प अवश्य पूरे होते हैं। मनुष्य की वास्तविक शक्ति उसकी दृढ़इच्छा ही है, क्योंकि यहीं जीवन के चिन्ह, कर्म की विधायिका तथा प्रेरिका होती है। जहां इच्छा नहीं होती, वहां कर्म नहीं होता और जहां इच्छा होती है, वहां कर्मो का होना अनिवार्य है। दृढ़इच्छा की प्रेरणा से ही मनुष्य कर्मो में प्रवृत्त होता है। यदि उसमें इच्छा की स्फुरणा नहीं, उसकी प्रेरणा न हो, तो मनुष्य भी जड़ बन कर पड़ा रहे।
    दृढ़इच्छा व्यक्ति को कठिन से कठिन कार्य करने की प्रेरणा देती है, इसी दृढ़इच्छा से व्यक्ति अपनी मंजिल को पाता है। मंजिल पाने के लिये मन में दृढ़इच्छा होना आवश्यक है। ऐसा कोई व्यक्ति नही होगा जो बिना इच्छा के अपनी मंजिल को पा ले।
    संकल्प - संकल्प से स्वल्प साधनों में भी मनुष्य अधिकतम विकास कर सकता है और आनंद का जीवन जी सकता है। दीपक कब कहता हैं कि वह दस किलो मिट्टी का बना होता और उसमें दस किलो तेल होता तो सबको प्रकाश देता। वह अपने सीमित साधनों से ही प्रकाश देने लगता है। संकल्प द्वारा प्रत्येक मनुष्य सफलता प्राप्त कर सकते है। हमारे देश में ही न जाने कितने महान पुरूष हुए हैं, जिन्हें किसी मानसिक आघात लगने से अपने गुप्त मन में सोई हुई गुप्त शक्तियों का ज्ञान हुआ। उनका जीवन परिवर्तित हुआ और वे अपने गुणों से संसार को चमत्कृत-विस्मित कर गये।
    इतिहास उन्हें ही याद रखता है, जो असंभव लक्ष्य निर्धारित करते हैं, और उन्हें प्राप्त करते है।
    जो लोग बिना लक्ष्य के जीते हैं, वे जल्दी मर जाते है। लेकिन जो लोग कुछ बनने का ख्याब देखते हैं, वे विश्व में अमर हो जाते है।
चाहत - शुभ कार्य की शुरूआत तो बहुत से लोग करते हैं, लेकिन लक्ष्य तक कुछ ही लोग पहुंच पाते है। सफलता के शिखर पर कभी भीड़ नहीं होती। दरअसल विश्वास, उत्साह और साहस ही जीवन है। जीवन के भीतर से ही जीवन का उदय होता है।
    आगे बढ़ने की चाहत में संकोच सबसे बड़ा अवरोध होता है, पर यह तभी सम्भव है, जब हमारा संकल्प, हमारा उद्देश्य अटूट साहस, श्रृद्धा एवं शक्ति से संयुक्त हो। अधूरे मन से किए गये कार्य में कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं होती। संकल्प का दूसरा रूप है आत्मविश्वास। वह जागृत हो जाए तो अपना विकास तेजी से किया जा सकता है।
    आत्मविश्वास - आत्मविश्वास अपने अंदर के मन से आता है, कठिन परिस्थितियों में अपने आत्मविश्वास की परीक्षा होती है। जहां आप का आत्मविश्वास डगमगाया तो आप अपनी सफलता से दूर हो सकते है, इसलिये अपने आत्मविश्वास को बनाये रखना आवश्यक है।
    संकोच - अक्सर महिलाये भीड़भाड़ क्षेत्र में कुछ कहने में संकोच करती है। यदि उन्हें भूख भी लग रही हो तो सबके सामने खाने में संकोच करती है, ऐसी कई परिस्थितियां होती है जिसमें महिलायें संकोच करती है।
    उसी प्रकार पुरूष महिलाओं के सामने संकोच करते हैं, लेकिन महिलाओ की अपेक्षा पुरूषों में यह बात कम पाई जाती है। संकोच के कारण कई कार्य सफल नहीं हो पाते हैं, जैसे कोई व्यक्ति अपना मनपंसद का कार्य करना चाहता है, और उसी से अपनी तरक्की करना चाहता हैं, किंतु माता पिता की इच्छा उन्हें कुछ और बनाने की होती है। संकोच के कारण वह अपनी इच्छायें दबायें रखता है, कोई सफलता व असफलता के बीच झूलता रहता है। कोई व्यक्ति प्रेम में पागल है किंतु वह अपने जीवन साथी से कहने में संकोच करता है, इसी संकोच में उसके साथी का विवाह कहीं ओर हो जाता है, और वह प्यार में असफल हो जाता है।
ध्यान - ध्यान जिसका न आदि है न अन्त। यह वर्ष की एक बूंद के समान है। इसी बूंद में छिपी है सारी की सारी नदिया और जलधाराएं इसी में समाये हैं, बड़े से बड़े समुद्र और जल प्रपात। ध्यान के बिना हमारा ह्दय भी बंजर मरूस्थल हो जाता है।
    विद्युत उत्पन्न करने वाला एक बड़ा यंत्र जब अच्छी तरह कार्य करता है तो इससे शायद ही कोई ध्वनि निकलती हो। ध्वनि और शोर-गुल तभी पैदा होता है, जब कहीं घर्षण होता है। मौन और विस्तार का आपसी मेल है मौन की अनंतता वह अनंतता है, जिसके भीतर का केन्द्र मिट चुका है।
    ध्यान से मन शांत होता है। यह मौन विचार की कल्पना और समझ से परे है। विचार जब अपने सारे अनुभवों, शब्दों और प्रतिभाओं सहित पूर्णतः विदा हो जाता है, तभी इस मौन का जन्म होता है।
    ध्यान दो प्रकार का होता है, एक वह जो अचेतन स्थित में होता है, जैसे - सपनों में खो जाना, ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाना, किसी कार्य में खो जाना, तथा दूसरी चेतन स्थिति में होती जिसमें ध्यान से तात्पर्य होता है - परिवार का ध्यान रखना, अपने लक्ष्य को ध्यान में रखना, अपने साथी का ध्यान रखना अर्थात ख्यालों में न खोते हुये चेतन स्थिति में ध्यान रखना। हम क्या कर रहे हैं, वह हमें चेतन स्थिति में याद रहता है, इसी में हम पूर्ण ध्यान स्थिति में रहते है।
    ध्यान की कोई तकनीक और तरकीब नहीं होती, इसलिये इसका कोई अधिकारी और दावेदार भी नहीं होता।
क्रोध - क्रोध से मूढ़ता उत्पन्न होती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रान्त हो जाती है, स्मृति भ्रान्त होने से बुद्धि का नाश हो जाता है, और बुद्धि नष्ट होने से प्राणी स्वयं नष्ट हो जाता है।
    क्रोध ही वह अग्नि है जो भाई को भाई से और माॅ को बालक से दूर कर देती है, इसलिये कभी भी क्रोध को अपने ऊपर हावी न होने दे, बल्कि धैर्य व शांति से काम ले।
    क्रोध थोड़े समय में शांत हो जाता है, किन्तु उस क्रोध में किया गया कोई भी कार्य नुकशान पहुंचाने वाला कार्य जीवन भर कलंक हो सकता है।
    क्षमा की राह पर चलने वाला यदा-कदा क्रोध करता भी है, तो वह दूसरों के भले के लिये ही करता है। वह कभी भी अपने मन में किसी के प्रति बैर या वैमनस्य का भाग नहीं रखता। क्रोध तो रिश्तों में दूरिया उत्पन्न करता है। और ऐसी दूरिया जिसकी दरारें भरना कठिन है, शायद भर भी नहीं सकती। क्रोध से रिश्तो में गांठे पड़ जाती है, जिसे खुलने में भी काफी समय लगता है। यदि वे गांठे खुलती भी है, तो रिश्तों में वो मिठास नहीं आ पाती है, जो पहले कभी हुआ करती थी। इसलिये श्रेष्ठ यही है कि क्रोध से परहेज करें।
    हमेशा इस बात का प्रयास करें कि हमारा मन शांत रहे, लेकिन यदि किसी कारणवश     क्रोध हो भी जाता है, तो तभी क्षमा मांग लें। अक्सर क्रोधी व्यक्ति अपनी गलती नहीं मानता, लेकिन कभी-कभी उसे एहसास होता है, तब वह गलती के लिये पछताता है, लेकिन क्रोध में दी गई गांलिया या कड़वे बोल वापस नहीं आ सकते। यही कारण है कि हम जितना समय क्षमा मांगने के लिये सोचते है उतना ही समय रिश्तों में दुरिया बनी रहती है और समय के साथ बढ़ती जाती है।
    ईष्र्या - सफलता पाने के लिये ईष्र्या का त्याग करना बहुत जरूरी है। हम प्रायः ईष्र्या के कारण स्वयं का नुकसान करते है। ईष्र्या करने से भावनाएं खराब हो जाती है। और हमारा मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। ईष्र्या करने वाला व्यक्ति पहले इसका स्वयं शिकार होता है, और बाद में दूसरो को नुकसान पहुंचाता है।
    ईष्र्या के प्रकार है - घृणा, तिरस्कार, जलन। मनुष्य में ईष्र्या का होना जरूरी है, किन्त मनुष्य उसका उपयोग अपनी सफलता के बजाय लोगों से जलन, घृणा के रूप में करता है।
    अक्सर लोग अपनी असफलता के कारण व दूसरो की सफलता को देखकर जलन के शिकर होते है। कभी स्वीकार करने की कोशिश नही करते की हम असफल हुये है। हम असफल हुये है उसका कारण ढूढने की बजाय वह सफल क्यों हुआ इसके लिये मन में घृणा पैदा करते है।
    किसी व्यक्ति की शक्ल अच्छी नहीं है तो घृणा, कोई गरीब है तो उसके यहां का खाना अच्छा नहीं है, उसका तिरस्कार, किसी व्यक्ति ने तरक्की करने की कोशिश की या वह सफल है तो उससे जलन यही ईष्र्या के प्रकार है।
    कोई व्यक्ति नीच जाती का है तो उसका तिरस्कार। किसी व्यक्ति को आपकी सोच अच्छी नहीं लगती और उसके द्वारा कहां जाता है कि अपने विचार बदले तो उससे घृणा। आपके पास दो पहिया वाहन है, और आपके पड़ौसी ने कार खरीद ली तो उसके जलन।
    यही ईष्र्या की भावना असफलता लाती है, अपनी असफलता और दूसरे की सफलता से मनुष्य ईष्र्यालु हो जाता है। ईष्र्यालु मनुष्य महत्वहीन होता है, अतएव ईष्र्या करना अपना महत्व घटाना है, हजारों गायों के बीच बछड़ा केवल अपने माॅं के पास जाता है, इसी प्रकार मनुष्य का कर्म भी उसी में पाया जाता है, जो उसका कर्ता होता है।
    शक - इस बात में कोई शक नहीं कि शक के कारण न जाने कितने ही घर टूटे और बिखरे। शक को कहीं डेरा जमाने के लिए किसी वजह की जरूरत नहीं। वह तो दिल, दिमाग, रिश्ते और व्यवहार में जबरदस्ती भी कब्जा कर सकता है। शक इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है, लेकिन लोग उसे अपना दोस्त मानते है। जाने अनजाने में आस्तीन में पले इस सांप को लोग दूध पिला रहे है।
    शक का शाब्दिक रूप वहम है, जो कुछ न कुछ होना दर्शाता है। अंधेरे में आप अकेले जा रहे हैं, सुनसान सड़क है, ऐसे में आपके मन में विचार आया वहम पैदा हुआ कि कोई व्यक्ति आपका पीछा कर रहा है तो आपका दिल जोरो से धड़कने लगेगा या आपको वहम हुआ कि आपको कोई भूत नजर आ रहा है तो आपको दूर से आता इंसान पर भी वहम हो जायेगा।
    शक या वहम एक बुरा रोग है। अगर यह किसी को हो गया तो इसका इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं है। यह व्यक्ति को विवेकहीन बनाता है।
    यदि कोई महान व्यक्ति को सदैव सदाचार जीवन व्यतित करते हुये लोग देखना चाहते है , लेकिन उस महान पुरूष से शब्दो में कही भेद पूर्वक बाद की जावे तो उस पर शक किया जाता है कि कहीं वह व्यक्ति संपूर्ण रूप से सही व्यक्ति नहीं है। शक तो मन के विचार का एक प्रकार है क्योंकि मन गति इतनी तीव्र होती है तो वह पल में क्या सोचता है और पल में क्या विचार बदलता है। शक को वहम के रूप में जगह बनाने के लिये तनिक भी देर नहीं लगती। 
    समाज में एक दूसरे का संबंध भरोसे पर टिका होता है। इसे कायम रखने की जिम्मेदारी हम सब की बराबर होती है। शक और विश्वास ने बड़े-बड़े रिश्ते खराब कर दिये।
    शैतान हर अच्छे काम में बाधा डालता है। तात्पर्य यह है कि आप अगर मंदिर या मस्जिद की तरफ जाएं, तो आपको एक साथ बहुत से काम याद आएंगे, लेकिन आप कोई गुनाह करने जा रहे है तो कोई काम याद नहीं आयेगा।
    आप अपने जीवन में अधिक से अधिक लोगों से बुराईयों की बात करें या शराब व शबाब की बात करें, बहुत से साथी मिल जायेगें और कोई आप पर शक भी नहीं करेगा। लेकिन आप देशभक्ति, समाजसेवी और अच्छी बात करते पाए गए तो आपको बुरा व्यक्ति साबित करने की कोशिश की जायेगी और आपकी इंसानियत पर शक भी पैदा करने की कोशिश की जाएगी।
    शक की जहां बात चल रही है वहां यदि जिज्ञासा की बात न की जायें तो यह अध्याय कुछ अधुरा लगेगा। जहां लोग शक को एक जिज्ञाशा का रूप मानते है, लेकिन यह सच नहीं है। किसी चीज के बारे में जानकारी प्रात करने तथा उसके सही होने या न होने की इच्छा जिज्ञासा है। 
    विश्वास - हर व्यक्ति दूसरों से विश्वास की अपेक्षा रखता है, पर उसमें खुद में विश्वास कर पाने की समझ, योग्यता नहीं रहती। दुर्भाग्यवश हमें बचपन से ही अविश्वास करना सिखाया जाता है, इसका कारण यह है कि अक्सर व्यक्ति किसी कार्य के पूर्ण होने के लिये संघर्ष करता है और संघर्ष के बीच उन लोगों पर विश्वास करता है जो उसके संघर्ष में सहायक होंगें किन्तु वे लोग विश्वासघात कर देते है जिसके कारण विश्वास करना कम हो जाता है।
    अगर हम ध्यान से देखें तो यही देखने में आता है कि हर व्यक्ति विश्वास और सम्मान की अपेक्षा तो रखता है, परन्तु विश्वास कर पाने तथा सम्मान कर पाने की योग्यता उसमें नहीं रहती, जिसके ही कारण दूसरे व्यक्ति के साथ अपने पराये का भेद उसमें बना ही रहता है। जिस तरह से यह विश्वास का अनुभव करता है, अगर दूसरा व्यक्ति उसे उसी तरह से विश्वास का अनुभव नहीं करा पाता, तो दूसरा व्यक्ति उसे अपना विरोधी नजर आता है, यहीं से उसके अविश्वास की शुरूआत होती है।
    प्रेम - हर वह चीज जिससे खुशी प्राप्त हो इच्छा की संतुष्टि हो प्रेम है। प्रेम का दूसरा अर्थ प्यार है।
    प्रेम की वास्तविक परिभाषा क्या होती है, इसका अनुभव सभी जीवों को है। एक लेखक को अपनी कलम से, एक प्रेमी को अपनी प्रेमिका से, एक माॅ को अपने बच्चे से, प्रेम है।
    किसी के लिए प्रेम आदत है, तो किसी के लिये प्रेम दर्द, होता है। कोई इसे अपनी जिम्मेदारी समझता है, तो कोई जुनून। लेकिन ऐसे कई लोग होते हैं, जो प्रेम को सुविधा और योग्यता से जोड़कर देखते है।
    कई बार ऐसे लोगों के साथ रहना पसंद करते हैं, जिनके साथ रहने में वे खुद को       सुविधाजनक महसूस करते हैं।
    दो अंजान लोगों की मुलाकात होती है उनकी आपस में बात होती हैं उन्हें लगता है कि वे अच्छे दोस्त बन सकते है। यह उनकी दोस्ती ही उनका प्यार है प्रेम है। उनके विचार एक दूसरे को सहयोग प्रदान करते है। उन्हे यह महसूस होता है कि फलां व्यक्ति के साथ जुड़ने पर कई तरह की सहूलियतें मिल सकती हैं, इसलिये वे जूड़ जाते है। उनका संबंध गहरा बनता जाता है और उसी गहरे रिश्ते को हम प्रेम समझते हैं।
    डर - डर कोई रोग नहीं है, यह एक प्रकार से मन ही की क्रिया है। अक्सर व्यक्ति सोचता है कि ऐसा करने से वैसा होगा और ऐसा करने वैसा होगा। इसी सोच में कई भावनाओं के बीच डर की भावना भी छुपी होती है, उसे लगता है कि ऐसा करने से कही नुकसान न हो जाये और यदि नुकसान हो गया तो मैं तो बर्बाद हो जाऊंगा यही उसके मन का डर है।
    डर के दो प्रकार है। एक सदृश्य डर दूसरा है अदृश्य डर। सदृश्य डर वह है जो हमें दिखाई देता है - उदाहरण के रूप में (1) एक व्यक्ति जंगल से गुजर रहा है, अचानक उसे शेर दिखाई देता है जिसके कारण उसके मन में शेर द्वारा हमला करने, मारकर खा जाने का भय पैदा हो जाता है (2) सड़क पार करते व्यक्ति के मन में डर होता है कि कोई वाहन बेकाबू होकर उससे टकरा न जाये या वाहन चलाने वाले व्यक्ति द्वारा उसे टक्कर न मार दें, ये भय उसके मन में सदृश्य रूप से बना रहता है।
    उसी प्रकार अदृश्य भय जो कि डर का दूसरा प्रकार है, जिसमें व्यक्ति को कई प्रकार के भय घेर लेते है। जो कि इंसान द्वारा स्वयं ही ग्रहण किये जाते है। बीमारियों के बारे में सोचकर - कभी कभी व्यक्ति थोडे लम्बे समय के लिये बीमार हो जाता है (लगभग एक माह या एक माह से अधिक) तो व्यक्ति सोचता है, कहीं मैं, गंभीर बीमारी से ग्रस्त तो नहीं हूॅ और जल्द ही मर जाऊंगा। ये उसका अदृश्य भय है।
    बच्चों के द्वारा कहना न मानना - माता पिता जो बच्चो का पालन पोषण उचित ढंग से करते है किंतु कुछ बच्चे अत्यंत जिद्दी स्वभाव के होते हैं, वे माॅ-बाप का कहना टाल देते है तो वे माॅ-बाप अक्सर इस भय से ग्रसित हो जाते है कि ये लड़का हमारी सहायता कभी नहीं कर सकेगा।
    लड़ाई झगड़ा हो जाने पर - अक्सर जीवन में कभी न कभी किसी परिस्थिति के कारण किसी न किसी से अचानक लड़ाई झगड़ा हो जाता है तो वह व्यक्ति लड़ाई-झगड़े के दौरान या समाप्त होने पर भय से ग्रसित हो जाता है कि इसका परिणाम क्या क्या हो सकता है?
    कुछ न आ पाने का भय - व्यक्ति का जीवन ऐसा होता है कि वह करना बहुत चाहते हैं किन्तु हर व्यक्ति सब कुछ कर लें यह संभव नहीं है। एक व्यक्ति क्रिकेटर बन जाये और वहीं व्यक्ति फुटबाल का खिलाड़ी बन जाये यह थोड़ा बहुत संभव है, किंतु दोनों में परिपक्व खिलाड़ी बन जायें यह संभव नहीं है। ऐसा व्यक्ति अक्सर ऐसा है कि मैं यह भी कर लूं और वह भी कर लूं किंतु इसी कारण वह व्यक्ति भविष्य में कुछ नहीं कर पाता है और एक भय के अवसाद से पीड़ित हो जाता है।
    डर को मन की दृढ़ता से ही दूर किया जा सकता है। सच तो यह है कि डर परिणाम का हल नहीं है, जब क्रिया हुई है तो परिणाम आयेगा ही। लेकिन इसके लिये भय को अपने ऊपर हावी होने दिया जाये यह उचित नही होगा।
क्षमा - क्षमा मन की भावना से उठती है। ग्रंथों मे लिखा है कि क्षमा करने वाला व्यक्ति महान होता है। इंसान क्रोध में तो दूसरो को नुकसान पहुंचाता ही है, लेकिन कभी कभी भूलवश भी इंसान के द्वारा नुकसान हो ही जाता है। इसके लिये दोनों परिस्थितियों में क्षमा करने वाले व्यक्ति की सोच का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसका मन कितना निर्मल और शुद्ध है कि वह जानता है कि मेरे क्षमा न करने से कोई लाभ नही हैं, किंतु क्षमा करने से मेरे मन का बोझ हट जायेगा और क्षमा किये हुये व्यक्ति अपने किये से स्वतंत्र हो जायेगा।
    गलती हो जाने पर क्षमा मांगना अच्छी बात है पर बार बार वही गलती दोहराई जाये और क्षमा मांगी जाये यह उचित नहीं है।
    क्षमा मांगने के लिये व्यक्ति को विनय निवेदन के साथ नम्र बातों से क्षमा मांगना चाहिये। मजबूरीवश क्षमा मांगना किसी भी कार्य के नुकशान की पूर्ति नहीं है और यदि क्षमा मांग भी ली गई है तो उसे छोटे या बड़े से क्षमा मांगने पर स्वयं मन ही मन हीन हो जाना ठीक नहीं है। क्षमा मांगने पर व्यक्ति छोटा या बड़ा नहीं हो जाता किंतु स्वयं के मन का मैल दूर हो जाता है, साथ ही अपने समक्ष उस व्यक्ति के मन में बुराईयों का विचार समाप्त हो जाता है।
    उदारता - सदैव उदार बने रहे यह सभी मनुष्य के लिये संभव नहीं है, किंतु उदारता जीवन में खुशी पैदा करने का एक शस्त्र है। लोगो के उदार व्यक्ति से उम्मीद होती है कि नाराज होना इनके स्वभाव में न के बराबर है।
    उदार व्यक्ति को हर परिस्थिति में संतुष्ट होना होता है। आज के समय में कितने लोग अपने जीवन से खुश है, ये तो कोई नहीं जानता। लेकिन उदार व्यक्ति जो कि हर परिस्थिति में संतुष्ट होना जानता है वह मन से तो सुखी जरूर होगा तभी उसकी उदारता सामने है।
    उदारता इंसानियत गुणों में अपने आप नहीं समाहित हुई है, इसे मनुष्य अपनी दृढ़ता से पैदा करता है, और इसका सतत पालन करने से ही इस गुण को विकसित करने में सफल हो सका है।
    कल्पना - कड़ी मेहनत करने के बाद जब व्यक्ति गहरी नींद में सोता है और सपनों में खो जाता है, यह उसकी अचेतन स्थिति होती है, जहां वह सपनों की दुनिया में खोकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने की कोशिश करता है। लेकिन इसे उसकी कल्पना नहीं कह सकते। कल्पना सचेतन स्थिति में की जाती है, लेकिन सपनों की जो बात है उसे सचेतन स्थिति तक याद रहती है उसे वह सचेतन स्थिति में कल्पना के रूप में शामिल करता है।
    सोते समय नींद में खोने पर आंख की पुतलियां झटके के साथ तेज गति से विभिन्न दिशाओं में घूमने लगती हैं तथा हाथ पैर अस्थाई रूप से शिथिल पड़ जाते हैं। साथ ही ह्दय की धड़कन बढ़ जाती है। यही वह अवस्था हैं, जब हम सपने देखते हैं । यदि इस अवस्था में व्यक्ति जाग जाये तो उसे सपने आधे अधूरे याद रहते हैं, जो सपने उसे याद रहते है वह उसे कल्पना में ढ़ालता जाता है।
    कल्पना में व्यक्ति एक समय में कई जगह पहूंच जाता है। चंद पल में वापस भी आ जाता है। चिंता करना और चिंता में खोये रहना कल्पना का ही रूप है, जब व्यक्ति खुश होता है तो उसका मस्तिष्क सुचारू रूप से कार्य करता है और उसकी कल्पना की गति कम होती है, परन्तु जब मन दुःखी होता है, तब कल्पना अनेक भयानक विचारों का रूप लेकर न जाने कहां कहां से मन को ले जाती है और निराशा के भंवर में डुबोती है। 
    इस निराशा से बचने का उपाय यही है कि परिस्थिति चाहे जो हो सकारात्मक विचार बनायें कल्पना भी सकारात्मक रूप में कार्य करने लगेगी।
    दया - दया की भावना इंसानियत गुणो में मुख्य गुण है। यदि मानवीय गुणों में दया की भावना को हटा दिया जायें तो शायद इंसान और जानवर में फर्क करना मुश्किल हो जाता। जानवरो में भी दया की भावना हैं, किन्तु सोचने समझने की क्षमता मनुष्य से कम होने के कारण उनमें दया की भावना का विकास कम ही होता है।
    किसी के आंसू को देखकर दया की भावना रखने वालो इंसानो का दिल पसीज जाता है। जब कोई व्यक्ति गिडगिडाकर क्षमा मांगता है, तब भी दया की भावना उसे क्षमा करने का आदेश देती है।
    मनुष्य कभी कभी किसी से द्वेषवश बुरा करना चाहता हैं, किन्तु उस व्यक्ति की परिस्थितियां भी उसे उस व्यक्ति पर दया करने की भावना जगाती है।
    उदार व्यक्ति दया के गुण से सम्पन्न होता है, चाहें उसके लिये कोई भी परिस्थिति हो। प्रकृति, व्यक्ति, जानवरों सबसे प्रेम करता है। 
    यदि घृणा, तिरस्कार, दुःख को दूर करता है तो हमें दया की भावना का मन में विकास करना होगा तभी हम बुरे गुणों से बच सकते है।
    पश्चाताप - मन को जिस प्रकार सुख और दुःख का अहसास होता है उसी प्रकार यदि मन के द्वारा कोई गलती हो जायें तो अच्छा व्यवहारिक व्यक्ति के मन में पश्चाताप जरूर होता है।
    गलती हर इंसान से होती है, लेकिन कई लोग अपनी गलती नहीं मानते ना ही इस बात पर विचार करते हैं कि गलती उनसे हुई है, क्योंकि यदि वे गलती मान लेगें तो वे सोचते है कि ऐसा करने से लोग उन्हें घृणा या तिरस्कार की दृष्टि से देखेंगे और यह भी हो सकता है कि लोग सम्मान से नहीं देखेगें।
    बुरे व्यक्ति को पश्चाताप कभी नहीं होता, किन्तु अच्छे व्यक्तियों को अपनी गलती पर पश्चाताप होता है और इसके लिये वे क्षमा मांगने से भी नहीं चुकते।
    पश्चाताप आंतरिक भावनाओं से संबंधित है, जो कि भूलवश किये गये कार्य या क्रोधवश में किये गये कृत्य के लिये पश्चाताप करना।
    जब तब व्यक्ति को अपने किये कार्य पर विश्वास है तो वह दूसरों के साथ हुये हानि लाभ के बारें में ज्यादा नहीं सोच पाता है और उससे अपने लिये अधिक करने की अपेक्षा रखता है, लेकिन यदि उसके द्वारा किये गये कार्य से उसे हानि होती है तो उसके लिये क्रोध करता है और क्रोधवश वह कुछ ऐसा कृत्य करता है, जिससे उस व्यक्ति का अपमान हो या उसके मान सम्मान को ठेस पहूंचे अन्त में जब वह व्यक्ति विचार करता है कि ऐसा करना उचित नहीं था तो इसके लिये मन ही मन दुखी होता है, यह उसका पश्चाताप है और उस पश्चाताप की सही समाप्ति तो वहां होती है जब वह उस कृत्य के लिये उस व्यक्ति से क्षमा मांगे।
    कहने का तात्पर्य यह है कि पश्चाताप तभी हो सकता है जब आपके पास उदारता होना जरूरी है और उदार व्यक्ति ही पश्चाताप करता है और पश्चाताप होने पर क्षमा मांग सकता है।
    किसी के आंसू को देखकर दया की भावना रखने वालो इंसानो का दिल पसीज जाता है। जब कोई व्यक्ति गिडगिडाकर क्षमा मांगता है, तब भी दया की भावना उसे क्षमा करने का आदेश देती है।
    मनुष्य कभी कभी किसी से द्वेषवश बुरा करना चाहता हैं, किन्तु उस व्यक्ति की परिस्थितियां भी उसे उस व्यक्ति पर दया करने की भावना जगाती है।
