सिक्ख इतिहास TPSG Saturday, August 24, 2019, 01:01 PM सिक्ख इतिहास गुरू नानक साहिब सिक्ख धर्म की नींव गुरू नानक साहिब ने रखी थी। गुरू नानक साहिब (20.10.1469-22.9.1539) का जन्म माता तृप्ता और बाबा कल्याण दास (पुत्र बाबा शिव नारायण और पोता बाबा राम नारायण) के घर राय भोई दी तलवंडी (अब नानकाणा साहिब) जिला शेखूपुरा, पाकिस्तान में हुआ था। जब आप पांच साल के हुए तो आपको स्कूल भेजा गया। यहाँ आपने संस्कृत भी पढ़ी। तेरह साल की आयु में आपने फारसी और अरबी में भी निपुणता हासिल कर ली थी। आपने संस्कृत, फारसी और अरबी की बहुत किताबें पढ़ी। सोलह साल की आयु में आप अपने क्षेत्र के सबसे अधिक शिक्षित युवक थे। 1487 में आपका विवाह (माता) सुलखनी के साथ हुआ। आपके घर श्री चन्द और लख़मी दास दो बेटों ने जन्म लिया। नवम्बर 1504 में आप सुल्तानपुर लोधी चले गये और नवाब दौलत खां के मोदी खाने में नौकरी करने लगे। आप तीन साल वहाँ रहे। अक्टूबर 1507 में आप अकाल पुरख (परमात्मा) के हुक्म अनुसार सिक्ख धर्म प्रचार हेतु सुल्तानपुर से चल पडे़। आपके साथ आपके प्रिय भाई मरदाना भी गए। आप सऊदी अरब, इरान, इराक, तिब्बत, अफगानिस्तान, श्रीलंका, पाकिस्तान, असाम, बंगाल, कश्मीर, पंजाब और भारत के अलग-अलग स्थानों पर गए। आप हिन्दुओं, बौद्धियों, जोगियों, सूफ़ियों और मुसलमानों के बडे़-बडे़ केन्द्रों और डेरों पर गए और वहाँ विद्ववानों, दार्शनिकों, प्रचारकों के अतिरिक्त आम लोगों के साथ भी अध्यात्मिक विचार विमर्श किया। आप जहाँ भी गए बुद्धिमान लोगों और साधारण लोग, सभी ने आपके प्रताप के आगे सिर झुकाया और आपकी शिक्षा कबूल की। आपने इन 13 वर्षों में चार उदासियों बड़ी (यात्राओं) में हजारों लोगों को अपने धर्म के साथ जोड़ा। 1522 में आपने रावी नदी के किनारे करतारपुर नाम के गांव की नींव रखी और अपने बाकी की आयु का अधिकांश भाग यही पर व्यतीत किया। इस बीच भी आप अलग-अलग स्थानों पर प्रचार हेतु जाते रहे। गुरू नानक साहिब ने प्रचार किया कि: वाहिगुरू़ (परमात्मा) सिर्फ एक है। उसकी शक्ति की सीमा नहीं आँकी जा सकती। वह हर जगह विद्यमान है। उसकी हस्ती अपार है। वह आरम्भ से ही अस्तित्व था, रहा है और हमेशा ही रहेगा। उन्होंने कहा ‘‘मुक्ति’’ (जीव में वाहिगुरू़ के अंश, आत्मा, का पार पा लेना) मरने के बाद नहीं बल्कि इस जीवन में ही संभव है। परमात्मा का ‘‘नाम जपने’’ और सच्चाई की जिन्दगी जीने से इन्सान ‘मुक्ति’ प्राप्त कर सकता है। सच्चाई की जिन्दगी जीने के लिए धर्म की कमाई करना, बांट कर खाना, दूसरों की सहायता करना, वाहिगुरू़ की कृपा को अपार मानना, सभी लोगों के भले की इच्छा और प्रार्थना करना, कमजोर और दबे लोगों के मानवी अधिकारों की रक्षा करना व वाहिगुरू़ के हुक्म के आगे शीश झुकना मानव का कर्तव्य है। गुरू नानक साहिब ने दिखावे की रस्मों तथा मर्क काण्डों का बहिस्कार करते हुए व्यावहारिक जीवन व्यतीत करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मुक्ति के लिए घर छोडने की आवश्यकता नहीं है बल्कि गृहस्थ जीवन जीते ही इसको प्राप्त किया जा सकता। उन्होंने कहा कि मनुष्य को दुनिया नहीं बल्कि माया की पकड़ को छोड़ने की आवश्यकता है। गुरू नानक साहिब ने अपने दर्शन को गुरवाणी में प्रस्तुत किया है। उन्होंने 947 सबद लिखे। आपकी वाणी में जपुजी साहिब, आसा दी वार, सिद्ध गोष्ठी, बारामाह उंकार (दक्खनी) इत्यादी भी शामिल है। आप की सारी वाणी गुरू ग्रंथ साहिब में संकलित है। गुरू नानक साहिब ने सिक्ख धर्म को धर्म के रूप में अपनी जिन्दगी में ही स्थापित कर दिया था। उन्होंने अलग-अलग स्थानों में ‘संगत’ और धर्मशालायें स्थापित की आपने ज्योति-ज्योति समाने से पहले ही भाई लहणा (गुरू अंगद साहिब) को अपनी गद्दी का उत्तराधिकारी बनाया। गुरू नानक साहिब ने अपने पुत्र श्रीचंद को गद्दी पा देकर अपने सबसे अधिक योग्य सिक्ख को चुना। गुरू नानक साहिब ने अंगद साहिब को गुरगद्दी सौंपने के साथ अपनी सारी वाणी और अन्य सामग्री के ग्रंथ जो भी उनके पास थे, भी उन्हें सौंप दिये और अपना प्रताप गुरू अंगद साहिब की हस्ती में स्थापित कर दिया। भले ही वह दो अलग काया थे पर उनमें एक ही हस्ती और एक ही ज्योति थी। गुरू नानक साहिब करतारपुर में 22 सितम्बर 1539 को ज्योति-ज्योत समा गए। गुरू अंगद साहिब गुरू अंगद साहिब (गुरगद्दी 22.9.1539-29.3.1552) का जन्म माता रामों (आप को सभराई, मनसा देवी और दया दया कौर भी लिखा है) और बाबा फेरू मल (पुत्र बाबा नारायण दास तरेहन) के घर गांव ‘मत्ते दी सरां’ (मुक्तसर के नजदीक) में हुआ था। अब इस गांव ‘नांगे दी सरां’ कहा जाता है। आपका पहला नाम लहणा था। आपके माता-पिता हिन्दू देवी दुर्गा को पूजते थे। जनवरी 1520 में आपका विवाह (माता) खीवी के साथ हुआ। आपके घर दो बेटे (दासू 1524 में और दातू 1537 में) और दो बेटियां (अमरो 1526 में और अनोखी 1533 में) पैदा हुई। एक बार अक्टुबर 1537 में, जब आप दुर्गा पूजा के लिए यात्रा पर जा रहे थे तब रास्ते में आपने पड़ाव डाला। करतारपुर में आप गुरू नानक साहिब के दर्शन करने भी गए। गुरू नानक साहिब के उपदेशों से भाई लहणा इतने प्रभावित हुए कि आपने देवी के मंदिर जाने का इरादा ही छोड़ दिया। आपने अनुभव किया कि जिस देवी की कृपा के राह में इतने सालों से देख रहे थे वह तो गुरू नानक साहिब की दासी बनने लायक भी नहीं थीं। इस दिन से भाई लहाणा गुरू नानक साहिब के ही हो कर रह गये। आपने अगले दो वर्ष गुरू नानक साहिब की सेवा में व्यतीत किए। 24 जून 1539 के दिन गुरू नानक साहिब ने भाई लहणा को अपनी गद्दी का अत्राधिकारी घोषित कर दिया और उनको नया नाम (गुरू) अंगद (साहिब) दिया। 7 सितम्बर 1539 को आप को रस्म के तौर पर गुरगद्द भी सौंप दी। गुरू नानक साहिब ने अपना प्रताप (गुरू) अंगद साहिब की हस्ती में स्थापित कर दिया और 22 सितम्बर ज्योति-ज्योत समा गये। इस के बाद गुरू अंगद साहिब खडूर साहिब चले गए। गुरू अंगद साहिब ने अपने समय के दौरान अलग-अलग स्थानों की यात्रा की और सिक्ख धर्म का प्रचार किया। गुरू अंगद साहिब ने पंजाबी भाषा और गुरमुखी लिपी में प्रचार किया। गुरमुखी लिपी का भले ही गुरू नानक साहिब ने भी प्रयोग किया था किंतु गुरू अंगद साहिब द्वारा इसको कौमी लिपी के रूप में प्रचारित करने से सिक्खों में भाईचारक संबंध बढ़े। गुरू अंगद साहिब ने गुरू नानक साहिब की जन्मशाखी भी लिखवाई (बाद में इसमें बहुत सी गलत बाते शामिल करके इसको वर्तमान ’भाई बाले वाली जन्मसाखी‘ के रूप में प्रचारित किया गया)। गुरू अंगद साहिब ने गुरू नानक साहिब द्वारा शुरू की गई लंगर की प्रथा का भी प्रचार किया। गुरू साहिब ने ‘मल अखाडे़‘ शुरू किये और सिक्ख युवको में खेलों और कुश्तियों का उत्साह बढ़ाया। उन्होंने अध्यात्मिकता के साथ-साथ स्वस्थ शरीर पर भी बल दिया। गुरू अंगद साहिब के समय खडूर साहिब एक बड़ा धार्मिक केन्द्र बन गया। आपने वाणी की रचना भी की। आपके सभी 63 श्लोक गुरू ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। 1552 में 48 वर्ष की आयु में आप ज्योति-ज्योत समा गये। ज्योति-ज्योत समाने से पहले आपने गुरू अमरदास साहिब को तीसरे नानक स्थापित कर दिया। गुरू अमरदास साहिब गुरू अमरदास साहिब (गुरगद्दी 29.3.1552 - 1.9.1574) का जन्म माताबख़त कौर (आपको सुलखणी देवी और लखमी देवी भी लिखा गया है) और बाबा तेज भान (पुत्र बाबा हरी दास) के घर जिला अमृतसर के गाँव बासरके (अब बासरके गिल्ला) में हुआ। आपके माता-पिता वैष्णव विचारों वाले थे और प्रति वर्ष हरिद्वार और कुरूक्षेत्र जाया करते थे। भाई अमरदास जी का विवाह 1532 में (माता) मनसा देेवी के साथ हुआ। आपके घर एक बेटी (भानी 1533 में) और दो बेटे (मोहन 1536 में और मोहरी 1539 में) पैदा हुए। आपके एक भतीजे का विवाह गुरू अंगद साहिब कीे बेटी बीबी अमरो के साथ हुआ था। एक दिन बीबी अमरो को पाठ करते सुन आपके दिल में गुरू साहिब को मिलने की इच्छा पैदा हुई। बीबी अमरो आपको खडूर साहिब ले गई। गुरू अंगद साहिब के दर्शन करके भाई अमरदास इतनेे प्रभावित हुए की आप उनके ही होकर रह गये। आपने बाकी सारी आयु गुरू साहिब के साथ उनकी सेवा में ही व्यतीत की। यह बात 1544 की है। 1552 में गुरू अंगद साहिब ने भाई अमरदास को तीसरे नानक स्थापित करने का निर्णय कर लिया। आपने अपना प्रताप गुरू अमरदास की हस्ती में स्थापित की दिया और सारी वाणी और अन्य पोंथियां भी सौंप दी। 1557 में गुरू अमरदास साहिब ने सिक्ख धर्म के प्रचार के लिए एक लम्बी यात्रा की। इस दौरान आप अनेक स्थानों के अतिरिक्त हरिद्वार और कुरूक्षेत्र भी गए। अनेक लोग सिक्ख धर्म में शामिल हुए। गुरू अमरदास साहिब ने सिक्ख धर्म के प्रचार के लिए 22 मंजियों (बडे़ केन्द्र) और 52 पीड़ियों (लघु केन्द्र) स्थापित कीं। इन सभी 74 स्थानों पर आप ने एक-एक प्रचारक को मनोनीत किया। इन प्रचारो में अलग-अलग जातियां और क्षेत्रिय स्थानों के सिक्खों के साथ-साथ एक स्त्री भी शामिल थी। उन्होंने गुरू नानक साहिब के हुक्म के अनुसार औरतों में पर्दा और सती प्रथा की कुरीति भी समाप्त की। ऐसा लगता है कि कुछ वर्ष बाद अकबर ने सती प्रथा खत्म करते समय गुरू साहिब का उपदेश ही माना होगा। 1556 मेें आपने गोइंदवाल में बाउली तैयार करवाई ताकि क्षेत्र में पानी की कमी का समाधान हो सके। बाद में अन्य गुरू साहिबान ने भी कई और स्थानों पर भी कुएँ और बाऊलियां बनावाई। गुरू अमरदास साहिब ने पहली माघ, वैशाख, और हिन्दू त्यौहार दिवाली वाले दिन प्रत्येक वर्ष गोइंदवाल में सिक्खों के समागम करने शुरू किये। इन समागदमों में हजारों सिक्ख पहूंचा करते थे। गुरू साहिब ने यह दिन इसलिए नहीं चुने कि सिक्ख धर्म माघी, वैशाख और दीवाली को महत्व भी था बल्कि इसलिए चुने क्योंकि यह दिन साधारण लोगों को मालूम होने के कारण कार्यक्रमों का पता करना आसान था और उन दिनों कैलेंडर भी नहीं हुआ करते थे। गुरू अमरदास ने गुरू नानक साहिब की ओर से शुरू किये गये लंगर को सिक्खों के जीवन का एक अटूट भाग बना दिया हैं। दरबार में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिये पहले लंगर खाना अनिवार्य कर दिया। लंगर का अर्थ मुफ्त खाना नहीं था बल्कि अध्यात्मिक सामाजिक और भाईचारक साँझ थी जिससे बड़े होने का अहंकार और छोटे होने की हीन भावना भी समाप्त होती है। जब मुगल बादशाह अकबर बादशाह पहली बार गोइंदवाल गए तो उन्हें भी गुरू साहिब के दर्शन करने से पहले लंगर खाना पड़ा था। गुरू अमरदास साहिब के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुए कि उन्होेनें सिक्खों को यात्रा कर की छूट दे दी। उन दिनों हरिद्वार और कुरूक्षेत्र जाने वाले को गंगा और जमुना नदी पार करते समय कर देना पडता था। अकबर ने घोषणा की कि क्योंकि सिक्ख हिन्दू नहीं हैं इसलिए यात्रा कर सिक्खों पर लागू नहीं है। गुरू अमरदास साहिब के समय सिक्खों की संख्या बहुत अधिक हो चुकी थी। गुरू अमरदास साहिब ने भी वाणी की रचना की। आपके लिखे सारे के सारे 869 श्लोक गुरू ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। इनमें ’आनंद साहिब‘ बाणी भी है जिसको सिक्ख प्रतिदिन पढ़ते है। पंथ की सेवा करते आप 1574 में ज्योति-ज्योत समा गये। ज्योति-ज्योत समाने के कुछ समय पहले भाई जेठा जी को चोैथे नानक बनाया और उनको नया नाम (गुरू) रामदास साहिब दिया। पहले उन्होंने गुरू रामदास साहिब को एक आदर्श सिक्ख नगर कायम करने के लिए प्रेरणा भी दी थी। इस नगर की नींव 1564 में रखी गई थी। उस समय इस का नाम गुरू दा चक्क रखा गया। फिर यह चक्क रामदास बना और अब इसे अमृतसर कह कर जाना जाता है। गुरू रामदास साहिब गुरू रामदास साहिब (गुरगद्दी 1.9.1574-1.9.1581) का जन्म माता दया कौर और बाबा हरिदास (पुत्र बाबा ठाकर दास, पोता बाबा हरदियाल सोढ़ी) के घर लाहौर में हुआ था। आपके बचपन का नाम जेठा था। आप अभी सात ही साल के थे कि आप के पिता का देहांत हो गया। 1541 में आपकी माता आपको गांव बासरके ले गई। यहां आप का मिलन (गुरू) अमरदास साहिब से हुआ। कुछ वर्षाें के बाद (गुरू) अमरदास साहिब गोइंदवाला चले गए, और भाई जेठा को भी ले गये। गुरू अमरदास का भाई जेठा से इतना प्यार था कि वह जहां भी जाते भाई जेठा को भी साथ ले जाते। जब गुरू साहिब कुरूक्षेत्र और हरिद्वार की ओर धार्मिक यात्रा पर गए तो भाई जेठा जी आपके साथ गए। 16 फरवरी 1554 के दिन गुरू साहिब ने अपनी बेटी बीबी भानी का विवाह भाई जेठा के साथ कर दिया। बीबी भानी ने तीन पुत्रों को जन्म दिया- परिथी चंद 1558 में, महादेव 1560 में और (गुरू) अर्जुन साहिब 1563 में। एक बार पंडितों और क्षत्रियों ने मुगल बादशाह को शिकायत की कि गुरू अमरदास साहिब लोगों को गायत्री मंत्र पढ़ाने की बजाय गुरूवाणी के साथ जोड़ रहे हैं। उन दिनों अकबर हिन्दूओं की बात बडे़ ध्यान से सुना करता था। जब अकबर लाहौर आया तो उसने तो गुरू साहिब को बुला भेजा। गुरू अमरदास साहिब आप तो नहीं गए परंतु भाई जेठा को भेज दिया। भाई जेठा ने अकबर की पूरी तसल्ली कराई। इस पर अकबर ने पंडितों और क्षत्रियों को ड़ांटा और भाई जेठा का लाहौर आने के लिए शुक्रिया अदा किया। 1564 में (एक स्त्रोंत के अनुसार 1570 में) गुरू अमरदास साहिब ने भाई जेठा को हिदायत दी की वह पंजाब के मध्य में कहीं भूमि खरिद कर सिक्खों के लिए एक नये नगर की नींव रखे। भाई जेठा ने पूरा तुंग गांव और सुलतानविंड, गिलवाली और गुमटाला गांवों की थोडी-थोडी ज़मीन खरीद कर ‘‘गुरू दा चक्क’’ कर स्थापना की। सबसे पहले संतोखसर सरोवर की खुदाई शुरू की गई। इस बीच आप को वापिस गोइंदवाल बुला लिया गया और नए नगर का काम रूक गया। सितम्बर 1574 के दिन आपको चोैथे नानक स्थापित किया गया। 