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महाप्रजापति गौतमी

TPSG

Saturday, April 20, 2019, 06:36 PM
Mahaprajapati Gautami

महाप्रजापति गौतमी
    ‘‘बहूनं वत अत्थाय माया जनयि गौतमं’’
    उपर्युक्त शब्द महाप्रजापति गौतमी के हैं। वह कहती है - ‘‘अहो! बहुतों के लिए ही माया ने गौतम को जना।’’ इनसे अधिक उदात्त शब्दों में किसी छोटी बहन ने अपनी बड़ी स्वर्गीया बहन को श्रद्धान्जलि अर्पित नहीं की। इस देश में स्त्री-जाति का गौरव सामान्यतः ‘मातृग्राम’ (मातुगाम) अर्थात् ‘‘माताओं का समुदाय’’ शब्द ही प्रत्युक्त होता है। संसार की जितनी स्त्रियों हैं, माताएं हैं, बौद्ध संघ की यही मान्यता थी। गौतमी अपनी बहन के इसी मातृत्व के गौरव को स्मरण करती हुई कहती है - उसने गौतम-सा पुत्र जना, गौतम-जो अपने प्रयत्न से लोक में सम्यक् सम्बुद्ध हुआ, अन्धकारग्रस्त लोक के लिए जिसने ज्ञान का अक्षय दीपक जलाया, जिसका जीवन अपने लिये नहीं, बल्कि बहुतों के हित के लिए, सारी मनुष्य-जाति के हित के लिए उपयुक्त हुआ, उस गौतम को महामाया ने जना। माता के लिए इससे अधिक गौरव की और क्या बात हो सकती है?     भगवान् गौतम की माता (महामाया) बच्चा जनने के सातवें दिन परलोक चल बसीं। बच्चे का पालन-पोषण उनकी छोटी बहन महा-प्रजापति गौतमी ने किया। महाप्रजापति गौतमी का जन्म देवदह नगर (लुम्बिनी वन में जहां भगवान बुद्ध का जन्म हुआ, उसी के समीप यह एक कस्बा था) में सुप्रबुद्ध के घर में हुआ था। सुप्रबुद्ध कोलिय गणतन्त्र के प्रधान थे। उन्होंने अपनी दोनों कन्याओं का विवाह एक साथ राजा शुद्धोदन के साथ कर दिया था। जब महामाया मर गई तो प्रजापति के अपना भी एक पुत्र था। जिसका नाम था नन्द। गौतमी ने नन्द को तो दासियों को दे दिया और स्वयं बड़ी तन्मयता के साथ अपनी बड़ी बहन के पुत्र गौतम को पाला-पोसा। ‘बुद्ध’ के निर्माण में इस देवी का कितना हाथ था, यह हम उस कृतज्ञता और आदर से ही जान सकते हैं जो भगवान् अपनी इस क्षीरदायिका माता के प्रति सदा रखते थे। जैसा हम अभी देखेंगे, स्त्रियों को बुद्ध के शिष्यत्व का जो सौभाग्य मिला वह इसी देवी के आचार-गौरव के कारण।
    97 वर्ष की अवस्था में शुद्धोदन की मृत्यु हुई। उस समय भगवान् बुद्ध वैशाली में थे। पति की मृत्यु के बाद प्रजापति ने संसार छोड़ने की इच्छा प्रकट की। इसके लिए वह भगवान् बुद्ध से अनुमति लेने का अवसर खोज रही थी। सौभाग्यवश यह अवसर भी मिला और भगवान् कपिलवस्तु आये। शाक्य और कोलिय क्षत्रियों के बीच रोहिणी नदी के जल के ऊपर झगड़ा चल रहा था। उसी को शान्त करने के लिये भगवान् कपिलवस्तु आए थे। झगड़ा शान्त होने पर भगवान् ने ‘‘कलहविवाद-सुत्त’ का उपदेश दिया। द्वेषपूर्ण  आचरणवाले (दोसचरितानं) मनुष्यों को लक्ष्य कर यह उपदेश दिया गया था। उसे सुनकर एक दम 500 शाक्य घर छोड़ कर प्रव्रजित हो गए। उन सबकी स्त्रियों सहित प्रजापति भी प्रव्रज्या मांगने आ गई, परन्तु भगवान् ने उन्हें प्रव्रजित होने की अनुमति नहीं दी और वैशाली चले आये। बाद में आनन्द की कुशलता से वैशाली में प्रव्रज्या की आज्ञा मिली। प्रव्रजित होने के बाद ही प्रजापति गम्भीर साधना में लग गई।
    एक बार गौतमी ने भगवान् को समर्पित करने के लिये सुन्दर वस्तू बनाई जो गौतमी ने भगवान् को भेंट की जिसे भगवान् ने अपने लिये अस्वीकार करते हुए कहा, ‘‘गौतमी् इसे संघ को दे दो। संघ को देने से मैं पूजित हूंगा और संघ भी।’’ आनन्द ने भगवान् से सुन्दर वस्तू ग्रहण करने की विनती की, किन्तु शास्ता ने समझाया कि प्रजापति केे ही अधिक कल्याण के लिये उन्होंने ऐसा किया है। व्यक्तिगत दान की अपेक्षा संघ को दिया हुआ दान हर हालत में अच्छा है। संघ बुद्ध से भी बड़ा है। इसी प्रसंग में उन्होंने ‘दक्षिणा-विर्भग-सुत्त, का उपदेश भी दिया।
    भगवान् प्रजापति का बड़ा आदर करते थे। प्रजापति भी संघ के समस्त लोगों का ध्यान रखती थी। महाप्रजापति गौतमी ने 120 वर्ष की अवस्था में परिनिर्वाण प्राप्त किया।
    गौतमी ने एक उदात्त-भाव-पूर्ण गाथा हमारे लिये छोड़ी है, जिसमें उसका सौमनस्य, साधनापूत अनाविल जीवन और सबसे अधिक वृद्ध के प्रति अपारा कृतज्ञता और श्रद्धा-भाव स्वच्छ दर्पण की भांति प्रतिबिम्बित होते हैं। यह गाथा इस प्रकार है:
    हे बुद्ध! हे वीर! हे सर्वोत्तम प्राणी! तुम्हें नमस्कार!
    जिसने मुझे और अन्य बहुत से प्राणियों को दुःख से उबारा।
    सब दुःखों के कारण का मुझे पता चल गया, उनके मूल
    कारण वासना का भी मूलोच्छेदन कर दिया गया।
    आज मैं दुःख-निरोग-गामी आर्च अष्टागिंक मार्ग में विचरण करती हूॅ।
    माता, पुत्र, पिता, भाई, मातामही मैं पूर्व जन्मों में अनेक बार बनती रही,
    यथार्थ ज्ञान को न जानती हुई मैं लगातार संसार में घूमती रही।
    मैंने उन भगवान् बुद्ध के दर्शन किए, यह मेरा अन्तिम शरीर है! 
    मेरा अवागमन क्षीण हो गया, अब मुझे फिर जन्म लेना नहीं है!
    पुरूषार्थ में लीन, आत्म-संयमी, नित्य दृढ़ पराक्रम करने वाले,
    इन संघगत भिक्षुओं को अवलोकन करो - 
    यह बुद्धों की वन्दना है।
    अहो! बहुतों के कल्याण के लिये ही माया ने गौतम को जना,
    जिसने व्याधि और मरण से त्रस्त प्राणियों के दुःख-पुंज को काट दिया!
- संग्रहक - टीपीएसजी

 





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