    उदार व्यक्ति दया के गुण से सम्पन्न होता है, चाहें उसके लिये कोई भी परिस्थिति हो। प्रकृति, व्यक्ति, जानवरों सबसे प्रेम करता है। 
    यदि घृणा, तिरस्कार, दुःख को दूर करता है तो हमें दया की भावना का मन में विकास करना होगा तभी हम बुरे गुणों से बच सकते है।
    पश्चाताप - मन को जिस प्रकार सुख और दुःख का अहसास होता है उसी प्रकार यदि मन के द्वारा कोई गलती हो जायें तो अच्छा व्यवहारिक व्यक्ति के मन में पश्चाताप जरूर होता है।
    गलती हर इंसान से होती है, लेकिन कई लोग अपनी गलती नहीं मानते ना ही इस बात पर विचार करते हैं कि गलती उनसे हुई है, क्योंकि यदि वे गलती मान लेगें तो वे सोचते है कि ऐसा करने से लोग उन्हें घृणा या तिरस्कार की दृष्टि से देखेंगे और यह भी हो सकता है कि लोग सम्मान से नहीं देखेगें।
    बुरे व्यक्ति को पश्चाताप कभी नहीं होता, किन्तु अच्छे व्यक्तियों को अपनी गलती पर पश्चाताप होता है और इसके लिये वे क्षमा मांगने से भी नहीं चुकते।
    पश्चाताप आंतरिक भावनाओं से संबंधित है, जो कि भूलवश किये गये कार्य या क्रोधवश में किये गये कृत्य के लिये पश्चाताप करना।
    जब तब व्यक्ति को अपने किये कार्य पर विश्वास है तो वह दूसरों के साथ हुये हानि लाभ के बारें में ज्यादा नहीं सोच पाता है और उससे अपने लिये अधिक करने की अपेक्षा रखता है, लेकिन यदि उसके द्वारा किये गये कार्य से उसे हानि होती है तो उसके लिये क्रोध करता है और क्रोधवश वह कुछ ऐसा कृत्य करता है, जिससे उस व्यक्ति का अपमान हो या उसके मान सम्मान को ठेस पहूंचे अन्त में जब वह व्यक्ति विचार करता है कि ऐसा करना उचित नहीं था तो इसके लिये मन ही मन दुखी होता है, यह उसका पश्चाताप है और उस पश्चाताप की सही समाप्ति तो वहां होती है जब वह उस कृत्य के लिये उस व्यक्ति से क्षमा मांगे।
    कहने का तात्पर्य यह है कि पश्चाताप तभी हो सकता है जब आपके पास उदारता होना जरूरी है और उदार व्यक्ति ही पश्चाताप करता है और पश्चाताप होने पर क्षमा मांग सकता है।
    मन शरीर के भीतर का वह अदृश्य भाग है, जिससे विचारों की उत्पत्ति होती है, यह मस्तिष्क की कार्यशक्ति का द्योतक है। यह कार्य-शक्ति कई तरह की होती है जैसे - चितंनशक्ति, स्मरणशक्ति, निर्णयशक्ति, बुद्धि, भाव, इंद्रियाग्राह्ता, एकाग्रता, व्यवहार, परिज्ञान इत्यादि।
    मन के जहां अच्छे विचार उत्पन्न होते है तो वहीं इसके विपरीत बुरे विचार भी पैदा होते है। जहां अच्छे विचार मनुष्य को समाज में सम्मान दिलाता है तो वही बुरे विचार वाला व्यक्ति सभी लोगो की नजरों में दुश्मन बना रहता है।
    मनुष्य अक्सर अपने लाभ हित के कारण बुरे विचारो को अपना कर बुरे कार्याे में भाग लेता है और धीरे-धीरे वह इसका आदि हो जाता है, इसके बाद उसमें कई बुराईंयां समाहित होने लगती है। बुराईयों को जहां ग्रहण करने में समय नहीं लगता और कई बुरे गुण तो बिना प्रयत्न किये इंसानी शरीर में समाहित हो जाते है। बुरे प्रकृति के लोगो की जमात तादाद में   होती है और उन्हें ज्यादा एकत्रित करने की आवश्यकता नहीं होती वे स्वतः ही जुड़ने लग जाते हैं, किन्तु बुराईयों की कोई सीमा नहीं है लेकिन इसका अंत जरूर है।
    अच्छाई से व्यक्ति का मस्तिष्क सभी के लिये लाभ का कार्य करता है, किन्तु बुराई से जहां खुद को नुकसान होता है वहीं अन्य व्यक्तियों को भी नुकसान होता है।
    बुराई के तत्व
झुठ - बुराई की शुरूआत ही झूठ से होती है। झूठ बोलकर व्यक्ति अपनी गलती छुपाता है और गलती होेने पर भी अपनी गलती को स्वीकार नहीं करता है। व्यक्ति धीरे धीरे झूठ बोलने का इतना आदि हो जाता है कि उसे कभी कभी यह भी याद नहीं रहता है, कब कहां कौन सा झूठ बोल दिया गया है। वह इस बात का आदि हो चुका होता है कि जैसे एक नशेला व्यक्ति को रोज नशे की लत लग चुकी हो।
    झूठ से किसी की मदद की जा सकती है वहां झूठ बोलना ठीक है, उस झूठ से अन्य किसी को कोई परेशानी न हो और जिसकी मदद कर रहे है वह व्यक्ति उस झूठ से मदद के योग्य हो, वह झूठ ठीक है। ऐसा झूठ जिससे सही व्यक्ति की जान बचाई जा सके वह झूठ उचित है।
    जीवन की सफलता
    जीवन की सच्ची सफलता मन की संतुष्टि या तृप्ति से है। व्यक्ति का उद्देश्य अक्सर अधिक से अधिक रूपये कमाने का होता है और अधिक से अधिक रूपये कमाकर बड़ा आदमी बन जाना सफलता नहीं है, लेकिन इसे ही लोग सफलता समझते है।
    मनुष्य का जीवन प्रकृति द्वारा दिया गया अनमोल तोहफा है, इसे फालतू कार्यो में लगाकर व्यर्थ करना नासमझी के सिवा कुछ नहीं है। जीवन को संतुष्टि के साथ जीने से हम आत्मा को तृप्त कर पाते है। जीवन में चाहें तो व्यक्ति सब कुछ इकट्ठा कर लें लेकिन उसका उपयोग वस्तु के नष्ट होने तक कर पाता है या स्वयं के नष्ट होने पर वस्तु वही रह जाती है। यदि इस प्रकार जीवन जिया जाये तो जीवन का उद्देश्य सही मायने में निर्थक है। जीवन को जीना चाहते है तो ऐसे जियें जैसे पानी का बहाव होना जो सदा चलता रहता है और निर्मल होते जाता है। जीवन को निर्भय और चिंतामुक्त होकर जीना चाहिये।
    जीवन की अच्छाई व बुराई के दो पहलू है जिनके अच्छाई व बुराई के तत्वों का उल्लेख किया जा रहा है।
अच्छाई के तत्व
    (1) सच (2) प्रसंशा (3) मदद भावना, उदारता  (4) प्रेम (5) निडरता (6) खुशी (7) गर्वता (8) शांति (9) विश्वास (10) व्यवहार (11) समझदारी (12) जिम्मेदारी (13) धैर्य (14)  संतुष्टि, संतोष (15) दान (16) आत्मविश्वास
बुराई के तत्व
    (1) झूठ (2) निंदा (3) जलन (4) क्रोध (5) डर (6) चिंता (7) अंहकार (घंमड) (8) वासना (9) अविश्वास (10) अव्यवहार (11)चापलूसी (12) असंतुष्ट (13) लालच (14) शक
    विश्वास - जिस पर विश्वास हो व्यक्ति उसके साथ अक्सर काम करना पसंद करता है। विश्वास है इस कारण काम करने से मधुर संबंध होगें और अन्य व्यक्ति भी इसी विश्वास से जुडेंगे इससे आपकी सोच को लक्ष्य के तरफ बढ़ने में मदद मिलेगी।
    एक दूसरे पर विश्वास करने से ही अपना जीवन चक्र चलता है। विश्वास है तो व्यक्ति अपनी मंजिल की ओर बढ़ जाता है और पा लेता है। सब कुछ उपलब्ध होने पर भी कभी कभी सफलता प्राप्त नहीं होती है, इसका एक ही कारण है - अपनी कार्यक्षमता पर विश्वास न करना।
    व्यक्ति की कोशिश यह होना चाहिए की वह हर बात के लिये दूसरो पर आश्रित न हो क्योंकि ऐसा करने से वह दूसरो पर हर बात के लिये आश्रित रहने का आदि हो जायेगा।
    जब कोई कार्य करने का विचार करें तो पहले उसकी रूपरेखा तैयार कर लें। अच्छी तरह से विचार कर लें कि इस कार्य को किस प्रकार कर पायेगें चाहें वह कार्य असंभव सा प्रतीत हो लेकिन उसे करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ होना जरूरी है, यही विश्वास तो आपको मंजिल पाने में सफल बनायेगा।
    विश्वास अच्छे व बुरे दोनों जगह शामिल हैं, अच्छाई का मार्ग अपनाने के लिये अच्छे लोगों पर विश्वास तथा बुरी संगति मिलने पर बुराई को अपनाकर अपना वर्चस्व बनाने के लिये उस पर विश्वास।
    अच्छाई को लोगो तक पहूंचाने व बुराई को मिटाने के लिये किये गये कार्यो जिसमें पूर्ण सफलता मिलने का आधार विश्वास है।
    धैर्य - मनुष्य के इंसानियत की सही परीक्षा होती है धैर्य से। जिसके पास धैर्य नहीं है तो उसकी कोई मंजिल निश्चित नहीं होगी। बिना धैर्य के वह मंजिल पा ही नही सकता, बिना मेहनत से मिली सफलता में भी धैर्य शामिल नही हो सकता, क्योंकि धैर्य कठिन परिस्थितियों में किये गये कार्यो से पनपता है। सफलता के लिये परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने के लिये जी जान से किये गये मेहनत की परीक्षा से पनपता है।
    यदि व्यक्ति कोई कार्य करना चाहता है और उसमें धैर्य नही होगा तो वह उस कार्य को जल्दी करने की कोशिश करेगा और जल्दी के कारण उसका वह कार्य पूरा नहीं होगा, बिना धैर्य के वह कोई कार्य नहीं कर सकता।
    व्यक्ति अक्सर हर कार्य जल्दी करना चाहता है पर उस कार्य को पूर्ण होने की अपनी सीमा भी हो सकती है, जिसे विलम्ब नहीं कहा जा सकता। दूध गर्म करते समय उबलने तक का धैर्य। हर वह कार्य जिसमें समय की आवश्यकता होती है, वहां धैर्य होना वाजिब है। ये अलग बात है कि आप को 03 किलोमीटर पैदल चलना है और वहां आपको जल्दी जाना है, इसके लिये आप तेजी से कदम आगे बढ़ाकर समय बचा सकते है, लेकिन आपके पास गाडी है और आप चाहोगे की तीन किलोमीटर तत्काल पहूंचा जाये ये संभव नहीं, क्योंकि आपको गाडी चलाते हुये वहां तक पहुंचने में समय लगेगा और समय लगने के कारण आपको धैर्य रखना होगा अन्यथा आप दुर्घटना के शिकार हो सकते है या जल्दी में किसी को ठोकर मार सकते है, इसी दुर्घटना के शिकार होने से बचने  या बचाने के लिये धैर्य रखना आवश्यक है।
    व्यक्ति के पास लक्ष्य है तो वह उसकी मंजिल की दिशा खोज सकता है, यदि उसके पास धैर्य नहीं होगा तो उसका मन शांत नहीं होगा, जिस व्यक्ति के पास धैर्य नहीं है वहां मन की बुद्धि कार्य नहीं करती, जिस कारण बिना एकाग्रता के बिना धैर्य के मंजिल तक पहुंचना संभव नही होगा।
    धैर्य सफलता की पहली सीढ़ी है। मन को अविचलित होने से बचाने के लिये हर परिस्थिति में आपको धैर्य रखना होगा और लक्ष्य बनाकर दृढ निश्चिय करके मंजिल पाने के लिये प्रयास करना होगा।
    सत्य - सत्य निडर है सत्य डर नही सकता ना ही सत्य छुप सकता है। सत्य ऐसी विशेष अवस्था है, जो अपने आप में सिद्ध है, प्रमाणित है। सत्य कमजोरों के लिये भी शक्ति है। सूरज की रोशनी को हम छिपा नही सकते ना ही किसी डिब्बे में बंद कर सकते है, ठीक उसी प्रकार सत्य प्रकाश है, इसे छिपा नहीं सकते ना ही इस दबा सकते है।
    अक्सर सत्य बात कहने पर याद रह जाती है, जबकि किसी बात को दबाने के लिये झुठ का उपयोग करने पर झूठ कहने पर भूल भी जाते है और एक न एक दिन सच सामने आ जाता है। एक झूठ छूपाने के लिये कई झूठ बोलना पड़ते है। सच जहां मन में शांति पैदा करता है वहीं झूठ मन में अंशाति बनाये रखता है।
    सच्चाई के लिये व्यक्ति यदि लड़े और मैदान में अकेला भी होगा तो वह सौ पर भी भारी होगा, लेकिन झूठ से व्यक्ति सदा कमजोर होगा।
    संतुष्टि (संतोष) - अपने द्वारा किये गये कार्यो एवं उससे मिलने वाली उपलब्धियों से संतुष्ट होना। जब हम किसी कार्य से संतुष्ट नहीं होते तो वह कार्य धैर्य से एवं रूचिपूर्वक नहीं किया गया होता है तभीा उस कार्य से संतुष्टि प्राप्त नहीं हुई होती। अक्सर व्यक्ति कोई भी कार्य करता है वह अपनी स्वयं की संतुष्टि के लिये करता है। अन्य किसी के यहां नौकरी करते समय यदि उस कार्य में संतुष्टि नहीं है तो वह व्यक्ति वह कार्य छोड़ देता है या मजबूरी वश बिना संतुष्टि के कार्य करता रहता है।
    जिसके मन में संतोष है वह प्रसन्नयुक्त होगा। मन में संतोष का भावन नही होगा तो वह चेहरे पर तनाव का भाव लायेगा। जब व्यक्ति तनाव में होगा तो वह प्रसन्न हो ही नहीं सकता।
    आजकल व्यक्ति अपने किसी भी कार्य से पूर्णतः संतुष्ट नहीं है। छोटी सी बात पर भी तनाव पैदा कर लेता है और दूसरो की भावना को ना समझना और अपने लाभ हित के लिये अपनी सुख सुविधा के लिये वे सभी कार्य करता है जिससे मन को संतुष्टि प्राप्त नही हो पाती।
    आज दुनिया में बहुत से लोग अपने कार्यो से लोगो के व्यवहार से संतुष्ट नहीं है, इसका कारण यह है कि ज्यादातर लोग तनाव ग्रस्त है। तनावग्रस्त होने का मूल कारण जिंदगी को अपने अनुकूल चलाना है, लेकिन जब परिस्थितियां हमारे बस में नही है तो हमारा जीवन अनुकूल कभी नहीं हो सकता।
    हमारे जीवन को हम लोगों ने शायद दो ही खण्डो में विभाजित कर रखा है एक परिवार, दूसरा रोजगार। सबसे पहले हम प्राथमिकता परिवार को देते है, उनके खाने, पीने, रहने, स्वास्थ्य आदि का ध्यान रखते है। दूसरा रोजगार जिससे परिवार की सभी जरूरतो को पूरा कर सके जिससे परिवार को खुशिया प्रदान कर सके। इसी कारण हम अपने जीवन में प्राकृतिक, अप्राकृतिक एव ंजीवन के विभिन्न पहलुओं की खुशी का भरपुर आनंद नहीं ले पाते है और हम असंतुष्टता महसूस करते है अपने जीवन से। हम उपरोक्त दो खण्डों पर ही केन्द्रित रह जाते है और हम इन्ही दो चीजों के लिए जिंदगी में संघर्ष करते है।
    जब हम किसी परिस्थिति को अपने अनुकूल नहीं कर पाते है तो हमें यह मान लेना चाहिये कि जीवन में जो घट रहा है, उसे स्वीकार करें। और अपने जीवन में होने वाली अच्छी या बुरी किसी भी घटना से तनाव ना लें और संतुष्ट जीवन व्यतीत करें।
प्रशंसा - किसी के द्वारा किये गये उच्च कार्य की हम अक्सर प्रशंसा करते है। हम उसकी प्रशंसा किसी लाभ हित से नहीं बल्कि उसके द्वारा स्वयं को अंचभित किये जाने के कारण ही करते है।
    प्रशंसा के दो प्रकार है - एक झूठी प्रशंसा एक अंचभित कार्य के लिये सच्ची प्रशंसा
    झुठी प्रशंसा - अक्सर झूठी प्रशंसा में कोई लाभ की भावना छूपी होती है, अर्थात् जो व्यक्ति प्रशंसा करता है, उसका उसमें लाभ या हित छूपा होता है। यह हमें पता नहीं होता है कि उसमें वह क्या चाहता था क्योंकि प्रशंसा ऐसी चीज है जो हमें अहसास कराती है, अपने कार्य के बडप्पन की, क्योंकि हमारे कान हमारे द्वारा किये गये किसी भी कार्य की बुराई सुनना ही नहीं चाहते, हम चाहे वह कार्य सही कर रहें हो या गलत। होता भी यही है कि कोई भी व्यक्ति अपने मूंह से उस कार्य की बुराई नहीं करना चाहता जिसे हम कर रहे हो, क्योंकि इसमें दो बाते हो सकती है या तो उसे यह लगता है कि हम उससे बुरा मान जायेगें जिससे उसकी बुराई हो जायेगी या वह यह सोचेगा कि वो व्यक्ति उसकी प्रशंसा नहीं कर रहा वह उससे जलता है या उसे आगे बढ़ने नहीं देना चाहता। वह किसी भी स्थिति में झुठी प्रशंसा सुनना चाहता है। ऐसे लोगों का दुनिया ज्यादा प्रतिशत है जो अपनी झुठी प्रशंसा सुनना चाहते है।  इसके अतिरिक्त जो लोग अमीर होते है, नेता होते है या कोई उच्च पद पर पदथ होते है ऐसे व्यक्तियो के पीछे चापलूसो की कतार लगी होती है, ऐसे उच्च व्यक्ति प्रशंसा में रत रहते है, और सही और गलत का अनुमान नहीं लगा पाते है। ऐसे व्यक्ति प्रशंसा के इतने आदि हो जाते है कि यदि कोई व्यक्ति भूल से इनके कार्य की बुराई कर दें तो वे लड़ने झगड़ने को तैयार हो जाते है। चापलूसो का कार्य अक्सर भडकाने का होता है।
    दूसरा अंचभित कार्य की प्रशंसा - कुछ व्यक्ति ऐसे प्रशंसा करने से दूर रहते है वे जानते है कि वे ऐसे कार्य को अंजाम देने वाले है, जो आश्चर्य जनिक होगा, जिसके प्रशंसा बाद में स्वयं ही होने लगेगी वे तर्क पर कार्य करते है और जानते है कि कहां लोग उसका फायदा उठा सकते है, वे प्रशंसा के लोभी भी नहीं होते, वे सिर्फ अपने कार्य में तल्लीन होकर अपने कार्य को सौ प्रतिशत करने की कोशिश करते है और ऐसे लोग बिरले ही होते है।
    ऐसे व्यक्ति जो गरीब, निर्धन होते है, वे अक्सर प्रशंसा के भूखे नहीं होते, लेकिन यदि उनकी महत्व की प्रशंसा कोई उच्च व्यक्ति करें जैसे - अमीर व्यक्ति, उच्चपद युक्त व्यक्ति, या उम्र में बड़ा व्यक्ति तो वे अपने आप में ऊर्जावान हो जाते है तथा उनमें भी कुछ बड़ा बनने की इच्छा उत्पन्न होती है।
    निदंक सहने वाला व्यक्ति जिसकी निंदा उसके कार्य के कारण होती है, वह व्यक्ति भी समाज में चर्चित होता है और प्रशंसनीय व्यक्ति की अपेक्षा वह जल्दी चर्चा में आता है, लेकिन सिर्फ बुराई के साथ में। उसमें यदि कुछ अच्छाई छूपी भी हो तो वह भी बुराई में तब्दील हो जाती है। इसके विपरीत प्रशंसा प्राप्त करने वाला व्यक्ति अत्यधिक प्रशंसा से अपने सारे गुण खो देता है या अपना दायरा प्रशंसा तक ही सीमित कर लेता है, कुछ ही व्यक्ति इस दायरे से दूर निकल पाते है, और सफल बनकर इतिहास बनाते है।
    व्यक्ति के लिये प्रशंसा सुनना और उसका आनंद लेने में कोई बुराई नहीं है किन्तु प्रशंसा प्राप्त होने पर अपने आपको अपने कार्य के लिये संयमित होना बहुत जरूरी है।
    प्रशंसा में व्यक्ति को ज्यादा रतयुक्त नहीं होना चाहिये तथा कभी निंदा प्राप्त होने पर     क्रोधयुक्त नहीं होना चाहिए। दोनों परिस्थितियों में अपना सामंजस्य बनाये रखना आवश्यक है।
उदारता मदद भावना - खुशियों से भरपूर रहना हो तो जीवन में उदार भावना का होना अत्यंत आवश्यक है, जब बच्चे छोटे होते है तब भी उनमें उदारता की भावना होती है, वे इतने उदार नही होते, किंतु अपनो के लिये कभी-भी उनमे उदारता होती है - जैसे उनके पास कोई खिलौना है तो और दूसरा घर में छोटा भाई है जिसमें वर्ष का ज्यादा अंतर नहीं है, तो वे एक दूसरे को खिलौना देकर अपना मनोरंजन कर लेते है, किन्तु अन्य कोई हम उम्र का बच्चा आ जाये तो वे अपना खिलौना उसे नहीं देते। यदि हम लोग दूसरे बच्चे को वहीं खिलौना देते है तो वे रोने लग जाते है, यदि स्थिति उनके खाने के सम्बन्ध में है, यदि उनके पास कोई चाकलेट या खाने की कोई वस्तू है तो वे सिर्फ अपने परिचित व्यक्ति को ही दे सकता है, लेकिन कभी कभी उदारता वश वह अपनी वस्तु हम उम्र के बच्चे को देकर अपनी दोस्ती या परिचय बढ़ाना चाहता है। उदारता का अर्थ है - नम्रभाव कभी कभी व्यक्ति को किसी के द्वारा अपने मन माफिक कार्य न करने के कारण क्रोध आ जाता है, लेकिन इसके बावजूद वह         क्रोध न दर्शाकर उसके सामने प्रेमभाव दर्शाये यह उसकी उदारता है, नम्रता है।
    यह उदारता की भावना तब पैदा होती है, जब उनमें अपने को छोड़कर दूसरो के प्रति प्रेमभाव जागें वे उसे मानवता के रूप में देखे अपने उस कार्य को सच्ची सेवा के रूप में देखें अपने लाभ की भावना उसमें निहित न हो तो वही व्यक्ति पूर्ण उदारता युक्त हो सकता है। और यह प्रत्येक मनुष्य के लिये संभव नहीं है। 
    मदद भावना का होना आवश्यक है, तभी हम उदारता की भावना अपने शरीर में पैदा कर सकते है वर्ना दूनिया नकलची इंसान पर केन्द्रित बन कर रह जायेगी अर्थात उदारता की भावना ऊपरी दर्शाकर सामान्य व्यक्ति को ही बेवकूफ बनाया जा सकता है।
    यहां उदारता के प्रति नकलची भावना से कहने का तात्पर्य यह है कि उदारता ह्दय से आनी चाहिये ना कि ऊपरी चेहरे से नकलची भाव दर्शाकर उदारता दर्शानी चाहिये।
निडरता - जिस व्यक्ति ने मन की सारी आवश्यकताओं को पा लिया वह दूनिया में सबसे निडर व्यक्ति बन जाना है। मन की सारी आवश्यकतायें जो कि कभी बुरी नहीं हो सकती। उसे ऐसा व्यक्ति  जिसने संतोष करना सिख लिया हो वह व्यक्ति ही प्राप्त कर सकता है। जिसने संतोष करना नहीं सिखा उसे अच्छी वस्तु प्राप्त हो जाने पर भी वह उसमें दोष्ज्ञ देखता है तथा उससे संतुष्ट नहीं होना है।
    एक समय ऐसा भी था जब रूपये पैसे, सोना, चांदी किसी भी प्रकार का कोई लेनदेन नहीं होता था, तब मनुष्य की आवश्यकतायें सीमित थी, उसे जब गेहूं की आवश्यकता होती थी तो उसके पास जो भी वस्तू उपलब्ध होती थी उसके बदले या जिस व्यक्ति से वह गेहूं प्राप्त करना चाहता है, उस व्यक्ति की आवश्यकता की वस्तू जिसमें नमक, राई, जिरा, चावल, फल्ली कोई भी वस्तू देकर उसके बदले गेहूं प्राप्त करना था, इसी प्रकार अपनी आवश्यकता की वस्तू दूसरो को आवश्यक वस्तु प्रदान कर प्राप्त की जाती थी। अपने खेत खलियान, घर सब खूल्ला छोड़ देने पर किसी भी प्रकार का भय नहीं था यह उस समय की निडरता थी, यह निडरता बाहरी सतह की है, व्यक्ति के अंदर की निडरता की सही परीक्षा तो उसके जीवन में घटने वाली बुरी परिस्थितियों के युद्ध से है। यदि आंतरिक रूप में निडरता नहीं है तो वह व्यक्ति अपने जीवन से हारा हुआ है। इसी कारण उसके जीवन में निराशा भरी है। हर परिस्थिति का सामना निडरता से नहीं करेगें तो यह मान लिजिये की अपने जीवन का संघर्ष को विराम लगने में ज्यादा समय नहीं लगेगा क्योंकि ऐसा व्यक्ति जो निडरतामुक्त हो भारी अवसाद से ग्रस्त रहता है और जीवन में प्राप्त होने वाले छोटे से खुशी के अंश में भी निराश होता है, क्योंकि वह यह सोचता है कि कहीं मेरा ये सुखद अंश खो गया तो फिर मुझे इस सुखद अंश के लिये निराश के भंवर में डूबना पडेगा और इसके बाद फिर वह सुखद अंश यदि फिर मिलता है, तब उसका आनंद लूंगा। लेकिन यह तो जीवन है, ऐसे छोटे-छोटे सुखद अंश आते रहते है, लेकिन इन अंशो को हम डर कर क्यों गूजार दें इसे निडरता से जी लों। ऐसी निडरता से जीवन को शहद की मिठास बना लो और यह संभव होगा तभी जब हम संतोषयुक्त जीवन जियेगें तब। संतोषयुक्त जीवन जीने से निडरता इसके बाद अपने आप पैदा हो जायेगी।
प्रेम - किसी भी व्यक्ति या वस्तू से लगाव रखना प्रेम है। प्रेम के कई शाब्दिक अर्थ है, जिसमें प्यार, लगाव, मोह शामिल है। जब हम भगवान पर आस्था रखते है तो उनके प्रति यह प्रेमभाव तो होता है, लेकिन उससे अधिक विश्वास की भावना शामिल होती है। 
    कभी कभी हम जीवन में निराशा से गुजरते है तब भी भगवान को याद करते है । वे ही भगवान को याद करते है, जिन्हे अपने आप पर विश्वास नहीं होता या वे तर्क से सोच नहीं पाते कि जिस निराशा से वे गुजर रहे है, उसका हल क्या होगा। भारी मानसिकता का दबाव होने पर वे मानसिक शांति व उसके हल के लिये भगवान की शरण में जाते है यह उस भक्त की भगवान के प्रति आस्था व प्रेमभाव है।
    बचपन के समय से वयस्कता प्राप्त करने की उम्र तक लगभग सभी अपने आप से प्यार करते है, लेकिन जब व्यक्ति की शादी हो जाती है तो अक्सर सभी व्यक्ति अपने बीबी बच्चो में शामिल हो अपने जीवन में आसक्त हो जाते है। यह उस व्यक्ति (महिला या पुरूष) का अपने परिवार के प्रति प्रेम है।
    ऐसे व्यक्ति भी है जो अपने को दुनिया के व्यक्तियों  से अलग समझते है और कुछ अलग करना चाहते है वे लोग लेखक, चित्रकार, वैज्ञानिक हो सकते है तथा इसके अतिरिक्त सांसारिक जीवन का त्याग करने वाले भंते, सन्यासी, साधू हो सकते है। अपने को साधारण व्यक्ति से असाधारण व्यक्ति बनाने की सोच के कारण वह ऐसा करता है। क्योंकि ऐसे व्यक्ति चाहते है कि जिस प्रकार महान पुरूषो का सम्मान होता है, उन्हे सम्मान के रूप में प्रेम प्राप्त होता है, उसी प्रकार दूनिया उसे सम्मान करे, प्रेम करें।
खुशी - ऐसा कार्य जिसे करने से हमें संतुष्टि प्राप्त होती है, वह खुशी प्रदान करती है। खुशी प्राप्त करने के कई उपाय है, किन्तु अधिकतर व्यक्ति अपनी खुशी केवल दूसरो के कार्यो की, व्यवहार की, या दूसरे व्यक्ति के बारे में बुराई करने पर प्राप्त करते है, जिसे सच्ची खुशी की संज्ञा नही दी जा सकती। सच्ची खुशी ढूढ़ने की कोशिश बहुत ही कम लोग करते है। सच्ची खुशी दूसरो की मदद करने से मिलती है। उसमें जो आनंद है, वह लाखो-करोड़ो रूपयो, अच्छे पकवानो से भी प्राप्त नहीं हो पाती है।
    ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो पूर्णतहः खुशीयुक्त हो। हर व्यक्ति के अंदर अपना अपना दुःख है, जिसे वह प्रकट तो कर देता है, लेकिन उसके दुःख का व्यवहारिक रूप में हल करने वाला कोई नहीं होता है। मौखिक रूप से सात्वंना देने वाले तो कई मिल जायेगें।