1577 में आपने अमृतसर सरोवार की नींव रख कर खुदवाई शुरू करवाई। (अब सरोवर के नाम से इस शहर का नाम अमृतसर जाना जाता है)। शीघ्र ही ‘‘गुरू दा चक्क’’ एक बहुत महत्वपूर्ण नगर बन गया है। गुरू साहिब ने दूर-दूर के क्षेत्रों से अच्छे कारीगर, व्यापारी तथा अन्य लोगों को नए नगर में बसने के लिए प्रेरणा दी। गुरू रामदास साहिब ने धर्म के प्रचार और सिक्खों के भाईचारे में तालमेल के लिए मसंद प्रथा शुरू की। प्रत्येक क्षेत्र में एक या एक से अधिक मसंद बनाये गए। इससे सिक्खों और गुरू साहिब के बीच आदान-प्रदान अच्छा होने लगा। गुरू साहिब के समय बाबा श्रीचंद (पुत्र गुरू नानक साहिब) ने भी सिक्ख परिवार में शामिल होने की इच्छा प्रकट की। गुरू साहिब ने उदासियों को इस शर्त पर सिक्खी में शामिल किया कि वह सिक्ख धर्म का प्रचार करेंगे और सिक्ख धर्म धारण करेंगे। पंथ की सेवा करते गुरू रामदास साहिब 1581 में ज्योति-ज्योत समा गए। इससे पहले उन्होंने गुरू अर्जुन साहिग को पांचवे नानक स्थापित कर दिया। गुरू रामदास साहिब ने भी बाणी की रचना की। आपकी सारी बाणी गुरू ग्रंथ साहिब में संकलित है। गुरू अर्जुन साहिब गुरू अर्जुन साहिब (गुरूगद्दी 1.9.1581-30.5.1606) का जन्म माता भानी और गुरू रामदास साहिब के घर गोइंदवाल में हुआ था। 1579 में उनका विहाह (माता) रामदेई के साथ हुआ। जब दस साल तक माता रामदेई के स्वास्थ्य के कारण आपके घर कोई संतान न हुई तो माता रामदेई और बाबा बुढ्ढा जी के दबाव डालने पर आपके घर (गुरू) हरगोबिंद साहिब का जन्म हुआ। इस कारण कुछ लोगों ने (गुरू) हरगोबिन्द साहिब का जन्म बाबा बुढ्ढा जी की दुआ से होने का प्रचार भी किया, जो कि गलत है। गुरू अर्जुन साहिब 1 सितम्बर 1581 के दिन पांचवे नानक स्थापित किए गए। गुरू गद्दी संभालने के बाद उन्होंने सिक्ख धर्म के प्रचार के लिए कार्यक्रम बनाये। परन्तु दूसरी ओर परिथी चंद, जिसको गुरू रामदास साहिब ने गुरगद्दी के योग्य समझा था, ने षड्यंत्र रचने शुरू कर दिये। उसने ‘गुरू दा चक्क’ को आने वाली भेंट, रसद, और अन्य वस्तुएं अपने लिए संभालनी शुरू कर दी, जिसका असर गुरू के लंगर पर भी पड़ा। परन्तु शीघ्र ही बाबा बुढ्ढा, भाई गुरदास और अन्य सिक्खों की मदद से लोगों को सच्चाई का पता लगा तो सारा सिलसिला फिर से ठीक हो गया। इसके बाद आप ने अमृतसर सरोवर को पक्का करवाना शुरू कर दिया। 1586 में अमृतसर सरोवर पूरी तरह तैयार हो गया। 27 दिसंबर 1587 के दिन आपने सरोवर के बीच दरबार साहिब (हरिमंदिर साहिब) की नींव रखी। (बाद में एक मुसलमान लेखक बूटेशाह ने झूठा प्रचार कर दिया कि दरबार साहिब की नींव साईं मिंया मीर ने रखी थी)। 1588 में ही संतोखर सरोवर भी तैयार हो गया। 1590 में तरनतारन सरोवर की नींव रखी गई। 1593 में आपने करतारपुर (जालन्धर) नगर की नींव रखी। 1597 में आपने रूहीला गांव में गोबिन्दपुर (अब हरगोविन्दपुर) नगर बसाया। 1603 में रामसर सरोवर तैयार हो गया। इस समय दौरान गुरू अर्जुन साहिब, गोइंदवाल, गुरू दा चक्क (बाद में रामदास और अब अमृतसर), गुरू दी वडाली और करतारपुर (जालन्धर) में रहते है। जिस समय आप गोइंदवाल थे तब एक दिन मुगल बादशाह अकबर भी अपने मंत्री अबूफ़जल के साथ 24 नवम्बर 1598 के दिन वहां आया था। गुरू अर्जुन साहिब ने बहुत सारी वाणी की रचना की। आपने 2000 से अधिक श्लोक लिखे। सभी गुरू ग्रंथ साहिब का भाग हैं। आपने बाकी गुरू साहिब की और अपनी वाणी को इकट्ठा कर गुरू ग्रंथ साहिब का स्वरूप तैयार किया। उन्होंने इस स्वरूप को भाई गुरदास के हाथों लिखवाया। यह स्वरूप 31 जुलाई 1604 के दिन पूरी तरह तैयार हो गया और इसका प्रकाश 16 अगस्त 1604 के दिन हरिमंदिर साहिब (दरबार साहिब) में किया गया। गुरू अर्जुन साहिब ने ‘दसवंध’ (अपनी आमदनी का दसवां हिस्सा) को सिक्ख जीवन का एक अटूट भाग बनाया। भले ही दसवंध को एक स्थान इक्ट्ठे करने ओर से इस को कौम के लिए खर्च करने की प्रथा बनाई। गुरू रामदास साहिब की ओर से स्थापित किये गये मंसदो के द्वारा और नये मसंदों द्वारा सिक्खों का दसवंध गुरू साहिब के पास पहूंचना शुरू हो गया। इस तरह इस तरह सिक्ख कौम बडे अच्छे ढंग से संघठित हो गया। इस से कट्टरपंथी गैर-सिक्खों को ईष्र्या होने लगी। इन में शेख अहमद सरहंदी, बीरबल और कई अन्य हिन्दू और मुसलमान जागीरदार भी थे। से सभी अकबर को भड़काने की कोशिश करते थे परन्तु कभी भी सफल नहीं हो सके। एक बार 1586 में बीरबल ने अमृतसर में अपना प्रतिनिधि भेज कर गुरू साहिब को ‘धार्मिक कर’ देने के लिए भी कहा। गुरू साहिब द्वारा कर देने इनकार करने पर बीरबल ने हमला करने की धमकी दी। यह अलग बात है कि इस दौरान बीरबल एक अन्दय युद्ध में मारा गया और हमला न कर सका। दूसरी ओर गुरू साहिब का बड़ा भाई परिथी चंद भी गुरू साहिब के विरूद्ध षडयंत्र रचता रहा। उसने सुलही रखां को भड़का कर दरबार साहिब पर हमला करवाने की योजना तैयार की परन्तु सुलही खां हमला करने से पहले ही मारा गया। उसने गुरू साहिब के बेटे (गुरू हरगोंविद साहिब) को भी मरवाने का प्रयत्न किया। 1605 में अकबर की मृत्यु हो गई। अब जहांगीर मुगल बादशाह बना। जहांगीर के बादशाह बनते ही उसके पुत्र खुसरो ने बगावत कर दी। खुसरो एक बडी पराजय के बाद पंजाब की ओर भाग गया। रास्ते गोइंदवाल के पास नदी पार करते समय शायद वह रस्मी तौर पर गुरू अर्जुन साहिब के दर्शन करने भी गया। थोडे ही समय में खुसरो की बगावत दबा दी गई। जब जहांगीर ने हर उस व्यक्ति के विरूद्ध षडयंत्र शुरू कर दिया जिसको खुसरो कभी मिला भी था। अस सिलसिले में 23 मई 1606 को जहांगीर ने गुरू अर्जुन साहिब की गिरफ्तारी का हुक्म भी जारी किया। गुरू अर्जुन साहिब को जहांगीर के समन 25 मई को पहूंचे। उसी दिन ही गुरू साहिब ने गुरू हरगोबिन्द साहिब को छठे नानक स्थापित किया और लाहौर की ओर चल पडे़। आप को 27 मई के दिन मौत की सजा सुनाई गई। जहांगीर के हुक्म से गुरू साहिब को लाहौर के गर्वनर मुरतजा खां को सौंप दिया गया। मुरतजा खां ने गुरू साहिब को गरम लोहे और जलती रेत पर बिठा कर उनकी लंगी काया पर गरम रेत (बालु) डालने के लिए गुरदत्ता भठिआरा को लगा दिया। तीन दिन की यातना के बाद गुरू साहिब की काया बुरी तरह जल गई। तब उनको रावी नदी के सुपुर्द कर दिया गया। गुरू हरगोबिन्द साहिब गुरू हरगोबिन्द साहिब (गुरगद्दी 30.5.1606-30.3.1644) का जन्म माता गंगा और गुरू अर्जुन साहिब के घर गांव ‘गुरू दी वडाली’ में हुआ। आपने बचपन ‘गुरू दी वडाली’ में बिताया और कुछ समय अमृतसर और गोइंदवाल में भी रहें। 1604 में आपका विवाह (माता) दमोदरी के साथ हुआ। 1620 में आपका दूसरा विवाह (माता) नानकी और तीसरा विवाह (माता) महादेवी के साथ हुआ। आपके घर पांच पुत्र (गुरदित्ता, सुरजमल, अनिराय, अटलराय, और तेकबहादुर) और एक पुत्री (वीरो) ने जन्म लिया। 25 मई 1606 को आपको छठे नानक बनाया गया। आपने 1608 में अकाल तख्त साहिब प्रकट किया। आपने मीरी और पीरी की दो तलवारे धारण करके सिक्खी ने मीरी-पीरी के एक होने का ऐलान किया। आपने कहा की सिक्ख किसी संसारिक बादशाह का गुलाम नहीं हो सकता सिक्ख की वफादारी सिर्फ अकाल पुरक और उसके तख्त (अकाल तख्त साहिब) के साथ ही हो सकती है। एक मीर (संसारिक हाकम) का कर्तव्य है कि वह धर्म का राजा बने और मानवी अधिकार का रक्त वाला हो ; और पीर का कर्तव्य है कि वह जहां जुल्म और अन्याय देखें वहां अपनी जान पर खेलकर भी न्याय और सच्चाई के लिए लडे। उन्होंने कहा कि प्रत्येक सिक्ख में यह दोनों गुण होने चाहिए। एक सिक्ख में मीरी और पीरी दोनों एक साथ होने चाहिए। 1610 में आपने अमृतसर के चारों ओर दिवार बनावाई और साथ ही लोहगढ़ किला भी बनवाना शुरू कर दिया। 1612 में यह सारा काम पूर्ण हो गया। 31 दिसम्बर 1612 को अमृतसर से दिल्ली की ओर रवाना हो गये। जनवरी 1613 में आपको दिल्ली में गिरफ्तार करके किला ग्वालियर किला जेल में पहूंचा दिया गया। इस गिरफ्तारी के पीछे जहांगीर के साथ-साथ मुरताज़ खां (गर्वनर लाहौर) और शेख अहमद सरहदी का हाथ भी था। 1618 में मुरतजा खां मर गया। इस के साथ ही शेख अहमद सरहदी का असर भी जहांगीर पर कम होना शुरू हो गया। दूसरी ओर वजीर खान साईं मियां मीर और मल्लिका नूर जहां ने भी जहांगीर को समझाया और सिक्खों के पीर गुरू हरगोबिन्द साहिब की रिहाई के लिए दबाव डाला। आखीर जहांगीर ने 26 अक्टुबर 1619 के दिन आपको रिहा कर दिया। गुरू संाहिब ने रिहाई के लिए शर्त रखी की वहां कैद 101 हिन्दू राजा (49 छोटी कैद वाले ओर 52 लम्बी कैद वाले) भी रिहा किया जाए। रिहाई के बाद नवम्बर 1619 में गुरू साहिब और जहांगीर के बीच गोइंदवाल में मुलाकात हुई। यहां से दोनों कलानौर और बाद में कश्मीर की ओर इक्ट्ठे गए। 1620 से 1630 तक गुरू साहिब अधिक समय अमृतसर तथा गोइंदवाल में रहे। 18 मार्च 1631 को आप डरोली भाई गए और साथ ही गुरू ग्रंथ साहिब का स्वरूप भी ले गए। यहां पर आप कुछ महीने रहे। बाद में आप ने गुरू ग्रंथ साहिब का स्वरूप करतापुर (जालंधर) भेज दिया। इसके बाद आप फिर अमृतसर आ गये। 1634 को वज़ीर खान की मृत्यु हो गई। इसके बाद लाहौर दरबार ने गुरू दरबार ने गुरू साहिब के साथ फिर से दुश्मनी शुरू कर दी। भले ही गुरू साहिब की पहली लडाई रूहीला (अब हरगोबिन्दपुर) में 27 सितम्बर और 3 अक्टुबर 1621 के दिन हुई थी परन्तु उस समय हमलावर भगवान दास घेरड़ और चंदू का पुत्र करमचंद और उन के साथी मुगल सैनिक थे। लेकिन सरकारी तौर पर आप पर हमला 13 अप्रैल 1634 के दिन जरनैल मुर्तजा खां की कमान में अमृतसर में हुआ था। दिसम्बर 1634 के दिन जब गुरू साहिब महिराज गांव में ठहरे हुए थे तब मुगल सैनिकों ने लल्ला बेग के नेतृत्व में आक्रमण किया। इसके बाद गुरू साहिब करतारपुर आ गए। यहां 27 अप्रैल 1635 के दिन गुरू साहिब का नमक हरात सिपाही पैंदा खान, मुगल फौज को ले आया। यह लड़ाई तीन दिन चली। इन सभी युद्धों में गुरू साहिब की जीत हुई। 1 मई 1635 के दिन गुरू साहिब कीरतपुर साहिब चल पडे़। 3 मई 1635 के पश्चात आप अधिक समय यहीं रहे और यहां से अलग-अलग इलाकों में धर्म के प्रचार के लिए जाते रहे। इस बीच कई राज्यों के बागी राजा और अन्य बडे़ व्यक्ति गुरू साहिब के पास आश्रय ले कर रहते रहे। गुरू साहिब ने उन सबको अपनी पनाह में रखा। आप 1644 में ज्योति-ज्योत समा गए। गुरू हरिराय साहिब गुरू हरिराय साहिब (गुरगद्दी 30.3.1644-6.10.1661) का जन्म माता अनंती (आपको माता बसी और निहाल कौर भी लिखा गया है) और बाबा गुरूदित्ता (पुत्र गुरू हरगोबिन्द साहिब) के घर हुआ। आपने अपना बचपन करतपुर साहिब में व्यतीत किया। 1640 में आपका विवाह (माता) सुलखनी (आपको मादता कृष्ण कौर और कोट कलियाणी भी लिया गया है) के साथ हुआ। आपके घर रामराय (1652 में) ने जन्म लिया। मार्च 1642 केे दिन गुरू हरगोबिन्द साहिब ने आप को सातवें नानक स्थापित कर दिया। आपने कीरतपुर साहिब और आस-पास के बहुत सारे इलाके में सिक्ख धर्म का प्रचार और प्रसार किया। सिक्ख धर्म के प्रचारको को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए आपने 360 प्रचार केन्द्र स्थापित किये और प्रत्येक केन्द्र पर एक-एक मसंद नियुक्त किया। आपके पास 200 घोड़े और हजारों पैदल सेना थी। आपने सिक्खों को सैनिक सिखलाई के साथ-साथ राजनीतिक प्रबंध चलाने का ढंग भी सिखाया। कीरतपुर से आप ज्यादातर हिमाचल कश्मीर, पंजाब की यात्रा पर जाया करते थे। इस समय के दौरान आप कुछ वक्त नाहन में भी रहें। 1659-60 में आपने लाहौर, जलालपुर जट्टां गलोटियों खुरद, सिआलकोट, श्रीनगर, जम्मू, रामगढ़, सांभा और पठानकोट आदि का दौरा भी किया। दूसरी ओर 1658 में मुगलों के बीच गद्दी के लिए युद्ध शुरू हो गया। औरगंजेब से हार खा कर शिकोह पंजाब की ओर भाग गया। गोइंदवाल के पास व्यास नदी पार करते समय उसने गुरू साहिब के दर्शन किए और सहायता मांगी। गुरू साहिब ने उसके नदी पार करने के बाद पीछे आ रही औरगंजेब की सेना को काफी समय तक रोक रखा। इतने समय से दारा शिकोह काफी दूर निकल गया। बाद में शिकोह पकड़ा गया। जब औरंगजेब गद्दी पर पूरी तरह बैठ गया तो उसने हर उस व्यक्ति की खोज की जिस का दारा शिकोह के साथ थोड़ा भी संबंध था। उस ने गुरू हरिराय साहिब को भी संमन भेजे। गुरू साहिब ने अपने बड़े पुत्र राम राय को दिल्ली भेज दिया। जब रामराय ने औरंगजेब को प्रसन्न करने का प्रयत्न शुरू किया। तब गुरू साहिब ने उसको पंथ से निष्कासत कर देने का ऐलान किया। आपने आठवें नानक के लिए गुरू हरिकृष्ण साहिब को चुना। आप 6 अक्टूबर 1661 के दिन कीरतपुर साहिब में ज्योति-ज्योत समा गए। गुरू हरिकृष्ण साहिब गुरू हरिकृष्ण साहिब (गुरगद्दी 6.10.1661-30.3.1664) का जन्म माता सुखलनी का और गुरू हरिराय साहिब के घर कीरतपुर साहिब में हुआ। 5 अक्टुबर 1661 के दिन आप आठवें नानक बनाये गए। दूसरी ओर आपके बडे़ भाई राम राय, जिसको गुरू हरिराय साहिब ने पंथ से निष्कासित कर दिया था, ने औरंगजेब की सहायता से गुरगद्दी प्राप्त करने का प्रयत्न किया। रामराय के कहने पर औरंगजेब ने गुरू हरिकृष्ण साहिब को संमन भेजे। 19 मार्च 1664 के दिन गुरू साहिब कीरतपुर साहिब से दिल्ली की ओर चल पडे़। रास्ते में आप अलग-अलग स्थानों से होते हुए पंजोखड़ा गांव पहूंचे। पंजोखड़ा में लाल चंद नाम के एक पंडित ने गुरू साहिब की छोटी आयु देखकर उनके प्रताप की आशंका की और गुरू साहिब को कहा कि गीता का अर्थ निकालकर बतायें। गुरू साहिब ने उस अहकांरी पंडित को कहा की यह काम तो एक साधारण सा व्यक्ति भी कर सकता है। गुरू जी के आदेश पर एक स्थानीय सिक्ख छज्जू राम, जो एक झीऊर था, ने गीता के कमाल के अर्थ निकाल कर बताये। पंडित का अहंकार चूर-चूर हो गया। गुरू साहिब ने पंड़ित को समझाया कि विद्वान व्यक्ति में अहंकार नहीं बल्कि नम्रता होनी चाहिए। पंजोखड़ा से कुरूक्षेत्र होकर रास्ते में धर्म का प्रचार करते हुए गुरू साहिब दिल्ली पहूंचे। दिल्ली में आप रजा जै सिंह मिरजा के बंगले में ठहरे। यहां भी राजा जै सिंह मिरजा की रानी पुष्पा देवी ने भी गुरू साहिब की परीक्षा लेनी चाही। उसने स्वयं नौकरों जैसे वस्त्र पहन लिये और एक नौकरानी को अपने कपड़े पहना दिये। गुरू साहिब ने रानी पुष्पा देवी को तुरन्त पहचान लिया। रानी ने आपसे प्रार्थना की कि आप उसे सिक्ख धर्म में शामिल करे। 