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निब्बान (निर्वाण)

TPSG

Saturday, April 20, 2019, 03:01 PM
Nibban

निब्बान (निर्वाण)
    अष्टांगिक मार्ग की सब श्रेणियों को उत्तीर्ण करके मनुष्य किस परमपद को प्राप्त करता हैं ? उसका क्या स्वरूप है? यह प्रश्न प्रत्येक विचारशील मनुष्य के मन में आता है। बौद्ध धर्म के सिद्धान्त मनुष्य को दुःख क्षय की ओर ले जाते हैं यथापि वह दुःखक्षय बिना उद्योग के नहीं प्राप्त होता। उस उद्योग का क्या फल है? इसका उत्तर यही मिलता है कि दुःख सेनिवृत्ति। दुःख से निवृत्त होकर क्या रह जाता है? इसका उत्तर शांति व सुख है। इसका उत्तर स्पष्ट नहीं मिलता। मनुष्य अपने वासनामय कर्मों से एक भाव की विभीषिका बनाए हुए हैं। वह विभीषिका दूर हो जाती है, उसका सारा भयानक दृश्य छिन्न-भिन्न हो जाता है। क्या हम उस विभीषिका से मुक्त होकर किसी अन्य वास्तविक संसार में आते हैं? इसका बुद्ध धर्म की ओर से यही उत्तर दिया गया कि विभीषिका में पड़ा हुआ मनुष्य उसके दुःख से मुक्त होना चाहता है। फिर भी यह प्रश्न रहता है कि हम उसकी वास्तविक अवस्था रूप अपने मन में चिन्तित न कर सकें, किन्तु वह वास्तव में ऐसी अवस्था है भी या नहीं? उत्तर यही है कि अवस्था है तो उसे दुःख से मुक्त होने के लिये बुद्ध के दिये दुःख निरोध का पालन कर दुःख से मुक्ति पाना होगा। बौद्ध धर्म आत्मा को नहीं मानता। बौद्ध लोग सब वस्तु को अनित्य और दुःखमय मानते, सबको अनात्म मानते है। पज्ज स्कन्दों अर्थात् रूप, वेदना, संज्ञा, पडायतन तथा विज्ञान की कर्मरज्जु क्षीण होकर टूट जाती है तो स्कंध टूटकर पृथक हो जाते है। आत्म-प्रतिति का भी नाश हो जाता है। वासना का क्षय हो जाने से नाम-रूप इन्द्रधनुष के चित्र विचित्र रंगों की भांति विलीन हो जाते हैं। निर्वाण निःशेषता का एक बार बुद्ध से जब बच्छगोत्त परिव्राजक ने आत्मा के विषय में पूछा कि वह शाश्वत है या नहीं इस पर उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया। प्रश्न के दुबारा पूछे जाने पर भी कोई उत्तर नहीं मिला।
    राज मिलिन्द ने आचार्य नागसेन से निर्वाण के विषय में पूछा तो उन्होंने उसको बताने में अपनी असमर्थता प्रकट की।
    निर्वाण दो प्रकार का माना जाता है। 1. उपाधिशेष 2. निरूपाधि शेष। इसी को पूर्ण निर्वाण भी कहते हैं। इसका वर्णन प्रायः निषेधात्मक ही आता है।
    बुद्ध भगवान दुःख की निवृत्ति को एक प्रकार की भवेच्छा अर्थात् जीवन इच्छा कहते है, इसी हेतु उन्होंने निर्वाण का भावात्मक वर्णन नहीं किया।
    कुलीन तथागतोचित कर्म करते हैं। तथागत परिनिर्वाण का उपदेश षिक्षा के लिये देते हैं, जिससे लोग आनन्द एवं उपेक्षा में न पड़ जावें। यदि निर्वाण आत्म-रूपी दीपक का बुझ जाना नहीं है तो क्या हो सकता है? वह एक शांति की स्थिति है जिसमें न जन्म है न जरा है और न मरण। जिस प्रकार आंधी के मिट जाने पर शान्त वायु बहती है, वैसे ही निश्चल निर्वाण में आत्मा की स्थिति है। जीवन के दूर हो जाने से निर्मल वायुमण्डल की सी आत्मा की स्थिति हो जाती है। उमसें किसी प्रकार का क्लेश, राग, द्वेष नहीं रहता।
    यद्यपि यह कहना कठिन है कि स्वयं बुद्ध ने निर्वाण को भावात्मक माना है अथवा अभावात्मक। तथापि यह अवश्य कहना पड़ेगा कि जब विषयो में उन्होंने दोनों अन्तों से दूर रहकर मध्यमा प्रतिपदा अर्थात् बीच की राह स्वीकार की तो निर्वाण के सम्बन्ध में इस मार्ग को छोड़ देना उचित न होगा। निर्वाण के          सम्बन्ध में बुद्ध का मौन रहना इस बात का द्योतक है कि न वह उसको शाश्वत ही मानते हैं और न अशाश्वत। निर्वाण न पुर्ण तथा भावात्मक है न पूरा पूरा अभावात्मक। भाव इतना ही है कि वह एक शान्त निश्चल अवस्था है। अभावानात्मक इस अंश में है कि उमसें जीवन, मरण, उत्थान, पतन, सर्ग, विसर्ग, वासना का नाश हो जाता है, किन्तु अत्यन्ताभाव नहीं हो, जो कुछ रहता है वह एक आनन्द की अवस्था है।
- संग्रहक - टीपीएसजी

 





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