    दुःख मिलने पर सहनशिलता, धैर्य का होना सख्त आवश्यक है, किनतु हम लोग धैर्य नहीं रख पाते है, और जल्द ही हम विपरीत परिस्थिति से घबरा जाते है, जबकि मौसम के परिवर्तन की तरह हमारे जीवन में भी सुख और दुःख का चक्र घुमता रहता है। इस बात से हम इन्कार नहीं करते है कि इसके लिये परिस्थितियां जिम्मेदारी होती है, लेकिन जिस प्रकार बरसात के मौसम में पानी का गिरना आवश्यक है। ठंड के मौसम में ठंड का पड़ना आवश्यक है और ग्रीष्म काल में गर्मी के तपन का होना आवश्यक है, उसी प्रकार दुःख और सुख का अपने जीवन में परिवर्तन होना आवश्यक है।
    जब इंसान को खुशी प्राप्त होती है तो उसकी सारी क्रियाये सुचारू रूप से कार्य करने लगती है, और मन-मस्तिष्क भी प्रफुल्लित हो जाता है, किंतु दुःख में कुछ समय में ही व्यक्ति की शरीर की रचना पर असर पड़ने लगता है और उसके बाद सुख के परिवर्तन होने पर कुछ समय में दुःख में पड़े परिस्थिति में अपने आपको तत्काल परिवर्तन नहीं कर पाता।
    दुःख का सामना करने के लिये धैय, सहनशीलता की आवश्यकता होती है और उस वक्त का इंतजार करना होता है, जब हमें सुख का आंनद प्राप्त हो सके लेकिन यह सुख भगवान के भरोसे बैठने पर भी प्राप्त नहीं हो सकता। इसे पाने के लिये खुद की सुख पाने का यत्न करना चाहिये।
    गर्वता - गर्वता की बात करें तो यह केवल मनुष्य जीवन पर ज्यादा लागू होती हैं क्योंकि उस मनुष्य को ही अपने मान-सम्मान की ज्यादा चिंता होती है, जबकि धरती पर रहने वाले अन्य सभी जीवों के लिये गर्वता कोई बड़ी बात नहीं है। मनुष्य जीवन के लिये गर्वता होना भी उसके भोजन की तरह आवश्यक है, लेकिन बिना गर्वता से व्यक्ति मर नहीं जाता। उसे जब लगता है मेरे मान-सम्मान को ठेस पहुंची है, तो वह अपने अंदर ग्लानि महसूस करता है।
    गर्वता एक वैज्ञानिक के अपने सफल आविष्कार की, एक डाक्टर द्वारा अपने मरीज के जीवन को बचाने की एक बेटे के पुरस्कार जितने पर या माॅ-बाप का नाम ऊंचा करने पर यह गर्वता नही तो और क्या है।
    गर्वता जो हर एक इंसान के अंदर होती है, चाहे वह बच्चा हो, महिला हो या पुरूष हो अपने देश पर गर्व करने की और सम्मान को बनाये रखने की। और यह गर्वता क्यों न हो इस माटी पर जन्म लिया इस माटी के लिये मिटने की गर्वता क्यों न हो।
    गर्वता के दो प्रकार है - एक गर्वता है, दूसरो के लिये, दूसरी गर्वता है स्वयं के लिये।
    दूसरो के लिये गर्वता - इस गर्वता के दायरे में देश पर मर मिटने वाले नौजवानो, शहिदों तथा राष्ट्रभक्तों पर गर्वता। अपने पुत्र के द्वारा किये गये उष्कृष्ट कार्य के लिये गर्वता। अपने मित्र द्वारा अपने स्वयं के उपस्थित न होेने पर अपने स्थान पर उसके द्वारा किये गये अपने परिवार के सहयोग के लिये गर्वता। अंजान व्यक्ति द्वारा अचानक की गई मदद के लिये गर्वता।
    स्वयं के लिये गर्वता - हम अपने सक्षमता पर गर्व करते है, उसी प्रकार कभी कभी हम अपने आप पर अंहकार के रूप में गर्व करने लगते है, इसके कई कारण हो सकते है, जिसके कुछ कारण हैं - अपने आप की सुन्दरता पर गर्व, अपने द्वारा कमाये गये धन पर गर्व, अपने ताकत पर गर्व, अपने द्वारा आविष्कार की गई नई वस्तू या सामग्री पर गर्व, दूसरों द्वारा सहयोग या मदद मांगने पर उनकी सहयोग या मदद करने पर गर्व इसके अतिरिक्त अन्य कई प्रकार के गर्व शामिल है। ये सब गर्व स्वयं के लिये है, जिनकी भी इस गर्व से पूर्व हम मदद या सहयोग करते है, यह स्वयं द्वारा की जाती है। यद्यपि गर्वता के सुखद अनुभव के कारण हम भूल जाते है कि यह गर्वता थोड़ा बहुत आन्तरिक सुख का अनुभव तो कराती है, किन्तु क्या यह सुख गर्वता करने योग्य है। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि कोई भी कार्य चाहें अपने सम्मान बढ़ाने के लिये करते है, वह कार्य में हित का भाव ज्यादा होना चाहिये ना कि अहसान करने का, क्योंकि सही गर्वता तो उसमें है, जिसमें लाभ-हित की भावना स्वयं के लिये ना हो बल्कि इसमें पूर्ण स्वार्थ भावना का होना अति आवश्यक है।
    आत्मविश्वास - आत्मविश्वास से तात्पर्य यह है कि अपने शरीर के अंदर रहने वाली शक्ति (आत्म) में विश्वास ही आत्मविश्वास का संपूर्ण शब्द है। आत्मविश्वास यदि मनुष्य के अंदर है तो उसे कठिन से कठिन डगर भी सरल लगती है। अक्सर देखा गया है कि डर के कारण छोटी घटना से भी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, क्योंकि उसमें आत्मविश्वास की अत्यंत कमी थी। और जिन व्यक्तियों में आत्मविश्वास अधिक है, उन्हें जब कभी मौत से सामना करना पड़ता है, तो मौत उनसे हार कर भाग जाती है। मनुष्य के अंदर जीने की कठोर लालसा हो और आत्मविश्वास कूटकूट कर भरा हो वह व्यक्ति 100 वर्ष की आयु से भी अधिक जीता है। जीवन है तो दुःख और सुख, धूप छांव की तरह आते रहेगें लेकिन जब दुःख प्राप्त होता है तब हम अपने आत्मविश्वास के बल पर दुःख का सामना करते है और दुःख को विपरीत दिशा मंे धकेल देते है और सुख आनंद आत्मविश्वास के कारण ही उठा पाते है।
    एक छात्र का अपने छात्र जीवन मंे भरपुर आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है क्योंकि उस छात्र जीवन में वह सपने बुनता है, कभी उसके सपने छोटे होते हैं, कभी उसके सपने बड़े होते है, जिसमें अक्सर वह अच्छी जिंदगी बिताने के लिये सारे सुख सुविधाओं की व्यवस्था करने के लिये सपने देख लेता है और जब समय की रफ्तार बढ़ती है और सपनों को पाने के लिये डगर कठिन लगती है, तब वह अपना आत्मविश्वास खोन लगता है।
    जब व्यक्ति आत्मविश्वास खोने लगता है, उस समय यदि कोई मित्र, परिवार के सदस्य, शिक्षक, गुरू, या कोई ज्ञानी व्यक्ति आत्मविश्वास बढ़ाये तो वह छात्र अपना आत्मविश्वास को वापस बढ़ाकर मंजिल पाने के विशाल सपने को कम कर कुछ उस हिस्से में पाने के प्रयत्न में लग सकता है।
    आत्मविश्वास को कहीं से खरीदा नहीं जा सकता, इसे तो अंदर बढ़ाया जा सकता है। और यह तभी प्राप्त कर सकते है, जब हम किसी की बुराई करना हमेशा के लिये छोड़ दें, क्योंकि जिसे हम आनंद प्राप्त करने की कला समझते है वह हमारे आत्मविश्वास को कम करने का कार्य करती है। स्वभाविक है कि हम दूसरों की बुराई करेंगे तो बुराई के गुण हममे विकसित होगें यह पूर्णतः सत्य है।
    हम दूसरों का जितना आत्मविश्वास बढ़ाये उससे अधिक आत्मविश्वास हमारा बढ़ता है। आत्मविश्वास बढ़ाने का यह मतलब नहीं कि व्यक्ति कोई गलत कार्य करके आत्मविश्वास खो बैठा हो और हम उसे फिर से वहीं कार्य करने के लिये आत्मविश्वास जगाये। बल्कि हमें उसे अच्छा कार्य करने के लिये प्रेरित करना होगा।
    आत्मविश्वास को अक्सर लोग आत्मा में छूपा विश्वास समझ बैठते है, जबकि आत्मा वह है जो केवल मन के जीवित रहने तक ही शरीर में रहती है । जब मन खुद पर विश्वास खोने लगता है तब आत्मविश्वास कम होने लगता है, जब मन खुश होता है तो आत्मविश्वास बढ़ने लगता है।
शांति - मनुष्य का चित्त अगर विचलित है, तो वह शांति प्राप्त नहीं कर सकता। शांति प्राप्त करने के लिये दुनिया की समस्त व्यवहारिक, मानसिक व आर्थिक तत्वों को छोड़कर केवल मन की एकाग्रता पर पूर्ण ध्यान देने पर शांति महसूस होती है, इसी महसूस करने वाली शांति के लिये दुनिया भटकते रहती है, वे अपने साथ दुनिया के सारे भ्रम लेकर चलते रहते है, उनका त्याग नहीं करते और अंत में कहते है कि मुझे शांति प्राप्त नहीं हुई। अन्त में जब वे अपने शरीर का त्याग कर निर्वाण होते है, तब ही वे पूर्ण शान्तत्व को प्राप्त होते है।
    शांति के दो प्रकार है - (1) अस्थाई शांति (2) स्थाई शांति।
    अस्थाई शांति के दो तत्व है - (1) राष्ट्रीयत शांति (2) स्वयंयत शांति।
    स्थाई शांति के दो तत्व है -  (1) परिवारयत शांति (2) मानसिकयत शांति।
    अस्थाई शांति के तत्वों में राष्ट्रीयत शांति से तात्पर्य सर्वप्रथम हम जिस समाज में रहते है, वहां शांति का माहौल बनाये। समाज में शांतित्व का माहौल बनाने पर नगर में शांति के लिये कार्य करे शहर में शांति बनाये रखे, शहर में शांति बरकरार रखने में आप कामयाब हो गये तो आप राज्य में शांति बनाये रखने का प्रयत्न करें, जब कोई व्यक्ति राज्य में शांति बनाने के प्रयत्न में सफल हो जाता है केवल बाहरी राष्ट्र के आक्रमण को छोड़ दे तो उस राष्ट्र में अपने आप शांति आ जाती है। 
    समाज में शांति तभी बना सकते है, जब व्यक्ति उपद्रव जैसा कार्य नहीं करें, बल्कि उपद्रव करने वाले व्यक्ति पर अंकुश लगाये। यह अंकुश तब लगेगा जब समाज को प्रत्येक व्यक्ति अपने समाज में शांति बनाये रखने के लिये इच्छुक होगा, जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति समाज में शांति बनाये रखने के लिये प्रयत्नशील होगा तो वह उपद्रव करने वाले व्यक्ति को कैसे बर्दाश्त कर सकेगा, वह इसकी प्रतिकार करेगा यदि अकेले वह प्रतिकार नहीं कर सकता है तो समाज के लोगों को संगठित कर उपद्रवी व्यक्ति को सामाजिक दण्ड देकर उसका उपद्रव समाप्त करेगा। इस प्रकार समाज की शांति बनाये रखी जा सकती है। नगर की शांति के लिये समाज के जागरूक व्यक्ति अपने सतर्कता से नगर में फैली अंशाति को दूर करेंगे इसके लिये सामाजिक रूप से प्रत्येक क्षेत्र पर संगठन की रचना करनी होगी। जो व्यक्ति नगर की शांति खराब करते है, उन्हें इन संगठन द्वारा सजा प्रदान की जावे तथा इसमें सजा का प्रावधान कड़ा हो इसका संबंध संविधान के प्रावधान से नहीं है, ना ही सामाजिक रूप से प्रत्येक समाज का अलग कोई संविधान से। उपद्रवी के लिये कड़े प्रावधान से तात्पर्य - यदि उसका उपद्रव समाज के लोगों को, नगर के निवासियों को हानि पहुंचाता हो तो उसे नगर से बाहर किया जावें तथा उसे समाज में स्थान न दिया जावे। या उसके लिये सामाजिक रूप से बहिष्कृत किये जाने की समय सीमा निर्धारित कर दी जावे। नगर के अपने अपने क्षेत्र के संगठन द्वारा शहर में शांति बनाये रखने हेतु आवश्यकता पड़ने पर पुलिस फोर्स, आर्मी फोर्स द्वारा मदद ली जा सकती है। जो उपद्रवी समाज में उन्माद फैलाते है उन्हे गिरफ्तार करवाकर उन्हें कानूनी तौर पर सजा दिलाई जावें जिससे भविष्य में अन्य व्यक्ति द्वारा उपद्रव नहीं किया जावें ।
    इस प्रकार सामाजिक संगठ की एकता से शहर में शांति व्यवस्था बनाई जा सकती है, तथा इससे आर्मी फोर्स व पुलिस फोर्स को अतिरिक्त कार्यक्षमता की आवश्यकता नहीं होगी जिससे उन्हें अपने कार्यक्षमता बढ़ाने में भी सहयोग मिलेगा और वे राज्य में शांति बनाये रखने में सहयोग प्रदान कर सकेगें, जिस राज्य में शांति हो उस देश को शांतियुक्त होने से कौन रोक सकता है। जब देश के अन्दर के लोग जागरूक होे तो उसे बाहरी आक्रमण की चिन्ता नहीं रह जाती, क्योंकि देश शांति बनाये रखने से इतना सक्षम हो जाता है बाहरी आक्रमण का मुकाबला कर सकता है।
2.    स्वयंयत शांति - स्वयंयत शांति से अर्थात स्वयं के शांति के लिये प्रयत्न किया जाना। स्वयं की शांति के लिये व्यक्ति सर्वप्रथम अपने आप में शांति  न खोजते हुये ईश्वर पर निर्भर हो जाता है, जबकि असली शांति हमारे शरीर के भीतर छिपी है, जिसे निकालने के लिये प्रयत्न भी स्वयं को करना है। जिसके लिये ध्यान को लगाना होगा और ध्यान की स्थितियों को प्राप्त करना होगा। शांति महसूस करने से नहीं प्राप्त होती इसे प्राप्त करने के लिये स्वयं के गुणो की पहचान होना आवश्यक है और गुणो पर अमल करना अत्यंत आवश्यक है।
स्थाई शांति - 
1. परिवारयत शांति - जब बच्चा पैदा होता है, तब से वह परिवार का एक हिस्सा बन जाता है, जब उसकी उम्र लगभग 3 से 5 वर्ष की होती है, तब वह शिक्षा अध्ययन में प्रवेश करता है। जब बच्चे की उम्र 13 से 18 वर्ष होती है, तब भी उसे परिवार के महत्व का अधिक ज्ञान नहीं होता है। 18 से 23 वर्ष (सामान्यतहः 21 वर्ष) की आयु में वयस्कता की पूर्णता प्राप्त करने का समय होता है, यही उम्र में वह परिवार के महत्व को समझने लगता है। 23 से 27 वर्ष की उम्र में उसे परिवार के लिये कुछ न कुछ कार्य करने की इच्छा जाग्रत हो जाती है, इसके पूर्व की अवस्था में कार्य करने की इच्छा परिस्थितियों पर निर्भर करती है। वयस्कता प्राप्त करने के पश्चात जब भी किसी वर्ष में व्यक्ति का विवाह होता है। उसके नवीन परिवार का विस्तार प्रारंभ हो जाता है। अब उस व्यक्ति को स्वयं से जुडे पूर्व के परिवार एवं नवीन प्रारंभिक परिवार के प्रति दायित्व निभाना होता है। इसी दायित्व को निभाने के लिये व्यक्ति हर संभव प्रयत्न करता है - परिवार की आवश्यकता जब तक सीमित होती है, तब तक अपने सीमित आय से परिवार का पालन पोषण करता है, लेकिन जैसे-जैसे परिवार में आर्थिक खर्चे बढ़ने लगते है, वह परिवार में देने वाला समय आर्थिक व्यवस्था बनाये रखने के लिये अर्थात आय बढ़ाने के लिये प्रयत्नशील रहता है। इसी आर्थिक स्थिति को बनाये रखने के कारण वह परिवारयत शांति बनाये रखने में कामयाब रहता है। परिवार में बच्चे आ जाने से परिवार में और अधिक खुशी का माहौल पैदा होता है, लेकिन बिना आर्थिक सुविधा के खुशियों पर काफी असर पड़ता है, लेकिन इन खुशियों को स्थाई खुशिया नही कहां जा सकता। स्थाई खुशी परिवार की सुरक्षा, स्वास्थ्य से जुड़ी होती है, आर्थिक सुरक्षा से जुडी होती है, जब उस व्यक्ति को लगता है। उसके परिवार में पारिवारिक सुरक्षा स्वास्थ्य सुरक्षा आर्थिक सुरक्षा है तों वह पारिवारिक शांति का अनुभव करता है।
2. मानसिकयत शांति - व्यक्ति के लिये मानसिकयत शांति दो प्रकार की होती है। (1) उसे परिवार, राष्ट्र स्वयं से कोई मतलब नहीं होता वह इनके प्रति किसी भी प्रकार की तृष्णा नही रखता चाहता केवल मानसिक शांति का अनुभव करना चाहता है। (2) उसे परिवार, राष्ट्र, स्वयं तथा स्वयं से हित रखने वाले व्यक्तियों की चिंता होती हे, वह इन्हें अग्रसर देखना चाहता है, स्वयं भी कुछ करना चाहता है। अब वह अपने प्रयत्न में सफल होता है अर्थात उन्नति की ओर अग्रसर होते देखता है तो उसे मानसिकयत शांति प्राप्त होती है।
    मानसिक शांति का सही अनुभव तो तभी हो सकता है, जब हम न प्राप्त करने वाली स्थिति को प्राप्त करने की कोशिश करे जो हमारे पास उपलब्ध है, उसी के बारे में विचार करें और जो वस्तु उपलब्ध है, उसी को उपयोग करें। कहने का तात्पर्य है कि कोई व्यक्ति हवाई जहाज से सफर करना चाहता है उसके लिये सपने बुनता है, जब लगता है कि हम उस प्रयत्न में असफल हो गये तो हम दुःखी होते है, यदि हम टेªन से सफर कर लेते तो उस समय तो दुःखी नहीं होते बल्कि खुशी का अनुभव करते हुये समय काट सकते है। जब हमारे मन को  खुशी प्राप्त होती है तब ही हम शांति का अनुभव करते है। खुशी व शांति प्राप्त करने के लिये हम जिन वस्तुओ का उपयोग करते है वे यदि अपनी आर्थिक सीमा के दायरे के अंदर हो तो खुशी प्राप्त करना व्यर्थ नही है, किंतु अपनी आर्थिक क्षमता नही हो और हम दायरे से बाहर जाकर खुशी खरीदना चाहते है वह आपको खुशी दे ही नही सकती, बल्कि जिस खुशी में आप शामिल है, उसको भी दुःख में बदल देगी। मानसिकयत शांति के लिये तृष्णा का अंत स्वयं को करना है।
डर - ऐसे व्यक्तियो की संख्या बहुतायत में होती है, जिनमें अंदर ही अंदर न जाने कितने डर होते है, लेकिन वे स्वयं को भी यही दर्शाते है कि हम निडर है, हमें किसी का डर नहीं है, लेकिन वे जानकर भी अंजान बनते हैं। इस परिधि में दो बाते आ सकती है - (1) वे तर्क द्वारा निर्णय या सत्य तक पहूंच नही पाते या तर्क संगत बातों को सोचना नहीं चाहते। (2) वे जानते है कि डर उनके अंदर किस किस रूप में उपस्थित है, लेकिन वे बाहर दिखाना नहीं चाहते, क्योंकि वे यह सोचते है कि इससे लोगो के सामने उनका अपमान होगा या वे उनके सामने ग्लानि महसूस करेंगे।
डर के प्रकार - भूत प्रेत का डर, परिवार के प्रति डर, स्वयं के जीवन का डर, प्राकृतिक प्रकोप का डर, ईश्वर का डर, इंसानी रिश्ते के हानि का डर, दूसरे देशो के आक्रमण का डर।
भूत प्रेत का डर - व्यक्ति को अपने आप ही भ्रम हो जाता है कि वह किसी प्रेत या आत्मा से पीड़ित है। कभी-कभी रात में वह पेड़ो की परछाई, पत्तो की हलचल, हवाओं की रफ्तार या किसी जीव जन्तू की चहल पहल से भी डर जाते है और सोचते है कि उनके पीछे कोई आ रहा है और  इसी भ्रम में आत्मा प्रेतात्मा को मान बैठते है। 
    आत्मा-प्रेतात्मा जिसे अच्छे व्यक्ति के शरीर में आत्मा के रूप में उपस्थित मानते है तथा बुरे व्यक्ति के शरीर में प्रेत आत्मा के रूप में मानते है। अच्छा या बुरा व्यक्ति जब कुछ अजीब से हरकते करे तो उसमे हम प्रेतात्मा का असर मानते है। इस प्रकार प्रेतात्मा हमारे शरीर में अदृश्य रूप से घर करती है, यही डर  आपके शरीर में गहराई से अपनी जड़े कर लेगा।
परिवार के प्रति डर - व्यक्ति के लिये परिवार बहुत मायने रखता है। परिवार की सुख          सुविधा के लिये मेहनत करना उसका कर्तव्य है। इसी कर्तव्य को निभाने की जिम्मेदारी घर के प्रत्येक सदस्य पर होती है। जो नाबालिग बच्चे होते है, वे परिवार का निर्वहन की जिम्मेदारी नही निभाते क्योंकि यह उनके बचपन के दिन होते है। उस स्थिति में परिवार में अपने दायित्वो को वे समझ नहीं पाते है, लेकिन नाबालिग से बालिग होने की स्थिति लगभग 13 वर्ष से 18 वर्ष के बीच के उम्र में परिवार के प्रति लगाव व अपने दायित्व को महसूस करने लगते है और 18 वर्ष बालिग होने की उम्र होती है। 18 से 23 वर्ष तक यदि परिवार पर कोई विपत्ति न हो तो वे अपने बालिग से पूर्ण बालिग  स्थिति को खुशी से व्यतीत करना पंसद करते है, लेकिन जिम्मेदारियों के अहसास के साथ। परिवार के मुखिया को इस बात का डर रहता है कि यदि उसके साथ कोई दुर्घटना हो गई तो उसके परिवार का क्या होगा। वह अपने परिवार के सारे प्रकार के हानि के बारे में पूरा विचार करने लगता है, उसके परिवार में जितने भी सदस्य - बुजुर्ग, पत्नी, बच्चे सभी के बारे में विचार आने लग जाते है। 
    लेकिन यह डर क्या जरूरी है, इसका उत्तर तो वहीं व्यक्ति दे सकता है, जिसके मन में इस प्रकार का डर वाकई में है और परिवार का जिम्मेदार व्यक्ति हो अर्थात मुखिया हो। ऐसा नही है कि यह डर परिवार के मुखिया पर ही निर्भर करता है। यह डर पति यदि मुखिया है तो पत्नी पर भी निर्भर करता है। किसी परिवार में पत्नी मुखिया है तो पति पर निर्भर करता है। लेकिन यह डर परिवार के प्रति इसलिये भी होता है कि अपने वंश अपने नाम को आगे बढ़ते देखते की ख्वाहिश ही डर पैदा करती है। एक लेखक होने के कारण मैं इस तथ्य पर पहुंचा हूूॅ क यह सोच उचित नहीं है यदि आप वाकई में बहादूरी की जिंदगी जीना चाहते है। परिवार के प्रति सिर्फ हमें अपनी जिम्मेदारी निभाते ही चलना है। अपने बारे में या परिवार के बारे में इस प्रकार के डर से दूर रहे। हम दुनिया में जब नहीं थे तब भी दुनिया चल रही थी और हम दुनिया में नही रहेंगे तो भी दुनिया रूकने वाली नहीं हैं, पर जितनी खुशी बिना डर के परिवार को आप दे सकें उसे देना चाहिये, लेकिन ईमानदारी पूर्वक जीवन के साथ।
3.    स्वयं के जीवन का डर - भूतकाल में हमने क्या किया उसकी याद हमारे मस्तिष्क पटल पर उभरते रहती है। कभी कभी हम लोग अपने जीवन काल में कोई बुरी गलतियां कर लेते है, जिसका एक अच्छे इंसान को अहसार जरूर होता है, और अपने अंदर उस गलती के लिये बार-बार विचार करता है। लेकिन जिस दिन आपने गलती का अहसास कर लिया। उस दिन से आप नया जीवन प्रारंभ करें। यह सच है कि आपने सोचा कि हम यहां से पुरानी बातों को भुला देगें और नया जीवन प्रारंभ करेगें, तब भी आपको अपनी पुरानी घटना के लिये बहुत सुनना पडता होगा लेकिन यह सोच कर उस घटना की यह सजा है और यह सजा मुझे जितनी भी मिलेगी मंजूर है। चाहे ताने सुनकर, चाहे अन्य किसी रूप में ग्रहण करेगें। आप देखेगें की आपमें काफी सुधार आ गया और वे लोग जो आपसे घृणा करते रहे है, उनमें भी          सुधार आ जायेगा। मगर इसके लिये बहुत समय लगेगा कभी कभी जिदंगी पूरी गुजर जाती है। घटनाये मस्तिष्क पटल पर बुरी पडती है, झूठ बोलन की, अपने द्वारा ऐसा कार्य करने पर जो समाज में उचित न हो, अपने द्वारा किसी की बुराई करने पर जो समाज में उचित न हो, अपने से किसी ने उम्मीद लगाई और उस उम्मीद पर हम खरे नहीं उतरने पर हमें स्वयं को ग्लानि। इस प्रकार कई रूप में बुरे क्षण याद आते है, इसी प्रकार हमारे मस्तिष्क पटल पर खुशी के पल भी उभरते जिनके बारे में सोचकर आंनदित होते है। व्यक्ति अपने भूतकाल में अच्छे और बुरे क्षणों को याद करता है और उनसे उनके जीवन में होने वाली घटनाओं से डर जाता है। भविष्य काल में अपने अच्छे जीवन के बारे में विचारता है। मैं क्या बनूंगा और कैसे रहूंगा और क्या-क्या करूंगा। इसी भविष्य की सोच में वह विचारित रहता है और भविष्य जो कि उसे उसकी इच्छानुसार प्रगति दे पायेगा या नही यह व्यक्ति के लिये बहुत बड़ा डर है। वाकई में इसी सोच में व्यक्ति ज्यादा भयभीत रहता है। इसके बावजूद व्यक्ति अपने आपको लोगो के सामने दर्शाता है कि वह निडर है। ऐसे बहुत ही कम व्यक्ति है, जो ज्योतिष को नहीं मानते ज्यादातर व्यक्ति ज्योतिष के पास अपने भविष्य के बारे में जानने की कोशिश करते है और ज्योतिष व्यक्ति हमेशा लाभ की बाते उस व्यक्ति को पूर्णरूपेन प्रशंसा से भरपुर बातों के अतिरिक्त कुछ नहीं बता सकता। कभी कभी भूतकाल की घटी घटना बतायेगा। भूतकाल की बात करें तो उसमें भी वह कोई घटना ऐसी हुई थी कोई घटना वैसी हुई थी, इसके बारे में ही बता सकता है। कहने से तात्पर्य इतना है कि या यह भूत या भविष्य का स्वयं के जीवन का डर नहीं है।
प्राकृतिक प्रकोप का डर - इस प्रकार के डर में सभी प्रकार की प्राकृतिक दुर्घटनाओ से होने वाली घटनाओ से सम्बन्ध है जैसे - बिजली से क्षति, जीव-जंतु, जंगली जानवरो से क्षति, बिमारियों के फैलने से क्षति, बाढ़ से क्षति, आंधी तूफान से क्षति, भूकंप व ज्वालामुखी से क्षति, प्राकृतिक रूप से आग लगने पर क्षति, इत्यादि प्राकृतिक प्रकोप के डर में जिन क्षतियों का उल्लेख किया गया उनका संक्षेप में विवरण निम्न रूप से है -
बिजली से क्षति  - वर्षा ऋतू के समय बिजली के चमक कर धरती पर किसी भी स्थान पर गिरने पर उस स्थान को क्षति पहूंचती है। कभी कभी बिजली आवासीय स्थल पर गिरती है, जिसमें रहने वाले परिवार को भारी क्षति होती है, बिजली पेड़ों पर भी गिरती है। आवासीय स्थल पर बिजली गिरने का कोई निश्चित स्थान नहीं होता। मानव द्वारा निर्मित संसाधनो से जो बिजली उत्पन्न की जाती है, उस बिजली से भी क्षति होती है।
जीव जंतु से क्षति - जंगली जानवरों से मनुष्य को क्षति पहूंचती हैै। जीव जंतू, शेर, चीता, साॅप, बिच्छु सभी प्रकार के वे जीव जो अन्य जीवो को हानि पहूंचाते है।