21 मार्च 1664 के दिन (गुरू) तेग बहादुर साहिब भी आसाम और बिहार की यात्रा से वापिस दिल्ली पहंूच गए। दूसरे दिन (गुरू) तेग बहादुर साहिब और गुरू हरिकृष्ण साहिब की मुलाकात हुई। (गुरू) तेग बहादुर साहिब ने गुरू हरिकृष्ण साहिब को औरंजेब की नीति के बारे बताया और सावधान रहने के लिए कहा। गुरू हरिकृष्ण साहिब के (गुरू) तेग बहादुर साहिब को बताया कि उनका अंतिम समय निकट है इसलिए आप नवन नानक के रूप में गुरगद्दी की सेवा संभालने के लिए तैयार रहे। 25 मार्च 1664 को गुरू हरिकृष्ण साहिब ओर औरंगजेब की मुलाकात हुई। अगली मुलाकात के लिए समय रखा। परन्तु वाहिगुरू का हुक्म कुछ और ही था। उसी रात गुरू साहिब पर चेचक की बिमारी का हमला हुआ। अगले चार दिनो तक चेचक का असर पड़ता गया। 30 मार्च के दिन आप ज्योति-ज्योत समा गए। जाने से पहले आप ‘बाबे.जो बकाले मे है’ को गद्दी सौपने की घोषणा कर गए। उस समय (गुरू) तेग बहादुर साहिब बकाला मे रहे थे। जैसा कि पहले बताया जा चुका है गुरू हरिकृष्ण साहब ने (गुरू) तेग बहादुर को 22 मार्च को ही नवम नानक बनने के लिए मना लिया था। गुरू तेग बहादुर साहिब गुरू तेग बहादुर साहिब (गुरगद्धी 30.03.1664़-11.11.1675) का जन्म माता नानकी और गुरू हरि गोबिन्द साहिब के घर अमृतसर में हुआ। अमृतसर में रह कर आपने धर्म और दर्शन की पढ़ाई की और साथ मे घुडसवारी और तलवारबाजी भी सीखी। 1632 में आपका विवाह (माता) गुजरी के साथ हुआ 18 दिसम्बर 1661 के दिन आपके घर (गुरू) गोबिन्द सिंघ साहिब ने जन्म लिया। भले ही (गुरू) तेग बहादुर को अभी तक गुरगद्दी नहीं मिली थी परन्तु आप शुरू से ही लोक सेवा और धर्म प्रचार में बढ़-बढ़ कर भाग लिया करते थे। इस सिलसिले में 1656 से मार्च 1663 में आसाम, बंगाल, और बिहार की यात्रा करते रहे थे। 22 मार्च 1664 के दिन गुरू हरिकृष्ण साहिब ने आपको नवम नानक के रूप में सेवा संभालने के लिए कह दिया था। 11 अगस्त 1664 के दिन आपको नवम नानक स्थापित करने की रासमिक कार्यवाही की गई। इसके बाद आप पंजाब में धर्म प्रचार यात्रा पर निकल पड़े। मालवा और बांगर देश की यात्रा के दौरान आपने तलवंडी साबो में एक सरोवर का निर्माण करवाया। मई 1664 में आप राजा दीप चंद की रस्म क्रिया पर आप बिलासपुर (हिमाचल) गए। उसकी विधवा रानी चम्पा को जब पता चला कि गुरू जी बंगार देश जाने की तैयारी कर रहे है तो उसने गुरू साहिब को याचना की कि वह कहिलूर रियासत के निकट ही रहें। इस पर गुरू साहिब ने सहोंटा, लौदीपुर व मीयांपुर गांवों की भूमि पर चक्क नानकी गांव की नींव रखी। कुछ दिन यंहा रहने के पश्चात आप फिर बांगर देश रवाना हो गए। वहां एक दिन अक्टुबर 1665 में आप को गिरफ्तार कर दिल्ली में औरगंजेब के सामने 8 नवम्बर को पेश किया गया। 2 महीने 3 दिन के पश्चात आप रिहा हुए। इसके बाद आप फिर आसाम, बंगाल और बिहार की यात्रा पर चले गए। आप चार वर्ष से अधिक इस इलाके में रहे। अप्रैल 1672 में आप वापिस चल पड़े। इसके बाद आप बाबा बकाल आ कर रहे। मार्च 1672 में आप चक्क नानकी आ गए। अगले तीन वर्ष आप यहीं रहे और यहीं से अलग-अलग नगरों की यात्रा को जाते रहे। 25 मई 1675 के दिन कश्मीर के 16 ब्राम्हण भाई कृपा रामदत्त के नेतृत्व में चक्क नानकी आये और औरंगजेब द्वारा जबरदस्ती इस्लाम फैलाने के बारे में बताया। गुरू साहिब ने इसको रोकने के लिए दिल्ली जाने का फैसला किया। आपने 8 जुलाई 1675 के दिन गुरू गोबिन्द साहिब को दसवें नानक बनाया और 11 जुलाई को दिल्ली की ओर रवाना हो पड़े। रास्ते में मकलमपुर रंघड़ां (अब मकलमपुर) गांव में आपको गिरफ्तार कर लिया गया। आप तीन महीने बस्सी पठाणां किला में कैद रहे। उस समय औरंगजेब हसन अबदाल में था। औरंगजेब ने कई अत्याचार कर आपको इस्लाम धारण करवाने का प्रयत्न किया लेकिन सफल न होने के बाद आपको दिल्ली ले जाया गया। आप 5 नवम्बर को दिल्ली पहूंचे। कुछ दिन की कैद और जुल्मों के बाद आपको 11 नवम्बर 1675 के दिन शहीद कर दिया गया। हिन्दूओं ने आप को ‘हिन्दू धर्म का रखवाला’ कह कर सम्मानित किया और जो ब्राम्हण आपके पास फरियाद लेकर आये थे, वे सभी अपने परिवारों सहित, सिक्ख बन गये। तेग बहादुर साहिब ने भी बाणी की रचना की। आपने 115 श्लोक लिखे जो गुरू ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। गुरू गोबिन्द साहिब गुरू गोबिन्द साहिब (गुरगद्दी 11.11.1675-7.10.1708) का जन्म माता गुजरी और गुरू तेग बहादुर साहिब के घर पटना में हुआ। आपने अपने जीवन के पहले पौने नौ वर्ष पटना में बिताये। (शायद इसी कारण आपकी भाषा में बिहारी हिन्दी का प्रभाव अधिक था) 1670 में आप पटना से बकाला चले गये। वहां से मार्च 1672 में आप चक्क नानकी आ गये। 1673 में 12 वर्ष की आयु में आपने घुड़ सवारी और शस्त्र विद्या का प्रशिाक्षण शुरू किया। इसके अतिरिक्त आप ने दर्शन की बहुत सी पुस्तके भी पढ़ी। आपको पंजाबी, फारसी एवं संस्कृत भाषाओं का भरपूर ज्ञान था। 8 जुलाई 1675 के दिन आपने रणजीत नागारा बनवाया और सिक्ख रियासत की प्रभुसत्ता का ऐलान किया। गुरू साहिब ने हुक्मनाने भोते कर जो सिक्ख गुरू घर में भेंट भेजना चाहते हों वह अच्छे घोड़े, शस्त्र एवं पुस्तकें लेकर आयें। मार्च 1683 में आपने सिक्खों में नेज़ाबाजी, गतका, तलवार चलाने और कुश्तियों के मुकाबले करवाने आरम्भ किये। धीरे-धीरे गुरू साहिब के पास शस्त्र चलाने में कुशल युवकों की संख्या काफी बढ़ गई। इस बीच बिलासपुर का युवराज अजमेर चन्द सिक्ख-विरोधियों की चुंगल में फस गया। इस कारण बिलासपुर रियासत और सिक्खों के संबंधों में तनाव शुरू हो गया। अप्रैल 1685 मे नहान के राजा की इच्छा मानते हुए पाउंटा साहिब नगर बनाने का निर्णय किया। जमुना नदी के किनारे एक रमणीक स्थान देखकर आप ने नये नगर की नीव रखी। थोडे दिन बाद राम राय (जिस को गुरू हरिराय साहिब ने पंथ से निष्कासित कर दिया था) भी वहां आया और अपनी भुल पर क्षमा मांगी। राम राय कि मृत्यु के बाद उसके एक चेले ने गढवाल के राजा को बुला कर गुरू साहिब पर हमला करवा दिया। 18 सितम्बर को 1688 के दिन भंगानी में गुरू साहिब की पहली लडाई हुई। इस लडाई के एक महीने 10 दिन बाद गुरू साहिब चक्क नानकी को वापिस रवाना हो गये। 29 मार्च 1680 को आपने विलासपुर की महारानी चम्पा रानी से मीयाँपुर, लोदीपुर, सहोटा, आगमपुर और तारापुर की सारी भूमि भी खरीद ली। आज कल चक्क नानकी, आनंदपुर साहिब और साथ के गांवों को अनंदपुर साहिब कहा जाता है। 30 मार्च 1689 को अपने चक्क नानकी के निकट अनंदपुर साहिब की नींव रखी तथा पांच किले बनाने शुरू किये। मार्च 1691 में मुगल सेना पहाड़ी राजाओं पर आक्रमण कर दिया तो गुरू साहिब ने पहाड़ी राजाओं की सहायता की। 19 मार्च 1691 के दिन नादौण की लड़ाई में आपने मुगलों को करारी हार दी। इसी मई में रानी चम्पा की मृत्यु हो गई। दूसरे वर्ष अप्रैल 1692 में आपने पहाड़ी राजाओं को इकट्ठा करने के लिए एक बैठक बुलाई। इसके बाद आपने कई पहाड़ी राजाओं रियासतों की यात्रा की। अप्रैल 1693 में आपने मालवा और बांगर देश में धर्म प्रचार किया। इन दिनों अजमेर चंद बिलासपुरी राजा एक बार फिर सिक्खों के लिए भीतर ही भीतर शत्रुता रखने लगा। अगस्त 1645 में उसने लाहौर के गर्वनर द्वारा आनंदपुर में हमला करवा दिया। ऐसे छोटे-छोटे दो तीन हमले हुए। फरवरी 1696 में मुगलों ने गुलेर राज्य पर हमला कर दिया। गुरू साहिब ने गुलेर के राजा की सहायता की। माार्च 1698 में गुरू साहिब ने मंसद प्रथा समाप्त करने का ऐलान कर दिया। पहली वैसाख के दिन आपने खालसा प्रकट करने का अद्भुत कौतक किया। इसके साथ ही आपने सिक्खों को खंडे का अमृत देना शुरू किया। आपने पांच ककारः केश, कंघा, कड़ा, कछहरा, कृपाण और केशकी (दस्तार) प्रत्येक सिक्ख के लिए आवश्यक की। पहाड़ी राजा अजमेर चंद पहले ही गुरू साहिब और सिक्खों से ईष्र्या करने लगा था परन्तु 1698 के आद उसने सीधे आक्रमण करने प्रारम्भ कर दिये। उसका सबसे पहला आक्रमण 23 जून 1698 के दिन हुआ फिर जून, अगस्त, अक्टुबर 1700 में भी आक्रमण हुए। इसके बाद तीन साल तक युद्ध विराम रहा। लेकिन 16 मार्च 1704 के दिन पहाड़ी सैनिकों ने फिर आक्रमण कर दिया परन्तु हारकर भाग गये। लेकिन 3 मई 1705 के दिन पहाड़ियों और मुगलों ने अनंदपुर साहिब को पूरी तरह से घेर लिया। 4 दिसम्बर को औरंगजेब का पत्र पहूंचने पर अगले दिन गुरू साहिब ने नगर खाली करने का निर्णय किया। रास्ते में पहाड़ी राजाओं और मुगल सेना ने आक्रमण किया। गुरू साहिब उनका परिवार और कुछ अन्य सिक्ख बचकर निकल गये। चमकौर में मुगल सेना ने गुरू साहिब कोे फिर से घेर लिया। इस समय गुरू साहिब के साथ दो साहिबजादें, पांच प्यारे और लगभग चालीस सिक्ख थे। 7 दिसम्बर की रात तक बहुत से सिक्ख शहीद हो चुके थे। नबी खां और गनी खां की मदद से गुरू गोबिन्द वहां से निकल कर माछीवाड़ा पहूंच गये। यहां अलग-अलग गांवों से होते हुए आप 16 जनवरी 1706 के दिन तलवंडी साबों पहूंचे। आप यहां 9 मास रहें। अक्टुबर 1706 में आप वहां से चलकर अहमद नगर की ओर चल पडे ताकि औरंगजेब से आमने-सामने वार्तालाप कर सकें। आप अभी रास्ते में ही थे कि औरंगजेब मर गया। उसके पुत्रों में गद्दी के लिए युद्ध शुरू हो गया। बहादुर शाह ने अपना प्रतिनिधि गुरू साहिब के पास भेजकर मदद मांगी। गुरू साहिब के सिक्ख इस युद्ध में बहादुर शाह के साथ हो कर लड़े। बहादुर शाह ने जितने के बाद गुरू साहिब का धन्यवाद किया। गुरू साहिब बहुत समय बहादुरशाह के साथ रहे और नर्मदा नदी (महाराष्ट्र) तक इकट्ठे गये। जब गुरू साहिब ने देखा की बहादुर शाह चालाकी कर रहा है तो उन्होंने उसका साथ छोड दिया और नंदेड की ओर चल पडे। यहां माधो दास बैरागी (बाबा बंदा सिंह) उनको मिला। माधों दास ने खंडे का अमृत लिया। गुरू साहिब ने उसको सिक्ख सेना का जत्थेदार बना कर पंजाब की ओर भेजा। 5 अक्टुबर 1708 को बंदा सिंह नंदेड से चला। 6 अक्टुबर को जमशेद उखां नाम के पठान (जिस को बहादुर खां और वजीर खां ने मिलकर भेजा था) गुरू साहिब को सोते हुए देख छूरे से वार करके गंभीर रूप में घायल कर दिया। उसी दिन गुरू साहिब ने ग्रंथ साहिब को हमेशा के लिए गुरूता प्रदान की और ज्योति-ज्योत समा गये। आपका संस्कार नंदेड़ में ही किया गया। ज्योति-ज्योत समान से पहले गुरू साहिब ने सिक्खों को कहा था कि दो शताब्दियों में 10 गुरूओं ने सिक्ख दर्शन के संबंध में गुरबाणी में वह सब कुछ समझा दिया है जिसकी एक सिक्ख को कभी भी जरूरत पड सकती है और साथ ही 10 गुरूओं की जिन्दगी सिक्खों के लिए प्रकाश स्तम्भ है। सिक्खों को दर्शन और धर्म की शिक्षा की और जरूरत नहीं, सिक्खों को अब किसी देहधारी गुरू की भी जरूरत नहीें। अब गुरू ग्रंथ साहिब सिक्खों के सदा के लिए गुरू होगें। सिक्खों का रातनीतिक नेतृत्व ‘सर्बत खालसा’ के पास होगा। सिक्ख अपने सभी फैसले गुरू ग्रंथ साहिब की हजूरी में गुरमता कर के किया करेंगे। बाबा बंदा सिंघ बहादुर ज्योति-ज्योत समाने से पहले गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब ने सिक्खो के पास बुलाया और कि मुझे अकाल पुरक का हुक्म आ गया हैै। मेरे पश्चात आपने पंथ का नेतृत्व करना है। मैंने अब जांनशीन किसी व्यक्ति को नही बनाना। अब सिक्खों को धर्म, सभ्याचार, फलसफे बारे भरपुर ज्ञान हो चुका है और उन्हे देहधारी गुरू की आवश्यकता नही। गुरू साहिबान की शिक्षा में कुछ हाजिर है और यह सारा कुछ गुरू ग्रंथ साहिब मे दर्ज है। यह पंथ मेरे पश्चात गुरू ग्रंथ साहिब को अपना गुरू माने। यह सिक्खो का सदवी गुरू होगा। ऐसे ही पंथ अपने दुसरे मसलों का हल गुरमते से किया करेगा। यहा सिक्ख गुरू ग्रंथ साहिब की हगुरी मे राष्र्टीय भावना से गुरू ग्रंथ साहिब की शिक्षा के मुताबिक गुरमता किया करेगें. वहा मैं स्वयं हाजिर हुआ करूंगा। पहले 5 अक्टुंबर 1708 के दिन गुरू साहिब ने बाबा बंदा सिंघ को खालसा पंथ का जत्थेदार बना पंजाब में भेज दिया था। बाबा बंदा सिंघ कें साथ गुरू साहिब ने अपने पांच चुनिंदा सिंघ (बाज सिंघ, बिनोद सिंघ, काहान सिंघ, फतेह सिंघ तथा राम सिंघ) भी भेजे। बाबा बंदा सिंघ और सिंघो को गुरू साहिब ने हुकम दिया कि वह अपनी सांझी राए से गुरमता करके कार्यवाही किया करेंगे। गुरू साहिब ने उन्हंे हिदायत की कि उन्होने सिक्ख होमलैंड कि आजादी के लिए संघर्ष करना है परन्तु इस संघर्ष पर भी धर्म का पहरा होना है। गुरू साहिब ने बाबा बंदा सिंघ के एक हुक्मनामा भी दिया जिस में संगतो के कहा गया था कि देश की आजादी के लिए सभी सिक्ख बाबा बंदा सिंघ का साथ दें। बाबा बंदा सिघ उसी दिन नांदेड से चल पडें। अभी बंदा सिघ रास्ते में ही था कि उसे पता चल गया कि गुरू गोबिंद सिंघ साहिब शहिद हो चुके है। परन्तु इस पर भी उसने गुरू साहिब कि ओर से दिये मिशन को न छोडा। वह सोते हुए निसाने के लिये चलता़-चलता पंजाब पहुच गया। यहा से उसने गुरू साहिब के मुख्य सेवादारों तथा सिक्ख गांवों ओर पत्र भेजें और गुरू साहिब के हुक्म के बारे में बताया। बाबा बंदा सिंघ के पत्र मिलने पर सेकडों और फिर हजारो सिक्ख उसके साथ आ मिले। एक वर्ष के अंदर-अंदर बाबा बंदा सिंघ के पास हजारो सिक्खो की फौज बन चुँकि थी। अब बाबा बंदा सिंघ मुगल फौज के साथ पहली टक्कर ले सकता था। बाबा बंदा सिंघ के फौजी एक्शन का पहला पड़ाव समाणा कस्बा था। समाणा उस समय एक बडी रियासत था। लाहौर, मुलतान तथा सरहिंद के बाद बडी रियासत समाणा ही था। सिक्ख इतहास मे समाणा का संबंध इसलिए था कि गुरू तेग बहादुर साहिब और गुरू गोबिंद सिंघ साहिब के छोटे दो साहिबजादों को शहिद करने वाले जल्लाद का नगर यही था। बाबा बंदा सिंघ ने 26 नवम्बर 1709 के दिन समाणा पर सिक्ख फौज का कब्जा हो चुका था। अगले दिन बाबा अंदा सिंघ ने भाई फतेह सिंघ समाणा का सुबेदार स्थापित कर दिया और उसके साथ पांच सिंघों के सलाहाकार सौंप दिया। समाणा खालसे की हकुमत का पहला सेंटर बन गया। ं समाणा पर कब्जा करने के पश्चात बाबा बंदा सिंघ ने सिक्ख होमलैंड का बाकी हिस्सा आजाद करवाने के लिए तैयारी शुरू कर दी। कुछ ही सप्ताह में घुडाम, कुंजपुरा, ठसका, शाहबाद