बीमारियां फैलने से क्षति - बीमारियों से मनुष्य को काफी क्षति पहुंचती है। किसी कारणवश यदि भंयकर बिमारियां फैल जाये तो मनुष्य जाति को काफी हानि पहुंचती है। कुछ बीमारियांे का इलाज तो किया जा सकता है, कुछ बीमारियां काफी विकराल रूप धारण कर लेती है, और उसके कारण मनुष्य को काफी क्षति पहुंचती है।
बाढ़ से क्षति - वर्षा ऋतु में अक्सर नदिया उफान पर होती है। अत्यधिक बरसात के कारण जलस्तर के बढ़ने से बाढ़ का रूप ले लेती है और बाढ़ पुरे गांव, नगर, शहर में आ जाती है जिससे जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है तथा व्यक्ति के आवास, भवन अवयस्त हो जाते है।
आंधी तूफान से क्षति - जब हवा का संतुलन बिगड़ता है, तो वह तेज आंधी तूफान का रूप् लेता है। आंधी तूफान जो जोरदार हवा के रूप में हो या चक्रपात के रूप में हो दोनों ही स्थिति मनुष्य के लिये हानिप्रद होती है। ये आंधी तूफान का भयानक रूप बाढ़ के भयानक रूप की तरह विकराल भी हो सकता है।
भूंकप व ज्वालामुखी से क्षति - जमीन में होने वाली भूगर्भित हलचल जिसमें भूकंप व ज्वालामुखी शामिल है। भूकंप से जमीन में जगह जगह दरारे हो जाती है तथा जमीन पर निर्माण भवन, आवास, जीव-जंतू, पेड-पौधे, मनुष्य अंदर समा जाते हैं। उसी प्रकार ज्वालामुखी से लावा निकलता है जो काफी गर्म होता है, उससे भी क्षति होती है।
प्राकृति रूप से आग लगने पर क्षति - जंगलों में हवाओं के रफतार के कारण अक्सर कई पेड़ गिरत है तथा एक दूसरे से घर्षण करते है, इसी घर्षण क्रिया के कारण अक्सर जंगल में आग लग जाती है। कभी कभी बिजली कड़कड़ाने के बाद जंगल में गिरती है, जिससे सूखे पेड़-पौधों में आग लग जाती है। ये प्राकृतिक रूप से आग लगने के कारण भी क्षति पहूंचती है।
    इस प्रकार उपरोक्त प्राकृतिक रूप से डर वाकई में मनुष्य के मन मस्तिष्क पर असर करता है, क्योंकि वह जानता है कि इन प्राकृतिक रूप में हुई दुर्घटना से भी उसके जीवन, परिवार के जीवन, तथा परिवार पर मुसीबत पड़ सकती है। बिजली से क्षति, जीव-जंतू से हानि, बीमारी फैलने का डर, बाढ़ की स्थिति में बाढ़ जाने का डर, आंधी तूफान का डर, भूंकप व ज्वालामुखी का डर, और भी ना जाने कितने ही प्राकृतिक आपदाओं के डर से व्यक्ति मन ही मन भयभीत रहता है।
    यदि वह अपने इस डर को छोड़ दे तो वह सुख पूर्वक जीवन यापन कर सकेगा। लेकिन वह ऐसे किसी भी डर को मानने को तैयार नही होगा, क्योंकि ऐसे डर का कोई समय नहीं होता। हम परिवार में या दोस्तो में, अन्य अपनी खुशियों में शामिल रहते है लेकिन इस प्रकार के डर की कल्पना एकांत में करते है या प्राकृति आपदाओं की हलचल नजर आने पर।
ईश्वर का डर - दुनिया में दो प्रकार के व्यक्ति है - एक वे जो ईश्वर में विश्वास रखते है वे आस्तिक होते है। दूसरे वे जो ईश्वर को नही मानते नास्तिक होते है।  ईश्वर के मानने के तीन प्रकार है - 1. बिना जाने, बिना तर्क के ईश्वर को मान लेना 2. ईश्वरी चमत्कार देखकर, पढ़कर, सुनकर, समझकर ईश्वर को मानना 3. स्वयं ईश्वर की खोज करना और किसी एक शक्ति को मानना।
1.    बिना जाने, बिना तर्क के ईश्वर को मान लेना - ऐसा व्यक्ति अपने अज्ञानता के कारण करता है या अपने आलस्य के कारण। ईश्वर के प्रति वह जानने की चेष्टा नही करता, क्योंकि वह इतना जानता है, जहां बहुतायत में लोग एक ही कार्य करते है वह सही होगा और मैं उसी बहुतायत में शामिल हो जाउंगा तो मैं भी सही माना जाउंगा। वे व्यक्ति तर्क से सोचते नहीं है, इसके दो कारण हो सकते है - 1. या तो वे सुखी सम्पन्न है 2. या आर्थिक, मानसिक, स्वास्थ्य से परेशान है। जो लोग काफी मजबूरी या परेशानियों से घिरे है, अपने जीवन में, अपने परिवार में, अपने स्वास्थ्य में, अपने आर्थिक कार्यो में इसी कारण वे ईश्वर से अपने लिये या अपने परिवार के लिये, आर्थिक एवं स्वास्थ्य के लिये प्रार्थना करते है, दुआ मांगते है, वंदना करते है। जो लोग सुखी सम्पन्न है, उन्हें लगता है कि हमें जो मिला है, ईश्वर से प्राप्त हुआ ै, मैं जिस ईश्वर को मानता हूॅ वह ईश्वर मुझसे खुश है और यह सब इस ईश्वर की मेहरबानी है। फिर मुझे तर्क-वितर्क से क्या लेना देना है।
2.     ईश्वरी चमत्कार देखकर, पढ़कर, सुनकर, समझकर ईश्वर को मानना - व्यक्ति टेलीविजन के माध्यम से, नाटक या मंच के माध्यम से ईश्वर के आस्था के प्रति बनाये गये  चलचित्र को देखकर आस्था में तल्लीन होता है। ईश्वर के बारे में ग्रंथ या लेख पढ़कर आस्था में तल्लीन होता है। ईश्वर के आस्था के रूप में बनाये गये गीत, गाने, भजन, इत्यादि सुनकर इसके अतिरिक्त प्रवचन, सभाये, सत्संग में सुनकर आस्था में तल्लीन होता है। कभी कभी व्यक्ति को लगता है कि ईश्वर के द्वारा किसी इंसान की जान बच गई, या ईश्वर के भक्ति के कारण उस व्यक्ति के तरक्की हो रही है ऐसा समझकर वह भी ईश्वर की भक्ति में तल्लीन हो जाता है।
3.     स्वयं ईश्वर की खोज करना और किसी एक शक्ति को मानना - व्यक्ति हो खोजी होते है वे दूसरो की अवहेलना की परवाह नही करते है, उन्हे लगता है कि यह ईश्वर वाकई में सत्य है तो वे उसे पूर्ण मन से मानते व स्वीकार करते है।
    यह ईश्वर को मानने का कारण है या तो हम अपने एवं स्वयं से हित रखने वाले व्यक्ति की भलाई चाहते है और अहित न हो इसके लिये ईश्वर पर आस्था रखते है। कुछ व्यक्ति शांति या मुक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से भी ईश्वर को मानते है। लेकिन इन सब कारणो के पीदे छूपा होता है डर। इसे स्वीकार करना होगा लेकिन पाखंडी लोग, बनावटी लोग, इसे स्वीकार नहीं करेगें और इस बात में सत्यता नहीं है ऐसा वे दर्शायेगें। दूसरा डर है कि ईश्वर है तो शैतान है, शैतान से केवल ईश्वर ही बचा सकता है, उसी के डर से हम ईश्वर को पकड़ कर रखते है ताकि ईश्वर उसका मुकाबला करें और हम ईश्वर को इसके लिये प्रार्थना करते है। ईश्वर को नहीं मानेगें तो हमारे काम पुरे नहीं होगें। दूसरी बात शैतान से बचने के लिये ईश्वर पर आस्था रखते है यही ईश्वर का डर है।
इंसानी रिश्ते के हानि का डर - व्यक्ति चाहे किसी समाज का हो, धर्म का हो उससे जुड़े अन्य व्यक्तियों का उस व्यक्ति से कोई न कोई रिश्ता जरूर होता है, जिन्हे व्यवहारिकता के रूप में कई नाम दिये गये है। इन्ही रिश्तो को निभाने के लिये व्यक्ति जागरूक रहता है। ये अलग बात है कि कुछ लोग रिश्ते निभाना आवश्यक नहीं समझते । ये बात सच है कि जीवन में रिश्ते बनाना बहुत ही कठिन काम है। यही कारण है कि व्यक्ति रिश्तों के हानि होने के डर से चिंतित हो जाता है। इंसानी रिश्ते टूटने के लिये या तो इंसान स्वयं जिम्मेदार होता है या इसके लिये परिस्थितियां जिम्मेदारी होती है, लेकिन इसमें रिश्ते टूटने का डर जरूर होता है। एक बार यदि रिश्तो के बीच दरार आ जाये तो उसे भरना बहुत कठिन हो जाता है।
दूसरे देशो के आक्रमण का डर - दूसरे देशो के आक्रमण का भी डर रहता है जिसमे देश को हानि पहूंचती ही है, साथ ही परिवार में डर के हालात भी पैदा होते है, कई स्थितियां पैदा भी हो जाती है जिससे डर व्याप्त होता है जैसे - परिवार में सदस्य का खोना, आर्थिक तंगी, मानसिक स्थिति।
दान - दान से तात्पर्य है जो बिना मोल से दी जावे, जिसका कोई मूल्य नहीं होता दान तो अपनी इच्छा से दिया जाने वाली वस्तु है। अच्छाई के गुण में दान भी एक तत्व है। दान के दो प्रकार है - 1. वह जिसे दानकर्ता स्वयं करता है, उसमे दान करने की स्वयं इच्छा जागती है, जिसे अन्य किसी व्यक्ति या परिस्थितियां दान करने को मजबूर नहीं करती है। इस दान के प्रकार में व्यक्ति के पास जो वस्तू होती है वह उसे दान करना चाहता है, दान करने के लिये दानकर्ता का उस वस्तू का मालिक होना होता है, अन्य किसी की वस्तू दान करने का किसी भी व्यक्ति को अधिकार नहीं है और वह दान की श्रेणी में नहीं मानी जा सकती। दान करने वाली वस्तुओं में - कपड़े, मूल्यवान वस्तू, जमीन, अपने शरीर के अंग या पूरा शरीर भी स्वयं के मालिकाने की किताब तथा स्वयं के द्वारा लिखी गई पुस्तके या खरीदी गई पुस्तके इत्यादि शामिल है।
    दानकर्ता कुछ दान करना है तो उसमे उसकी भावना, इच्छा, प्रेम का होना अत्यंत आवश्यक है। क्रोध में किया गया दान दानग्रहण योग्य नहीं होता।
    2. दान का दूसरा प्रकार है - दान लेना। दान लेने की स्थिति में ऐसे व्यक्ति जो दान लेने के अधिकारी, साधू, सन्यासी आते है। भिखारी के दान लेने की स्थिति अलग है वे मांग करते है, और इच्छूक व्यक्ति उन्हें देता है, लेकिन भिखारी को देने और नहीं देने की इच्छा शामिल होती है। इनकी साधु, सन्यासी भी मांग करते है, किन्तु उनकी आवश्यकताये सीमित होती है और वे आवश्यकतानुसार मांग करती है।
    दान करने के लिये अपने ह्दय में दान करने की भावना का होना आवश्यक है, जब व्यक्ति का ह्दय किसी कारण परिस्थिति के कारण परिवर्तन होता है तो वह अपने पास की वस्तू दान करता है इसके पीछे उनकी सोच यह होती है कि वह जिस व्यक्ति को वस्तू दान कर रहे है, उस वस्तू का उपयोग हो।
क्रोध - क्रोध की उत्पत्ति तब होती है, जब मन की इच्छापूर्ण नहीं होती। जब व्यक्ति किसी कार्य को करना चाहता है, लेकिन वह उसमें असफल हो जाता तब भी, क्रोध आता है। जब व्यक्ति किसी से कोई कार्य कराना चाहता है, लेकिन उसके द्वारा यह कार्य सही रूप में नहीं किया जाता तब भी क्रोध आता है। जब व्यक्ति किसी से कोई कार्य कराना चाहता है, लेकिन वह करने मना कर देता है, तब भी क्रोध आता है। इन सब बातों में स्वयं की इच्छा छुपी है, जो पुरी नहीं होने पर क्रोध का जन्म होता है।
    क्रोध की उत्पत्ति के सामान्यतः छः कारण है:-
1.    स्वयं की इच्छा की पूर्ति न होने के कारण
2.    दूसरो से जलन भावना के कारण
3.    अचानक विवाद के कारण
4.    आर्थिक तंगी के कारण
5.    स्वास्थ्य में कमी के कारण
6.    मानसिक परेशानी के कारण
1.    स्वयं की इच्छा की पूर्ति न होने के कारण - व्यक्ति की स्वयं की किसी भी प्रकार की इच्छा चाहे वह किसी को लाभ पहूंचाने की हो या हानि पहुंचाने की यदि उसकी इच्छा पुरी नही होती है तो उसके मन में क्रोध उत्पन्न होता है।
2.    दूसरो से जलन भावना के कारण - अक्सर व्यक्ति दूसरों के व्यवहार से, तरक्की से, स्वास्थ्य, आर्थिक व्यवस्थाओं से या अन्य प्रकार से द्वेष भाव रखता है, ऐसा उसके पास वैसी वस्तु या सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण होता है। जिसके कारण वह अपने आप में हीन भावना पैदा कर लेता है और दूसरे व्यक्ति से जलता है, और उस व्यक्ति के विरूद्ध अपने स्वयं के मन में क्रोध पैदा करता है।
3.    अचानक विवाद के कारण - कभी कभी छोटी-छोटी समस्याओं के लिये एक दूसरे से व्यक्ति विवाद करने लग जाता है, जिसके कारण आपस में विवाद हो जाता है। छोटी समस्याये कभी कभी उनके लिये बडी समस्याये बन जाती है जैसे - बच्चे के लिये झगड़ना, कचरा इत्यादि फेंके जाने पर, कभी कभी अपने शब्दो के गलत प्रयोग के कारण, अचानक किसी बात से बहस उत्पन्न होने के कारण विवाद हो जाता है, जो क्रोध को जन्म देती है।
4.    आर्थिक तंगी के कारण - आर्थिक तंगी की समस्या का प्रतिशत बहुत ज्यादा है, क्योंकि ऐसे केई परिवार है, जो आर्थिक तंगी से गुजर रहे होते है। मान लिजिए त्यौहार कल है और त्यौहार के लिये कुछ खरीददारी करना है, लेकिन रूपयों की कही कोई व्यवस्था नही है तो ऐसी स्थिति में परिवार का प्रत्येक सदस्य दुःखी हो जाता है और साथ ही मन में इस तंगी पर क्रोध भी आता है।
5.    स्वास्थ्य में कमी के कारण - जो लोग स्वस्थ है, उनके साथ भी थोडी बहुत स्वास्थ्य की समस्या बनी रहती है, लेकिन जो पूरी तरह से ठीक है, वे भी एक न एक दिन थोडी स्वास्थ्य की समस्या से गुजरते ही है। कुछ लोग स्वास्थ्य की भी लम्बी परेशानी झेलते है। लम्बे समय तक बीमार रहने से उनके स्वभाव में चिड़चिडापन आ ही जाता है। यही चिड़चिडापन क्रोध का अंश है, जो स्वयं की सहनशीलता पर निर्भर करता है। जब परेशानियों को हम सह नही पाते हैं तो उसे क्रोध के रूप में व्यक्त करते है।
6.    मानसिक परेशानी के कारण - मानसिक परेशानी के तीन कारण (1) प्राकृतिक रूप से परेशानी (2) व्यक्तियों द्वारा परेशान किये जाने के कारण (3) स्वयं के कार्य से संतुष्ट न होने के कारण
    मानसिक परेशानी जिस व्यक्ति को होती है, वह अक्सर कई प्रकार के विचारो में खोया रहता है। कुछ विचार ऐसे भी होते है, जिसका हल नहीं निकल पाता या उसका परिणाम हानिप्रद हो सकता है, इसी विचार में व्यक्ति विचारो के उलझन में खोया रहता है।
(1) प्राकृतिक रूप से परेशानी के कारण - प्राकृतिक रूप से आई विपदा का शिकार होना जैसे - घर पर बिजली गिरना, बाढ़ से घर में पानी भरना, जीव-जंतु के द्वारा नुकसान प्राप्त होने पर तथा कई प्रकार के प्राकृतिक आपदा से परेशानी होती है, जो मानसिक परेशानी के कारण बनते है।
(2) व्यक्तियों द्वारा परेशान किये जाने के कारण - सामान्यतहः व्यक्ति व्यक्तियों से ज्यादा मानसिक रूप से परेशान पाया जाता है। कुछ व्यक्ति दूसरो को परेशान करने के लिये जान-बुझकर परेशान करते है। कुछ लोग दूसरो अपना मतलब निकालने के लिये दूसरो को हानि पहुंचाते है। कुछ लोग दूसरो से जलते है जिसके कारण उनकी सफलता में बाधक बनते है। ये सब व्यक्तियों द्वारा परेशान किये जाने के कारण होता है।
(3) स्वयं के कार्य से संतुष्ट न होने के कारण - व्यक्ति की मानसिक परेशानी का यह भी कारण है कि वह स्वयं के कार्य से संतुष्ट नहीं होता है, वह जो कुछ करना चाहता है, परिस्थितियाॅ उसके विपरित हो जाती है, जिसके कारण कार्य में असंतुष्टि आ जाती है। दूसरी बात यह है कि स्वयं के पास अपने कार्य भी सफलता के लिये वस्तूओ की उपलब्धता में कमी भी कार्य की प्रगति में बाधक होती है इस प्रकार की असंतुष्टि क्रोध का कारण होती है।
    इस प्रकार क्रोध की उत्पत्ति कही न कहीं इच्छा के पूर्ण न होने की स्थिति में उत्पन्न होती है, चाहे इसके लिये अन्य कोई व्यक्ति जिम्मेदार हो, स्वयं जिम्मेदार हो या प्राकृतिक स्थिति जिम्मेदार हो। प्रत्येक प्रक्रिया में इच्छा का शामिल होना निश्चित है और इच्छा की पूर्ति किसी भी रूप में पुरी नहीं हो पाती है, तब वह क्रोध के रूप में उत्पन्न होती है।
असंतुष्टि - असंतुष्ट शब्द निराशावाद का सूचक है। इच्छा की पूर्ति नहीं होने पर हम असंतुष्ट होते है।
    असंतुष्ट होने की स्थितियां है - (1) बाह्यरूप से असंतुष्ट होना (2) आन्तरिक रूप से अंसतुष्ट होना।
(1)    बाह्य रूप से असंतुष्ट होना - इस प्रकार की असंतुष्टि केवल हमारे द्वारा किये गये कार्यो की सफलता-असफलता से नहीं है, इसके अतिरिक्त हमारे द्वारा अधिकृत व्यक्ति के कार्य की सफलता-असफलता पर भी निर्भर करता है। व्यक्ति यदि पूर्ण रूप से सफलता अर्थात इच्छानुसार या इच्छा से भी अधिक सफलता प्राप्त करता है, तब वह असंतुष्ट हो ही नहीं सकता। हाॅ यदि उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति द्वारा कार्य में इच्छा के अनुसार सफलता अर्जित करने के स्थान पर असफलता चाहे कम या बहुत अधिक हो, प्राप्त होती है तब, तो वह असंतुष्टि प्रदान करेगी। बाह्य रूप से, कोई भी कार्य, जैसे - आप बगीचे में फूल लगाना चाहते हैं, इसके लिये या तो आप स्वयं मेहनत करोगे या किसी माली से करवायेगे लेकिन फूलो के खिलने पर जब आप देखेगी, जितनी मेहतन आपने की उससे आपको सफलता कम मिली है तो आप असंतुष्ट जरूर होगी। स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा जिसे आप पढ़ा रहे हो, जब परीक्षा में अच्छे अंक नहीं लाता है, तो पढ़ने वाला बच्च्चा असंतुष्ट होता है, जो बच्चे का पढ़ाता है वह भी असंतुष्ट होता है। खेत में किसान जब फसल लगाता है, किन्तु बरसात की कमी के कारण फसल का नष्ट होना उसे दुःख जरूर देता है, किंतु यह उसे बाह्य असंतुष्टि प्रदान करता है।
(2)    आंतरिक असंतुष्टि - आतंरिक असंतुष्टि व्यक्ति को मन इच्छा पर निर्भर करती है। अच्छा भोजन प्राप्त न होने पर मन की तृप्ति न होना व्यक्ति को आन्तरिक असंतुष्टि देता है। लड़के की चाह होने और लड़की पैदा हो जाने की स्थिति भी आंतरिक असंतुष्टि देता है। काम वासना की तृप्ती की इच्छा रखने वाले व्यक्ति की इच्छा पूर्ण न होने पर भी असंतुष्टि होती है।
    इस प्रकार बाह्य एवं आन्तरिक असंतुष्टि दोनो की स्थिति में इच्छा शामिल होती है, यदि व्यक्ति इसमें जरा संतोष शामिल कर लें तो अपनी असंतुष्टि को संतुष्टि में बदलने में थोडा बहुत कामयाब हो जाता है, जो उसे मानसिक परेशानी से तो बचा सकता है।
    शरीर का स्वास्थ्य खराब होना बाह्य असंतुष्टि है, लेकिन उस स्वास्थ्य के खराब रहने से ठीक न होना आंतरिक असंतुष्टि है।
जिम्मेदारी - जिम्मेदारी से अहसास शब्द जुड़ा है। जिस व्यक्ति पर जिम्मेदारी होती है, उसे अपने सुख दुःख का अहसास जरूर होता है। जिम्मेदारी व्यक्ति या तो स्वयं ही लेता है या जिम्मेदारी अन्य लोगों द्वारा दे दी जाती है।
    जिम्मेदारी का सम्बन्ध स्वयं से होता है। यदि हम ऐसा कार्य कर रहे है जिसमें या तो अपने स्वयं के लाभ की बात हो या अन्य लोगों के हित की बात हो जिम्मेदारी तो रहती है।
    जिम्मेदारी को व्यक्ति या तो अपना कर्तव्य समझता है या उसे अपने ऊपर बोझ, यही कारण है कि व्यक्ति मानसिकता के रोग से ग्रसित हो जाता है। व्यक्ति को यह मान लेना चाहिये की जब तक व्यक्ति का जीवन है तो जिम्मेदारी साथ रहेगी यह तो कर्तव्य है, जिसे जीवनभर निभाना पड़ेगा जिस दिन व्यक्ति जिम्मेदारी को बोझ समझेगा उस दिन से वह भारी बोझ से दबा महसूस करेगा।
    जिम्मेदारी दो व्यक्तियों के लिये शायद ज्यादा मायने की नहीं है - एक तो पागल व्यक्ति  तथा दूसरा असमर्थ व्यक्ति।
    पागल व्यक्ति - जो मूढ़ विक्षिप्त हो उसे अपने जीवन के अतिरिक्त अन्य किसी जिम्मेदारी का अहसास नहीं होता और अपने जीवन के बारे में भी पूरी तरह उसे ज्ञान नहीं होता। इसके अतिरिक्त पागल वे भी हो सकते है, जो स्वयं को चालाक समझते है, लेकिन अपनी जिम्मेदारी दूसरो पर डाल देते है और अपना कार्य निकाल लेते है, लेकिन सही मायने में समझदारी होने के बावजूद वे दूसरे तरह के पागल समझे जा सकते है।
असमर्थ व्यक्ति - अपने शरीर के अंगो से असमर्थ व्यक्ति को जिम्मेदारी का अहसास तो होता है पर वे खूद दूसरो के सहारे पर निर्भर होते है, जिस कारण जिम्मेदारी उठाने में वे असमर्थ होते है।
    जिम्मेदारी व्यक्ति केवल आदमी पर ही नहीं औरत पर भी लागू होती है।
    आदमी पर जिस प्रकार जिम्मेदारी के रूप में एक बेटा, भाई, पिता, मित्र, सहयोगी की जिम्मेदारी निभानी होती है, उसी प्रकार औरत को एक बेटी, बहन, माता, सहेली, सहयोगी की जिम्मेदारी निभानी होती है, ये तो रिश्ते की जिम्मेदारी की बात है, इसके अतिरिक्त अन्य जिम्मेदारी होती है। अपने समाज, धर्म, राष्ट्र, की जिम्मेदारी इसके अतिरिक्त विश्व के प्रति भी हमारी जिम्मेदारी है।
    जिम्मेदारी को दो भागों मंे बाँटा जा सकता है। एक स्वयं के प्रति जिम्मेदारी, दूसरी है दूसरो के लिये जिम्मेदारी।
1.    स्वयं के प्रति जिम्मेदारी - व्यक्ति की जब छोटी आयु होती है, तब तो उसकी स्वयं के प्रति जिम्मेदारी नहीं होती, लेकिन जब उनकी उम्र समझदारी की होती है तो उस पर छोटी छोटी जिम्मेदारी होती है। उम्र के बढ़ने के साथ साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है। स्वयं के लिये पढ़ने की जिम्मेदारी घर के छोटे मोटे कार्यो को करने की जिम्मेदारी। स्वयं के प्रति जिम्मेदारी हमें स्वयं क्या बनना है, उसके लिये, नियम के पालन के साथ पूर्ण रूप से जिम्मेदार होना आवश्यक है। यह अलग बात है कि परिस्थितियां ही व्यक्ति को जिम्मेदारी से विमुक्त कर देती है, लेकिन बंधन से बांध तो नहीं देती।
2.    दूसरों के प्रति जिम्मेदारी - व्यक्ति जब वयस्क हो जाता है तब उस पर अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी होती है, माता पिता के प्रति जिम्मेदारी घर की आवश्यकताओं की जिम्मेदारी। व्यक्ति का विवाह होने पर पत्नी, रिश्तेदार, माता-पिता, भाई-बहन के प्रति जिम्मेदारी बढ़ती हैं, बच्चे हो जाने पर बच्चों के प्रति जिम्मेदारी। बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी उनके स्वास्थ्य की जिम्मेदारी। इस प्रकर व्यक्ति दूसरो के प्रति जिम्मेदारी में पारिवारिक जिम्मेदारी निभाते है। दूसरी जिम्मेदारी सामाजिक जिम्मेदारी होती है - जिसमें मित्र, रिश्तेदार, समाज के लोग, मोहल्ले के लोग, व्यक्ति से सम्बन्धित हितैषी, शुभचिंतक आते है। जिसमें सम्मिलित व्यक्ति के यहां या सार्वजनिक स्थल पर होने वाले कार्यक्रम जैसे - विवाह, त्यौहार, सभा, इत्यादि में शामिल होकर अपने सामाजिक उपस्थिति दर्ज करता है, इसके अतिरिक्त किसी के दुःख में जैसे - घटना होने, मृत्यु होने पर शामिल होता है।
3.    दूसरों के प्रति जिम्मेदारी में तीसरी जिम्मेदारी होती है, राज्य के प्रति जिम्मेदारी तथा देश के प्रति जिम्मेदारी। देश के प्रति जिम्मेदारी में व्यक्ति यदि नागरिकता के नियमों का पालन करें तथा जागरूक नागरिक बना रहें और आवश्यकता पड़ने पर राज्य की तथा देश की सेवा के लिये तत्पर रहे, यही देश के प्रति एवं राज्य के प्रति जिम्मेदारी है। जो व्यक्ति नियमों का पालन करता है तथा जागरूक रहता है वह राज्य व देश के प्रति जिम्मेदार स्वयमेव होता है।
    व्यक्ति को जिम्मेदारी का अहसास होना जरूरी है, तब ही वह अपने भावना अपने मन से जिम्मेदारी के भार को उठाता है, यदि व्यक्ति को बिना अहसास के जिम्मेदारी उठाने पड़े तो उस पर लादी गई जिम्मेदारी उसे बोझ प्रतीत होगी। जब तक व्यक्ति में कार्य करने की क्षमता होती है, तब तक जिम्मेदारी साथ रहती है।
जलन - जलन की उत्पत्ति के कई प्रकार है, जिनमें क्रोध, बैर, घृणा, तिरस्कार मुख्य है।
    क्रोध को या तो व्यक्ति अंदर ही अंदर दबाकर रखता है या एकदम से क्रोध आने पर  क्रोधित होकर शांत हो जाता है, लेकिन जिस पर हम क्रोध कर रहे होते है, उसे क्रोध करने वाले व्यक्ति से बैर हो जाता है, अर्थात उसके प्रति मन ही मन घृणा भर जाती है, फिर वह व्यक्ति उस क्रोधी व्यक्ति का उसी समय तिरस्कार कर देता है, या तिरस्कार करने का मौका देखता है।
    जो व्यक्ति क्रोध को दबा लेता है, उसके लिये यदि बार बार उस व्यक्ति पर क्रोध की स्थिति उत्पन्न हो जाने पर अत्यधिक जलन की भावना भर देती है, जो क्रोध करने वाले व्यक्ति के लिये बुराई का कार्य करती है।
    व्यक्ति जगह जगह चुगली, बुराई करता है, क्योंकि उसके मन में घृणा भरी होती है, लेकिन यह परिस्थिति दोनों व्यक्ति के लिये खराब बन जाती है, क्योंकि बुराई, चुगली जब उस क्रोधी व्यक्ति के पास पहुंचती है तो वह भी उसी तरह जलन का शिकार हो जाता है, और उसके मन में क्रोध उत्पन्न होता रहता है, वह भी उस व्यक्ति के प्रति वही रूख अपनाता है।