मारकंड़ा और मुस्तफाबाद पर सिक्खों की हुकुमत हो चुकी थी। बाबा बंदा सिघं ने इन सभी रियासतों के सिक्ख प्रशासक लगा दिये । इसके कुछ समय पश्चात उसने सढौरा पर भी कब्जा कर लिया। यह छोटी- छोटी रियासतें जीतने के पश्चात उसने सरहिंद को असजाद करवाने की तैयारी शुरू कर दी। सरहिंद उस समय दिल्ली तथा लाहौर सबसे मजबूत ताकतवर हकुमत थी। सरहिंद सिक्खो के सिने पर एक नासुर जैसी थी क्योंकि इसके सुबेदार वजीर खान ने सिक्खो पर बहुत जुल्म किये थे। इसकी ही मदद से बिलासपुर के अजमेर चन्द ने अनंदपुर साहिब पर हमले किये थे और गुरू साहिब के सिक्ख नगर को खाली करना पड़ा था। इसी की फौज ने चमकौर की गढ़ी में गुरू साहिब पर हमला किया था जिसमें गुरू साहिब के दो बडे़ साहिबजादे और 40 सबसे अजीज सिक्ख शहिद हुए थे। इसी ने गुरू साहिब के दो छोटे साहिबजादों को नीवों में चिना और बाद में शहिद किया था। इसी ने गुरू साहिब की बजुर्ग मां माता गुजरी को तसीहे देने के पश्चात सरहिंद किले के बुर्ज से गिरा कर शहीद किया था। सिक्ख इस अत्याचारी को सख्त सजा देना चाहते थे। परन्तु, सरहिंद एक बहुत बड़ी रियासत था। यह रियासत कई कई मिलों तक फैली हुई थी। इसकी एक बहुत बड़ी फौज थी। अकेला सरहिंद शहर तीन कोह (10 किलोमीटर) के करीब बसा हुआ था। इसका बजबुत किला और असले का बड़ा ज़खीरा दिल्ली के बाद शायद सबसे बड़ा था। इस रियासत पर हमला करने अथवा इसका मुकाबला करने के लिए सोचना बहुत बड़ी बात थी। इसलिए बाबा बंदा सिंघ को छः महीने और तैयारी करनी पड़ी। उसके पास फौज की भी अभी कमी थी। उसने सभी ओर सिक्खों को पत्र लिख कर फौज में शामिल होने के लिए कहा। गेहूं की कटाई के पश्चात हजारों सिक्ख बाबा बंदा सिंघ के कैंप में आ गए। इनमें माझा, मालवा, दुआबा, कश्मीर और सभी ओर के सिक्ख शामिल थे। जब बाबा बंदा सिघं की पुरी तैयारी हो गई तो उसने 10 मई 1710 के दिन सरहिंद कीं ओर कुच कर दिया। सरहिंद से बहुत दुर चप्पड़ चिड़ी गांव की जुह मे सिक्खों और सरहिंदी फौज में गह -गच्च युध्द हुआ। इस जबरदस्त जंग मे पांच हजार के करीब सिक्ख शहिद हुए तथा कई हजार सरहिंदी फौजी मारे गए। आखिर 12 मई 1710 के दिन सरहिंद पर सिक्ख फौजौ का कब्जा हो गया। सरहिंद का सुबेदार वजीर खां और उस का वजीर सुच्चा नंद को उसके फौजीयों ने गिरफ्तार कर लिया। इन दोनों जालिमो को उनके जुर्म के मुताबिक सख्त सजा दी गई। सरहिंद कब्जा करने के पश्चात बाबा बंदा सिंघ ने इस रियासत पर खालसा राज कायम कायम करने का ऐलान कर दिया। सरहिंदर की जीत वाले दिन से बाबा बंदा सिंघ ने नये सम्सत (कैलेंडर) की शुरूआत कर दी। बंदा सिंघ ने खलसा राज का सिक्का और सरकार की मोहर भी जारी की। खालसे के सिक्के पर उकरा हुआ था। देग ओ तेग ओ नुसरत बेदिरंग याफ़त अज नानक गुरू गोबिंद सिंघ बंदा सिंघ ने स बाज सिंघ को सरहिंद का नया सुबेदार स्थापित कर दिया। उसने बाकी प्रबन्ध भी सिक्खों को सौप दिया। सरहिंद, जो जालम सुबे से जाना जाने लगा था, अब इंसाफ की रियासत माना जाने लगा पडा़। परन्तु, बाबा बंदा सिंघ की हकुमत बहुत देर कायम न रह सकी। हिंदुस्तान का बादशाह बहादुर शाह लाखों फौजों के साथ पंजाब की ओर चल पडा़। कुछ ही दिनो मे बंदा सिंघ के जीते इलाकों पर मुगलो ने दुबारा कब्जा कर लिया। इसके बाद मुगल मुगल फौजें बाबा बंदा सिंघ के पीछे लग गई और उसको लोहगढ़ में घेर लिया परन्तु बंदा सिंघ इस घेरे में भी बच कर निकल गया। इस दौरान उसने बिलासपुर तथा और पहाड़ी इलाकों में हमले कर उनसे अपनी शक्ति मनवाई और खराज (टैक्स) वसुल किया। इसके पश्चात फौज को जत्थेबंद कर वह दुबारा पंजाब की ओर मुड़ा। बहादुर शाह को बंदा सिंघ का डर इतना हो गया कि उसने लाहौर में ही डेरे लगा लिये और यहां ही वह 28 फरवरी 1812 के दिन मर गया। उसकी मौत के पश्चात काफी समय दिल्ली के तख़्त के हाकम कोई ताकतवर निजाम कायम न कर सके जिस कारण बंदा सिंघ ने दुबारा अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया। दुसरी ओर दिल्ली में फर्खसीयर बादशाह बन गया। उसने अपने पैर पक्के करने के पश्चात बंदा सिघ के विरूद्ध बडी फौज भेज दी। कुछ समय तो मुगल और सिक्ख फौजों मे आंखमिचैली चलती रही पर आखिर बाबा बंदा सिंघ गुरदास नगंल की गढ़ी (जो एक बडी हवेली जैसी थी) में घिर गया। मुगल फौजो की गिनती इतनी थी कि उनका घेरा तोडना आसान नही था। बंदा सिंघ की प्लानिंग थी कि थक्क-हार कर मुगल घेरा उठा लेंगे। परन्तु मुगलों के पास फौंजें, हथियार, खुराक और अन्य वसीले बहूत ज्यादा थे। इसलिए उन्होने घेरा डाला रखा। इस लम्बे घेरे के कारण सिक्ख फौंजों के लिए बहुत मुश्किल आई। उनके पास खाने का सामान औंर असला दोनों ही कम थें। यदि वह घेरा तोडकर निकलने की कोशिश करते तो भी उनमें से बचने की कोई आस नही थी गढ़ी में घिरे रहने से खूराक खत्म हो जानी थी। वही हुआ। आखिर उनके पास खुराक खत्म हो गई। आखिर कई दिन बिल्कुल ही भुखे रहे और इससे वह निढाल हो गए। जब कई दिन सिक्ख फौंजो की कोई हिलजुल न हुई तों मुगल फौंजो ने इक्कठे ही गद्दी पर धावा बोल दिया। वह बडा गेट तोड़कर अंदर घुसे तो उनको कई सिक्ख भी मुकाबले में नजर न आया। सभी भुख के कारण कमजोर होने के पश्चात निढाल पडे़ हुए थे। मुगलों ने अधमरे सिक्खों को गिरफ्तार कर लिया। बात सितम्बर 1815 की है। इनको गिरफ्तार कर दिल्ली ले जाया गया। दिल्ली में जुन 1816 में इनको 100 के हिसाब से कत्ल कर दिया गया। आखरी दिन 1 जुन को बंदा सिंघ और बाकी के एक दर्जन के करीब मुखी सिक्खों के तसीहे दे कर शहिद कर दिया गया। सिक्खों पर मुगलों के अत्याचार 1716 से अगले पांच वर्ष सिक्खों के लिए बहुत मुश्किल थे। मुगल बादशाह ने सिक्खों के कत्लेआम का हुक्म दिया हुआ था। कई सिक्ख पकड़ कर मारे भी जा चुके थे। इस हालत में सिक्ख शहरों और गांवों को छोड कर पहाड़ों, जंगलों और रेगिस्तान की ओर चले गए। इस के पश्चात बाबा दरबार सिंघ ने सिक्ख फौंजों को जत्थेबंद किया। घिरे-घिरे सिक्ख फौजों ने सरकारी खजाने छीनने शुरू कर दिये। इस दौरान सिक्ख अमृतसर के दर्शन करने के लिये भी आया करते थे। अमृतसर से काफी दूर गांव डल्ल वां का भाई तारा सिंघ भी आए गए सिंध को रहने की जगह औंर लंगर की सेवा किया करता था। जब मुगल हाकम को यह पता लगा तो उस ने तारा सिंघ को गिरफ्तार करने के लिए फौंज भेंज दी। तारा सिंघ ने फौज का डट कर मुकाबला किया औंर बहुत सारे फौंजी मार दिये। आखिर वह समय भी शहिद हो गया। यह बात 1726 की है। भाई तारा की सिक्ख आगुओं मे बड़ी इज्जत थी। जब सिक्ख जरनैलों को उसकी शहीदी का पता चला तो उन्होंने एक बैटक की औार गुरमता पास किया कि भाई तारा सिंघ को शहिद की हरकत करने के जवाब में सरकारी खजाने लुट जाएं, शाही असलखाने लुट जांए और सरकारी थानों पर हमला कर जालिंमो को सजा दी जाएं। गुरमते के कुछ ही दिनो में सिक्ख फौंजों ने कई जगह खजाने और असलेखाने लूट लिए। सिक्खो के एकशन से लाहौर को मुसिबत पड़ गई। यह गुरीला जंग कई साल चलती रही। कभी सिक्ख हाथ दिखा जाते और कभी सिंघो को जंगलो, पहाड़ों और मारूशथल मे जा कर छिपना पड़ता रहा। इस तरह 6 वर्ष बीत गए। सरकार का निजा़म इस दौरान सूबे में अघुरी हकूमत ही कर सका क्योकि सरकार का आधा का ध्यान सिक्ख गुरीला जत्थों की ओर लगा हुआ था। आखिर सरकार ने सिक्खों के साथ समझौता करने का फैसला कर लिया। मार्च 1733 में पंजाब के गर्वनर ज़करीया खां ने लाहौर के एक सिक्ख भाई सुबेग सिंघ को सिक्खो के लिए जागीर (अर्ध प्रभ्कसता) की पेशकश देकर सिक्ख नेताओं की ओर भेजा। जब सिक्ख नेताओ तक यह पेशकश पहुची तो उन्होंने सभी सिक्खो के साथ इस संबंघी विचारें करने का फैसला कर लिया। उन दिनो बाबा दरबार सिंघ सभी सिक्ख जत्थों के मुखी थे। उन्हानेे अकाल तख़्त साहिब औंर हरिमंदर साहिब के मुख्य सेवादार को कहकर सरबत खालसा का एक इकटठ अकाल तख़्त साहिब पर बुलाने के लिए कहा। 29 मार्च 1733 को सरबत खालसा का इकट्ठ अकाल तख्त साहिब पर हुआ। इस समय लाहौर से भाई सुबेग सिंघ जागीर की खिल्लत लेकर पंहूंचे। उन्होंने सिक्ख जरनैलों को जागीर की यह पेशकश कबूल करने के लिए अरज की। कुछ नेता इस पेशकश को कबूल करने के हक में थे और कुछ विरूद्ध थ। कुछ ऐसे भी थे जो चाहते थे कि इस को वक्ती तौर पर कबूल कर सिक्ख फौजों को जत्थेबंद कर लिया जाए और अच्छे हथियार तथा घोड़े इकठ्ठे कर लिया जाएं। आखिर कईयों इस सुझाव को कबूल कर लिया। जागीर की पेशकश कबूल कर लिए जाने के पश्चात भाई मनी सिंघ को यह खिल्लत कबूल करने के लिए कहा गया। उन्होंने कहा की मैं 10वें वर्ष में दाखिल हो चुका हूं, इस कारण यह सेवा किसी और को सौंपी जाए। इसके पश्चात फौजों के सांझे मुखी बाबा दरदबार सिंघ को खिल्लत कबूल करने की विनय की गई। वह तो नवाबी को रद्द करने वालों में सब से आगे थे। उन्होंने बिलकुल ना कर दी। बाबा दरबारा सिंघ के पश्चात खालसा फौजों के डिपटी चीफ स. कपूर सिंघ थे। यह सोच कर कि कहीं वह भी सीधा इन्कार न कर दें, पांच सिक्ख उन के पास गये और हाथ जोड कर अरज कि वह एक बार खिल्लत अवश्य कबूल कर लें। स. कपूर सिंघ कुछ समय के लिए चुप रहे और फिर बोले, ‘‘मैं इस शर्त पर यह खिल्लत कबूल करता हूं कि मैं यह पहनूंगा नहीं। मैं मुगलों के दरबार में हाजिर नहीं हूंगा और मुझसे घोंडों की सेवा संभाल वापिस नहीं ली जायेगी।’’ दस. कबूल सिंघ की शर्तें खालसा जरनैंलों और भाई सुबेध सिंघ ने कबूल कर लीं। इस दिन से स. कपूर सिंघ को बुलाया जाने लगा। जैसे कईयों के विचार थे कि नवाबी वक्ती तौर पर कबूल की जानी चाहिए है, सिक्खों ने दो महिनों में ही अच्छे हथियार और घोडे़ इकट्ठे कर लिये। अब सभी सिक्ख एक झंडे के नीचे होकर जत्थेमंद हो गए। लेकिन अगले कुछ सप्ताहों में ही उन्होंने सोचना शुरू कर दिया कि हम जालिम सरकार के साथ समझौता कर के गुनाह किया है। इसका धोना धोने के लिए हमें लाहौर नगर पर हमला करना चाहिए। इस गुरमते पर अमल करने के लिए संघों ने सभी ओर एक्शन करना शुरू कर दिया। उन्होंने कई जगहों खजाने असलाखाने और अस्तबल लूट लिये। जब इस की खबर जकरीया खान दको मिली तो वह हक्का-बक्का रह गया। उसने एकदम सिक्खों के जागीर जब्त कर ली और सिक्खों की गिरफ्तारी का हुक्म जारी कर दिया इस पर सभी सिक्ख फिर छिपने वाले ठिकानों की ओर निकल गए। अक्टूबर 1733 में (जागीर कबूल करने से 6 महीन के पश्चात औंर जागीर छिन जाने से तीन महीनों के पश्चात) भाई मनी सिंघ ने अकाल तख़्त साहिब पर सरबत खालसा इकटठ करने का फैसला किया। जागीर का समझौता टूटने के कारण ज़करीया खां ने हुक्म जारी किये हुए थे कि सिक्खो को गिरफ्तार किया जाए। ऐसे हालात मे सिक्खों के अमृतसर पहुचने कि कोई आस नही थी। भाई मनी सिंघ ने गर्वनर ज़करीया खां से दीवाली के नाम पर इकटठ करने की अनुमती मांगी। सरकार ने पांच हजार रूपये अदा करने की शर्त पर इजाजत दे दी। दुसरे ओर ज़करीया खां ने यह प्रचार भी करवा दिया कि दीवाली के मौके सरकार अमृतसर को घेरा डाल कर सभी सिक्खों को गिरफ्तार कर लेगी। इस प्रचार से दिवाली के दिनों में बहुत थोडे़ सिक्ख अमृतसर आए। इस से चडावा कम हुआ और भाई मनी सिंघ 5000 रूपये अदा न कर सकें। उन्होंने यह रकम वैशाखी के मौके पर होंने वाले चडावे मे से अदा करने की मौहलत ले ली। अप्रैल मे भी ज़करीया खां ने सिकखों की गिरफ्तारी के डरावे का प्रचार कर दिया। इस बार फिर सिक्खों की आमद अमृतसर मे कम हुई और भाई मनी सिंघ रक्म अदा न कर सके। इस पर मुगल गर्वनर ने उनके एक दरजन के करीब साथियों को गिरफ्तार कर लिया। सरकार ने उन पर मूस्लमान बन जाने पर मुआफ कर देने की शर्त रखी। किसी भी सिक्ख ने धर्म छोडना मंजूर न किया। उन्होंने सभी को तसीहे और सख्त सजाए दे कर 24 जून 1734 के दिन शहिद कर दिया। सिक्खो ने इन शहिदीयो का जवाब बहुत जल्दी ही दे दिया। फतवा देने वाले काजी और शहिद करने वाले जल्लादों को मौत के घाट उतार दिया गया। अगले चार वर्ष सरकार और सिक्खों मे आंखमिचोैली के थे। सिक्ख छिपने वाले स्थानों से अंधरे मे आकर खज़ाना, असला और घोडे़ लुट कर ले जाया करते थे। ऐसा करते हूए कई सिक्ख शहिद भी हो जाया करते थे। 1739 मे नादर शाह ने पंजाब पर हमला कर दिया। सभी ओर लुट मचाते हुए वह दिल्ली पहुंचा। दिल्ली मे लुट मार और कतले आम करने के बाद वह वापस अपने मुलक पहुंचा। रास्ते मे सिक्ख गुरीला जत्थों ने उसके काफले पर कई बार हमले किये और उसके लुट के माल का काफी हिस्सा कम किया। इन हमलो से परेशान होकर उसने लाहौर के सुबेदार ज़करीया खां पूछा कि उसका खज़ाना छीनने वाले यह लोग कौन हैं और यह कहा रहते हैं। ज़करीया खां ने उसको जवाब दिया की ‘‘यह लोग सिक्ख है और इनके घर घोडों की पीठों पर है।’’ जकरीया खां यह सुनकर खबरा गया और उसने जकरीया खां को चेतावनी दी कि यह सिक्ख दुबारा सिर उठाएंगे और हो सकता है कि यह सल्तनत छीन लें। नादर शाह की इस चेतावनी को जकरीयां खां ने दहशत के तौर पर लिया और उसने सिक्खों को पकडनें के लिए स्पेशल फोरस बना दी। उसने सिक्खों के सिरों के मूल्य रख दिये। इस तरह सैकड़ों सिक्ख पकड़ कर शहीद कर दिये गए। इसके बावजूद सिक्खों ने अपने गुरीला एक्शन जारी रखें। एक ओर सिक्ख एक्शन करने लगे हुए थे तथा दूसरी ओर सरकार और उसके टाऊट सिक्खों की पकड़वाई करवा कर ईनाम हासिल करने में एक दूसरे से आगे बढ़ना चाहते थे। जकरीयां खां की हकूमत के दौरान 10,000 से अधिक सिक्ख शहीद हुए। जुलाई 1745 में जकरीयां खां मर गया। उसकी जगह याहीआ खां लाहौर का गर्वनर बना। उसने भी सिक्खों पर जूल्म करना जारी रखा। इन दिनों में ही याहीयां खां का एक हिन्दू वजीर लखपत राय मुगलों से बढ़ कर सिक्ख दुश्मनी का दिखावा कर रहा था। उसने बहुत सारे सिक्ख गिरफ्तार करवाकर मरवाये। इन्हीं दिनों सिक्ख के एक दस्तें की टक्कर लखपत राय के भाई जसपत राय से हो गई। इस भिंडत में जसपत राय मारा गया। भाई की मौत के पश्चात लखपत राय तो पागल जैसा हो गया। उस ने सिक्खों पर और जुल्म करने शुरू कर दिये। अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए लखपत राय ने सिक्खों का कत्लेआम करना शुरू कर दिया। उस ने एैलान किया कि ‘‘सिक्ख धर्म की नींव एक क्षत्रिय गुरू नानक दसाहिब ने रखी थी दऔर अस का खात्मा भी एक क्षत्रीय की करेगा।’’ उस ने ‘‘गुड’’ और ‘‘ग्रंथ’’ लफ्जों पर भी पांबदी लगा दी क्योंकि इन से ‘‘गुरू’’ और ‘‘ग्रंथ’’ लफ्ज याद आते थे। 10 मार्च 1946 के दिन उस ने 1,000 सिक्खों को एक ही दिन लाहौर में शहीद कर दिया। मई 1946 में उस को पता चला कि काहनूवान की छंभ में बहुत सारे सिक्ख इकट्ठे हुए थे। उस ने एक बड़ी फौज ले कर छंभ (जंगल) को चारों तरफ से घेर लिया। कई दिन घेरे के पश्चात भी मुगल फौज डरती हुई उस छंभ के अंदर नहीं जाती थी। इस दौरान सिक्खों ने भी गूरीला जंग शुरू कर दी। इस से लखपत राय और याहीमा खां की फौजों का बहुत नुकसान हुआ। बुखलाए हुए, गुस्से और नफरत से भरे हुए लखपत राय और याहीमां खां ने फौज को हुक्म दे दिया कि छंभी को आग दिया जाए। इस आग का मुकाबला करना किसी के बस का रोग नहीं था। सिक्खों ने अब मुगल फौजों का घेरा तोडकर निकल जाने का फैसला किया। मुगल फौजों की संख्या ज्यादा थी। इस कारण घेरा तोडना इतना आसान नहीं था। इस हालत में सिक्खों का बहुत नुकसान हुआ। एक घल्लूघारा में सात से दस हजार सिक्ख मारे गये। इस कत्लेआम को छोटा घल्लूराम कहा जाता है। याहीमां खां और लखपत ने 10 से 15 हजार तक सिक्ख कत्लेआम किये। इस अंधेरे समय में सिक्ख कौम ने (नवाब) कपुर सिंघ, जस्सा सिंघ आहलूवालीया,जस्सा सिंघ रामगढीया, नंद सिंघ सुकरचक्कीया, दीप सिंघ (बाबा), गुरदयाल सिंघ डल्लेवालीया, हरी सिंघ पंजवड़ जैसे जरनैलों के नेतृत्व में अपने आप को जत्थेबंद किया और दुबारा गुरीला एक्शन शुरू किये। 1748 मे सिक्खों ने 60 से ज्यादा जत्थे कायम हो चुकें थे। 12 मार्च 1748 के दिन इन सभी का एक इकटठ अकाल तख्त साहिब पर अमृतसर मे हुआ। इस इकटठ मे फैसला किया गया सभी सिक्ख ज़त्थो को 11 मिसलो मे ज़त्थेबंद कर दिया जाए। इन 11 मिसलो के नाम थे आहलुवालीया मिसल (जस्सा सिंघ), भंगी मिसल (हरी सिंघ), डल्लेवालिया मिसल (गुलाब सिंघ), फैज़लापूरीया मिसल (कपूर सिंघ), कन्हईया मिसल (जै सिंघ) करोडी सिंघआ मिसल (करोडा सिंघ), नकई मिसल (हरिा सिंघ), निशानवालीया मिसल (दसौंध सिंघ), नंद सिंघ संघानीया मिसल (नंद सिंघ), (बाद मे इसे रामगडीया मिसल कहा जाने लगा), सुकरचक्कीया मिसल (नौध सिंघ), शहीदी मिसल (दीप सिंघ)। फूलकिया खानदान सिक्ख मिसलो मे शामिल नही थे। सिक्ख राज स्थापित होनें के बाद वह अपने आप को बारहवी मिसल कहने लगे थे। वैसे वह खालसा फौज का हिस्सा कभी भी नही बने थे। 1748 से 1762 तक सिक्ख मिसलों ने अपनी शक्ति को ज़त्थेबंद किया। सिक्ख होमलैंड़ मे इस समय मुगल की हकूमत थी परन्तु उन पर भी अहमद शाह दुरानी की हकूमत थी। अहमद शाह अकसर हमले करता रहता था और जितनी देर वह पंजाब मे रहता था, उसकी ताकत का सिक्का ही चलता था। उसके जाने के पश्चात सिक्ख इस मूलक के असली हाकम होते थे। दुसरें अर्थो में सिक्ख होमलैंड के तीन हाकम थे। कागजा़ें मे यह मुगलो की हकुमत थी, दुरानी के हमले के समय यहा अफगानों का राज था, वैंसे सभी ओर सिक्खों की हकूमत थी। चाहे अहमद शाह लुट मार करके औंर टैंक्स उगराहने के बाद यहा नही रहता था परन्तु वह अपने पीछे अपने जरनैल छौड जाया करता था। दुरानी के आने के बाद सिक्ख छिपन स्थानो में बाहर आ जाया करते थे और अफगान जरनैलों की उनके आगे कोई पेश नही जाती थी। इस दौरान मार्च 1754 में सिक्खों ने पंजाब के किसानो को ’राखी‘ की पेशकश की जो उन्होने खुशी- खुशी मान ली थी। वह सिक्खो को अपनी फसल का माना हिस्सा देते थे और इस बदले सिक्ख उनको मुगल हाकमों अफगान हमलावरों से रखवाली (सुरक्षा) देते थे। दूसरे अर्थो में पंजाब की असली राजे और शासक सिक्ख थे। रखवाली का यह प्रबंध कई वर्ष चलता रहा। आखरी 1758 में अकाल तक साहीब पर गुरमत पास किया गया कि प्रत्येक मिसल की रखवाली इलाके में उस मिसल का राज मान लिया जाये। परन्तु समुची हुकूमत तक साहिब के द्वारा सरबत खालसा की मानी जाये। अफगान हमलावर अहमद शाह दुरानी को पंजाब ने सिक्खों का मोलबाला खनकता था और वह इनको को खत्म करने की कोशिशे करता रहता था। परन्तु उसकी ज्यादा नहीं थी चलती क्योंकि उसके आने के पश्चात सिंक्ख पहाड़ों जंगलों तथा मरूस्थलों (रेगिस्तान) की ओर निकल जाते थे इस सारे समय (1748 से 1762) में अहमद शाह के फौजियों और दो बार बडी टक्करे हुई। पहली टक्कर नबम्बर 1757 में हुई जब अफगानों ने हरी मंदर साहिब और अकाल तख्त साहिब की ईमारतों पर कब्जा कर लिया और इनकी बेअदबी की। इसको रोकने के लिए बाबा दीपसिंह 5000 से ज्यादा साथियों को लेकर अमृतसर की ओर चल पड़े। 11 नवम्बर 1757 को गुरू की नगरी में अफगानों और सिक्खों की भारी मुठभेड हुई जिस में 10000 अफगान और 5000 सिक्खों के साथ बाबा दीपसिंह शहीद हो गये। दूसरी बडी मुठभेड़ 5 फरवरी 1762 के दिन हुई। अहमद शाह दुरानी को पता चला कि हजारों सिक्ख कुप-रहिड़ा गांव के नजदिकी जंगलों में परिवार के साथ छिपे बैठे थे। उसने एक बडी फौज लेकर इन सिक्खों को चारों तरफ से घेर लिया और हमला शुरू कर दिया। अचानक हुए इस हमले के कारण सिक्खों को बडी मुश्किल आई। बीवी, बच्चों के साथ होने के कारण उन को परिवारों की सुरक्षित वहां से बचा कर ले जाने के कारण बहुत नुकशान उठाना पड़ा। कुप रहीड़ से सिघों ने बीकानेर के रेगिस्तान की ओर बढ़ना शुरू कर दिया। अंधेरा होने तक, सिक्ख फौंजों के दसाथ जूलती रही। यहां से वापस मुडकर अहमद शाह की फौज ने हरिमंदर साहिब और अदकाल तख्त साहिब की ईमारतों को तोड़ दिया। इस एक ही दिन 5 फरवरी 1762 को, 25 से 30 हजार तक सिक्ख मारे गए। इस घल्लूघारे से सिक्ख कौम का आधा हिस्सा तबाह हो गया परन्तु इसने सिक्खों में बेदिली दका अहदसास न भरा बल्कि फैसलाकुन लडाई की तैयारियों का विचार करने लग पड़े। सिक्ख राज्य की स्थापना बड़े घल्लूघारे से सिर्फ 8 मास पश्चात 16 अक्टूबर के दिन सभी सिक्ख अमृतसर में इकठ्ठे हुए। इस समय हुए सरबत खालसा इकठ्ठा में सिक्खों ने फैसला किया कि अहमद शाह दुरानी से सीधी टक्कर ली जाए। अगले दिन दुरानी ने अमृतसर पर हमला बोल दिया। सारा दिन हुई लडाई में सिक्खो का हाथ ऊपर रहा। अंधेरा होने के बाद दुरानी की फौज लाहौर की ओर वापस चली गई। इसके बाद दुरानी ने समझ लिया कि वह अब सिक्खों से सीधी टक्कर लेने के योग्य नहीं है। इसलिए वह जल्दी ही वापस चला गया। अहमद साहिब दुरानी आठवीं बार काबूल से फौज लेकर आया लेकिन 1 दिसम्बर 1764 का दिन छोड कर उसकी सिक्खों के साथ कोई टक्कर नहीं हुई। इस दिन भी उसके हजारों फौजियों के साथ अकाल तख्त साहिब की सेवा संभाल कर रहें, 30 सिक्खों ने बाबा गुरबक्श सिंघ के नेतृत्व में सैकडों अफगान फौजियों को मारने के पश्चात शहीदियां प्राप्त कर की। अमृतसर में 30 सिक्खों और 30 हजार अफगान फौजियों की असंतुलित लड़ाई कोई लड़ाई न थी। 17 जनवरी 1765 के दिन सिक्ख और अफगानों में असली लड़ाई हुई थी जिसमें सिक्ख फौजों ने जीत हासिल की थी। इस हार के पश्चात अहमद शाह वापस काबूल को चला गया। 9 अप्रैल 1765 के दिन सरबत खालसा ने अकाल तख़्त साहिब पर इकट्ठ कर यह गुरमता भी किया कि लाहौर को भी आजा़द करवा लिया जाये। 16 मई के दिन गुज्जर सिंघ भंगी, लहणा सिंघ भंगी और सोभा सिंघ कन्हईया की अगुवाई में सिक्खों ने लाहौर पर कब्ज़ा कर लिया । इसके साथ ही सिक्खों ने अपना सिक्का भी जारी कर दिया। इसके पश्चात् भी अहमद शाह दिसंबर 1766, 1769 और 1770 में भी पंजाब की ओर आया लेकिन उसने सिक्खों के साथ कोई सीधी टक्कर न ली। 14 मार्च, 1770 के दिन उसका जरनैल जहान खां मर गया और कमजोर, बुजुर्ग, हारा, उदास अहमद शाह भी 23 अक्तुबर 1772 के दिन मर गया। इसके पश्चात् अब पंजाब को विदेशी हमलों का डर समाप्त हो गया। अब सिक्ख पंजाब के शासक थे। इस दौरान सिक्खों ने हिंदुस्तान तथा इसकी राजधानी दिल्ली की ओर भी मुंह किया। 11 मार्च 1783 के दिन दिल्ली के लाल किले पर भी खालसे का नीला निशान साहिब फहराया गया था। इस समय आहलुवालीया मिसल कपूरथला और माझे के कुछ इलाके पर रागढ़ीया कादीयां, बटाला, हरिगोविंदपुर, मयाणी, टोडा, सिंघपुरीए, बनूड़, मनौली, भारतगढ़ पर; कन्हैया बटाला परगना में शहीदो मिसल अम्बाला और सहारनपुर के अलाके में नकई सलतुज और लाहौर के बीच के इलाके सुकरचक्कीया गुजरावाला में राज कर रहे थे। फरीदकोट, पटीयाला, नाभा, जींद, सरहिंद, बूडीयां, कैथल वगैरह भी सिक्खों के कब्जे में थे। यानि सारा सिक्ख होमलैंड सिक्खों ने आजाद करवा लिया था। परन्तु इस माहौल में कुछ सिक्ख राजे मुगलों जैसा करने लग गये तथा अय्यासी में पड़ गए। उनके हिन्दूं वजीरों तथा सलाहकारों ने उनको सिक्खी से दूर करने में विशेष रोल अदा किया। वह अय्यास के साथ-साथ जालम भी बन गये। इस माहौल में 1799 में सुकरचक्कीयां मिसल के नौजवान राजे रणजीत सिंघ ने लाहौर पर कब्जा कर लिया। इसके पश्चात उसने अलग-अलग मिसलों के इलाके छिनने शुरू कर दिये। 1801 में उसने अपने आप को ‘महाराजा’ भी ऐलान कर दिया। अगले कुछ वर्षों में उसने 11 में से 10 मिसलों के इलाके छीन लिए। कपुरथला को छोड कर सतलुज के इस ओर उसने सारे इलाके पर कब्जा कर लिया। रणजीत सिंघ शीघ्र ही डोगरों (गलाबों सिंह, धियान सिंह, सुचेत सिंह, हीरा सिंह) यू.पी. के ब्राम्हणों (खुशहाल सिंह, तेज सिंह, लाल सिंह, बेली राम) तथा अन्य हिन्दूओं के चंगुल में फंस गया और इन्होंने रणजीत सिंह को चापलूसी, शराब, सुन्दर लड़कियां पेश करके अपनी मुठ्ठी में कर लिया। दूसरी ओर इनमें से कुछ डोंगरे तथा ब्राम्हण अंग्रेजों के साथ गुप्त संबंध भी रखने लग पड़े। सिक्ख और अंग्रेज 1839 में रणजीत सिंह मर गया। डोगरों ने 1840 में उसके पुत्र खड़ग सिंघ और पौत्र नैनिहाल सिंघ भी मार दिये। 1843 में शेर महाराजा बना। उसको संधावालीया ने मार दिया। 1843 में नागालक लीप सिंघ गद्दी पर बैठा। इस दौरान भी डोगरों और भारत के ब्राम्हणों ने अंग्रेजों के साथ मिल कर रणजीत सिंघ की हकूमत और अंग्रेजों का कब्जा करवा दिया। मार्च 1849 में पंजाब में अंग्रेजों की हकूमत कायम हो चुकी थी। इस समय सिक्खों की आबादी 80 लाख थी। हकूमत बदलने के साथ ही दिखावे के तौर पर बने सिक्ख दुबारा हिन्दू बन गये और यह आबादी सिर्फ 18 लाख रह गई। इसके साथ ही अंगे्रजों ने ईसाई धर्म का प्रचार शुरू कर दिया। इस हमले से बचने के लिए सिक्खों ने सिंघ सभा लहर शुरू कर दी। ठाकर सिंघ, संधावलीया, जवाहर सिंघ कपूर, ज्ञानी दित्त सिंघ, प्रो. गुरमुख सिंघ कंवर विक्रम सिंघ और उनके साथियों ने सिक्खों को बेदिली और उदासी में से निकाल कर कौम को नई जिन्दगी दी। इस दौरान गुरूद्वारों पर पुजारियों ने कब्जा कर लिया हुआ था। उनमें सेे ज्यादा हिन्दु थें और वह गुरूद्वारो की आमदनी अय्याशी, पाप, व्यभिचार और नशों के लिए खर्च करते थे। इस सभी को समाप्त करने के लिए अकाली लहर (गुरूद्वारा सुधार लहर) चलाई गई। करतार सिंघ झबर, तेजा सिंघ भुच्चर, मास्टर मोत सिंघ, तेजा सिंघ समुदरी, अमर सिंघ झबाल और उनके दो भाई, लक्ष्मण सिंघ धरोवाली, हरचंद सिंघ लायलपुरी, सुन्दर सिंघ लायलपुरी, मास्टर तारा सिंघ, बाबा खड़क सिंघ, सेवा सिंघ ठीकरीवाला औरों के नेतृत्व में पांच वर्षो कि जददो-जहद में 500 सिक्ख शहीद हुए, 50000 जेलों में गए और लाखों, कराड़ो रूपये जुर्माना भरने तथा दुसरे नुकसान के पश्चात 1925 में गुरूद्वारा एक्ट बना जिससे बहुत से गुरूद्वारे सिक्खो ने आजाद करवा लिये पर इसमे हजुर साहिब और पटना साहिब शामिल नही थे तथा यह आज 2003 में भी आजाद नही थे। इस दौरान अंग्रेजो कीे तरफ से भारती उप महादीप की आजादी की लहर भी चल पडी। 1940 में मुस्लमानो ने अलग पाकिस्तान की मांग भी शुरू कर दी। इस दौरान सिक्ख नेता जज़बाती होकर हिन्दु आगुओं के कहने पर वह आजाद मुलक सिक्खसंतान की जगह भारत से सांझा देश बनाने में राज़ी हो गए। सिक्खों की जनसंख्या पंजाब सिक्खों का होम लैंड है। दुनिया भर के सिक्खों की जनसंख्या का 70 प्रतिशत पंजाब में है। वैसे सिक्ख दुनिया के हर भाग में रहते हैं। भले ही पुरी सही संख्या बतलानी संभव नही किन्तु एक अनुमान से संख्या निम्नलिखित है:- पंजाब 14592387 हरियाणा 11,70662 दिल्ली 10,0000 उत्तर प्रदेश 6,7859 राजस्थान 8,18420 जम्मू कश्मीर 2,07154 महाराष्ट 2,155337 मध्य प्रदेश 1,50772 चण्डीगढ 1,45175 बिहार 20780 बंगाल 66391 हिमाचल 72353 गुजरात 45587 आंध्र प्रदेश 30998 आसाम 22519 उड़ीसा 17496 कर्नाटक 15326 तमिलनाडू 9545 केरल 2726 मणीपुर 1653 मेघालय 3110 अरूनाचल 1865 गोआ, दमन 1115 नागालैंड 1152 त्रिपुरा 1182 सिक्कम 1176 अंडमान 1587 मिजेारम, 1000 इंग्लैंड 4-6 लाख कनेडा 4-6 लाख अमरीका 5-7 लाख इटली 1 लाख मलेशिया 50 हजार कीनिया 50 हजार सिंगापुर 15 हजार थाईलैंड 10 हजार आस्टेलिया 20 हजार हालैंड 5 हजार न्युजीलैंड 8 हजार हांगकांग 3 हजार जर्मनी 6 हजार बैलजीयम 4 हजार नार्वे 6 हजार बाकी देश 50 हजार सिक्ख कौन हैं ? कोई भी व्यक्ति, जो किसी भी जाती, रंग, नस्ल के साथ संबंध रखता हो सिक्ख हो सकता है, अगर वह: एक परमात्मा पर विश्वास रखता हो। दस गुरूओं और गुरू ग्रंथ साहिब की शिक्षाओं को मानता हो। अपने घर की रस्मो को अकाल तख़्त साहिब से जारी रहत मर्यादाओं के अनुसार निभाता हो। खंडे के अमृत पर विश्वास रखता है और अमृत पान किया हो या करना चाहता है। किसी और धर्म या डेरे पर विश्वास नही रखता। (निरंकारी, राधास्वामी, नामधारी इत्यादि नही है) अपने नाम के साथ सिंघ (मर्दो के लिए या कौर (औरतो के लिए) लिखता है। शरीर के किसी भाग से रोम रोम ना (बाल) काटना हो। सहजधरी सिक्ख कौन है ? कोई भी व्यक्ति दरअसल ’सहजधरी सिक्ख’ नही हो सकता। कुछ लोगो ने यह शब्द उन लोगो के लिए उपयोग किया है जो (1) एक परमात्मा पर यकीन रखते हैं (2) किसी और धर्म पर यकीन नही रखते हैं (3) दस पातशाहियों और गुरू ग्रंथ साहिब की शिक्षाओ पर विश्वास रखते हैं (4) अपने घर के रीति रिवाजो को अकाल तख़्त से मंजुर रहत-मर्यादा अनुसार करते है (5) हलाल नही खाते (6) शराब नही पीते (7) अपने केश नही कटाते और हमेषा दस्तर पहनते हैं (महान केश, प़़त्रा 693)। परन्तु सहजधारी शब्द सिक्ख दर्शन में कही भी नही आता। सच्चाई यह है की 20वीं शदी के शुरू में अंग्रेजों ने सिक्खों के लिए कुछ विशेष राहते शुरू की थी कुछ हिन्दूओं नें इन सुविधाओं का फायदा उठाने के लिए अपने आप को कथित सिक्ख घोषित कर दिया। पर 1947 के बाद यह काम बंद हो गया। अब कोई भी सहजधारी नहीं। शाब्दिक अर्थ में सहजधारी का मतलब है वह व्यक्ति जो खंडे का अमृत लेना चाहता है और वह धीरे-धीरे इस ओर चल रहा है। यानि कोई भी इंसान कई वर्ष लगातार सहजधारी नहीं हो सकता। 