    यहां जलन से तात्पर्य यह है कि क्रोध से बैर, घृणा, तिरस्कार पैदा हुए किंतु वह और अधिक भयानक रूप धारण कर लेता है।
    दूसरी स्थिति - जलन की दूसरी स्थिति जिसे व्यक्ति स्वयं पैदा कर लेता है जैसे - स्वयं की अत्यधिक बढ़ाई करना एवं अपने हित की वस्तु या अपने हितेषियों की अत्यधिक बढ़ाई करना। यह सामने उपस्थित व्यक्ति के मन में जलन की भावना पैदा करता है। कभी कभी व्यक्ति सोचता है, इससे स्वयं का तथा सामने वाले व्यक्ति का मनोरंजन होगा, लेकिन यह सोच अक्सर गलत होती है। हाॅ, अपने कार्य व हितैशी की आवश्यक जानकारी देना बढ़ाई करना नहीं माना जा सकता लेकिन अत्यधिक प्रशंसा बढ़ाई करना होगा। आवश्यक जानकारी देना उचित है, किंतु सामने वाले की प्रशंसा न करते हुये स्वयं की प्रशंसा स्वयं के मुख से तथा अपने हित की वस्तु या हितेषियों की प्रशंसा लगातार करते रहने से व्यक्ति ऊबने लगता है, तथा मन ही मन जलन का शिकार हो जाता है।
    जलन की तीसरी स्थिति है - अहंकार, अक्सर व्यक्ति के पास यदि कोई खास वस्तू हो या कलां में निपुण हो तो उसे उसका अहंकार हो जाता है और वह सामने वाले व्यक्ति को हिन भावना से देखता है, या उसे दर्शाता है कि यह तुम्हारे लिये कठिन कार्य होगा या तुमसे हो नहीं सकता जो मैंने प्राप्त किया उसे तुम प्राप्त नहीं कर सकते। यह भावना भी जलन का शिकार बनाती है। यह अंहकार व्यक्ति को जलाता है कि मैं श्रेष्ठ हूॅ या मेरी वस्तु श्रेष्ठ है, या मेरे हितेषी श्रेष्ठ हैं, अर्थात् अंहकार जलाता है, जलन पैदा करवाता है। 
    जलन की चैथी स्थिति है - स्वयं ही जलन पैदाकर लेना, दूसरों की खुशी देखकर व्यक्ति के मन में जलन की भावना पैदा होती है, और मन ही मन दूसरों के खुशी के प्रति जलित होता रहता है। खुशी जो कि दूसरो के द्वारा या तो स्वयं अर्जित की गई होती है या वह व्यक्ति परिस्थितियों से जुझते हुये स्वयं खुशी अर्जित करता है, लेकिन इस खुशी में वह स्वयं भी शामिल हो सकता है लेकिन इसके विपरीत सामने वाला व्यक्ति जलित होता है, जितनी अपने स्वयं द्वारा या परिस्थिति द्वारा सुख मिला या प्राप्त किया उसी में संतुष्टि को शामिल कर लेना जलन से मुक्ति का उपाय हो सकता है।
    व्यक्ति अपने आप में अक्सर परिवर्तन तब करता है, जब सामने उपस्थित दृश्य के अच्छे गुणो को देखता है या व्यक्ति के रहन-सहन, ढंग के बाहरी तत्वो को देखकर आकर्षित होता है, उसके मालिकाने चल अचल संपत्ति की शानौ शौकत को देखकर जलित होता है, अर्थात् स्वयं मन ही मन अपने पास उन सब चीजों की उपस्थित न होने के दुःख के कारण जलित होता है।
    जलन की उत्पत्ति को रोकने के लिये संतुष्टि व धैर्य शामिल करने पर जलन की स्थिति से मुकाबला किया जा सकता है, धैर्य रखने से तात्पर्य यह है कि या तो व्यक्ति स्वयं की मेहनत से वस्तु अपने लिये उपलब्ध कर लेगा या उसकी आवश्यकताओं से समझौता कर लेगा जो कि धैर्य की परिभाषा व्यक्त करेगा, अर्थात व्यक्ति को धैर्य व संतुष्टि रखना आवश्यक होगा।
निंदा - निंदा की दो क्रियाये है, एक जो कि दूसरो पर लागू होती है और दूसरी हम पर। जब  हम दूसरो की निंदा करते है वह दो प्रकार की सोच होती है, एक तो दूसरो के चरित्र को नुकशान पहूंचा दूसरा जिस की हम निंदा करते है, उमसें हमें आनंद प्राप्त होना।
    निंदा जो हम पर लागू होती है उसकी प्रतिक्रिया यह होती है, हम अक्सर निंदा को स्वीकार नहीं पाते, क्योंकि हम स्वयं की निंदा पसंद नहीं करते। हम चाहते है कि हम श्रेष्ठ बने रहे। इस दूनिया में जितने भी महापुरूष, महान व्यक्ति, मानवीय भगवान पैदा हुये हैं, उन सब की किसी न किसी व्यक्ति द्वारा निंदा की गई, बिना निंदा के कोई रह नही सका है। इसी प्रकार इन्ही मानवीय भगवान, महापुरूष, महान व्यक्ति द्वारा भी निंदा की गई है, उन्होंने  अक्सर मनुष्य के बुरे गुणों की निंदा की है। अच्छे गुणो के मानवीय शरीर में विकसित करने की बात की है।
    निंदा की पहली क्रिया जो दूसरो पर होती है, जिससे कुछ व्यक्ति और भी क्रोधित हो जाते है, क्योंकि वह निंदा को स्वीकारते नहीं। कुछ व्यक्ति निंदा को स्वीकार कर अपनी बुराई को दूर करने की कोशिश करते है, अर्थात यह निंदा की पहली क्रिया है जो दूसरो पर होती है।
    निदंा की दूसरी क्रिया हम पर होती है, जब हम किसी व्यक्ति की निंदा करते है, तो हम देखते है कि उसकी क्रिया हम पर भी होती है हम या तो निदंक बन जाते है अर्थात निंदा करने के आदि होना। निंदा में हम खुशी, सूख, आनंद ढूढ़ते है। कुछ व्यक्ति में निंदा करने पर बदलाव भी हो जाता है, क्योंकि उनके द्वारा दूसरे व्यक्ति की निंदा करने से जब दूसरे व्यक्ति को नुकशान, हानि होने से व्यक्ति विचार करता है कि यह उसके द्वारा की गई बड़ी गलती है, तो वह अपने द्वारा किये गये निंदा और उससे होने वाली हानि या नुकशान से आहत दुःखी हो जाता है, और वह अपने आप में बदलाव करता है।
    निंदा के तत्व में सर्वप्रथम जलन, भावना (बदले की भावना) क्रोध, तृष्णा शामिल है। व्यक्ति के द्वारा दूसरे व्यक्ति के सुख को देखकर जलन होती है, जलन होने के कारण वह अपने अंदर ही अंदर हीन भावना को रोके रहता है, जब ऐसा व्यक्ति उसे मिलता है जो उसी के तरह जलनयुक्त व्यक्ति  होता है उससे वह दूसरे व्यक्ति की भरपूर निंदा करता है। और ऐसे व्यक्ति बहुतायत में मिल जाते है, क्योंकि हर व्यक्ति किसी न किसी हीन भावना का शिकार होता है, बहुत ही कम व्यक्ति होते है जो हर परिस्थिति को संतुष्टि के रूप में लेते है तथा अन्य लोगो का निंदा न करने के प्रति जागरूक करते है। जलन की स्थिति वह भी होती है जब कोई व्यक्ति बुरा है और उसकी बुराई के बारे में कहना भी एक निंदा है। कुछ व्यक्ति की परिस्थितियंां ऐसी होती है कि वे रोग से ग्रस्त होते है, उसके प्रति भी बुराई करना निंदा है।
    कभी कभी व्यक्ति-व्यक्ति का आपस में बैर हो जाता है तो इसी बैर भावना में रहते हुये उसके प्रति हीन भावना पैदा कर लेना इसके पश्चात धीरे धीरे बदले की भावना पैदा हो जाती है। इसी बदले की भावना से वह जगह जगह लोगों के पास निंदा करने लगता है।
    स्वभाविक है, बैर पैदा होने के पूर्व व्यक्ति के प्रति क्रोध उत्पन्न होगा और क्रोध उत्पन्न होते ही मनुष्य शरीर में बुराई की सारी भावना में क्रोधवश ही पैदा हो जाती है। क्रोध पैदा होने के साथ निंदा सर्वप्रथम पैदा होती है।
    तृष्णा वह शब्द है, जो मनुष्य में इच्छा की भूख जो आग की तरह होती है और तृष्णा ही वह है जो इच्छा की आग पैदा करती है, जिसे संतुष्टि, शांति व धैर्य से शांत किया जा सकता है। किसी व्यक्ति के पास में अच्छी वस्तु उपलब्ध होने पर उसे प्राप्त करने की इच्छा और वह इच्छा पूर्ण न होने पर तृष्णा पैदा होती है। वह वस्तु बार बार सामने आने पर या दिखने पर तृष्णा बढ़ती जाती है और वह तृष्णा शांत न होने पर व्यक्ति जब कुछ नहीं कर पाने की स्थिति बनती है तो वह निंदा करने लगता है, उस व्यक्ति की, उस वस्तु की।
    निंदा करने वाले व्यक्ति यदि दूसरो से जलन की भावना न रखे बल्कि निंदा करना ही  हो तो बुराई की निंदा करे। बुरे व्यक्ति की बुराई करने की अपेक्षा उसमें समाई बुराई के तत्वों की निंदा करे। इसी प्रकार की निंदा हमें अच्छे व्यक्तित्व प्रदान करेगी और बुरे व्यक्ति को         सुधारने में सहयोग होगा, क्योंकि निंदा जब व्यक्ति की कि जायें उसके कार्यो की की जावें तो यह निंदा व्यक्ति व्यक्ति के मन में और अधिक निंदा करने का अवसर देती है, और निंदा करने को बढ़ावा देती है।
    निंदा करने वाला व्यक्ति चुगली जरूर करता है, चुगली करने से तात्पर्य है कि वह झूठी बातें, बुराई की बातें, अन्य व्यक्तियों को बताता है। चुगली करना निंदा के तत्व में शामिल है।
शक - शक की उत्पत्ति अधिक नकारात्मक विचारावान होने से होती है, अर्थात नकारात्मक विचार व्यक्ति के मन में शक की भावना पैदा करते है।
    शक के दो तत्व है, एक वहम दूसरा है जिज्ञासा। वहम व्यक्ति को कुछ होने की संभावना दर्शाता है, कुछ होने से तात्पर्य है, किसी व्यक्ति के मन में विचार आया कि मेरा एक सेवक है, जो काफी ईमानदार हैं, किंतु शक पैदा होने पर वहीं ईमानदार व्यक्ति के प्रति नकारात्मक विचार आता है कि कहीं वह चोरी तो नहीं करता। इसी सोच को बार बार विचारण में लाने से ओर भी अधिक शक को बल मिलता है। अक्सर पति पत्नी एक दूसरे पर शक की भावना रखते है, यह बात सभी पति पत्नीयों पर लागू नहीं होती यह उन पर लागू होते है जो शक्की किस्म के होते है। दोस्त-दोस्त पर शक करता है। प्रेमी-प्रेमिका पर सच्चे प्रेम के होने न होने का शक करता है अर्थात शक दो व्यक्ति के बीच होता है इनमें किसी बात का होना अर्थात कुछ बात होना दर्शाता है। 
    कभी कभी व्यक्ति को लगता है कि मैं ज्यादा बीमार हूँ और शायद अब मेरा बचना मुश्किल है। कभी कभी रात को अपनी परछाईयों से डरना, पत्तो के हिलने से हवा के चलने से भूत-प्रेत का वहम करना। अन्जान रास्ते से गुजरने में अज्ञात व्यक्ति द्वारा मर दिये जाने का विचार करना, पेड़ पर लटकी डाली को देखकर प्रेत का होना समझना, झांड पत्तियों में सांप, बिच्छू का होना समझना, रास्ते में चैराहो पर तंत्र मंत्र की हुई वस्तू को पड़ा देखकर यह तंत्र मंत्र स्वयं पर लगने का विचार करना, ऐसे अनगिनत वहम है, जो व्यक्ति के अंदर शक पैदा करते है, और शक की भावना बढ़ाते है।
    शक का दूसरा तत्व है - जिज्ञासा को यद्यपि शक की श्रेणी में नहीं लिया जा सकता किन्तु किसी के बारे में कोई न कोई विचार बनाना चाहे वह जानने के लिये हो या वहम के रूप में हो विचार के रूप में शक तो होगा कि यह हो सकता है या नहीं हो सकता है यहीं तत्व  जिज्ञासा को शक के तत्व में शामिल करता है। किसी चीज के बारे में जानना जिज्ञासा है, जिज्ञासा सही एवं गलत के बारे में विचार बनाना है। अक्सर वैज्ञानिक लोग किसी वस्तू का आविष्कार करते है तो वे इस बात पर विचार करते है कि ऐसा करने पर यह ऐसा होगा, वैसा करने पर शायद वैसा होगा अर्थात जिज्ञासा के साथ कार्य करते है अर्थात उनके द्वारा शक की विचारणा की जाती है।
    जैसे जैसे समय बदलता गया व्यक्ति का व्यक्ति पर से विश्वास उठ गया, इसका कारण यह था कि व्यक्ति जिस पर भरोसा करता है वह भरोसे पर खरा नहीं उतरता वह धोखा देता है और बार बार लोगों से धोखा खाने के कारण व्यक्ति अन्य व्यक्तियों पर विश्वास कम करता है और उन पर शक करता है कि यह व्यक्ति कार्य कर सकेगा या नहीं।
    ये बात अलग है कि शक करने से कई लोगों के घर बर्बाद हुये है, लेकिन इंसान इस आदत से मजबूर है, क्योंकि इस समय व्यक्ति के पास समय कम है और समय के साथ यदि वह नहीं चला तो वह इस भागती जिंदगी से पिछड जायेगा।
    यदि व्यक्ति दूसरो पर शक करना छोड़ भी दे तो अपने आप वह शक से बच नहीं पायेगा, क्योंकि अपने जीवन में व्यक्ति कितना ही सफल हो जाये या कितनी बार भी असफल हो जाये वह जब तक जीवन को संतुष्टि से नहीं जीता तब तक शक उसके साथ रहेगा। शक तभी पीछा छोड़ेगा जब व्यक्ति इस दूनिया को छोड़ेगा।
लालच - अधिक से अधिक प्राप्त करने की भावना लालच है। लालच में सही गलत की कोई संभावना नहीं रहती बस व्यक्ति के मन में अत्यधिक प्राप्त कर लेने की इच्छा रहती है। 
    लालच की उत्पत्ति व्यक्ति की आवश्यकताये बढ़ जाने या स्वयं द्वारा आवश्यकताये बढ़ा दिये जाने के कारण होती है।
    लालच की दो परिस्थिति होती है, एक वह परिस्थिति जब व्यक्ति की जरूरते ज्यादा होना, दूसरा है अनगिनत इच्छायें होना।
    जरूरते ज्यादा होना - व्यक्ति जब एक छोटा बच्चा होता है, तब उसकी जरूरते कम होती है, नहीं के बराबर होती है, वह केवल खाने की आवश्यकता तक सीमित होती है, इसके बाद जब वह थोड़ा बड़ा होता है तो अन्य बच्चो को देखकर उनके तरह अच्छे कपडे़, मनोरंजन की वस्तुयें की आवश्यकतायें बढ़ जाती है। इसके बाद जब वह वयस्कता की आयु तक पहूंचता है तो उसे कपड़े, मनोरंजन की वस्तूओं के अतिरिक्त खर्च करने के लिये रूपयों की आवश्यकताये बढ़ जाती है, इसकी पूर्ति नहीं होने के कारण वह अपने मन को हमेशा असंतुष्ट पाता है, और यह असंतुष्टि दूर करने के लिये वह बुरी भावनाये, आदत पैदा करता है, जिसमें लालच भी पैदा होता है। विवाह होने के बाद परिवार की आवश्यकताओं का बोझ भी उस व्यक्ति पर पड़ता है, जिस कारण पहले से असंतुष्ट मन में सक्षम लोगों के प्रति घृणा भाव भी पैदा होता है, वह बुराई के तत्वों को अपनाने लगता है। कुछ समय पश्चात बच्चो का भार भी व्यक्ति पर आ जाता है, जिस कारण से व्यक्ति पर और अधिक आवश्यकतायें बढ़ जाती है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति न होने के कारण ही लालच की भावना बढ़ जाती है। ऐसे में व्यक्ति जब किसी अन्य व्यक्ति का कार्य करता है तो उसमें कुछ और अधिक प्राप्त करने की ख्वाईश रखता है। इसी कारण व्यक्ति उसमें झूठ, चोरी, चालाकी, मक्कारी शामिल कर लेता है। व्यक्ति जब इस पारिवारिक जीवन में शामिल है तो उसकी आवश्यकता कम नहीं होती है, बढ़ती रहती है।
    अनगिनत इच्छाये - व्यक्ति की इच्छाये अनगिनत होती है, इन इच्छाओ में व्यक्ति की इच्छा जमीन पर से पहूँच आसमां तक होती है। व्यक्ति की इच्छायें इतनी विशाल होती है कि जिसकी संपूर्ण पूर्ति करना मुश्किल है। वही इच्छाये पूरी होती है, जिसे उस व्यक्ति को पूर्ण करने की क्षमता हो, अपनी क्षमता से अधिक वही इच्छायें पूरी होती है, जिसमें निरंतर प्रयासरत हो इसके बाद वह इच्दायें पूर्ण होती है, जिसमें उस व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य लोगों का सहयोग हो, लेकिन इसके अतिरिक्त अन्य इच्छाये जिसमें व्यक्ति की क्षमता समाप्त हो जाती है और मशीनों की क्षमता के सहयोग से इच्छायें पूर्ण होती है। (जिन इच्छाओं को मनुष्य अपनी क्षमता से पुरी नहीं कर पाता जिसके लिये मनुष्य बल से भी अधिक बल की आवश्यकता होती है उस हेतू मशीनी उपयोग) लेकिन उसमें भी व्यक्त् िका कही न कहीं हाथ होता है बिना व्यक्ति के मशीन भी कार्य नहीं करती, इसीलिये व्यक्ति की जहां तक क्षमता है, वहां तक की इच्छाये पूर्ण होती है। आसमां के तारे तोड़ना इंसान के बस की बात नहीं है। इन इच्छाओ के पूरी न होने के कारण या इच्छाओं की पूर्ति के लिये आवश्यकतायें सीमित होने के कारण लालच बढ़ना स्वभाविक है।
    व्यक्ति कभी कभी अपनी आवश्यकताओं से संतुष्ट होता है, फिर भी वह चाहता है कि उसके पास भोग विलास की इतनी वस्तुयें इकट्ठा हो जायें कि मैं नहीं रहूँ तो मेरी आने वाली पीढ़ि के लिये यह भोग विलास की वस्तुयें काम आयेगी। इसी लालच में वह और अधिक भोग विलास की वस्तुयें इकट्ठा कर लेता है। जिससे अन्य लोगों कि आवश्यकताओं का नुकशान होता है, उनकी आवश्यकताओं की वस्तुओं का संग्रह अन्य व्यक्ति कर लेता है और दूसरेां की इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती है। यही कारण है कि जिन लोगों आवश्यकताओं की संतुष्टि हो जाने के पश्चात् भी उनका लालच समाप्त नहीं होता और      जिनकी आवश्यकताओं की पूर्ति (संतुष्टि) नहीं हुई वे आवश्यकताओं की पूर्ति न होने के कारण लालची हो गये अर्थात दोनो स्थिति में लालच की भावना पैदा हो रही है।
चापलूसी - किसी व्यक्ति द्वारा अपने कार्य को किये जाने के लिये मीठे शब्दो का उपयोग करना, हाथ जोड़कर काम कराना, कार्य के प्रति गिडगिडाना, जिस व्यक्ति के द्वारा कार्य की प्रगति आसान हो उसकी प्रशंसा करना, बढ़ाई करना, उस व्यक्ति से जुडे़ हितैषी, परिवार, शुभचिंतक की प्रशंसा करना, बढ़ाई करना, उस व्यक्ति से जुड़े दुश्मन की निंदा करना, बुराई करना इसके अतिरिक्त प्रेमपूर्वक लालच देना चापलूसी है। चापलूसी की सीधी परिभाषा अपना मतलब निकालने के लिये उस व्यक्ति के पक्ष की बात करना।
    व्यक्ति के कुछ कार्य ऐसे होते है जो स्वयं के द्वारा नहीं हो पाते ना ही उसके द्वारा         अधिकृत सेवक द्वारा होते है। उससे जुडे़ पदाधिकारी के द्वारा स्वीकृति प्रदान करने पर ही वह कार्य संभव होता है, यही स्वीकृति प्राप्त करने के लिये तथा रूके हुये कार्य पूर्ण करने के लिये व्यक्ति चापलूसी की राह अपनाता है, इसका कारण यह भी हो सकता है कि व्यक्ति को अपने कार्य जल्दी कराना होता है या उस कार्य से उसका अच्छा लाभ जूड़ा होता है।
    अक्सर ऐसे व्यक्ति जो चापलूसी से दूर रहते है, और वे इसे नापंसद करते है, वे समय की गति से काफी पीछे होते है, क्योंकि ना ही उन्हें हाथ जोड़कर काम कराना आता है ना ही रिश्वत देकर काम करना आता है। उन्हें उस पदाधिकारी व्यक्ति से स्वीकृति प्राप्त करने में काफी विलम्ब हो जाता है या स्वीकृति प्राप्त होने तक जो कार्य किया जाना होता है, वह कार्य का समय समाप्त हो चुका होता है।
    दूसरी स्थिति में मतदान होने के पूर्व की स्थिति किसी राजनेता की होती है वह व्यक्ति चूनाव जीतने के लिये लोगों से चापलूसी करता है, और चूनाव जितने के पश्चात लोगो को अपने कार्य किये जाने के लिये राजनेता की चापलूसी करना पड़ती है।
    तीसरी स्थिति में परिवार के मुखिया चाहे वह पति हो या पत्नी दोनो को एक दूसरे से किसी भी प्रकार की मदद की आवश्यकता होती है, तो उसमे प्रेम के साथ चापलूसी जरूर शामिल होती है और यदि बच्चो की बात करें तो वे माॅ-बाप से किसी वस्तू की मांग की पूर्ति के लिये या अपनी बात मनाने के लिये चापलूसी करते है, लेकिन यह चापलूसी में परिवार का प्यार शामिल होता है। यह उचित भी है। लेकिन यहां यह बात इसलिये कहीं गई है कि परिवार में अत्यधिक चापलूसी से इसी बात की आदत पड़ जाती है, जो कि बूरे तत्वों में शामिल है।
    जो व्यक्ति चापलुस होता है वह दूसरो की चुगली करने (झूठी बाते, बुराई की बाते) से भी नहीं चूकते।
    चापलुसी करना किसी को पसंद नहीं, किंतु यह चापलुसी कार्य के न हो पाने की संभावना को दूर करने के लिये व्यक्ति तुरंत अपनाता है। कोई व्यक्ति से नुकशान, गलती, हानि हो जाने पर उसकी भरपाई नहीं कर पाने अथवा भरपाई से बचने के लिये व्यक्ति चापलुसी करता है।
    अविश्वास - अविश्वास की उत्पत्ति होती है संकोच से। व्यक्ति का अपने कार्य सफलता के प्रति संकोच रहता है कि उसका कार्य सफल होगा या नहीं, यहीं संकोच व्यक्ति के मन में अविश्वास पैदा करता है।
    अपने स्वयं के द्वारा पूर्ण ईमादारी, दृढ़निश्चिय और विश्वास के साथ किये गये कार्य के सफलता मिलने की आशा बहुत ज्यादा होती है।
    दुनिया में व्यक्ति अविश्वासी व्यक्ति के बजाये विश्वासी व्यक्ति को क्यों चूनते हैं, इसका कारण यह है कि वे अपने कार्य की सफलता के प्रति आशावान रहते है, न की आश्वस्त। वे चाहते है कि उनका कार्य विश्वास के साथ पूर्ण हो, इसीलिये वे विश्वस्त व्यक्ति पर भरोसा करते है।
    व्यक्ति के जीवन में दो बाते हमेशा होती है, एक हार और दूसरी जीत जो व्यक्ति के मन में यदि अविश्वास भरा है, वह व्यक्ति जीत की आश कैसे कर सकता है। यदि वह मानता है कि वह हार जायेगा तो वह पहले से ही हारा है, यदि वह जीत के प्रति यह भावना रखता है कि मैं शायद जीत सकता हूॅ तो पूर्ण विश्वास से नहीं कह पा रहा होता है, इसमें भी उसके अविश्वास की बात होती है।
    कभी कभी ऐसा भी होता है, व्यक्ति पूर्ण ईमानदारी, दृढ़निश्चय से कार्य करता है, इसके बावजूद उसे सफलता नहीं मिलती। सफलता नहीं मिलने का कारण यह कतई नहीं कि उसे अपने आप पर विश्वास नही था। इसका कारण यह होता है कि व्यक्तियों में कोई एक व्यक्ति प्रथम होता है, कोई द्वितीय लेकिन कोई न कोई व्यक्ति प्रथम होता है, जो द्वितीय होता है क्या उसने अपनी पूर्ण शारीरिक एवं मानसिक शक्ति का उपयोग नहीं किया होगा। ऐसा हो नहीं सकता कुछ ही अंश की शारीरिक एवं मानसिक क्षमता में कमी के कारण जीत हार में बदल जाती है अर्थात जीत उसी की होती है, जिसकी क्षमता द्वितीय आने वाले व्यक्ति से अधिक हो।
    अविश्वास के कारण भी कई है, जिसे व्यक्ति का व्यक्ति से विश्वास उठ जाना शामिल है, क्योंकि भिन्न-2 व्यक्ति से बार-बार धोखा खाने के कारण व्यक्ति के मन में अन्य व्यक्तियों पर से विश्वास उठ जाता है और वह अविश्वासी बन जाता है। कभी कभी स्वयं को बार बार असफलता पाते देख खूद पर से भी वह अपना विश्वास खो देता है, इसी कारण वह अविश्वासी हो जाता है।
    अविश्वास व्यक्ति को सफलता से वंचित कर सकता है, और अत्यधिक विश्वास व्यक्ति को धोखा दे सकता है, किन्तु धोखा खा लेेने पर अविश्वासी बन जाना उचित नहीं है। सतर्क होकर, सोच-विचार के व्यक्ति के प्रति विश्वास - अविश्वास किया जा सकता है, किन्तु जब परिस्थिति ऐसी हो की विश्वास करने के शिवा अन्य कोई उपाय नहीं है, तब यह विचारणीय हो सकता है, लेकिन स्वयं पर विश्वास-अविश्वास की बात हो और परिस्थिति ऐसी हो की विश्वास करने के शिवा कोई उपाय नहीं  है तो पूरी आशा के साथ विश्वास करें, क्योंकि खूद पर विश्वास स्वयं एक जीत है।
    अविश्वास की उत्पत्ति संकोच से होती है और संकोच को दूर करने के लिये मन में आत्मविश्वास का होना जरूरी है। आत्मविखस से यहां तात्पर्य है कि मन में विश्वास हो कि यदि कार्य होगा तो सही कार्य नही होगा तो दूसरा प्रयत्न किया जावेगा और अधिक प्रयास के साथ तभी संकोच दूर हो सकता है और विश्वास पैदा होगा।
    वासना - वासना का मन से बहुत गहरा जुड़ाव होता है - मन की आवश्यकता में संतुष्टि शामिल न होने की स्थिति में मन भटकता है, वह चित्त में नहीं होता है, मन की इच्छा पूरी करने के लिये इंसान को कितनी ही परेशानियाँ उठानी पड़ती है, यह जानते हुये भी मन सदा भटकता रहता है। मन की चित्त अवस्था में न होना, किसी वस्तू की चाह रखना एक वासना है एक भूख है। 
    वासना के दो प्रकार है एक शारीरिक भूख, दूसरी है मानसिक भूख।
    शारीरिक भूख - कठोर परिश्रम कर अपने शरीर को थका देना शारीरिक परिश्रम है, शारीरिक परिश्रम में अपने शरीर के अंगो द्वारा किये गये कार्य शामिल है जैसे - भारी वस्तूओं को उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना अथवा जमीन खोदना, पेड़ काटना अन्य  शारीरिक कार्य जो परिश्रम से किये जाते है। ये सभी कार्य शारीरिक परिश्रम के अंतर्गत आते है, किंतु एक वयस्क व्यक्ति की शारीरिक भूख होती है, जिसकी पूर्ति नहीं होने पर मन में वासना पैदा होती है और इसके लिये उसमें धैर्य, ठहराव नहीं है तो वह अपराध करता है और दोषी होता है।
    मानसिक भूख - मानसिक रूप से कार्य केवल आज्ञा देकर की जा सकती है अथवा मानसिक रूप से कार्य लेखन के रूप में स्वयं किया जा सकता है।