1996 में गुरूद्वारा चुनाव के समय हिन्दूओं ने गुरूद्वारों पर अधिकार करने के लिए कथित ‘सहजधारी’ नाटक करके हिन्दूओं की वोटें बनवाई थी।। इस षड़यंत्र में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के कुछ नेता शामिल थे। सिक्ख दर्शन के अनुसार ‘सहजधारी सिक्ख’ नाम की कोई चीज नहीं है। एक सिक्ख या ‘अमृतधारी’ है या तों ‘गैर-अमृतधारी’ है या ‘पतित’ चोैथी कोई चीज सिक्ख दर्शन में नहीें है। अगर कोई हिन्दू (या मुसलमान या कोई और) सिक्ख कहलाना चाहता है तो वह अमृत पान करके सिक्ख बन सकता है। ऐसा कई लोगों ने किया भी है। यदि किसी को सिक्खी में विश्वास है तो क्या वह शेरोमणी कमेटी का वोटर बनने के साथ ही बनता या कायम रहता है ? नहीं सच तो यह है कि यह एक गहरा षड़यंत्र है जिसका उद्देश्य सिक्खों के गुरूद्वारों पर कब्जा करना ही है। सिक्ख कौम सभी अमृतधारी और जो अभी अमृतधारी नहीं हैं, ‘सिक्ख कौम’ का हिस्सा है। संगत/गुरू संगत जहाँ भी 5 या 5 से अधिक सिक्ख उपस्थित हो उस इक्ठठा को संगत कहा जाता है। (यहाँ पांच की संख्या की भी पाबंदी नही)। जब वह गुरू ग्रंथ साहिब की हजूरी में गुरू को उपस्थित जानकर कोई कार्यवाही करते हैं तब वह गुरू संगत कहलाते है। सर्वत खालसा समूची सिक्ख कौम को ’सर्वत खालसा’ कहा जाता हैं। इसका अर्थ सभी सवा दो करोड़ या अधिक सिक्ख नहीं। सर्वत खालसा दरअसल उस इक्टठा को कहते हैं जिसमें पंथ के सभी समूह के प्रतिनिधि शामिल हो। यह जथेंबंदिया वह हैं जो अकाल तख़त साहिब को सर्वोच्च मानती है और उनकी वफादारी अकाल तख़्त साहिब के साथ हैं। 18वीं सदी में ऐसे सर्वत खालसा इक्टठा वर्ष में दो या अधिक बार हुआ करते थे। इन इक्ठठों में सिक्ख कौम अपने राष्ट्रीय बिन्दुओ पर विचार विमर्श करके फैसला किया करते थे। इस फैसले को गुरमता प्रत्येक सिक्ख के लिए अकाल तख़्त साहिब का हकुमनामा होता है। गुरमता गुरमता का शाबदिक अर्थ है ’गुरू की मत’ के अनुसार किया गया मत का निर्णय। पंथ की ओर से गुरू ग्रंथ सहिब की हजूरी में सिक्ख दर्शन के अनुसार लिये गए फैसले गुरमते कहलाते हैं। गुरमता सिक्ख दर्शन के किसी अर्थ को स्पष्ट करने के लिए हो सकता हैं या किसी ऐसे नुक्ते के संबंध में जो समूची सिक्ख कौम के साथ संबंध रखता हो। साधारण मतो के लिए दुसरा शब्द.’’फैलाना’’ प्रयोग किया जा सकता है। हुक्मनामा गुरू साहिब कि ओर से संगतो को भेजे जाने वाले खतों (प़त्रो) को हुक्मनामे कहा जाता था। संगत उन पर फुल चढ़ाना ही नही बल्कि उनके दर्शन करना भी सम्मान कि बात समझती थी। अठारवी सदी में सर्वत खालसा के इक्ठठ में किये गए गुरमते को अकाल तख़त सााहिब से ’हुक्मनामा’ के रूप मे पंथ को सामिल किया जाता था। बीसवी सदी मे अकाल तख्त साहिब के तत्कालीन कथित-जत्थेदार की ओर से किये गए ’हुक्म’ को भी हूक्मनामा कहा जाने लगा हैं। लेकिन इन ब्यानो/ फैसलो को हूक्मनामा कहना गलत है। गुरू साहिब और अन्य की ओर से जारी किये गए हुक्मनामो के संबंध मे एक पुस्तक भी छपी हुई है। पर इसके बीच छपे हुए कुछ हुक्मनामे नकली हैं। कुछ और नकली हुक्मनामो के मौजुद हाने का भी पता लगता है। खंडे की पाहुल (अमृत) गुरू पंथ में शामिल होने से पहले हर सिक्ख को ’खडे का अमृत’ लेना पडता है। खंडे का अमृत पाँच प्यारे पिलाते हैं। पाँच प्यारे खंडे से अमृत तैयार करके एक विशेष मर्यादा के अनुसार इच्छुक सिक्खो को पिलाते हैं। हर सिक्ख प्रतिज्ञा करता है कि मैं अपना जीवन सिक्ख पंथ के लिए समर्पित करूॅगा। इसके बाद पाँच प्यारे सिक्ख रहीत मर्यादा बताते हैं। पाँच प्यारों में प्रत्येक वह अमृतधारी सिक्ख मर्द या स्त्री शामिल हो सकता है जो कुरहतिया या तनख़हिया (धार्मिक सजा पाने वाला) न हो। चार बज्र कुरहितें 1. शरीर के किसी भी हिस्से से रोम (बाल) काटना। 2. हलाल माँस खाना। 3 तम्बाकू का सेवन करना। 4 तुरकनी (पर नारी) का संग करना। (इस चारों में से किसी का व्यापार करना या कमाई खाना भी बज्र कुरहित है। ) इनमें से कोई भी कुरहित करने वाला सिक्ख नही रहता। कुरिहतें 1 मीणे, मसंद, धीरमलीये, रामराईये, निरंकारिये, सिरगुंम, नड़ीमार, कुड़ीमार (बेटी को मारने वाले) के साथ रोटी-बेटी का संबंध रखना। 2 बेअमृतधारी या पतित के साथ एक थाली में भोजन खाना। 3 सफेद बाल उखाडना या रंगना। 4 पैसे लेकर बेटी का रिश्ता करना। 5 किसी नशे का इस्तेमाल करना। 6 सिक्ख मर्यादा के विपरीत कोई कार्यवाही करना। 7 अमृत पान के समय किये गए प्रण को तोड़ना। इन कुरितो को तोडने वाला सिक्ख तनख़ाहिया हो जाता है और उसको पाँच सिक्खो के सामने उपस्थित होकर, भुल पर क्षमा याचना कर के तनख़्वाह लगवानी पड़ती है। परन्तू चार बज्र कुरहितों में से कोई एक भी करने पर फिर से अमृत पान करना पडता है। इससे पहले तनखाह लगवा कर तनख्वाह भी भुगतनी पडती है। सिक्ख के लिए क्या करना जरूरी है? वाहिगुरू पर विश्वास रखना। दसों पातशाहियों (गुरूओ) के ’एक’ होने पर विश्वास रखना। दसो पातसाहियों की शिक्षाओं के अनुसार जीवन व्यतीत करना। जितनी जल्दी हो सके अमृत का पान करना। सिर्फ अकाल पुरक की आराधना करना। अपने नाम के साथ सिघं (पुरूषो के लिए) या कौर (स्त्रीयों के लिए) लगाना। पंजाबी भाषा पड़ना, लिखना, बोलना और गुरमुखी लिपी सीखना और प्रयोग करना। सिक्ख दर्शन और इतिहास का अधिक ज्ञान प्राप्त करना। अपने बच्चो को सिक्ख धर्म, ऐतिहास तथा दर्शन का ज्ञान देना। अपने बच्चो को पंजाबी बोली और गुरमुखी लिपी सिखाना। घर की रस्मे अकाल तख़त साहिब से प्रवानित रहित मर्यादा के अनुसार करना। जहाँ तक संभव हो सके प्रतिदिन गुरूद्वारे जाना। ईमानदारी की कमाई करना। अपना दसवंध निकालना और सिक्ख कौम की भलाई के लिए खर्च करना। भाईचारे कि सेवा में हिस्सा डालना। जाति, रंग, नसल, लिंग के आधार पर भेदभाव करना। गरीब और कमजोर की मदद करना, बेईमानी का विरोध करना। अकाल तख़्त साहिब के हुक्मनामों के आगे सिर झुकाना। सिक्ख होमलैंड की भलाई में हिस्सा लेना। सिक्ख कोम के प्रति होने वाले अन्याय के प्रति चैकस रहना। घर की रस्में, जितना संभव हो सके, सादगी के साथ करना। सादा भोजन खाना (शराब, तम्बाकू, डग्स का प्रयोग न करे) सुबह के समय जल्दी उटना और नितनेम करना। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहकार से बचना। पराई स्त्री को बहन बेटी के बराबर समझना। गरीब की रसना को गुरू की गोलक समझना। अपनी बीवी/पति का वफादार रहना। दुसरे सिक्ख को ’वाहेगुरू जी का दा/खालसा, वाहेगुरू जी की/दी फतेह’’ बोलने मे पहल करने का प्रयत्न करना। धर्म के किरत कर के निर्वाह करना। जन्म से मृत्यु तक गुरू मर्यादा निभाना। सिक्ख के लिए क्या न करना जरूरी है? गुरू ग्रथं साहिब के अलावा किसी के आगे माथा नही टेकना। मंदिर, मस्जिद, गिरजा, साईनागाग, या किसी गैर-सिक्ख सिक्ख धार्मिक स्थल पर पूजा या प्राथना नही करनी। किंन्तु, सिक्ख को दूसरे के धर्म का आदर करना चाहिए। कब्र या मड़ी (समाधी) पर विश्वास नही रखना और माथा नही टेकना। किसी सिक्ख की मंडी नही बनाना। मुर्ति या तस्वीर (भले ही गुरू साहिब की हो) की पूजा नही करना और उसके आगे माथा नही टेकना। वैसे तो गुरू साहिब की असली तस्वीर कोई भी नही, परन्तु यदी सचमुच मिल भी जाये तो भी उसकी पूजा करना या उसके आगे माथा टेकना सिक्ख दर्शन के विपरीत है। जादु, तावीज, काला इल्म, अधं विश्वास, भेदभाव में विश्वास नही रखना। विशेष समय, लग्न, मुहूर्त, ग्रहण, दिन, बार, तारीख के भ्रम में न पडना। बेटी के जन्म लेने पर उसे मारना नही। सती-प्रथा को नही अपनाना। करवां चोैथ, रोजा या कोई अन्य उपवास नही रखना। धार्मिकता हेतु उपवास रखना गलत नही हैं केवल स्वास्थ्य के लिये उपवास रखना उचित है। संक्रांति, अमावस्या, या पुर्णिमा को महत्वपुर्ण नही मनाना। इसका सिक्ख धर्म के साथ कोई संबंध नही। जनेउ या ऐसी अन्य प्रथा पर विश्वास नही रखना। राधा स्वामी, निरंकारी, सच्चा सौदा (सरसा) इत्यादि के साथ रोटी-बेटी का संबंध नही रखना। साधू, संतो, डेरोवालों को नही मानना। जनता के दसतार के बिना नही आना। घर में भी नंगे सिर नही बैठना। घर -बार छोड़ कर उदासी/साधु/संयासी नही बनना। (गृहस्थ अपनाना है) तबाकु, ड्रक्स या अन्य नशे (भंग, अफीम आदी) का सेवन नही करना। अपनी स्त्री के सिवाय दुसरी स्त्री के साथ संग नही करना। स्त्री ने पर्दा प्रथा नही अपनाना। किन्तु सुन्दरता प्रतियोगिता में हिस्सा लेना सिक्खी उसुलो के विपरीत हैं। बच्चे का अर्बासन (गर्भपात) नही करना। नाक, कान या अन्य अंग का छेदन नही करना। बिना छेदन किए गहने प्रयोग किये जा सकते है। चोरी नही करना, जूआ नही खेलना। सिक्ख का नितनेम अकाल तख़्त साहिब की ओर से मंजुर रहीत मर्यादा के अनुसार सिक्ख के नितनेम में निम्नलिखित बाणीयाँ शामिल हैं:- जपुजी साहिब जापु साहिब सवैये (स्रावग सूध वाले) रहिदास (सोदर के सबद, सो पुरख के सबद, चैपाई, आनंद साहिब की पहली 5 तथा 40 वीं पउड़ी और मुंदावणी), सोहिला। अखंड पाठ अखंड पाठ का अर्थ है बिना रूके लगातार पाठ करना। सिक्खों में यह प्रथा 19वीं सदी के अंत तक बिल्कुल नही थी और 20वीं सदी के बीच ही इसकी शुरूआत हुई हैं। जैसे-जैसे सिक्ख आर्थिक रूप से समृद्ध होतं गये अखंड पाठ और दिखावे की अन्य रस्में सिक्खो में, रस्म के तौर पर करना, सिक्ख दर्शन के विपरीत है। गुरबाणी का एक सबद हो या गुरू ग्रंथ साहिब के कुछ पन्ने हों या पुरा पाठ हो इसके लगातार करने या रूक-रूक कर या हिस्सो में करने या न करने पर कोई फर्क नही पडता। गुरबाणी कोई मंत्र या जादु या इल्म नही है। गुरबाणी तो गुरू साहिब की बताई फ़िलासफी हैं, जो पढ़ कर, अर्थ समझ कर, उसे अपनी ज़िन्दगी में लाने के लिए है। सिक्खों के पाँच ककार एक अमृतधारी सिक्ख के लिए जरूरी है कि वह पाँच ’ककार’ (केश, कंधा, कड़ा, कछहिरा, कृपाण) हमेशा अंग-संग रखे। इनको ककार इसलिये कहा जाता है कि यह पाच शब्द, गुरमुखी के अक्षर ’क’ के साथ शुरू होते है। सिक्ख पाँचो में से किसी भी ककार कों अपने से जूदा नही कर सकता और इन्हे सारी जिन्दगी अपने साथ रखता हैं। यह पाँच ककार हैं: 1 केश - यह सिक्ख के लिए सबसे पहला जरूरी ककार ’केश’ है। सिक्ख अपने शरीर के किसी भी हिस्से से कोई भी रोम (बाल) अलग नही कर सकता। केश गुरू साहिब की मुहर (छाप) हैं। केश कटवाने वाला सिक्ख पतित कहलाता है। सच तो यह है कि कटे हुए केशो वाला कोई भी व्यक्ति अपने आप को सिक्ख नही कहलवा सकता। केशो कि संभाल के लिए ’’केसकी’’ भी जरूरी है। 29 मार्च, 1698/1699 के दिन जब गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब ने खंडे का अमृत शुरू किया तब उन्होने पाँच प्यारो को बाकी चार ककारों के साथ पांचवीं केशरी भी दी थी। भले ही केशरी ’ककार’ हो या न हो किन्तु गुरू साहिब ने इसको सिक्ख के अस्तित्व का अटुट हिस्सा बनाया था। केसकी केशो के सम्मान और उनकी संभाल के लिए आवश्यक भी है। बहुत सी सिक्ख स्त्रीयों भी केसकी सजाती है। वैसे चुन्नी/डुप्पटा भी सिक्ख लिबाज में मंजूर है। (देखो दस्तार के लिए अलग लेख) 2 कंघा- सिक्खो का दुसरा ककार कंघा है। सिक्ख कंघा एक साधारण कंघी से अलग है। इसका रूप और आकार दुसरो से अलग रूपका है। कंघा केशो की संभाल के लिये आवश्यक है। सिक्ख के लिए अनिर्वाय है कि वह सुबह-शाम दोनों समय कंघे से बाल सजाकर जुडा करे। 3 कड़ा- सिक्खो का हुक्म है कि वह अपने दायें हाथ में लोहे का कडा पहने सोने का कडा सिक्ख दर्शन के अनुसार सही नही है। कड़े का पुर्वोतर जंग मे सुरक्षा था। दायें हाथ से पहना कड़ा इन्सान की ओर से किये जाने वाले गलत कामों को रोकने की पे्ररणा भी देता हैं। 4 कछहिरा-सिक्खो के लिए चोैथा ककार कछहिरा (एक विशेष काछ) है। यह साधारण काछ या जांघीये से अलग है। सिक्ख कछहिरा एक विशेष डिजाईन का होता है और विशेष व अलग तरीके से इस की सिलाई होती है। कछहिरा एक शाही पहनावा है। एक विचार के अनुसार यह सच्चंे सैक्स-जीवन की प्रेरणा भी देता है। 5 कृपाण- सिक्ख का पाँचवा ककार कृपाण है। गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब ने बन्दुक, तोप, पिस्तोल, नेजा, खंडा, किरच, गुरज आदि को नही बल्कि कृपाण को ककार बनाया था, क्योकि कृपाण में ’कृपा’ और ’आन’ दोनो शामिल हैं। सिक्ख को अपनी ’आन’ के लिए तलवार उठाने कि अनुमती है किन्तु उसने इसके प्रयोग के पहले ’कृपा’ (मेहर) करने का प्रयत्न करना है। सिक्ख की कृपाण आक्रमण के लिए नहीं बल्कि सुरक्षा के लिए उठ सकती है। सिक्ख की कृपाण न्याय और मानवी अधिकारो के लिए कर्तव्य की निशानी हैै। (देखे कृपाण के बारे में अलग लेख) सिक्ख सभ्याचार सिक्ख धर्म अध्यात्मिकता का धर्म है तथा यह जीवन में आगे बढ़ने का दर्शन है। इसे सिक्ख धर्म के आधारिक नियमों से समझाया जा सकता है। सिक्ख संस्कृति के मौलिक नियमो में से कुछ विशेष बिन्दु यह है: किरत करना- सिक्ख का अपने धर्म के साथ पहला वचन है: धर्म की किरत करना यानि सच्ची कमाई करना। सिक्ख ठग्गी, धोखा, चोरी, स्मगलिंग, बेईमानी से या हाथ फैलाकर मांग कर जीवन का निर्वाह नही कर सकता। सिक्ख ऐसा उद्योग या व्यापार कभी नही कर सकता जो सिक्ख दर्शन के आधार पर विपरीत हो जैसा हजामत करना, हेयर डेसिंग, ड्रग्स या तम्बाकू बेचना, वेश्यावृति या अडडा चलाना, हलाल मांस खाना या हलाल मांस बेचना। यह चारो बजर कुरहतें है। बाँट कर खाना-ं धर्म की कमाई करने के साथ-साथ सिक्ख का यह कर्तव्य भी है कि वह अपनी कमाई से दसवां हिस्सा धर्मांध निकाले। दसवंध सिक्ख के लिये कतव्र्य है। दसंवध न निकालने वाला सिक्ख गुरू साहिब का कर्जदार है। दसवंध को पंथ की तरक्की, गरीब या जरूरतमंद की सहायता या अन्य पंथक सेवा के लिए व्यवहार में लाया जाता है। यानि यह सिक्ख भाईचारे का जमा वाला हिस्सा है। नाम जपना-सिक्ख का कर्तव्य है कि वह हर समय वाहिगुरू का नाम जपे। सिक्ख धर्म में नाम जपना या नाम सिमरन हर समय ’वाहिगुरू’ कहते रहना भी नही हैं। सिमरण या नाम जपने का अर्थ है ‘स्मरण’ (याद) करना। यानि सिक्ख जो भी काम करेे वह साथ ही साथ परमात्मा के उसूलों (नियमों) के विरूद्ध कोई भी कार्यवाही नहीं करना। दूसरा, सिक्ख ने अपना नितनेम प्रतिदिन करना है और गुरबाणी भी पढनी है। उसने गुरबाणी का मतलब भी समझना है और उस पर अमल करने की कोशिश भी करनी है। सिक्ख को हर समय ऐहसास होना चाहिए कि वाहिगुरू उसको हर समय, हर जगह, हर हाल में देख रहा है। सिक्ख को हर समय परमात्मा के ‘निर्मल भय’ में रहना चाहिए। मानवी अधिकारों का रखवाला- सिक्ख का एक पवि़त्र कर्तव्य है कि वह गरीब, कमजोर और भोले लोगो कि रक्षा करे। अन्याय और जुर्म किसी भी रूप में, कही भी हो, सिक्ख कि बर्दाशत की सीमा से दुर है। सिक्ख के लिए आवश्यक है कि जहाँ तक हो सके वह मानवी अधिकारों का रखवाला बने। अत्याचार, ज्यादती, दहशत, अन्याय को देखकर सिक्ख चुपचाप नही रह सकता। सच्ची मानवता के लिए अरदास (सरबत दा भला) सिक्ख कि अरदास कभी भी अपने लिए नही होती। सिक्ख की अरदास कुल दुनिया के लिए होती है। सिक्खों की कौमी अरदास को आखरी पंक्ति है: ’तेरे भाणे सर्बत का भला।’ भाणा (परमात्मा की ऱजा) मानना सिक्ख तकदीर के आगे सिर झुकाने वाला नही, परन्तु अकाल पुरख के भाणे आगे सिर अवश्य झुकाता है। सिक्ख कठिन समय में उदास नही होता ओर किसी खुशी के मौके पर सीमा से बाहर नही होता। सिक्ख के लिए सुख और दुख दोनो पोशाखे है, कभी एक पहन ली और कभी दुसरी। सिक्ख अच्छे भविष्य के लिए डट कर मुकाबला करता है लेकिन सफल न होने पर परमात्मा से शिकायत नही करता और हर हालत को उसका भाणा (परमात्मा की इच्छा) समझ कर खुश दिल से स्वीकार करता है। वाहिगुरू की बख़्शिश मानना सिक्ख वाहिगुरू की बख़्शिश का शुक्रिया अदा करता है। सिक्ख वाहिगुरू कि महेरबानी व उसकी कृपा में विश्वास रखता है। सिक्ख मानता है कि वाहिगुरू ने जो भी उसको देना दे, वह ठीक समय पर ही देता है। वाहिगुरू हर एक सिक्ख की सम्भाल करता है। हमारी हर कामयाबी, हमारा हर प्राप्ति वाहिगुरू की मेहरबानी के कारण ही है। दुनियां में उसकी मर्जी और मेहर के बिना कोई भी वस्तु हासिल नही हो सकती। हमारा अस्तित्व भी उसकी मेहरबानी है। चढ़दी कला सिक्ख को आदेश है कि वह ’चढ़दी (चढ़ती) कला’ में जीयें। सिक्ख हमेशा जिन्दगी का सकारात्मक, प्रकाष वाला, आगे वाला पक्ष देखता है। परन्तु सिक्ख यह भी देखता है कि चढ़दी कला परमात्मा का नाम तपने पर ही हो सकती है क्योंकि दरअसल यह नाम जपना ही चढ़दी कला है: नानक, नाम ‘चढ़दी कला’, तेरे भाणे सर्बत दा भला। सिक्ख इंसटीच्युश्नस इंसटीच्युश्नस के लिए जमात या हिन्दी का संस्था का शब्द सही नहीं बैठता। इसलिए मैंने अंग्रेजी का शब्द का ही प्रयोग किया है। दूसरा, क्योंकि इसमें गुरू ग्रंथ साहिब, गुरू, गुरूद्वारा, सेवा लंगर, पंगत आदि भी शामिल है और उनको जमात (या हिन्दी में संस्था) कहना ठीक नहीं लगता। गुरू ग्रंथ साहिब गुरू ग्रंथ साहिब सिक्खों का हमेशा के लिए गुरू है। यह दसों पातिशाहियों की रूहानी जोत (आत्मिक ज्योति) है। यह सिक्ख धर्म दर्शन और का ग्रंथ है। गुरू ग्रंथ साहिब का पहला स्वरूप गुरू अर्जुन साहिब ने 1601-04 में तैयार किया था। भले ही इस ग्रंथ का पहले भी गुरू की तरह सत्कार किया जाता था किन्तु इस को रासमिक तौर पर और हमेशा के लिए गुरूता 6 अक्टूबर 1708 के दिन गुरू गोंबिंद सिंह साहिब ने सौंपी थी। गुरू ग्रंथ साहिब के 1430 पृष्ठ हैं। इसमें 5867 शब्द हैं। इन शब्दों की रचना गुरू नानक साहिब, गुरू आनंद साहिब, गुरू अमरदास साहिब, गुरू रामदास साहिब, गुरू अर्जुन साहिब और गुरू तेग बहादुर साहिब के अतिरिक्त भक्तों, सूफियों, भट्टों आदि ने भी की। इनमें शामिल है: भक्तों में भक्त कबीर, बाबा फरीद, भक्त नामदेव, भक्त बाबा रविदास, सत्ता बनवंड़, (दोनों ढाढी) सुन्दर, त्रिलोकन, धन्ना, बेनी, जयदेव, भीखण, सुरदास, सैण, पीपा, सदना, रामानंद, परमानंद, (सभी भक्त) और भट्टों में भीखा, कल्लू, जालप, किरत, मथुरा, सल्लू, बल्लू, भल्लू, हरबंस, नल्लू और गयंद। गुरू ग्रंथ साहिब की लगभग सारी बाणी 31 रागों के अनुसार गाये जाने के लिए है। सिक्ख केवल अकाल पुरख की पूजा करता है और अकाल पुरख के दर्शन शब्द में होते है। सिक्ख गुरू ग्रंथ साहिब की पूजा नहीं करते सिर्फ इस का सत्कार करते है। सिक्ख गुरू ग्रंथ साहिब में लिखे ‘सबत’ को माथा टेकते है। गुरू ग्रंथ साहिब का प्रकाश हर गुरूद्वारे में होता है किंतु गुरू ग्रंथ न तो हिन्दूओं कर मूर्ति की तरह है और न ही धार्मिक दर्शन (फलसफे) की किताब सब हैै। गुरू ग्रंथ साहिब को किताब या पुस्तक कहना इस का अपमान है क्योंकि यह तो अकाल पुरख के शब्दों का स्वरूप है। गुरू सिक्ख साहित्य में गुरू, सतिगुरू और वाहिगुरू शब्द परमात्मा के लिए प्रयोग में लाये गये है। गुरू और सतिगुरू शब्द दसों पातशाहियों के लिए भी प्रयोग किये गये है क्योंकि वह अकाल पुरख का पैगाम देने वाला थे। सिक्ख को सिर्फ वाहिगुरू की पूजा करने के आदेश है और वाहिगुरू के दर्शन ‘सबद’ रूप में गुरू ग्रंथ साहिब में होते है। सिक्ख धर्म में गुरू (दस नानक और गुरू गं्रथ साहिब) की पूजा नहीं होती बल्कि उन का सत्कार और सम्मान किया जाता है। गुरू साहिब की अपनी आज्ञा थी कि उनकी पूजा न की जाये और न ही उनको परमात्मा माना जाये। गुरू साहिब तो अपने आप को वाहिगुरू का दास, पैगाम (संदेश) देना वाला ही कहते है। दूसरा, सिक्ख फलसफे में गुरू सिर्फ एक ही था, दस नहीं थे। उनको क्रम अनुसार नानक, दूसरे नानक, तीसरे नानक या पहली पातिशाही.....दूसरी पातशाही, तीसरी पाताशाही कहा जाता है। वह दसों नानक अलग-अलग शरीर थे पर उनमें एक ही (रूह) आत्मा, एक ही ज्योति थी। (देखें: भाई गुरदास वार पहली, पउडी 45 और भट्टों के सवैये)। सिक्ख फलसफे में गुरू वाहिगुरू के साथ मिलन की पहली सीढ़ी है। गुरू वाहिगुरू से मिलने का रास्ता दिखाता है। गुरू बिना परमात्मा प्राप्त नहीं हो सकता। गुरू बिना मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। सिक्ख का गुरू नानक साहिब और उन के दस उत्तराधिकारी थे और अब गुरू ग्रंथ साहिब सदा के लिए गुरू है। गुरूद्वारा गुरू नानक के समय से जहां कहीं भी सिक्ख रहते थे, वह प्रायः हर दिन इकठ्ठे हुआ करते थे, वह यह इकठ्टे सिक्खों के घरों में हुआ करते थे। जब सिक्खों की गिनती बढ़ने लगी, उन्होने धर्मशाला बना ली। यह धर्मशाला बाहर से आने वाले सिक्खों के लिए सराय का भी काम देती थी और साथ ही इकठ्टे होकर किर्तन करने और विचार करने का केन्द्र भी थी। ऐसा पहला बड़ा केन्द्र करतारपुर (पाकिस्तान) था। जहां-जहां गुरू साहिब गये और प्रचार करते रहे वहां-वहां गड़ी-बड़ी धर्मशालायें तरन तारन, करतारपुर (जालंधर), कीरतरपुर, चक्क नानकी (अनंदपुर साहिब), पांउटा साहिब। ऐसे ही जहां जंहा सिक्ख संगतों की संख्या बहुत बढ़ गई थी वहां भी धर्मशाला (मुहल्ला दिलवाली सिंघा, दिल्ली), भाई दग्गों की धर्मशाला (धमतान, जींद), ढ़ाका, पटना, कश्मीर इत्यादि धर्म शालाओं का जिक्र आता है। ऐसी धर्मशालाओं की संख्या बहुत ज्यादा थी। 18वीं सदी के अंत में गुरू साहिब की याद में बने चबुतरों पर बनने वाली इमारतों को गुरूद्वारे कहा जाने लगा। जहां तक गुरूद्वारें के रूप में बनने वाली पहली इमारत का सवाल है वह दरबार साहिब ही था। इस के बाद तरन तारन और फिर कीरतपुर साहिब और अनंतपुर साहिब में गुरूद्वारे बने। नानकाना साहिब भले ही सिक्ख इतिहास की दृष्टि से पहली जगह बनती है पर वह गुरूद्वारा 19वीं सदी में बना था। दिल्ली के गुरूद्वारे भी 18वीं सदी के अंत में बने थे। आज कल पंजाब के हर गांव और शहर में गुरूद्वारे बने हुए है। गुरू साहिब से संबंध रखने वाले लगभग हर मुकाम पर गुरूद्वारे बन चुके है। विदेशों में भी जहां भी सिक्ख रहते है गुरूद्वारे बने हुए है। नियमानुसार प्रत्येक गुरूद्वारे (जहां गुरू ग्रंथ साहिब प्रकाश होता है) में लंगर और निवास (यात्रियों के लिए) होना जरूरी है। आज कल हर बड़े गुरूद्वारे के साथ एक सराय भी है। परदेश में बने गुरूद्वारे के साथ भले ही आजकल सराय नहीं (कुछ एक को छोडकर) पर वहां पंजाबी भाषा, गुरभुखी लिपी और सिक्ख इतिहास पढ़ाने की क्लासे प्रायः चलती है। गुरूद्वारे को सिक्ख चर्च, सिक्ख मंदिर या सिक्ख मस्जिद कहना बेसमझी या सरारत का नतिजा है। गुरूद्वारा, गुरूद्वारा है न कि चर्च, मस्जिद या मंदिर जिस तरह चर्च को ईसाई गुरूद्वारा, मस्जिद को मुस्लमान गुरूद्वारा और मंदिर को हिन्दू गुरूद्वारा नहीं कहा जा सकता उसी तरह गुरूद्वारों को सिक्ख मंदिर कहना गलत है। इसी तरह दरबार साहिब को गोल्डन टेम्पल कहना भी पूरी तरह गलत है। ‘गुरूद्वारा’ दो शब्दों के मेल से बना है: ‘गुरू’ और ‘दुआरा’ (घर/दरवाजा) यानि गुरूद्वारा का अर्थ है: गुरू का द्वार/घर जिससे हम वाहिगुरू के दर्शन करने के लिए तैयार रहते हैं। गुरूद्वारा सिक्ख पंथ का आधार केन्द्र है। सिक्ख के लिए आवश्यक है कि जितना भी संभव हो सके वह गुरूद्वारा के बीच और संगत के साथ बैठ कर किर्तन सुने और सेवा करें। सिक्ख के लिए गुरूद्वारा केवल धार्मिक केन्द्र ही नहीं, यह रूहानी, भाईचारक और शिक्षा का केन्द्र भी है। साधारणतः गुरूद्वारे के चार हिस्से होते है: दीवान हाल (जहां गुरू ग्रंथ साहिब का प्रकाश होता है), लंगर, सराय और पंजाबी-गुरमुखी-दर्शन और इतिहास पढ़ाने के लिए स्कूल। कुछ गुरूद्वारों में यह चारों सुविधायें होती है किंतु कुछ गुरूद्वारों में एक या अधिक सुविधायें नहीं भी होती। हर गुरूद्वारे में नगाड़ा होना भी जरूरी है और उपयुक्त मौके पर इसको बजाया भी जाना चाहिए। आज कल कई गुरूद्वारों की ओर से अस्पताल आदि भी चलाये जाते है। कुछ गुरूद्वारों में लाइब्रेरी भी होती है। गुरूद्वारों की सबसे विशेष स्थान दीवान/हाल होता है। इसमें गुरू ग्रंथ साहिब का प्रकाश होता है। गुरू ग्रंथ साहिब को साफ और सुन्दर रूमाले से लपेटा जाता है। इसकी ताबिया बैठे सिक्ख के हाथ में होती है। गुरू ग्रंथ साहिब के ऊपर संदोला भी सजाया होता है। संदोला और गुरू ग्रंथ साहिब को शहनशाह का सत्कार देने के लिए होते है (मक्खियों को हटाने या हावा देने के लिए नहीं होती)। गुरू ग्रंथ साहिब के पास घी के दीये जलाना, घंटिया बजाना, ताली मारना सिक्ख धर्म के नियमों के विरूद्ध है। कई लोग गुरू ग्रंथ साहिब के पास या नीचे पानी का घड़ा या कोई और बर्तन रख देते है। जो इसको पवित्र जल या अमृत बनाने की सोच से करते है वह अज्ञानता का प्रगटवा करते है। दीवान हाल जितना साफ और सादा हो सके बेहतर है। बेकार की सजावट, चमक-दमक, तड़क-भड़क, रोशनियों आदि के द्वार ध्यान इधर-उधर भटकता है और किर्तन, पाठ, कथा सुनने में रोक डालता है। दीवान हाल में तस्वींरे, नारे लगाना भी गलत है। इसके लिए लाइब्रेरी, लंगर, हाल, कार्यालय, रास्ते और बरामदे को प्रयोग में लाया जाने चाहिए। आज कल गुरू साहिब की जितनी भी तस्विरें मिलती है वे सब नकली है और कुछ लोगों को माॅडल बैठकर या काल्पनिक उड़ान से बनाई हुई है और कुछ में तो गुरू साहिब की हास्यापद सूरत नजर आती है। इस कारण गुरूद्वारों में किसी भी स्थान पर तस्वीरें नहीं लगानी चाहिए। उनकी जगह शब्द या गुरूद्वारों की तस्वींरे लगाई जा सकती है। निशान साहिब गुरूद्वारें की छत पर या बाहर की ओर निशान साहिब आवश्य होता है। आज कल इस का रंग केसरी होता है। गुरू साहिब के समय के इतिहास में केवल नीले रंग का निशान साहिब होता है। आज कल कुछ निशान साहिब का कपड़ा केसरी बांस या पाईप पर चढ़ाये कपडे का रंगा नीला होता है और कुछ तो सारा कपड़ा ही केसरी रंग का रखते है। भले ही निशान साहिब की ऊँचाई की कोई नापी नहीं होती किन्तु साधारणतः यह ईमारत की ऊंचाई से कुछ अधिक ऊँचा होता है। इसके कपडें पर ‘खंडे’ का निशान बना होता है। इस खंड़े में दो कृपाण, एक खंड़ा (दो धारा) और एक चक्र बना हुआ होता है। निशान साहिब के शीर्ष पर भी दो धार वाला खंड़ा होता है। निशान साहिब पर बना खंड़ा मीरी-पीरी के एक होने का निशान है। कुछ गुरूद्वारों में मीरी-पीरी के दो निशान साहिब झुलते है। उन्होंने इसको अकाल तख्ंत साहिब के मीरी-पीरी के दो निशान साहिब की तर्ज पर लगाया होता है। हालांकि अकाल तख़्त साहिब पर भी दो निशान साहिब उन्नीसवीं शताब्दी में लगाए गये थे। गुरूद्वारे की मर्यादा गुरूद्वारे संगत के लिए लगभग हर समय खुले रहते है। गुरूद्वारों की सेवा सुबह से आरंभ होती है। सबसे पहले गुरू ग्रंथ साहिब का स्वरूप लाकर प्रकाश करके, अरदास की जाती है। फिर हुक्म लेने के बाद पाठ किया जाता है। इसके बाद ‘आसा दी वार’ पढ़ी जाती है। इसके बाद किर्तन होता है। गुरूद्वारे में किर्तन गुरू ग्रंथ साहिब के शब्दों या भाई गुरूदास और भाई नंद लाल की वाणी का किया जा सकता है। किर्तन के बाद आनंद साहिब की पहली पांच तथा अंतिम पउड़ी पढ़ कर अरदास की जा सकती है। कई गुरूद्वारों में सारा दिन कीर्तन होता रहता है। कई गुरूद्वारों में शाम के समय गुरबाणी या इतिहास की कथा भी होती है। शाम के समय रहिरास के पाठ के बाद किर्तन और अरदास होती है। सोहिला के पाठ क बाद गुरू ग्रंथ साहिब का सुख-आसन कर दिया जाता है। गुरू ग्रंथ साहिब की प्रत्येक सेवा मर्द या और कोई भी कर सकता है। गुरूद्वारे कैसे जायें गुरूद्वारे के दीवान हाल में प्रवेश करने से पहले जूते उतारने चाहिए। अगर हो सके तो पैर भी धोने चाहिए। जिन लोगों ने दस्तार नही पहनी होती उन लोगों को अपना सर