    मानसिक भूख से तात्पर्य है मन की इच्छा की पूर्ति न होने पर वह चित्तयुक्त होता है, भटकते रहता है, स्थिर नहीं रहता है, वह उसी वस्तू की मांग करता है, जो उसकी इच्छा के कारण उत्पन्न हुई होती है। मानसिक कामना के विचार आने पर भी मानसिक भूख की उत्पत्ति होती है, लेकिन यह विचार बुरी स्थिति (खराब विचार) में पहूंचाती है, इसके लिये मन की धैर्यता व शांतता होनी बहुत आवश्यक है, अन्यथा बुरे विचार के साथ बुरी प्रवृत्तिया उत्पन्न हो जाती है।
    मन का भटकाव वासना पैदा करता है, जब तक मन की स्थिरता नहीं होगी, मन का भटकाव होगा। यह ठहराव अपने आप नहीं होता, इसे व्यक्ति को स्वयं इच्छा-जागृत कर स्थिर करना होता है।
    मन में वासना का पैदा होना अत्यन्त बुरा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यदि मनुष्य में वासना पैदा नहीं होगी तो संसार में मनुष्य की उत्पत्ति का विकास होगा ही नहीं और विकास नहीं होता तो मनुष्य जीवन समाप्त हो जायेगा लेकिन मन में वासना का पैदा होना वह भी बुरे विचारों के साथ वह वासना मनुष्यत्व गुणों के लिये हानिकारक है।
    वासना शब्द को यदि इंसानी भूख में शामिल कर ले तो यह पूर्णतहः असत्य है। वासना शब्द से यह भी अर्थ है किसी कार्य के प्रति उसकी भूख हो सकती है, जैसे व्यक्ति अपने कार्य की सफलता के लिये अपनी सारी शक्ति लगा देता है, जिसका परिणाम सफलता में प्राप्त करना चाहता है, वह परिणाम की सफलता की भूख ही वासना है। यह वासना मनुष्य की कामना की भूख से भिन्न है। कार्य की सफलता के प्रति निरंतर प्रयास करते रहना भी वासना है।
    व्यक्ति के मन में यदि किसी कार्य को करने की दृढ़ संकल्पना हो यदि वह उसमें कई बार असफल हो जाता है, इसके बावजूद निरंतर कार्य की सफलता के प्रति आश्वस्त होकर उसी कार्य को करने की इच्छा रखना उस कार्य की वासना है, जो यह दर्शाती है कि सफलता प्राप्त करने की कितनी भूख है।
    कोई तपस्वी भगवान को प्रसन्न करने में लगातार प्रयासरत रहता है, इसके बाद भी वह ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर पाता, किन्तु उसका ईश्वर को पाने का दृढ़ निश्चय ही वासना ईश्वर को पा लेने की भूख हैं, यही वासना उसे निरंतर तपस्या करने के लिये प्रेरित करती है, चाहे ईश्वर का उसे साक्षात्कार हो या इसी तपस्या में लीन रहते पाँच तत्वों में शामिल हो जाये।
    वासना शब्द किसी कार्य को करने की अत्यधिक तीव्रता को कहते है, उसके लिये किसी भी परिस्थिति से गुजरने तथा लाभ हानि के विचार को नकारते हुये इच्छा के कार्य वासना का रूप है।
    किसी कार्य को करने के लिये वासना की तीव्रता उचित नहीं है, क्योंकि इसमें व्यक्ति का अपना नुकसान होता है, साथ ही दूसरों को नुकशान होता है, इसी वासना में धैर्यता का होना आवश्यक होता है जिससे हम सही गलत का निर्णय ले सकते है।
    व्यवहार - व्यक्ति का सभी व्यक्तियों के प्रति प्रेमपूर्वक स्वभाव एक अच्छे व्यवहार को दर्शाता है। अच्छा व्यवहार व्यक्ति को व्यक्ति के प्रति सम्मान की भावना बढ़ाता है, और इससे अन्य लोगो का सहयोग भी प्राप्त होता है। बुरे व्यक्ति के व्यवहार पर इसकी प्रतिक्रिया भी इसके विपरीत प्राप्त होती है। व्यवहार से तात्पर्य यह नहीं कि किसी लाभ हित की भावना से अच्छा व्यवहार दिखाया जाये, इसके पश्चात अपना कार्य पूर्ण होने के पश्चात अपने व्यवहार में बदलाव लाना व्यक्ति का स्वभाव बन जाता है।
    व्यवहार की दो प्रक्रिया है - (1) स्वयं गुणो का विकास करना (2) दूसरों के व्यवहार से प्रेरित होकर गुणों का विकास करना।
(1)    स्वयं गुणों का विकास करना - अक्सर व्यक्ति किताबे, पुस्तके पढ़ता है और उनसे व्यवहार का ज्ञान प्राप्त करता है, इसके बाद वह व्यवहार को अपने आचरण में लाता है। स्वयं कुछ व्यवहार के गुणो को धारण करता है तथा कुछ व्यवहार के गुण दूसरो से प्राप्त करता है। जब तक व्यक्ति का जीवन है तो उसके साथ परिस्थितियां जुड़ी रहती है, यह तो उसका जीवन चक्र है, यह स्वयं उस व्यक्ति पर निर्भर रहता है कि वह अपने व्यवहार के गुणों को किस रूप में ग्रहण करें।
(2)    दूसरों के व्यवहार से प्रेरित होकर गुणों का विकास करना - व्यक्ति के लिये परिस्थितयां सदैव एक जैसी नहीं रहती। कभी परिस्थिति अच्छी होती है, तो कभी परिस्थिती बुरी होती है। लेकिन जब कोई परिस्थिति थोडे़ समय तक रहती है, उसमें व्यक्ति गुण अपने स्वभाव में ले लेता है। उदाहरणार्थ - व्यक्ति देखता है कि उनके सामने जो व्यक्ति है वह मिलनसार है तथा अच्छे व्यवहार से लोग इसका सम्मान करते हैं, यह वह लम्बे समय से देखता आया है, वह भी अपने को उसी व्यवहार में ढालने की कोशिश करता है अर्थात उस गुण की तरह आचरण करने की कोशिश करता है, यदि इसके विपरीत चले तो यदि व्यक्ति लंबे समय से देखता है कि व्यक्ति का व्यवहार दूसरो के प्रति बुरा है लड़ाई-झगड़े जैसा स्वभाव है, तो वह इस व्यवहार का अपने स्वभाव में क्रोध के रूप में शामिल कर लेता है। क्रोध के कई अवगुण अपने व्यवहार में शामिल कर लेता है।
    व्यक्ति से अपने गुणो का विकास करने के लिये प्रयत्न किया जाये तो वह उन गुणो का जल्दी अपने स्वभाव में नहीं ढ़ाल पता है, किन्तु दूसरों के व्यवहार को देखते हुए वह अपने स्वभाव में गुणों का विकास जल्द ही कर लेता है, क्योंकि वह अच्छे गुण हो या बुरे अपने व्यक्तित्व में शामिल कर लेता है, ऐसे लोग दुर्लभ होते है, जो व्यवहार के गुणों को समझकर उसके अनुसार आचरण करें।
    व्यक्ति की उम्र में जैसे जैसे बढ़ोत्तरी होती है अपने आप गुणों विकसित होते है और आदमी अपने गुणों का विकास करने के साथ साथ उसे आचरण में लाता है, यह जरूर हो सकता है कि अपने गुणों का विकास वह किस प्रकार करता है।
    व्यक्ति को अच्छा व्यवहार उसे प्रगति दिलाता हैं, क्योंकि व्यक्ति के व्यवहार से उसकी कार्य कुशलता का पता चलता है। अच्छा व्यवहार लोगों का समर्थन देता है तथा लोगों में सम्मान की भावना का विकास करता है।
    अहंकार (घमंड) - अहंकार शब्द से तात्पर्य है - स्वयं को सर्वोच्च स्थिति में दर्शाना अर्थात स्वयं में मैं की भावना का विकास करना।
    व्यक्ति यदि कुछ नहीं होता है, तो भी वह अपने आस-पास उपस्थित व्यक्ति के सामने अपनी उपस्थिति बनाये रखने की कोशिश करता है। अक्सर जिस व्यक्ति के पास प्रतिभा क्षमता, माहौल को रसमय बनाने की क्षमता होती है, सभी व्यक्ति उनकी बात सुनते है और मनोरंजन करते है, इसी कारण वह व्यक्ति उपस्थित व्यक्तियों में अच्छा स्थान पाता है, इसके विपरीत कुछ व्यक्त् ि अपनी बात रखना चाहते है। किंतु समय की सारी परिस्थिति उस व्यक्ति द्वारा अपने पक्ष में कर लिये जाने के कारण वह अपनी बात नहीं कर पाते, दूसरी बात यह है कि वे दर्शक बनकर रह जाते है, इससे अहंकार की भावना पैदा होती है।
    व्यक्ति यदि तर्कसंगत और सही बाते करता है तो ठीक है, किंतु जिस विषय पर बात करनी होती है, व्यक्ति इसके अतिरिक्त जो उसका विषय नहीं है, उस पर भी बाते करने लगता है। ऐसी स्थिति में जो व्यक्ति उपस्थित लोगों से कहना चाहता है वह कह नहीं पाता है और अहंकार की भावना पैदा होती है और यह स्वभाविक है, किंतु अहंकार को अपने ऊपर हावी होने देने पर ही दूसरे व्यक्ति के प्रति जलन की भावना पैदा होती है।
    अहंकार के दो प्रकार है - (1) स्वयं को श्रेष्ठ दर्शाना (2) जलन की भावना से अहंकार पैदा होना।
(1) स्वयं को श्रेष्ठ दर्शाना - व्यक्ति अपने को हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करना चाहता है, जिस क्षेत्र में व्यक्ति होता है और उसका थोडा सा ज्ञान प्राप्त कर लेता है तो व्यक्ति अपने आपको उस कार्य में दक्ष समझ लेता है, और उसके ज्ञान से कम और या थोड़ा सा अधिक ज्ञानी व्यक्ति को अपने पास पाता है, तो वह अपने थोडे से अनुभव को अत्यंत विशाल के रूप दर्शाना प्रारंभ कर देता है, ताकि सामने उपस्थित व्यक्ति को अपनी प्रतिभा क्षमता से आकर्षित कर सके, उसके मन में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर सके।
    इसके अतिरिक्त जब भी व्यक्तियों का माहौल तैयार होता है और वह व्यक्ति वहां उपस्थित रहता है तो जिस विषय पर बात चल रही होती है उसमें वह अपने पूर्व की क्षमताओं, प्रतिभाओं, अनुभवों का उल्लेख करने लग जाता है, जिसे कुछ व्यक्ति कई बार सुन चुके होते हैं, इसी कारण उनमें जलन की भावना पैदा होती है और उन्हीं में धीरे-धीरे अहंकार पैदा होता है। यदि कभी इसका विरोध वे व्यक्ति करते है तो उनकी ज्ञान क्षमता, प्रतिभा क्षमता कम होने पर व्यक्ति अहंकार वश उनकी अवहेलना करता है, यह व्यक्ति के मन में मैं की भावना स्वयं श्रेष्ठ दर्शाने की भावना है, अर्थात अहंकार है।
    (2) जलन की भावना से अहंकार पैदा होना - मैं कि भावना जब कहीं अवहेलना होती है, वहां जलन पैदा होती है, जहां जलन पैदा होती है वहां फिर से अहंकार पैदा होता है।
    व्यक्ति जब अपनी प्रतिभा क्षमता, ज्ञान को ज्यादा दर्शाने की कोशिश करता है, इसी के कारण सामने उपस्थित व्यक्ति जब इसका विरोध करता है तो वह अपनी अवहेलना पर द्वेष भावना पैदा करता है। इसी द्वेष भावना में अहंकार का पैदा होना स्वभाविक है, क्योंकि उसके मन में मैं की भावना को प्रेम पूर्वक समझाता और अहसास दिलाता कि यह भावना उचित नहीं है।
    दूसरी स्थिति में व्यक्ति के समक्ष यदि उससे भी अधिक प्रतिभा शाली व ज्ञानी व्यक्ति उपस्थित रहता है, तब उस व्यक्ति की स्थिति उन व्यक्तियों की तरह हो जाती है, जैसे पहले वह ज्ञानी, प्रतिभाशाली व्यक्ति था और श्रोतागण उसे सुन रहे थे, अब वह व्यक्ति श्रोता है और सामने उपस्थित व्यक्ति प्रतिभाशाली व ज्ञानी। स्वभाविक है कि वह भी अपने को सबके सामने सर्वोच्च दर्शायेगा।
    तीसरी स्थिति में व्यक्ति के ‘‘मेरा’’ की भावना दर्शाया गया है जिसमें ‘‘मेरा’’ की भावना से तात्पर्य है - जो व्यक्ति की वस्तू होती है, उस पर अपना हक जताता है तथा जो वस्तू उसकी नहीं होती है उसे भी वह मेरा कहता है ऐसी कई वस्तू है, जिन्हें व्यक्ति अपने मन मस्तिष्क से सोचे तो वह मेरा की भावना से घृणा करने लग जायेगा। और यदि संपूर्ण ज्ञान दृष्टि से विचार करें तो जो मेरा कहता है, वह भी उसका स्वयं का नहीं रह जायेगा। जब तक व्यक्ति जीवित है, तब तक वह मेरा (अधिकार) दर्शा सकता है, जीवन के नहीं रहने पर मेरा (अधिकार) समाप्त हो जाता है।
    मेरा के अहंकार में व्यक्ति अपने को दूसरों से कम समझना नहीं चाहता।
    व्यक्ति के मन में अहंकार की भावना पैदा होने की पूर्व कि स्थिति कैसे आती है इस बात पर इतना ही विचार किया जा सकता है कि चापलूसी इसमे ंशामिल होती है, उदाहरण स्वरूप  - यदि किसी व्यक्ति से कहें कि आप बहुत ज्ञानवान व्यक्ति है, चाहें उसके पास ज्ञान नहीं हो तो वह व्यक्ति अपने आप पर गर्वित होगा और उसमें ‘‘मैं’’ ‘‘मेरा’’ की भावना का तेजी से विकास होगा। किसी स्त्री से कोई व्यक्ति कहें कि आप बहुत खुबसुरत है तो इसकी प्रतिक्रिया उस स्त्री में ‘‘मैं’’ ‘‘मेरा’’ की भावना के साथ होगी।
    प्रशंसा करने पर व्यक्ति गर्व का अनुभव करेगा। व्यक्ति यदि प्रशंसा के काबिल है तो प्रशंसा करना उचित है और उस व्यक्ति के द्वारा अच्छे कार्य करने का यह सर्वोच्च पुरूस्कार है और यह सही है जो प्रशंसा के योग्य है पर यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह उस प्रशंसा को किस प्रकार लेता है, कहीं वह व्यक्ति  उस प्रशंसा में अपनी अहंकारी भावना पैदा न कर लें, वह उसे प्रशंसा के रूप में ही ले तो उचित है।
    इसके विपरीत दूसरी क्रिया यह है कि यदि किसी व्यक्ति की प्रशंसा करने के बजाय उससे कहे कि आप पागल है, बेकार के आदमी है तो उसकी भावना द्वेष, जलन, क्रोध युक्त होगी, आपके प्रति घृणा उत्पन्न होगी यही कारण है कि यह सब बुरे तत्व उत्पन्न न हो इसलिये व्यक्ति दूसरो की प्रशंसा करता है और अज्ञानी व्यक्ति इससे अपने मन में ‘‘मैं’’ और ‘‘मेरा’’ की भावना पैदा कर लेता है।
    चैथी स्थिति में अहंकार दूसरो द्वारा पैदा कराया जाता है, क्योंकि उस व्यक्ति के ऊपर ‘‘मैं’’ की भावना ज्यादा होती है, वह देखता है कि सामने उपस्थित व्यक्ति की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह मेरी तरह शानौ शौकत कर सके। ना ही कभी वह इस स्थिति में आ सकेगा, उसके सामने ऐसी बात करना या वस्तुये दिखाना जिससे उसे अपने पास उस वस्ते को कभी होने का अहसास दिलाया जाता है, जो कि दूसरो द्वारा पैदा कराया गया अहंकार है। इससे व्यक्ति में या तो उस स्थिति तक पहूंचने की दृढ़सकल्पना जागती है या वहां तक नहीं पहुंचने की निराशा पैदा होती है। वह उस स्थिति तक नहीं पहुंच जाता है तो वह क्रोधी व आक्रामक हो जाता है।
    इस प्रकार की स्थितियों से बचने के लिये व्यक्ति को धैय रखना आवश्यक है, तथा ऐसे व्यक्ति जो लोगों के सामने दिखावा करते हैं, उनसे बचना चाहिये, उन्हें ऐसा मौका नहीं दे जिससे वे अपनी शानों शौकत उस व्यक्ति को दिखा सके।
    चिंता - चिंता की दो स्थितियाँ है (1) स्वयं से सम्बन्धित चिंता (2) बाहरी चिंता
(1) स्वयं से सम्बन्धित चिंता में - स्वयं के कार्यो के प्रति चिंता, परिवार के प्रति चिंता, स्वयं के भविष्य की चिंता। स्वयं से सम्बन्धित चिंता में अपनी स्वयं की सुरक्षा की चिंता होती है। अपने स्वास्थ्य के प्रति चिंता होती है, अपने से जुड़े लोगों की चिंता (स्वयं द्वारा की गई चिंता) से मतलब है।
    स्वयं के कार्यो के प्रति चिंता - व्यक्ति जो भी कार्य करता है, उससे होने वाले लाभ हानि की चिंता। अपने परिवार की सुरक्षा के लिये किये गये कार्य की सफलता की चिंता।
    परिवार के प्रति चिंता - जब व्यक्ति सामाजिक रूप से रह रहा होता है तो उसका अपना एक परिवार होता है और यदि वह सांसारिक जीवन त्याग कर बाहर सन्यासी बना होता है, तब भी उसका सन्यासी के रूप में एक परिवार होता है।
(2)    बाहरी चिंता - इससे तात्पर्य यह है कि व्यक्ति बाहरी चिंता में अपने परिवार के अतिरिक्त उससे जुडे़ अन्य सम्बन्धों की चाहे परिवार के बारे में चिंता करता है, अपने समाज, नगर, शहर, राज्य, व देश, विश्व के प्रति चिंता करता है, यह उसकी बाहरी चिंता है।
    व्यक्ति अत्यधिक चिंता करने से अवसादग्रस्त रहता है, जिससे वह सकारात्मक विचारों को अपने मन में प्रवेश से रोकता है, उसके मन में अच्छे विचार उत्पन्न होने पर भी वह उसके प्रति चिंता करता है।
    चिंता से कल्पनाओं का विकास होता है और कल्पनायें मानव मस्तिष्क पर अच्छा-बुरा प्रभाव रखती है, यदि चिंता गंभीर हो तो व्यक्ति के स्वास्थ्य पर काफी असर करती है। एक मजबूत व्यक्ति भी अत्यधिक चिंता से, कमजोर हो जाता है।
    चिंता का प्रारंभ तब होता है, जब व्यक्ति विचार करता है कि उसके कार्य की बाधाये कौन सी है और उसे किस प्रकार दूर किया जा सकता है, इसी विचारणा के बढ़ते रहने से वह विचार चिंता का रूप धारण कर लेता है। उस विचारक मन में अत्यधिक समय तक रहने से चिंता बढ़ती है। 
    चिंता का प्रारंभ बाधा से होता है, जबकि जिस कार्य को हम कर सकते है, उसमें व्यक्ति सफल हो सकता है, इसके विपरीत उसमें भी व्यक्ति अत्यधिक चिंता करता है।
    चिंता का सम्बन्ध तीनो काल से जुड़ा होता है - प्रथमतः व्यक्ति वर्तमान की चिंता करता है - जैसे व्यक्ति कार्य के प्रति चिंता करता है। समय के कम होने के प्रति चिंता करता है। समय के कम होने से व्यक्ति विचार करता है कि उसे आज कहां जाना है और क्या कार्य करना है। इस प्रकार की चिंता जो कि एक वर्तमन समय की सामान्य चिंता है किन्तु अत्यधिक चिंता अपने कार्य के सफलता के प्रति करता है कि आज उस कार्य में सफलता मिलेगी या नहीं।
    द्वितीय स्थिति में भविष्य के प्रति चिंता करता है। अक्सर यह स्थिति मंे व्यक्ति ज्यादा मानसिक रूप से अवसादग्रस्त होता है, क्योंकि भविष्य से उसका सम्बन्ध जुड़ा होता है। एक अच्छी स्थिति में होने की भावना तथा परिवार को अच्छी स्थिति में देखने की इच्छा होना। व्यक्ति यदि व्यापार करता है तो वह अपने व्यापार की सफलता तथा भविष्य की योजना के प्रति चिंतित होता है।
    ऐसे कई व्यक्ति भी होते हैं, जो कम उम्र की अवस्था से वयस्कता प्राप्त करने की उम्र के बाद तक का भी कुछ समय का सही उपयोग नहीं करते उसके बाद जब उन्हें समय के कीमत का अहसास होता है तब वह देखते है कि उन्होंने अपना काफी समय खो दिया। फिर जब वे अपने अच्छे भविष्य के प्रति कार्य की योजना बनाते है, तब वे ज्यादा चिंतित होते है। 
    इसके अतिरिक्त ऐसे कई लोग होते है, जो कार्य प्रारंभ करते है और काफी ईमानदारी, दृढ निश्चय के साथ इसके बाद भी सही गति प्राप्त नहीं कर पाते है, इससे भी वे मानसिक रूप से काफी चिंतित होते है। यहां पर इसका कारण यह है कि प्रत्येक क्षेत्र की अपनी सीमा होती है, उदाहरण के रूप में एक क्षेत्र में 1000 लोग रहते है, किंतु आवश्यक वस्तु की 10 दूकानों से कार्य चल जाता है, वहां 11वीं दूकान खूल जाने पर 10 दूकानों पर थोड़ा असर पडेगा। व्यक्ति को वहां पर अच्छा व्यवसाय करने हेतु दौड़ में शामिल होना पडेगा जो कि चिंता का कारण होगी।
    तीसरी स्थिति भूतकाल की होती है - व्यक्ति अपने द्वारा की गई गलती को मस्तिष्क में स्मरण रखता है, कई घटनाये बुरी होती है, कई घटनायें अच्छी। जिसमें अक्सर स्वयं की गलती शामिल होती है और व्यक्ति इस गलती/भूल का बार-बार स्मरण कर चिंता करता है।
    भूतकाल में की गई गलती का सुधार भविष्य में नहीं किया जा सकता केवल वर्तमान में रहकर ही किया जा सकता है, और जो अच्छा व्यक्तित्व रखता है वह ही अपनी गलती स्वीकार कर उसमें सुधार करता है, या गलती के लिये क्षमा मांगता है।
    भूतकाल में चिंता का दूसरा कारण यह भी है कि व्यक्ति जिस चीज का ज्ञान नहीं रखता है वह वर्तमान समय में करना चाहता है, किन्तु जब वह देखता है यह कार्य उसके बस की बात नहीं था तो उसे छोड़ देता है तथा भूतकाल में अपने द्वारा समय को व्यर्थ गवानें पर चिंतित होता है।
    कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते है, जो चिंता को अपने ऊपर हावी ही नहीं होने देते जिसमें स्वयं से यदि कोई गलती हो जाये तो भी दे उसकी चिंता नहीं करते ना ही वह अन्य व्यक्ति को होने वाले नुकशान की चिंता करते है। क्षमा मांगना भी उचित नहीं समझते, उन्हें वर्तमान की चिंता होती है, आज की चिंता होती है। ऐसे लोगों में नशा करने वाले या अव्यवहारिक लोग शामिल होते है, जिन्हें भूतकाल और भविष्यकाल की चिंता नहीं होती।
समझदारी - समझदारी शब्द का अर्थ है - उच्च निर्णय लेना। उच्च निर्णय के दो मायने है एक वह व्यक्ति जो लोगों के लिये अच्छी भावना रखता हो और जिसमें तर्कसंगत निर्णय लेने की क्षमता हो। दूसरा वह व्यक्ति जो अपना लाभ देखता हो दूसरो को नुकशान पहुंचाकर भी अपना हित देखता हो। प्रथम स्थिति का व्यक्ति गुणों से युक्त होता है और सही समय पर सही निर्णय लेकर सही कार्य करता है। जबकि दूसरी स्थिति में व्यक्ति अवगुण की श्रेणी में ऐसे व्यक्ति को - बेवकुफी, धोखेबाज, चालाक, अविश्वासी, मक्कार और न जाने कितने ही ऐसे शब्दों से उच्चातिर किया जा सकता है। प्रथम स्थिति में व्यक्ति का उच्च व्यक्तित्व झलकता है। यदि किसी व्यक्ति से विवाद हो जाता है दूसरे व्यक्ति द्वारा अपमान कर दिया जाता है तो ऐसी स्थिति में यदि समझदार व्यक्ति बैर रखें, लड़ाई करें, या दुश्मनी पैदा करे तो यह समझदार व्यक्ति के लिये उचित नहीं होता है। कभी कभी इस प्रकार का अपमान यदि कुछ लोगो के सामने उपस्थिति के समय हो तो उसे लगता है कि लोग कल भी उसे अपमानित हुये व्यक्ति की दृष्टि से देखेगे। यही कारण है कि एक समझदार व्यक्ति भी अपमानित होते ही उसी समय क्रोध की प्रक्रिया दर्शाता है। यदि वह उस समय अपमानित होकर भी शांत भावना, नम्र भावना, धैर्यता दर्शाये तो कुछ समय पश्चात अपमानित करने वाले व्यक्ति को भी अहसास होने लगता है कि मैं शायद गलत कर रहा हूॅ। यदि आपने दूसरों को जीतने की शक्ति पैदा कर ली है तो कुछ दिनों में वह सबके सामने माफी भी मांग सकता है। यह उच्च भावना अच्छे समझदार व्यक्ति में होती है।


नोट - महान व्यक्तियांे के जीवनियां जो कि व्यक्ति  में प्रेरणा भरती है
    कई बार की असफलता प्राप्त करने पर भी अपनी मंजिल प्राप्त करने के लिये दृढ़ निश्चियी होकर विजय प्राप्त करना, बहुत सुखद होता है।
    एक कहानी उदाहरणार्थ - 
    अब्राहम लिंकन जिनका जन्म 12 फरवरी 1809 में पूर्वी अमेरिका के केंटकी में एक गरीब परिवार में हुआ था। बचपन से उनमें कुछ बनने की इच्छा रही। बचपन भी उनका कठिन परिस्थ्तिियों से जुझते हुये बीता। उनकी उम्र जब 09 वर्ष की तो उनकी माताजी का देहान्त हो गया। बचपन की अवस्था में उन्होंने कार्य करते हुये अपनी पढ़ाई जारी रखी, किंतु एक अच्छे कार्यालय में उनकी नौकरी लगी थी, जहां से उन्हें नौकरी ईमानदारी और नेक इंसान बने रहने के कारण गवांनी पड़ी। यह निश्चित था कि वे नेकदिली छोड़ नहीं सकते थे, चाहे उन्हें नौकरी छोड़ना पड़े। इस प्रकार उनके जीवन का सफलर चलता रहा। 1832 में इलियोनिस स्टेट लेजिस्लेशन में हार हुई। 1832 के बाद उन्होंने एक वर्ष व्यापार भी किया, जिसमें 1833 में बुरी तरह घाटा हुआ।
    अब्राहम लिंकन जिस लड़की से प्यार करते थे, उससे विवाह करने वाले थे, किंतु उस लड़की की मृत्यु 1835 में हो जाने से वे गहरे मानसिक अवसाद में चले जाते है, इस मानसिक अवसाद के कारण उनका 1836 में नर्वस ब्रेक डाउन हो जाता है।
    तीन वर्ष के मानसिक अवसाद से किसी तरह वे बाहर आ पाये और उन्होंने नया जीवन आरंभ करने का विचार किया। उन्होंने 1838 में इलिओनिस हाउस स्पीकर के चुनाव में भाग लिया जहां पर भी वे पराजित हुये। 1843 में यू. एस. कांग्रेस नाॅमिनेशन की दौड़ में पराजित हुये। 1846 में उनका कांग्रेस में चयन हुआ। इसके बाद 1848 में रीनाॅमिनेशन में पराजित हुये। 
    अब्राहम लिंकन ने मानसिक अवसाद से बाहर निकलने के बाद भी लगातार असफलताओं का सामना किया और हार नहीं मानी। वे हर बार एक हार मिलने पर और मजबूत, दृढ़ संकल्पित होते गये। 1849 में लेंड आफिसर पोजिशन के लिए रिजेक्ट कर दिए गए। 1854 में यू एस सीनेट की दौड़ में पराजित हो गये। 1856 में यू एस वाइस प्रेसिडेंट के नाॅमिनेशन की दौड़ में पराजित हुए। 1858 में यू. एस. सीनेट की दौड़ में पुनः पराजित हुये। इस प्रकार हार का सिलसिला चलता रहा। वे जीवन में हार पर जीत के लिये युद्ध लड़ते रहे। ऐसा नहीं है कि इतनी हार के बाद व्यक्ति पर मानसिक अवसाद का असर पड़ता न हो, लेकिन वे जानते थे कि यह उनकी जीत नहीं हार होगी, वे मानसिक अवसाद से बाहर निकल चुके थे। उनकी उम्र जब 51 वर्ष की होती है, तब वे सारी असफलताओं को एक तरफ करते हुये जीत का परचम लहराते हुये 1860 में यूनाइटेड स्टेट्स आॅफ अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति बनते है। यह उनकी असफलता पर सफलता की विजय है।
    अविश्वास - अविश्वास की उत्पत्ति होती है मन में डर की भावना से। हम जिस कार्य को करते है, उसमें उस कार्य के होने की यदि पूरी संभावना हम रखते है, तब उस स्थिति में अपने भय को समाप्त कर चुके होते है। जब भय समाप्त हुआ होता है, तब उस कार्य के पूर्ण होने की संभावना लगभग पूरी होती है।
    मान लिजिये कोई व्यक्ति ऊंचे पेड़ पर चढ़ने में दक्ष है, उस व्यक्ति को किसी भी पेड़ पर चढ़ना कठीन नहीं लगेगा, इसका कारण उसने अपना भय समाप्त कर लिया और वह उस कार्य को करने के लिये माहिर है। जबकि दूसरे व्यक्ति को यदि पेड़ पर चढ़ने को कहा जाये तो उसके मन में भय व्याप्त होने के कारण पेड़ पर चढ़ने के लिये पूर्ण तैयार नहीं हो सकेगा। धीरे-धीरे पेड़ पर चढ़ने के लिये हिम्मत बनाकर वह पेड़ पर चढ़ भी जाये तब उसे उतरने के लिये हिम्मत बनानी होती है। जब वह व्यक्ति पेड पर चढ़कर उतर पाता है और ऐसा वह कई बार करता है, तब वह अपना मन का भय समाप्त कर चुका होता है और उसे दूसरे पेड़ पर चढ़ने उतरने में भय नहीं रहता। इसके लिये उसे अपने आप पर विश्वास रखना होता है, जब यदि वह अपने आप पर विश्वास नहीं रख पायेगा तो स्वभाविक है, कि अविश्वास से उस पेड़ पर चढ़ना कभी नहीं हो पाता।
    अविश्वास से व्यक्ति के मन में अरूचि पैदा होती है। जब भी व्यक्ति कोई कार्य करना चाहता है, वह उस कार्य के लिये अरूचिकर होता है। कई कार्य ऐसे हो, जिन्हे व्यक्ति को करना आवश्यक होता है और यदि अविश्वास पैदा हो तो वह कार्य से अन्य लोगों की प्रशंसा नही कर पाता। स्वभाविक है कि जो व्यक्ति विश्वासी होता है, उसके साथ अन्य सभी लोगों को कार्य करना पसंद है, और वे भी उस व्यक्ति पर विश्वास से कार्य करते है, जिससे कार्य की सफलता का प्रतिशत बढ़ जाता है, जबकि इसके विपरीत देखा जाये तो किसी व्यक्ति को जब हम अविश्वास से कार्य करते देखते है, तो हमें भी उनसे अपना कार्य पूर्ण कराने में आशंका रहती है।
    कई बार ऐसी स्थिति आ जाती है कि कार्य को पूर्ण विश्वास से किया गया होता है, इसके बाद भी वह कार्य पूर्ण नहीं हुआ, इसका कारण यह होता है कि सब कुछ कर सकना मनुष्य के बस की बात नहीं होती, इसलिये कुछ परिस्थितियां ऐसी विपरित हो जाती है कि कार्य में असफलता प्राप्त होती है, लेकिन ये सोच लेना कि हमारे द्वारा पूर्ण विश्वास से कार्य करने पर भी कार्य में सफलता नहीं मिली तो विश्वास के प्रति भी भय व्याप्त कर लेना उचित नहीं होगा। यहां यह मान लिजिये कि आपका कार्य के प्रति पूर्ण प्रतिशत रहा, किंतु चलायमान समय की परिस्थितियां पूर्ण रूप से आपके कार्य के प्रति नहीं थी, कुछ परिस्थितियां विपरित भी होती है।
अव्यवहार - अव्यवहार की उत्पत्ति इंसानी गुणों में बुराई के तत्वों के विकास होने से होती है। 
    बच्चों की जब कच्ची उम्र होती है तब ही से यदि उसे उचित माहौल नहीं मिले तो वह जैसे मन की क्रियाआं के साथ परिस्थितियां बनेगी बच्चा वैसा सिखता जायेगा। ऐसी स्थिति में जब अच्छे तत्वों को सिखने का मौका मिलता है तब भी व्यक्ति उसे ग्रहण करने में अत्यधिक समय लगाता है, क्योंकि उसके लिये अच्छाई के तत्व ग्रहण करने की क्षमता का विकास कम हो जाता है। यही कारण है कि वह बच्चा अव्यवहारिक होता जाता है।
    उदाहरणार्थ - घर के परिवार के सदस्यों में सर्वप्रथम माता पिता आते है, जिनसे बच्चा व्यवहार सिखता है। जब माता पिता बच्चों को अच्छा व्यवहार नहीं सिखायेगें तो वह कैसे सिखेगा। जब माँ-बाप दूसरों की मदद की भावना नहीं दर्शायेगें, दूसरों के दुःख में शामिल नहीं होगें, स्वयं धैर्य नहीं रखेगें, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये लालच कर आवश्यकताओं की पूर्ति करेगें तो बच्चा इन गुणो को कैसे नहीं सिखेगा। दूसरी स्थिति में माता-पिता के पश्चात घर के बड़े सदस्यों में जैसे भाई-बहन आते है। जब माता-पिता ने बच्चो में इंसानी गुणों का विकास नहीं किया तो बड़े बच्चों से ही उनके छोटे भाई सिखते है। इसी प्रकार बाहरी व्यवहार में दूसरों के बच्चों से व्यवहार सिखते है। दूसरो के बच्चो के अतिरिक्त रिश्तेदार, मित्र, हितैषी, शुभचिंतक से तथा उनके बच्चों से सिखते हैं।
    तीसरी स्थिति में व्यक्ति स्वयं के व्यवहार से सिखता है। यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह अपने आपको अव्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करें या व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करें। व्यक्ति के लिये माहौल का मिलना आवश्यक है। यद्यपि यह व्यक्ति के मन की दृढ़ता पर निर्भर होता है कि वह व्यवहारिक तत्वों का पालन करें। उदाहरण -तीन मित्र है, जिनमें दो मित्र अव्यवहारिक है और एक मित्र व्यवहारिक है। दो मित्र शराब पीते है, झगड़ा करते हैं, इत्यादि। अब एक मित्र जो उन्हें व्यवहारिकता सिखाने की कोशिश करता है मगर वे अपने मस्ती में मस्त रहते है। उस अकेले मित्र की परेशानी यह है कि उन दो मित्र के अलावा अन्य कोई मित्र नहीं है, उसके सामने समस्या यह है कि वह या तो उनका साथ छोड़ दे या उनके साथ रहकर अव्यवहारिकता सिख ले या अपने व्यवहार से उनमें परिवर्तन लाये। यह उस मित्र पर स्वयं निर्भर करता है।
    चैथी स्थिति में मौसम का परिवर्तन जो कि मन के परिवर्तन से सम्बन्धित है। उदाहरणार्थ - गर्म मौसम होने पर व्यक्ति ठंडा पीने की इच्छा करता है और ठंडा मौसम होने पर गर्म पीने की इच्छा करता है। गर्म मौसम में अक्सर शरबत, ठंडा पानी इत्यादि ठंडे मौसम में चाय, काफी, गर्म पानी। व्यक्ति के मन में परिवर्तन तब आता है, जब वह चाहता है मौसम के अनुसार आवश्यक चीजे तो लेते है बचपन से वह कुछ ऐसे माहौल से निकला होता है कि वह इन मौस में मिलने वाले इन पदार्थो के अतिरिक्त जिव्हा के स्वाद में परिवर्तन महसूस करते है। ठंडे के मौसम में - शराब, गर्मी के मौसम में - ठंडी बियर पी लेते है।
    इस प्रकार व्यक्ति मौसम परिवर्तन के साथ मन के परिवर्तन का रूख व्यवहारिकता को बनाये रखने में असमर्थ होता है। कुछ लोग इन परिस्थितियों में अपने आप को बनाये रखते है।
    इस प्रकार अव्यवहारिक गुणों के विकास होते जाता है, जिसका असर यह होता है कि वह व्यक्ति अपना समय इन व्यर्थ के कार्यो में खो देता है जब धीरे-धीरे परिवर्तन के साथ वह कुछ बनना या करना चाहता है, तब उसके लिये नये सिरे से शुरूआत करना कठिन हो जाता है। जब वह बार-बार कुछ करने के प्रयत्न से थक जाता है तो वह वापस अव्यवहारिक हो जाता है और बुराई का दोषी हो जाता है। वह वापस व्यवहारिक बने ऐसा उसके लिये और कठिन होता है। यदि ऐसी स्थिति में उसे धैर्यता, संतुष्टि का पाठ पढ़ाया जाये तो वह अपराधी बनने से बच सकता है। अन्यथा यहां जीवन जीने का उद्देश्य समाप्त हो जाता है और वह अपने अव्यवहारिकता में परिवर्तन नहीं ला जायेगा।
समझदारी - बुराई के तत्वों पर नियंत्रण रखने की क्षमता रखने वाला व्यक्ति समझदार होता है और जो इन बुराई के तत्वों को जानता है कि इससे अपने व्यवहार को नुकशान है, साथ ही अपने इस व्यवहार से दूसरों को भी नुकशान होता है, उस पर नियंत्रण रखना समझदारी है।
    समझदारी से वही व्यक्ति काम ले सकता है, जिसमें अपने ऊपर नियंत्रण रखने की क्षमता का विकास हो गया है। जो व्यक्ति अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाता वह अपने व्यवहार से क्रोध, जलन, अव्यवहार, बैर, घमंड, असंतुष्टि पैदा कर लेता है, जो कि बुराई के तत्व है और इन्ही बुराइयों से अन्य बुराईयों का विकास हो जाता है, जो अच्छे व्यक्तित्व को नहीं दर्शाता।
    जहां व्यक्तियां का निवास होता है, अर्थात परिवारों का समुह रहता है। वहां अंहकार, निंदा, असंतुष्टि पैदा होती है। इसका कारण मानवीय व्यवहार में कमी होती है। इसके अतिरिक्त अच्छाई के तत्व भी शामिल होते है - धैर्य, संतोष, उत्तम व्यवहार शामिल होता है।
    अच्छाई के तत्व में व्यवहारिकता के लिये सबसे उपयुक्त गुण होता है समझदारी जिससे व्यक्ति में धैर्यता, संतुष्टि व कार्य कुशलता की क्षमता का पता चलता है। व्यक्ति को समझदारी के गुण को अपने मानवीय व्यवहार में बनाये रखना बड़ा कठिन होता है। जबकि इसके विपरित यदि ऐसा व्यवहार हो जाये जिससे कि बुराई के तत्वों का शामिल होना उससे व्यक्ति का कई वर्ष का बना हुआ व्यवहार कुछ समय में ही नष्ट हो जाता है। यही कारण है कि लम्बे समय तक समझदारी से व्यवहार बनाये रखना बड़ा कठिन होता है।
    बुराई के तत्वों में मानवीय जीवन को शामिल करना वाकई में आसान है किंतु इससे वापस निकलना आसान काम नहीं होता। उसी प्रकार अच्छाई के तत्वों को अपनाये रखना सरल कार्य नहीं है, किंतु इंसानी गुणों से युक्त जीवन जीने का इससे बढ़िया कोई उपाय नहीं है। मान लीजिये कोई व्यक्ति संयम जीवन संतोषी जीवन, खुशीयुक्त जीवन जीता है, जिसमें क्रोध का समावेश बिल्कुल नहीं है, उस व्यक्ति को जान-बुझकर क्रोध दिलाया जाना क्या उचित होगा। दूसरी बात क्या उसकी मानवीय गुणों से युक्त होने की परीक्षा लेना क्या उचित होगा। यही कारण है कि व्यक्ति-व्यक्ति को परखना चाहता हैं। ऐसी परिस्थितियां पैदा करता है, जिससे वह व्यक्ति अपने मार्ग से विचलित हो जाये। विचलित कर देने के पश्चात उसे उसके मार्ग से भटका देता है। हर वह व्यक्ति जो मंजिल पाना चाहता है, उसका कोई न कोई रास्ता होता है, जब उसे सही रास्ते में भटकाने और विचलित करने वाले व्यक्ति मिल जाते हैं तो वह दूसरा रास्ता अपनाता है, जो कि गलत भी हो सकता है और इसी में वह दोषी हो जाता है। हर व्यक्ति यदि एक दूसरे की मदद करें चाहें इंसानी भावना रखते हुये हो तो ऐसा व्यक्ति जो राह से भटक चुका है उसे वापसी करने में सहायता होगी। सही समझदारी का गुण यही है।
    वर्तमान समय में व्यक्तियों कि आवश्यकतायें बढ़ गई हैं, दूसरो को देखकर भी अपनी आवश्यकतायें बढ़ गई है। दूसरो को देखकर भी अपनी आवश्यकताये बढ़ा ली है। स्वभाविक है कि हर समय नये परिवर्तन में व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन होना स्वभाविक है। वह कब तक अपने आप में होने वाले परिवर्तन को रोक सकता है।
    इसी परिवर्तन के स्वरूप में व्यक्ति अपने आप को रोक नहीं पाता है, लेकिन यह उसके समझदारी की क्षमता होगी कि उसे तर्क अनुसार सोचना होगा कि मेरा परिवर्तन परिवार के लिये लाभदायक हो तथा अन्य लोगों को भी इससे लाभ हो क्योंकि जिस वस्तू से लाभ नहीं होता वह वस्तू फेंकने वाली होती है और हमेशा लाभदायक बने, यहीं समझदारी है। समझदारी के लिये अच्छाई के तत्वों को अपनी जीवन में ढालना होगा तथा दृढ़ निश्चयी होना होगा कि हमें कोई विचलित भी करें तो हम विचलित न हो।
    समझदारी को अन्य व्यक्ति हमारे शरीर में प्रविष्ट नहीं कर सकता। इसे स्वयं व्यक्ति को अपने अंदर से भावना पैदा करना होता है और अच्छाई तत्वों अपने अंदर की भावना में बोना होता है तब इंसानी गुणों का पेड़ पनपता है।
दुःख का प्रारंभ
    व्यक्ति के जीवन में ऐसे कई मोड आते है जहां वह अपने आप को दुःखी पाता है। सुख और दुःख व्यक्ति के जीवन में चलने वाली सतत प्रक्रिया है। इच्छा की पूर्ति न होने से दुःख का प्रारंभ होता है। व्यक्ति की इच्छायें अनंत है, वह कभी समाप्त नहीं होती। उसकी एक इच्छा पुरी नहीं हुई तो दूसरी इच्छा उत्पन्न हो जाती है और कुछ इच्छाये पूर्ण होने पर वह खुशी का अनुभव करता है। मान लिजिये एक वस्तू है और दो लोगो की इच्छा है वह मुझे प्राप्त करना है, इसी में यदि एक व्यक्ति वह वस्तू प्राप्त कर लेता है तो दूसरे व्यक्ति की इच्छापूर्ण नहीं होने पर वह दुःखी हो जाता है। इस प्रकार की कई परिस्थितिया है जिससे व्यक्ति दुःख का अनुभव करता है।
1.    स्वयं के द्वारा प्राप्त दुःख
2.    दूसरो के द्वारा दिया गया दुःख
3.    प्राकृतिक रूप से प्राप्त दुःख
4.    बीमारी होने पर दुःख
    स्वयं के द्वारा प्राप्त दुःख - व्यक्ति कभी कभी स्वयं से भी दुःखी हो जाता है। उसके मन में यह दुःख की भावना अक्सर उस समय पैदा होती है, जब वह औरो को अपने से बेहतर पाता है, उससे जब अपनी तूलना करता है तो उसके सामने अपने आपको कम पाता है या तूच्छ पाता है। उदाहरण स्वरूप (पहला) व्यक्ति अपनी सुन्दरता की तूलना दूसरे व्यक्ति से करता है जब सामने वाला व्यक्ति रंग की सुन्दता में उससे अधिक और सुन्दर होता है तो मन ही मन में अपने बारे में सोचकर दुःखी होता है। व्यक्ति कुरूप है तो सुन्दर व्यक्ति को देखकर अपने प्रति दुःखी होता है। (दूसरा) - जब व्यक्ति अपनी कार्य क्षमता से दूसरे व्यक्ति को अपने से अधिक पाता है उस स्थिति में दुःखी होता है या अपने को अन्य व्यक्ति से कमजोर पाता है तो दुःखी होता है। (तीसरा) अपनी गरीबी में व्यक्ति जब अपने से अमीर व्यक्ति को शान से देखता है तो वह अपने गरीबी के लिये मन में दुःखी होता है। (चैथा) - अपने को दुःखी और दूसरो के सुखी स्थिति में देखकर स्वयं के जलन भावना में रहकर दुःखी होता है। (पांचवा) व्यक्ति जो दूसरो के प्रति दयाभाव रहते है वे दूसरो को लाचार स्थिति में देखते है तो दुःखी होते है। (छठवां) व्यक्ति के मन में बीमारी का भय कुछ समय के लिये अस्वस्थ हो जाने पर थोड़ा स्वास्थ्य ठीक होने में विलम्ब लगने पर व्यक्ति बीमारी के बारे में सोचकर दुःखी होता है और यह सोच स्वयं पैदा कर ली जाती है जो उसे दुःखी करती है। (सातवां) व्यक्ति के मन में तीन स्थिति में विचारकर भय से दुःखी होता है प्रथम स्थिति - भूतकाल की जो उसके साथ घट चूकी है और ऐसी स्थिति (बुरी स्थिति) दोबारा न घटे इसके लिये मन में सोचकर दुःखी होता है। दूसरी स्थिति - वर्तमान की है, जिसमें व्यक्ति करना बहुत कुछ चाहता है पर परिस्थितियां ऐसी उत्पन्न होती है की वह कर नहीं पाता है या कर पाने में समस्यायें होती है जिससे वर्तमान समय हाथ से निकलने का भय मन में उत्पन्न होता है और वह इसी भय से दुःखी होता है। तीसरी स्थिति - (प्रथम) भविष्य होती है भविष्य में व्यक्ति के लिये दो स्थिति होती है। प्रथम की मेरा भविष्य कैसा होगा। मैं जो बनना चाहता हूॅ वह बन पाऊंगा या नही इसका मन में भय और भय से दुःख (द्वितीय) भविष्य में जो बनना चाहता था वह नही बन पाया और अब और भविष्य न बिगड़े इसके लिये जो सोच बनाई है उसमें सफलता के प्रति आशंका। इसी आशंका के पूर्ण होने या न होने का भय और भय से दुःख।
2. दूसरो के द्वारा दिया गया दुःख - व्यक्ति दूसरो के द्वारा दिये गये दुःख से दुःखी होते है। यह दुःख दो प्रकार के होते है एक तो व्यक्ति - दूसरो को सही रास्ता दिखाने के लिये देता है। दूसरा - व्यक्ति के द्वारा किये गये कार्यो से जल, द्वेष की भावना से ग्रस्त होकर दुःख देता है। प्रथम - सही रास्ता दिखाने के लिये दिया गया दुःख - इसमें व्यक्ति दूसरो से अच्छे मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करता है। यह बात अलग है कि ऐसे लोगो की संख्या कम होती है, किंतु ऐसे लोग माता-पिता, भाई-बहन या अन्य सही मार्गदर्शक व्यक्ति होते है जो चाहते है कि उक्त परिचित व्यक्ति दिशाहीन न हो जाये। इसके लिये वे प्रेम से, क्रोध से व्यक्ति को राह दिखाना चाहते है, उसे सही मंजिल की ओर प्रेरित करते है, लेकिन वह व्यक्ति उन लोगों से प्रेरित न होते हुये उनके कहे अनुसार जब विपरित कार्य करते है तब वे उन पर क्रोधित होते और यह क्रोध उस व्यक्ति को दुःख प्रदान करता है।
    द्वितीय - जलन, द्वेष की भावना से ग्रस्त होकर दिया गया दुःख - व्यक्ति के साथ ज्यादातर यही समस्या होती है कि यदि वह कुछ तरक्की करता है तो व्यक्ति व्यक्ति से जलन की भावना पैदा कर लेता है। इसका कारण अपना महत्व समाप्त होने, गौरव कम होने, पद छिन जाने, इत्यादि का भय होना हो सकता है। जलन की भावना में व्यक्ति व्यक्ति से लड़कर, झगड़कर, डराकर, परेशान करता है। ये वह जलन की भावना से करता है। 
    तृतीय - जिसे वह व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति न कर पाने के कारण और अधिक आय से पाने की कोशिश करता है। अपनी आवश्यकताओ को सीमित न कर पाने के कारण वह लालच में आ जाता है और वह लालच में दूसरो को परेशान करता है, दुःख देता है। दुःख देना और परेशान करने के उदाहरण - ¦(1) दूसरो के यहां की वस्तू चोरी करना, रूपयो पैसा चांदी चोरी, करना, कीमती सामान चोरी करना, दूसरो को नुकशान पहुंचाना। (2) व्यक्ति के द्वारा डराना, धमकाना, लूटना । जो दूसरो द्वारा दिया गया दुःख है।
    इस प्रकार दूसरो के द्वारा दिये जाने वाले दुःख में अन्य कई उदाहरण है किंतु उपर दिये गये कुछ सामान्य से उदाहरण है जो आम जीवन में प्रमुख है।
    चतुर्थ - इस स्थिति में व्यक्ति को जबरन जलन की भावना थोपी जाती है, जिसका असर जलन पैदा करने वाले व्यक्ति पर भी होता है और जो व्यक्ति अनुभवन करता है, उस पर भी असर होता है वह भी जलन में ज्यादा व्याप्त रहता है लेकिन यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह व्यक्ति इसको किस प्रकार से और कितना ग्रहण करता है।
3.    प्राकृतिक रूप से प्राप्त दुःख - मनुष्य के जीवन में दुःख प्राप्त करने की सीमाये अन्नत है, जिसे वह केवल मन को दुःखी करके पाता है। ये दुःख जो कि स्वयं के द्वारा ग्रहण किया जाता है। सत्य है कुछ दुःख दूसरो द्वारा दिया जाता है। कुछ दुःख प्राकृतिक रूप से स्वयं ही प्राप्त हो जाते है।
    व्यक्ति को प्राकृतिक रूप से स्वयं ही दुःखी होता है। व्यक्ति को प्राकृतिक रूप से प्राप्त दुःख में - गर्मी, ठंड, बरसात से होने  वाली हानि से दुःख प्राप्त तो होता है, साथ ही भूंकप, बाढ़, आसमानी बिजली, ज्वालामुखी इत्यादि की प्राकृतिक के रूप से नुकशान पहुंचाने और मनुष्य के मन में दुःख पैदा करते है।
    उदाहरण स्वरूप - कोई किसान व्यक्ति है तो उसके लिये फसल हेतु अत्यधिक बरसात होना नुकशानदायक है तथा अत्यधिक ठंड से फसल को नुकशान भी होता है। अत्यधिक गर्मी सुखा पैदा करती है तो बाढ़, भुकंप, फसल का बर्बाद करते है। ज्वालामुखी से नुकशान होता है। आसमानी बिजली से आम जन जीवन को नुकशान होता है। घरो और फसलो के नुकशान में आंधी, तुफान, भी एक कारक है। ये प्राकृतिक आपदाये एक किसान परिवार पर ही लागू नही होता। आम आदमी पर भी यह उतना ही लागू होता है जितना एक कृषक, एक मजदूर पर। आंधी तूफान आने पर कच्चे घरो की छत उडना, बाढ़ आने पर घरों में पानी घूसना ये प्राकृतिक दुःख प्रदान करता है। ठंडी, गर्मी या बरसात ऐसे लोगो के लिये दुःखदाई है, जो एक गर्म कपड़ा, या गर्मी से बचने के लिये सर की टोपी या बरसात में सिर बचाने के लिये छाता नही खरीद सकते आदि इन मौसमो की मार झेलने और दुःख पाते है।
    आसमानी बिजली यदि कही गिरती है, जहां घर हो आबादी हो वहां पर गिरने पर घर को नुकशान पहुंचाती है और किसी व्यक्ति पर गिरे तो उसकी मृत्यु हो सकती है जो कि दुःखदाई है।
    इस प्रकार प्राकृतिक रूप से प्राप्त दुःख के भी कई कारण होते है यहां केवल सामान्यत प्राकृतिक रूप से प्राप्त दुःख का उदाहरण दिया गया है।
4.    मौसमी परिवर्तन पर दुःख - व्यक्ति का मन कभी स्थित नही रहता है वह कुछ न कुछ विचार करते रहता है। इन विचारों में कभी मन प्रफुल्लित होता है तो कभी मन उदास भी होता है। उसी प्रकार प्राकृतिक मौसम सदा एक समान नही बना रहता है, इसमें भी परिवर्तन होते रहता है। उदाहरण स्वरूप - कमी गर्मी का मौसम होता है कभी बरसात और कभी ठंड का लेकिन इसके साथ साथ प्राकृतिक रूप से मौसमी परिवर्तन भी होता है, जिसमें गर्मी के मौसम में अचानक बरसात हो जाना और बरसात में मौसम में परिवर्तन होकर उमस, हल्की ठंड, अत्यधिक बरसात अधिक ठंड उसी प्रकार ठंड के मौसम में हवाओं के रूख से परिवर्तन होकर ठंड में अचानक गर्म हवाओ का परिवर्तन अचाकर बर्फ गिरने पर तापमान में परिवर्तन, कभी ठंड में बारिस का होना और बारिस के होने से मौसम में परिवर्तन यह सब परिवर्तन व्यक्ति के मन को प्रभावित करते है।
5.    बीमारी होने पर दुःख - व्यक्ति के लिये दुःख के कई प्रकार है जिसके कारण व्यक्ति दुःखी होता है। वह अपनी बीमारी के बारे में विचार कर चिंतित होता है। कुछ समय यदि व्यक्ति बीमार रहता है तो उस स्थिति में व्यक्ति के मन में विचार बनता है कि मैं कहीं किसी लम्बी बिमारी से ग्रस्त तो नहीं हूॅ और इसी सोच में व्यक्ति यह सोचता रहता है । इस प्रकार के दुःख की भी दो श्रेणी होती है। प्रथम श्रेणी - शरीर में प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर बार-बार बीमार होना दूसरी श्रेणी - ऐसी बीमारी होना जिसका इलाज किये जाने पर सही स्थित होने या न होने की संभावना दोनो परिस्थितियां हो सकती है। ये दो परिस्थितियांे से तात्पर्य यह है कि  यदि बीमारी ऐसी होती है जिसका इलाज संभव नहीं है, किंतु अपने अंदर की इच्छा शक्ति से इसका मुकाबला अंतिम समय तक किया जा सकता है ये हो सकता है कि बीमारी ठीक न हो और बीमारी से लड़ते हुये मृत्यु हो जाये लेकिन ये बात सही है हम पहले हारने से मुकाबला करना ज्यादा मुनासिब समझे हो सकता है कि हम बीमारी पर जीत हासिल कर लें जो अन्य लोगों के लिये प्रेरणा होगी।इसके विपरित हम उस स्थित में दवाई लेना बहुत आवश्यक है व्यक्ति के पास हम इस बारे में विचार करे के बीमारी होने का दुःख होता है। जिसे दूसरी परिस्थिति में बीमारी के पश्चात बूढ़ा होने का दुःख भी मानसिक सोच में कमजोरी पैदा करता है यह भी एक बीमारी की श्रेणी में आता है। वह व्यक्ति सोचना है कि कही मेरे साथ घटना तो नहीं हो जायेगी या कहीं मैं बूढ़ा हो गया तो मैं कैसे जी पाउंगा। यह सोच आदकी को धीरे-धीरे ओर अधिक मानसिक अपंगता की ओर ले जाती है। व्यक्ति मानसिक रोगी होते जाता है। इसी प्रकार व्यक्ति के मन में कई प्रकार से इस प्रकार बीमारी के बारे में विचार कर दुःख उत्पन्न होता है।
    इस प्रकार देखा जाये उपरोक्तानुसार दुःख के लिये व्यक्ति स्वयं ज्यादा जिम्मेदार होता है बहुत ही कम स्थिति में प्राकृतिक दुःख प्राप्त होता है।
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    शरीर के महत्वपूर्ण अंग के रूप में मस्तिष्क महत्वपूर्ण है, जिसमें मस्तिष्क से सारे अंगो का संचालन होता है, हमारे मस्तिष्क में अनगिनत तंत्रिका व न्यूराॅन्स होते है और इन तंत्रिकाओं में दो न्यूरान्स के बीच में जो खाली स्थान हैं उसमें नर्व इम्पल्स का आदान प्रदान कुछ जीव रसायनों के द्वारा होता है, जिन्हें विज्ञान की भाषा में ‘‘न्यूरोट्रांसमीटर’’ कहते हैं। मस्तिष्क जब कार्य करता है, कार्य करते समय न्यूरोट्रांसमीटर्स का असंतुलित होना उस व्यक्ति के लिये मनोविकार का शिकार होता है।
    मनोविकार से ग्रस्त व्यक्ति का फोरब्रेन लिम्बिक सिस्टम सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। जिसमें फोरब्रेन के फ्रटल व टेम्पोरल लोब्स, बेसल न्यूकिलीआई तथा लिम्बिक सिस्टम के हिप्पोकैम्पस एमाइगडाला व सिंग्यूलेट गाईटस इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। इसके अतिरिक्त व्यक्ति को अवसाद में पहुंचाने के लिये पिट्यूटरी ग्लेण्ड व हाइपोथेलेटस (हार्मोन्स) जिम्मेदार होते है, जिसमें न्यूरोट्रांसमीटर्स, सेरोटोनिन, नोऐड्रेनेलिन व डोपेसिन भी मनोविकार के असंतुलन के लिये जिम्मेदार होते है।
दुःख
1.    बचपन - जिस दिन बच्चे का जन्म होता है, उस दिन से उसके नये जीवन का आरंभ होता है, यहां से मनुष्य की आवश्यकतायें प्रारंभ होती है। बच्चे को नींद व भूख की आवश्यकता जिसको बडी तन्मयता से बच्चे की माॅ चिंता से करती है। पिता के लिये बच्चे की हर आवश्यकता की वस्तू उपलब्ध कराने की चिंता होती है। बच्चे के लिये हर दिन एक नया दिन होता है, क्योंकि उसकी उम्र आवरण के परिपक्वता में अपने को बदलाव करते हुये बढ़ती है। लगभग तीन वर्ष की उम्र में बच्चे को थोडी समझदारी आती है जिसमें बच्चा अपनी आवश्यकता की वस्तू के लिये कहता है और प्राप्त नहीं होने पर रोता है। इस उम्र में बच्चे की पढ़ाई की चिंता माॅ-बाॅप, अभिभावक को होती है और वे उसे विद्या अध्ययन में प्रवेाश् कराते है। इसके पश्चात बच्चे पर कुछ दबाव बढ़ जाता है, उनका समय पर स्कूल जाना, पढ़ना और समय का पालन करना। इस जिम्मेदारी को माॅ-बाॅप, अभिभावक निभाते है।
    जब बच्चे की उम्र 8 वर्ष के लगभग हो जाती है, तब उसे और अधिक नियम का पालन करना होता है। पढ़ाई के साथ साथ और भी प्रतिस्पर्धा प्रतियोगिता- जैसे - खेलकुद, संगीत, डांस, चित्रकला या अन्य यांत्रिकी अध्ययन। इस प्रकार की प्रतिस्पर्धा में बच्चे की इच्छा या माॅ-बाॅप, अभिभावक की इच्छा निर्भर करती है। भविष्य में बच्चा क्या बनेगा और उसे क्या बनाना चाहिये यही सोच को पूर्ण करने की इच्छा से बच्चे को इस प्रकार की प्रतिस्र्धा में शामिल करते है और उसी प्रकार से बनाने में चिंतित होकर सफलता के उद्देश्य में लग जाते है।         लेकिन यह भागती जिदंगी में आवश्यक भी  है, लेकिन बच्चो को जीवन में अत्यधिक बिजी करना या स्वयं भी उनके साथ बिजी होना और इस बिजी होने से दोनो का चिंताग्रस्त होना।
    बचपन से युवावस्था - जब बच्चे की उम्र लगभग 8 वर्ष होती है, वह समय माॅ-बाॅप, अभिभावक के लिये बच्चे की मानसिकता पर ध्यान देने की हो जाती है, क्योंकि इस उम्र में वह किस क्षेत्र की ओर जायेगा यह बच्चे की इच्छा पर भी निर्भर होता है, क्योंकि आप जो बनाना चाहते हैं, बच्चे को बनना पसंद है या नहीं उसे इस बात का ज्ञान नहीं रहता है, जो आप बनाना चाहते है उसके बारे में वह नहीं जानता - कि वह बनकर क्या करेगा और उसके अधिकार का कैसे उपयोग करेगा। इस उम्र में उसके मित्र की संख्या बढ़ती है और हर बच्चे के माॅ-बाॅप, अभिभावक की सोच अलग होती है। वैसे ही बच्चा देखता है कोई कुछ बनना चाहता है कोई गायक बनना चाहता है, कोई संगीत में जाना चाहता है और वह बच्चा भी इस बच्चे की तरह बार-बार सोच बदलता है, जिससे उसकी मानसिकता पर असर पड़ता है, लेकिन जो बच्चे के माॅ-बाॅप, अभिभावक है वे अपने बच्चे को बनाने के विचार बार बार न बदले जिससे बच्चे की मानसिकता पर ज्यादा असर होता है।
    बच्चे की उम्र 14 वर्ष की हो जाने पर वह काफी समझदार हो जाता है और तब से माॅ-बाॅप, अभिभावक को और अधिक ध्यान देना आवश्यक हो जाता है। बच्चे क्या पढ़ रहे है, कहां घूम रहे है और िकस के साथ रह रहे है। इस पर ध्यान देना आवश्यक है, क्योंकि वह उम्र उसके लिये सही गलत रास्ता के चुनाव का होता है क्योंकि सोच में परिपक्वता प्रारंभ हो जाती है। लेकिन हर कार्य में टोकना, डाॅटना,  मारना गलत हो सकता है, किंतु ध्यान देकर गलत राह से बच्चो की दूरी प्रेम से ही बनाई जा सकती है। 
    18 वर्ष की उम्र बच्चे के बचपन के समाप्ति की उम्र होती है इसके पश्चात उसमें व्यवहारिकता में परिपक्वता आती है। इस उम्र में उस बच्चे पर पढ़ाई का बोझ बढ़ जाता है, क्योंकि क्या बनना है, उस हेतू विषय का चयन करना होता है। आगे बढ़ने का बोझ होता है। इस उम्र में माॅ-बाॅप, अभिभावक काफी अवहेलना करते है, क्योंकि बच्चा हर समय तो बात नहीं मानता। इस कारण तरह तरह की अवहेला प्रारंभ होती है, जो कि आवश्यक नहीं है। बाहरी अवहेलना भी बच्चे को मिलती है जिसमें दोस्तो के अतिरिक्त उकने माॅ-बाॅप, अभिभावक भी करते है। यह किसी अन्य कारणवश नहीं, बल्कि उनके बच्चे कुछ और बनना चाहते है और  यह बच्चा कुछ और इस तालमेल का बराबर न होने से ऐसा होता है। यह उम्र सोच विचार परिवर्तन का समय होता है, क्योंकि ये उम्र में व्यक्ति को क्या बनना है, इसका ठोस आधार तय होता है और यह समय गुजर गया तो व्यक्ति के लिये जीवन में अत्यधिक कठिनाईयां पैदा हो जाती है।
    युवावस्था - 18 से 25 की उम्र में - इस उम्र में बच्चा एक युवक स्थिति में माना जाता है, उसकी बच्चे की उम्र समाप्त हो जाती है। यह उम्र में युवक को परिवार यदि सक्षम है तो पढ़ाई पर ध्यान देना व अपने जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ने की चिंता होती है लेकिन यदि युवक का परिवार सक्षम नहीं है तो उसके लिये संघर्ष वाला जीवन प्रारंभ होता है।
    यह समय अक्सर युवको को भटकाता है। माॅ-बाॅप, अभिभावक यदि बच्चे को आगे नहीं पढ़ा पाते है, तो उनके लिये चिंताजनक बात हो जाती है, क्योंकि उनकी क्षमता आगे पढ़ाने की नहीं होती है, इसमें तीन स्थितियां होती है 1. - माॅ-बाॅप, अभिभावक का सक्षम न होना - अक्सर ऐसी परिस्थितियां होती है जब बच्चे की उम्र 18 वर्ष होती है तो माॅ-बाॅप, अभिभावक यह सोचते है कि बच्चा मेहनत कर कमा लेगा और उससे पढ़ाई जारी रखेगा। वे पढ़ाई में होने वाला अधिक खर्च वहन नहीं कर पाते वे सक्षम नहीं होते है इस कारण ऐसा करते है। 2. - परिस्थ्तिियां - 1. - कोई माॅ-बाॅप, अभिभावक में से कोई व्यक्ति गंभीर बिमारी से ग्रस्त है या बच्चा बीमार है, जो आगे पढ़ नहीं सकता ऐसी भी परिस्थितिया होती है । 2. - परिवार में अचानक किसी का देहांत हो गया जिससे पढ़ाई का नुकशान दुखद घटना के कारण  हुई 3.परिवार का, रिश्तेदार का, भाई-बहन का,  चल-अचल संपत्ति के लिये वाद-विवाद का होना।
4. पति-पत्नी का आपसी विवाद जो लम्बे समय तक चलता है कभी कभी तलाक तक बात आ जाती है जिससे बच्चे की पढ़ाई का बाधित होना।
3. प्राकृतिक व विद्यमान परिस्थिति - प्राकृतिक परिस्थिति में मौसमी परिवर्तन, भूंकप, ज्वालामुखी, बाढ़, बिजली गिरना जिससे घर की क्षति होने से बच्चे की पढ़ाई बाधित होती है। अन्य परिस्थ्ािित में - देश में युद्ध होना, आंतरिक गृह युद्ध होना, दंगा फसाद, लड़ाई झगड़ा इत्यादि भी पढ़ाई को बाधित करती है।
    युवक के लिये 18 से 25 वर्ष की आयु में कई समस्या होती है, यदि स्थिति सही नहीं है तो वह सोचता है कि पढ़ाई करे या काम करें घर की परिस्थिति संभाले और ज्यादातर समय आवश्यकताओं की पूर्ति करने में निकल जाता है और पढ़ाई करने का कीमती समय निकल जाता है, क्योंकि एक बार पढ़ाई की डोर टूट जाये तो बड़ा मुश्किल होता है, फिर उसी डोर से जुड़ना ऐसा बहुत कम लोग कर पाते है और ऐसे बच्चे जो काम करते है, परिस्थितियों से लड़कर पास होते है वे सबके लिये मिसाल की बात है, वे वाकई में सम्मान के हकदार है।
    लगभग 18 से 25 की उम्र के युवक नौकरी में व्यापार में अन्य व्यवसायिक कार्यो में लग जाते है, कुछ अपनी पढ़ाई जारी रखते है, तो कुछ लोग परिस्थितियांे से संघर्ष करते है। कुछ युवको का विवाह हो जाता है, जिन पर पारिवारिक जिम्मेदारिया बढ़ जाती है। यह उम्र युवावस्था की ओर अग्रसर होती है।
    25 से 40 वर्ष की उम्र -
    यह उम्र युवावस्था की होती है, इस उम्र में व्यक्ति पर परिवार की जिम्मेदारी होती है। लड़कियों का यदि इस उम्र तक विवाह नहीं हुआ तो वह माॅ-बाॅप, अभिभावक के लिये चिंता जनक तो होता ही है साथ ही उस युवती को भी चिंतित किये रहता है।,
    (1) इस युवावस्था में व्यक्ति को भविष्य के प्रति ज्यादा चिंता होती है। ऐसी परिस्थितियां भी होती है, जिसमें प्रेम मंे सफलता के प्रति विचार होता है। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे मित्र होते है, जिनका साथ छूट जाता है, जिनसे ऐसी उम्र के युवक शामिल होते है। लड़की के लिये इस उम्र विवाह न होने के कारण भविष्य की चिंता ज्यादा विचार उत्पन्न होते है। यद्यपि ऐसी कई युवतियां अविवाहित होकर जीवन जीती हैं, किंतु एक परिवार में शामिल रहने की चिंता सभी को सताती है, वह चाहे किसी भी समूह का व्यक्ति क्यों न हों। (2) ऐसी परिस्थिति जिसमें युवक-युवती का विवाह हो चुका होता है, किंतु दोनो में से किसी एक का देहांत इस युवावस्था में हो जाता है तो भी इस युवावस्था में उनका चिंताग्रस्त होना स्वभाविक है, लड़कियों के लिये विधवा होना और अधिक चिंताग्रस्त होता है। (3) ये युवावस्था वह उम्र होती है जिसमें सफलता-असफलता लगी रहती है और यह सफलता अनुभव पर भी निर्भर करता है और ज्यादातर असफलता प्राप्त होने पर इस युवावस्था में युवक-युवती ज्यादा मानसिकता से ग्रसित होते है। (4) ये उम्र ऐसी होती है जिसमें इच्छाओं की संख्या अधिक होती है, लेकिन कई इच्छाओं को छोड़ना पड़ता है, और कई इच्छाओ की पूर्ति करने के लिये बहुत अधिक संघर्ष भी करना पड़ता है। यह युवावस्था की आयु 25 से 40 वर्ष तक होती है, इसके बाद वृद्धावस्था का प्रारंभ होने लगता है।
    युवावस्था से वृद्धावस्था - जब युवक-युवती की आयु 40 वर्ष के लगभग होती है, वह उम्र में उनका स्वभाव का बहुत परिवर्तन भी होता है उनका स्थायित्व या अस्थायित्व नजर आता है क्योंकि इस उम्र में संघर्ष करने की क्षमता कम लोगों में रहती है क्योंकि अधिकतर व्यक्ति संघर्ष करने से निराश हो जाता है या संघर्ष भरी दुनिया से दुःखी हो जाता है। इस उम्र में व्यक्ति कई समस्याओं, सफलता-असफलताओं से गुजरता है। कुछ लोग संघर्षरत रहते हुये सफलता प्राप्त करते है, तो कई लोगों को लगातार संघर्ष करने के बाद भी असफलता मिलती है। इस उम्र में जैसे जैसे उम्र ज्यादा होती है व्यक्ति वृद्धावस्था की ओर जाता है। लगभग 50-55 की उम्र में व्यक्ति के कई पुराने नये रिश्तो को निभाते हुये अपने अच्छे व्यक्तित्व को दर्शाता है। कभी-कभी कुछ रिश्ते किसी कारणवश छुट भी जाते है या उनमें सामजस्य नहीं होने के कारण वह रिश्ते समाप्त हो जाते है। इस उम्र तक अच्छे बुरे का पूरा ज्ञान हो जाता है। यह उम्र में यदि व्यक्ति बीमार न हुआ हो तो वह सेल्फ निर्णय से जीता है। यदि वह कार्य करने में असमर्थ हो गया हो तो उसे दूसरो की सेवा पर जीना होता है, लेकिन इस उम्र तक व्यक्ति ज्यादातर रिश्ते समाप्त होने पर दुःखी होता है या रिश्तो के प्रति अव्यवहारिकता के कारण दुःखी होता है।
70 से 100 वर्ष - यह उम्र वृद्धावस्था की होती है और इस उम्र में व्यक्ति अपने सारे अनुभव, अच्छे ज्ञान को देना चाहता है, लेकिन आजकल के नवयुवक उनके साथ बैठकर उनके अनुभव को लेना कम ही समझती है। कई लोग इस उम्र मेें अपंगता, बीमारी, मानसिक विकारता के शिकार हो जाते है, इस उम्र में व्यक्ति के जीवन का ज्यादा भरोसा नहीं रहता है कि वह इस उम्र में कब तक जियेगा या कभी भी बीमारी से ग्रस्त हो सकता है। इस उम्र में इच्छाशक्ति का दृढ़ होना बहुत आवश्यक है वर्ना इस उम्र में व्यक्ति मानसिक रोग का ज्यादा शिकार होता है और उसकी अचानक मृत्यु भी हो जाती है।
    इस वृद्धावस्था में ज्यादातर व्यक्ति का दूसरो की सेवा पर जिंदा रहना होता है। आजगल इस उम्र में कुछ परिवार के लोग हताश, निराश, बीमार अवस्था में छोड़ देते है, जिसके कारण उन्हें अनाथालय, वृद्धावस्था आश्रम में सहारा लेना पड़ता है। 
    इस वृद्धावस्था में व्यक्ति को चिडचिड़ाहट ज्यादा शामिल होती है। इस कारण उनको कुछ बीमारी, मानसिकता का शिकार होना हो सकता है।
    100 वर्ष की उम्र तक बहुत ही कम लोग जीवित रहते है जो कि नियम का पालन करते हुये अपने जीवन को जीते है लेकिन यह भी सच है कि एक न एक दिन व्यक्ति का शरीर नष्ट होना है। इस उम्र तक आते आते उन्होने अपने मन से, अपने शरीर से कितना संघर्ष झेला यह विचारणीय है, लेकिन हर परिस्थिति में व्यक्ति के मन की व्यग्रता से गुजरना होता है और मन को धीरज देकर सही सोच बनाये रखने पर ही मनुष्य ज्यादा उम्र तक जीता है, इसलिये ज्यादा चिंतित न होते हुये स्वयं सही दिशा से चलते हुये किसी की बुराई न करते हुये और स्वयं भी किसी का बुरा न करते हुये जीवन जीना सही जीवन जीना होता है।
अच्छाई के तत्वो का विकास
    जीवित शरीर को चलाने के लिये माॅस, हड्डी, और रक्त की आवश्यकता है, यह हर जीवित शरीर में मौजूद है। इनका संचालन मस्तिष्क में उपस्थित दिमाग कहां जाता है। और दिमाग को सही भाषा में मन शब्द से व्यक्त किया जा सकता है।
    मन मनुष्य के शरीर में अदृश्य रूप से उपस्थित है। जब तक मन शरीर में मौजूद है, तब तक मनुष्य का शरीर जीवित है। मन जब प्रफुल्लित रहता है, तब शरीर की सारी कोशिकायें, नसों एवं पूर्ण शरीर स्वस्थ रहता है और मन जब दुखी रहता है तो सब प्रकार की निराशाये मन-मस्तिष्क में जमा होने लगती है, ज्यादा समय तक मन की निराशा हमें बीमारी से ग्रस्त करती है और रोगी बनाती है। किंतु यदि मन को स्वयं प्रफुल्लित रखे तो कई रोग का अपने आप इलाज हो जाता है।
    मन में जब दूसरों के प्रति बुराईयां लाते है, वह बुराईयां ही हमारे लिये बुराईयां लाती है। किसी के द्वारा स्वयं की बुराई सुनने पर हम बुराई स्वयं ग्रहण करते है। कोई हमारा नुकशान करता है, हम उसके लिये बुरा करने की सोचते है, तब भी हम अपने आप बुराई ग्रहण करते है।
    हम किसी भी परिस्थिति में बुराई से बचे और हमें बुरी बुराई हमें सुनाई दें बुरा कहने वाले से भी अच्छी बात करें। यदि वह बार बार ऐसा करता है तो उसके साथ बार-बार अच्छा व्यवहार करें तो क्या वह कभी नहीं बदलेगा। वह नहीं बदलेगा ऐसा हो नहीं सकता। हाॅ आप दृढ़ संकल्पित हो अपने मंजिल की तरफ बढ़ते रहे आसानी से मंजिल मिल जाये तो मंजिल का मजा नहीं आयेगा। कठिनाइयों से मंजिल पाने का मजा कुछ और हैं।
शब्द की क्रिया
    जब किसी शब्द की क्रिया होती है तब उसकी एक दिशा होती है, एक गति होती है इसके विपरीत होने वाली शब्द की क्रिया उसकी दूसरी दिशा होती है और उसकी भी एक गति होती है।
    उदाहरण स्वरूप - एक दिन का समय 24 घंटे होता है, उसमें दिन होता है और रात होती है, यद्यपि सुबह सूरज निकलने पर दिन का प्रारंभ माना जाता है और सूरज के ढ़लने पर शाम का प्रारंभ होना और कुछ समय बाद रात होती है, अर्थात इस 24 घंटे में दिन और रात की क्रिया होती है (सुबह दिन प्रारंभ की क्रिया और शाम को दिन ढ़लने की क्रिया)। अर्थात् दिन का विरोधी शब्द रात है।
    दूसरे अर्थ में यदि हम किसी पर क्रोध करते है या कोई हम पर क्रोध करता है तो हम क्रोध का जवाब क्रोध से देने पर क्या वह कम नहीं होगा और ना ही वह समाप्त हो सकता है। यदि क्रोध करने वाले के लिये प्रेम का प्रयोग करें तो उसका क्रोध शांत होगा अथवा समाप्त होगा। क्रोध का विपरीत प्रेम है।
    हर क्रिया का एक शब्द है उस शब्द के विपरित किये गये कार्य उसकी विलोम क्रिया है। 
अच्छाई के तत्व का प्रांरभ और बुराई से बचने के उपाय
सच-झूठ - सच एक उजाला है, एक चमकता हुआ सूरज है। सच बोलने से व्यक्ति का चरित्र साफ नजर आता है, किंतु झूठ बोलने वाला व्यक्ति चालाक व मक्कार होता है। सच को एक बार में ही स्पष्ट किया जा सकता है, किन्तु झूठ को छुपाने के लिये कई झूठ शामिल होते है।
    सच बोलने पर व्यक्ति मन में शांति का अनुभव करता है, किंतु झूठ बोलने पर व्यक्ति चिंतित होता है तथा उसका मन अशांत होता है।
    सच बोलने वाला व्यक्ति दृढ़ निश्चिय होता है, वह नियम का पालन करने वाला होता है। उसकी सोच तर्कसंगत होती है, वह हर चीज को तर्क में रखकर विचार करता है और तर्क की कसौटी पर जब वह खरी उतरती है तो वह उसे अपने जीवन में ढ़ालता है। सच बोलने वाला व्यक्ति निडर होता है, उस किसी हानि का डर नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति झूठ बोलने वालो से नफरत करते है। ऐसे व्यक्ति बहुत कम होते है।
    झूठ बोलने वाला व्यक्ति स्वार्थी होता है और वह लालची होता है। झूठ किसी को छुपाने या किसी का अहित करने के लिये बोला जाता है, इसके अतिरिक्त खुद को लाभ पहुंचाने या दूसरो को लाभ देने के लिये झूठ बोला जाता है। दूसरो को लाभ पहुंचाने के लिये बोला गया झूठ भी किसी न किसी का नुकशान करता है, इसलिये झूठ वही काम का जिससे अच्छे कार्य हो उससे अधिक से अधिक लोगो को लाभ हो या किसी की जान बचाई जा सके वह जान जो उचित हो, उपयुक्त हो।
उपाय -  जो व्यक्ति सच बोलते है, और सच में विश्वास रखते है उनके लिये किसी उपाय की आवश्यकता नहीं है, किंतु जो लोग सच बोल नहीं पाते उनके लिये सप्ताह में एक दिन स्वयं ऐसा निश्चित करना होगा उस दिन वह सच बोले। धीरे धीरे यह अवधि बढ़ाई जावें जिससे वह सच करने का आदि हो सकता है।
    सच बोलना किसी भी प्रकार का दबाव लेना नहीं है, यह तो उसके अंदर से वीर भावना, सही भावना को दर्शाना होता है। झूठ व्यक्ति इसलिये बोलता है या तो उसे अपनी कोई चीज खोने का डर होता है या दूसरो से कोई चीज छिन लिये जाने का डर होता है। दूसरी परिस्थिति में या तो वह स्वयं ही डरा होता है या दूसरो से डर भावना से झूठ बोलता है।  तीसरी परिस्थिति में वह लालची होता है। वह झूठ बोलकर भी वह चीज पा लेना चाहता है वह दूसरों को नुकशान पहुंचाने के विचार से झूठ बोलता है। चैथी परिस्थिति में वह दूसरो के लाभ हानि का विचार न करते हुये उसकी आदत बना लेता है और उस आदत को अपना मनोरंजन समझ लेता है तथा दूसरों का मनोरंजन करने लिये भी वह झूठ बोलता है। पांचवी परिस्थिति - जब वह मजबूर होता है यह मजबूरी किसी भी प्रकार की हो सकती है उस स्थिति में वह झूठ बोलता है तथा उसे झूठ बोलने के लिये मजबूर किया जा जाता है। यही पाॅच परिस्थिति में वह झूठ बोलता है। 
    सच बोलने वाला व्यक्ति एक शेर की भांति होता है, क्योंकि सच बोलना एक कठिन कार्य है, उनके लिये जो विचार करते है कि इससे क्या लाभ है, लेकिन जिसने अपने दिल से मन मस्तिष्क से डर को दूर किया वह सच बोलने से नहीं डरता। सच बोलने के लिये कोई तपस्या की आवश्यकता नहीं है।
    सच बोलने के लिये तो दृढ़ निश्चिय की आवश्यकता है और सच बोलने से चरित्र की पवित्रता होती है। शुद्ध पानी को हर कोई पीना चाहता है, किन्तु पानी में कचरा आ जाये तो उसे पीने की इच्छा नहीं होती।
    उसी प्रकार यदि व्यक्ति सच बोले तो उसका चरित्र शुद्ध पानी की तरह होता है और उसकी बात हर कोई मानने लगता है या उसकी बात पर हर कोई अमल करना पसंद करता है।
    झूठ बोलने से केवल स्वार्थ साधा जा सकता है, जिस व्यक्ति ने झूट बोलना शुरू किया उसके लिये सच बोलना कठिन हैं, क्योंकि झूठ बोलकर भीड़ इकट्ठा की जा सकती है, लेकिन सच बोलकर भीड़ भाग जाने का डर रहता है। इस कारण ऐसे स्वार्थी व्यक्ति ही झूठ का सहारा लेते है। सच बोलने वाला व्यक्ति हर प्रकार से वीर होता है, दृढ़ निश्चियी होता है। यदि कहीं वह हार भी जायें तो भी वह अपने दिल में विजयी होता है।
प्रशंसा - निंदा
    प्रशंसा व्यक्ति के लिये प्रेरणास्प्रद होती है, ताकि वह जो कार्य कर रहा होता है उसमें और लगनशील हो और नये कार्य को स्फूर्तिमय रूप से कर सकें।
    प्रशंसा दो प्रकार से प्राप्त होती है। प्रथतः  व्यक्ति नियमित रूप से किसी कार्य को करते  रहता है और उसको कुशलता से करने में दक्ष हो जाता है तो उसकी प्रशंसा होती है। द्वितीय - व्यक्ति द्वारा ऐसा कार्य किये जाने से जो कि कठिन कार्य था अचंभित कार्य था उसे किये जाने पर प्रशंसा प्राप्त होती है।
    प्रशंसा करने वाले दो प्रकार के व्यक्ति होते है एक वे जो चापलूसी, स्वार्थी, झूठे होते है वे प्रशंसा किसी भी कारण या कोई भी कार्य करने पर करते है, क्योंकि इसमें उनकी कोई लाभहित की मंशा होती है। ऐसे व्यक्ति वैभव, वर्चस्व के कारण भी उनकी प्रशंसा, चापलूसी  करते रहते है।
    दूसरे प्रकार की प्रशंसा में व्यक्ति बिना स्वार्थ के प्रशंसा करता है, वह व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के मन के स्तर को गिरने नहीं देना चाहता। मन को प्रफुल्लित करने के लिये प्रशंसा करना या उस व्यक्ति द्वारा अच्छा कार्य किये जाने के कारण प्रशंसा करता है या ऐसा कार्य जो वाकई में कठिन हो ऐसा किये गये कार्य के लिये प्रशंसा करता है।
    इसके विपरित निंदा व्यक्ति को निराशा प्रदान करता है, क्योंकि वह व्यक्ति को पसंद नहीं होता उसे तो केवल प्रशंसा सुनने की आदत होती है। इसी निंदा में बुराई शामिल होती है। चाहे अपना मित्र, परिचित, रिश्तेदार द्वारा किसी कार्य के लिये व्यक्ति की निंदा की जाती है तो वह व्यक्ति उस व्यक्ति के लिये मन में बुराई रखता है या उसे पसंद नहीं करता।
    निंदा दो प्रकार की होती है। एक क्रोध करने वाले व्यक्ति के द्वारा क्रोधवश बुरी बात करने से उसकी बात बुरी लगती है, जिससे वह व्यक्ति निंदा का शिकार होता है। दूसरा वह जो अपने वैभव, वर्चस्व के कारण दूसरो के द्वारा जलन की भावना से ग्रसित होकर निंदा का शिकार होता है।
    व्यक्ति प्रशंसा से जिस प्रकार खुश होता है उसी प्रकार निंदा से दुःखी और क्रोधित होता है। निंदा करने वाले सभी व्यक्ति द्वेष या जलन रखने वाले नहीं होते है, कुछ व्यक्ति सही राह दिखने के लिये निंदा करते है। उनका उद्देश्य सही कार्य किये जाने से होता है वे बाते हमें निंदा के रूप में नजर आती है। 
    निंदा कभी कभी सही दिशा भी प्रदान करती है। प्रत्येक निंदा क्रोध करने योग्य नहीं होती है।
उपाय -    व्यक्ति को प्रशंसा में खोना नहीं चाहिये ना प्रशंसा में डूबना चाहिये, क्योंकि जिस व्यक्ति का स्वयं की प्रशंसा या अपने द्वारा किये गये कार्य की प्रशंसा सुनने की आदत होती है वह चापलूसो व मक्कारों के बीच घिर जाता है और उसे ऐसे लोगो के साथ रहना पसंद होता है। यदि वह कार्य की सरलता पर ही ध्यान दें और प्रशंसा को अत्यधिक रूप में न ले वह व्यक्ति महानता की दिशा की ओर बढ़ता है। इसके अतिरिक्त निंदा मिलने पर व्यक्ति को अपनी दिशा से भटकना नहीं चाहिये। उसे धैर्य रखना चाहिये और ऐसी निंदा जिसमें सुधार कर कार्य की सही दिशा दी जा सकती है। उसे सुधार कर कार्य की दिशा दी जा सकती है। उस निंदा को स्वीकारे और सही गति दें जो निंदा कार्य के विरूद्ध हो उसे छोड़ दे उसे स्वीकार ना करें। &nbs