रूमाल या किसी अन्य कपड़े से ढक लेना चाहिए। हाथ धोने क बाद दीवन हाल में जाकर गुरू ग्रंथ साहिब के आगे माथा टेका जाता है। माथा टेकते समय अगर पैसे नहीं हो तो कोई फर्क नहीं पडता। इसके बाद संगत में बैठकर किर्तन/कथा/व्याख्यान सुनना चाहिए। गुरूद्वारे जाने वालों के लिए अनुशासन कोई भी व्यक्ति, सिक्ख या गैर सिक्ख गुरूद्वारें जा सकता है और सेवा कर सकता है पर सही अनुशासन में रहना जरूरी है। किसी के पास तम्बाकू की कोई चीज नहीं होनी चाहिए। शराब, ड्रग्स या कोई अन्य नशा नही किया होना चाहिए। कोई गैर सिक्ख रस्म (बाल काटना, जानवर की कुबार्नी, सती की रस्म, उपवास, रोजा, राखी, होली, लोहडी, आदि) गुरूद्वारें में नहीं की जा सकती। दुसरे धर्माें से संबंध रखने वाले त्यौहार भी गुरूद्वारे में नहीं मनाये जा सकते। कुछ गुरूद्वारों और तख्त साहिब पर सिर्फ अमृतधारी ही जा सकते है। गुरूद्वारे में कथा, किर्तन सिर्फ सिक्ख ही कर सकता है। गुरू ग्रंथ साहिब की ताबिया पर सिर्फ सिक्ख ही बैठ सकता है। सिक्ख धर्म में पुजारी सिक्ख धर्म में पुजारी श्रेणी नहीं होती। सभी सिक्ख पुरूष, और औरत गुरूद्वारे में सेवा कर सकते है। इसी तरह सिक्खों में प्रचारक नाम की भी कोई श्रेणी नहीं है। आज कल व्यस्त जीवन के कारण तथा कुछ सुविधाओं को सामने रखकर तथा कुछ इस कारण भी साधारणतः लोगों को धर्म तथा मर्यादा के संबंध में जानकारी नहीं होती, गुरूद्वारें में भाई (शाब्दिक अर्थ भाई, वीर) या ग्रंथी (जो गुरू ग्रंथ साहिब पढ़ सकता है) लगाये गये है। किन्तु सिक्ख धर्म में भाई/ग्रंथी कोई पूजारी श्रेणी नहीं। उनका स्थान वह नहीं है जो मंदिर मे पूजारी, मस्जिद में मौलवी, या गिरजे में पादरी का होता है। इसी प्रकार सिक्ख में ‘संत’ नाम की भी कोई चीज नहीं है। आज कल हर कोई संत ही कहलवाने लगा है। इनमें से अधिकतर मुजरिम या गुनहगार होते है। ‘संत’ शब्द, सिक्ख दर्शन में, वाहिगुरू के लिए के लिए प्रयोग में लाया गया है। आज कल के साधु और पांखडी अपने आप को नीम-परमात्मा समझते है। कुछ तो अपने लिये ब्रह्मज्ञानी, महापुरूष की पदवी भी लिखवाते हैं । यह सिक्खी मर्यादा के विपरित हैं। यह संत प्रथा हिन्दु रीति है। तथा सिक्खों के साथ इसका कोई संबंध नहीं। किसी सिक्ख को संत कहना अज्ञानता और पाप है। सिक्खी में पंथ के सेवादारों के लिए ‘भाई’ (वीर), बाब (सूझवाला), बड़ा तथा ‘ज्ञानी’ शब्द प्रयोग किये जाते हैं । भाई लालो, भाई गुरूदास, बाबा बुड्ढा, बाबा अजीत सिंघ, फतहि सिंघ, जोरावर सिंघ, भाई दया सिंघ, धर्म सिंघ, साहिब सिंघ, हिम्मत सिंघ, मोहकम सिंघ, भाई रतन सिंघ भंगू, ज्ञानी सुन्दर सिंघ भिंडरंावाले, भाई रणधीर सिंघ, बाबा जरनैल सिंघ भिंडरंावाले, भाई अमरीकी सिंघ, सिक्ख इतिहास में प्रमुख व्यक्तियों के लिए प्रयोग होते हैं । सेवा सिक्ख धर्म का एक अन्य मुख्य कर्तव्य ‘सेवा’ हैं। वास्तव में सिक्ख दर्शन में सेवा का एक विशेष महत्वपूर्ण स्थान हैं। सिक्ख धर्म के अनुसार सेवा का अर्थ ‘मुफ्त काम करना’ नहीं हैं। यह अपनी मर्जी से, बिना मतलब से, नम्रता के साथ, बिना किसी उद्देश्य से, बिना किसी ईनाम या लालच के, की जाने वाली कार्यवाही है। सेवा किसी भी तरीके से: धन से, तन से या मन से की जा सकती है। गुरूद्वारे के लंगर मेें खाना तैयार करके, बर्तन साफ करके, फर्श की सफाई करके या अपने आस पास किसी गरीब की मदद करके, किसी को शिक्षा का दान देकर या पढ़ा कर, कौमी संघर्ष में हिस्सा डाल कर, मानवीय भलाई का कोई भी काम करके की जा सकती है। सिक्ख के लिए, सेवा, प्रतिदिन करनेे वाले आवश्यक कामों का एक हिस्सा है। साधारण लोग गुरूद्वारे में की हुई सेवा को बहुत धार्मिक मानते हैं किन्तु ऐसा नहीं है। हर सेवा का एक सा स्थान है। सेवा सिक्ख को नम्रता, धैर्य तथा उत्मता का सबक देती है। यह अंहकार, घमण्ड को खत्म करती है। किन्तु यदि सिक्ख सेवा को लालच, दिखाने के लिए या पाखंड के लिए करता है तो वाहिगुरू की दरगाह में यह सेवा, स्वीकार नही होती, ऐसा व्यक्ति दोगुना गुनाहागार बन जाता है। इसी तरह सेवा करते समय सिक्ख भेदभाव नहीं कर सकता। सेवा करने का अहंकार करना भी गुनाह है। सेवा करके किसी ‘फल’ की इच्छा रखना भी गुनाह जैसा ही है। लंगर सिक्ख धर्म में लंगर का विशेष महत्व है। लंगर की शुरूआत गुरू नानक साहिब करतारपुर में की थी। लंगर का भी सिक्ख धर्म मेें विशेष महत्व है। इसका आधार बँाट कर खाना, सेवा करना, संगत तथा समानता की उक्तियों में है। लंगर से हमें भाईचारे के साथ प्यार का तथा हर तरह के भेदभाव खत्म करने का सबक मिलता है। इसका अर्थ यह नहीं है की भेदभाव, सीमा तथा ऊच-नींच के फर्क को मिटाने को सिर्फ लंगर हाल में ही निभाना है बल्कि इसको अपनी सारी जिन्दगी में हर मौके पर निभाना हैं। लंगर सारी कौम का सांझा हैं। लंगर में हर व्यक्ति सेवा कर सकता है और ग्रहण कर सकता है। भले ही लंगर के लिए कोई रकम नहीं देनी होती किन्तु लंगर ‘मुफ्त रोटी’ नहीं होती, यह ‘पवित्र खाना’ होता है। आशा की जाती है कि गुरूद्वारे में दर्शन करने आने वाला प्रत्येक व्यक्ति लंगर ग्रहण करेगा। सिक्ख संस्कृति मेें तो गुरू ग्रंथ साहिब के दर्शन करने से भी पहले लंगर खाने की प्रथा है। जहाँ तक लंगर की रोटी का प्रश्न है, सेवा करने वालों को चाहिए कि वह इसको अपने घर में खाई जाने वाली रोटी से भी अधिक बनाये। लंगर बाँटते समय किसी भी तरह का कोई फर्क नहीं रखना चाहिए, यदि कोई फर्क रखा जाए तो उससे इसका उ६ेश्य ही समाप्त हो जाता है। संगत तथा पंगत गुरू के दर्शन करने की पहली सीढ़ी संगत है। इस कारण संगत में उपस्थित होना सिक्ख के लिए जरूरी है। जितना अधिक से अधिक सम्भव हो सके पुरे ध्यान तथा श्रद्धा के साथ संगत में उपस्थित होना चाहिए। इसी तरह लंगर (शेजन) भी सिर्फ लंगर हाल में खाना चाहिए तथा वह भी पंगत में बैंठकर। पंगत का अर्थ एक कतार (पंक्ति) में नीचे बैठना नहीं। इसका मतलब है सभी सिक्ख एक स्थान पर, बिना किसी फर्क या भेदभाव के बैठेंगे। लंगर हाल में या गुरूद्वारे के किसी अन्य कमरे में, किसी के लिए भी विशेष स्थान आरक्षित नहीं किया जा सकता। पंतग का अर्थ सिक्खों मेें जाति, नस्ल, रंग, लिंग, अमीर-गरीब, पदवी तथा अन्य सभी प्रकार के भेदभाव मिटाना है। इसका उ६ेश्य सिक्खों मेें भाईचारा एकता स्थापित करना है। संगत तथा पंगत में बैंठना, नाम जपना तथा लंगर में शामिल होना, एक सिक्ख के व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सिक्ख रैड-क्रास गुरू गोविन्द सिंघ साहिब के समय की एक प्रचलित कथा है कि सिक्ख रैड-क्रास का कमांडर भाई कन्हैया सिंघ घायलो को पानी पिलाया करता था तथा उनके घावोें की मरहम पट्टी किया करता था। वह अपनी सेवा के दौरान सिपाहियों तथा दुश्मन की सेना के सिपाहियो के साथ एक सा व्यवहार किया करता था। गुरू गोविन्द सिंघ साहिब का हुक्म था कि बेबस, लाचार तथा जरूतमंद कि सहायता की जाए। केवल साधारण हालात में ही नहीं अपितु युद्ध के दौरान भी हर अवसर पर, इन आदेशों को माना जाए। यह कथा लगभग तीन सदी पुरानी है। आज की ‘इंटरनेश्नल रैड-क्रास’ एक निरपेक्ष संस्था है तथा सैनिकों और नागरिकों को, जो युद्ध, दंगो या प्राकृतिक आपदाओं के दौरान मरते या घायल होते हैं, की सहायता करती है। दूसरी तरफ सिक्ख रैड क्रास निरपेक्ष श्रेणी नहीं थी फिर भी उनका नियम था कि घायल, बेबस, लाचार तथा जरूतमंद को अपना या पराया समझे बिना मदद देनी है। यदि भाई कन्हैया सिंघ पश्चिम का वासी होता तो आज वह दुनिया भर का हीरो होता। सिक्ख त्यौहार जहाँ तक त्यौहारों का प्रश्न है सिक्ख धर्म में साधारण दुनियाई मामलों के ‘त्यौहार’ नहीं होते। सिक्ख गुरू साहिब के जन्म दिन, शहीदी दिन तथा कुछ अन्य दिवस गुरूद्वारों में मनाये जाते हैं। गुरू साहिब की याद में मनाये जाने वाले दिनो को गुरूपर्व कहते है। किन्तु यह साधारण मेलों, पार्टियों या जश्न वाले त्यौहार नहीं होते। इन पर्वो के अवसर पर गुरूद्वारों में सम्मेलन हुआ करते हैं, कीर्तन, कथा, व्याख्यान तथा अरदास की जाती है। इसका उ६ेश्य सिक्ख भाईचारे के सम्मेलन करना तथा उसके साथ संबंधित इतिहास को याद करना है। कुछ छोटे-बडे़ शहरों में कुछ गुरूपर्वों तथा अन्य दिनों पर जलूस भी निकाले जातेे हैं। सिक्ख शहरों में बाजारो तथा गलियो में किर्तन करते हुए गुजरते है। सभी जगह मनाये जाने वाले मुख्य गुरूपर्व है: गुरूनानक साहिब का जन्मदिन (20 अक्टूम्बर, 1469), गुरू अर्जन साहिब का शहिदी दिन (30 मई 1606), गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब का जन्मदिन (18 दिसम्बर, 1661), खालसा प्रगट दिन (29 मार्च, 1698/1699), तिसरा घल्लूघारा (कत्लेआम) दिन (4जुन, 1984) गुरू तेग बहादूर साहिब का शहिदी दिन (11 नवम्बर, 1675) तथा कुछ अन्य दिन। अभी तक सिरोमणी गुरूद्वारा प्रबंन्धक कमेटी इन दिनो में सेे कुछ को विक्रमी कैलंडर के अनुसार दिन निकालकर मनाते हैं तथा हर वर्ष यह गुरूपर्व अलग-अलग, तारिखो पर आते है। जब चालु (गरैगोरिअन) कैलंडर के अनुसार दिन मनाना शुरू हो जायेंगे। सिक्ख रस्मे बच्चे का जन्म बच्चे का जन्म वाहिगुरू की बख्शीश है। इस कारण सिक्ख वाहिगुरू की कृपा के धन्यवाद की अरदास करता है। सिक्ख धर्म में बच्चे के जन्म लेने पर कोई विशेष ‘रस्म’ नहीं की जाति। हाँ! जितने जल्दी हो सके (माँ तथा बच्चे के स्वास्थ्य, मौसम हालात के अनुसार) बच्चे को निकट के गुरूद्वारे में ले जाकर माथा टेका जाता हैं। वैसे इसकी कोई दिनो की सीमा नहीं हैं। इसमें देर होने का अंधविश्वास भी नहीं किया जाना चाहिए। बच्चो का नाम रखना सिक्ख धर्म में बच्चे से संबंधित पहली रस्म उसका नाम रखना हैं। इस उ६ेश्य के लिए बच्चे को गुरूदारे में ले जाया जाता हैं, बच्चे के माता-पिता कड़ाह प्रसाद करवाते है, किर्तन होता है तथा फिर अरदास होती हैं। अरदास के बाद गुरू ग्रंथ साहिब से वाक (हुक्मनामा) लिया जाता है। बच्चे का नाम हुक्मनामें के पहले शब्द के अंक्षरो से चुना जाता हैं। बच्चे का नाम रखने का एक तरीका यह भी है की बच्चे का नाम पहले चुन लिया जाता हैं तथा बच्चे को गुरू ग्रंथ साहिब के आगे माथा टिकाकर उस नाम की अरदास कर दी जाती हैं। यह अरदास वाहिगुरू की परवांनगी तथा आर्शिवाद के लिए होती हैं। विवाह सिक्ख दर्शन के अनुसार हर सिक्ख के विवाह अनिवार्य है। सिक्ख धर्म, दुनिया से पलायन कर सन्यासी बनने या सारी उम्र कुआँरे रहने (ब्रह्मचर्य) को स्वीकार नहीं करता। सिक्ख धर्म व्यक्ति की काम की जरूरत से इन्कार नही करता किन्तु सिक्ख विवाह सिर्फ सैैक्स या शारीरिक आनन्द के लिए नही किया जाता। सैक्स के गुनाह से बचने के लिए विवाह जरूरी है। इसी तरह विवाह का उ६ेश्य केवल बच्चे पैदा करना तथा उनको पालना ही नहीं है। सिक्ख धर्म में विवाह पवित्र धर्म हैं। यह दो इन्सानों में समझौता नहीं हैं। यह दो आत्माओं में सामाजिक तथा आत्मिक मिलन है जिससे वे मिल जुल कर दुनिया में सामाजिक तथा आत्मिक मिलन है जिस से वे मिल जुल कर दुनिया में सामाजिक तथा आत्मिक भूमिका निभा सके। सिक्ख का कत्र्तव्य है कि दुनियां में साधारण सामाजिक जीवन व्यतीत करते हुए साथ-साथ मुक्ति हासिल करने के लिए परमात्मा का नाम जपे। विवाह का आयोजन जब सिक्ख बच्चे जवान हो जाते है तो माता पिता को चाहिए कि उन्हे सैक्स या विवाह के संबंध में जरूरी जानकारी दी जाये। एक तरीके से यह विवाह की तैयारी होती है। इस मौके पर बच्चों को सैक्स, विवाह का दर्शन, विवाह के सामाजिक पक्ष, विवाह की रस्में, रिवाज तथा भाईचारे की रस्मों के संबंध में जानकारी देनी चाहिए। यदि बच्चों को विवाह तथा आने वाली समस्याओं के संबंध में पहले जानकारी दे दी जायेगी तो उन्हें विवाह से पहले तथा पीछे कोई समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा। यह साधारण: प्रचार किया जाता है कि सिक्ख विवाहों के फैसले माता-पिता ही करते हैं। यह ठीक नहीं हैं। सिक्ख संस्कृति में बच्चों को अपने विवाह के संबंध में स्वयं फैसला करने का अधिकार होता हैं। साधारणतः लड़का या लड़की के लिए रिश्तेदार या दोस्त बात चलाते हैं। वे माता-पिता तक बात पहुँचाने से पहले स्वयं फैसला करते हैं कि वह लड़का/लड़की उनकी लड़की/लड़के के उपयुक्त है। यदि वे उस संबंध में अपने बच्चें को गारंटी दे सकते हैं तो वे उसकी जानकारी अपने बच्चे को देते हैंै। इसके बाद लड़का तथा लड़की एक दुसरे को देखते हैं। यदि दोनो को एक दुसरे का व्यक्तित्व पसंद आ जाए तो दोनो का विवाह कर दिया जाता है। किन्तु यदि दोनों में से एक भी दूसरे के संबंध में नापसंदगी जाहिर कर दें तो यह विवाह नहीं होंता। इसके बाद अन्य रिश्तो के संबंध में जानकारी आती हैं तथा जब तक दोनो ’हाँ’ नही कह देते विवाह नही किया जाता। कई बार लड़का या लड़की अपनी जिन्दगी सें, पढ़ाई दौरान या किसी अन्य स्थिति में बनी हुई पहचान का रिश्ता अपने माता-पिता को बताते है। माता-पिता उनके संबंध में जानकारी प्राप्त करते हैं। यदि उनको उस बच्चे के व्यक्तित्व तथा स्वभाव का मेल तथा बच्चे का भविष्य अच्छा बीतने के आसार नजर आएं तो वे हाँ कर देते हैं और रिश्ता हो जाता हैं। किन्तु कुछ मामलों में बच्चें तथा माता पिता कि सोच में काफी अन्तर आ जाता हैं। ऐसी हालात में या तों फैसला लटक जाता हैं या माता-पिता जबरदस्ती किये गये विवाह में बच्चे कभी तो समझौता कर लेते हैं किन्तु कई बार समझौता न करने पर कठीन जिन्दगी बिताते हैं। दूसरी तरफ बागी होकर किये गये विवाह भी अकसर सारी जिन्दगी चलते नही। बागी विवाह या कथित ‘प्यार विवाह’ करते समय नौजवान जल्दबाजी करते है। प्यार विवाह का फैसला साधारणतः ‘प्यार’ शुरू होने के कुछ ही सप्ताह या महिनों में ही हो जाता है। कुछ नौजवान को छोड़ कर अधिकतर को तो एक दूसरे के संबंध में सामने दिखाई देती जानकारी के अतिरिक्त कुछ भी मालुम नहीं होता उन्होंने साथ पढ़ने या नौकरी करने के दौरान पास रहते सिर्फ सामने दिखाई देती जिन्दगी के हिसाब से ही फैसला किया होता है। अपने पार्टनर के पूरे व्यक्तित्व, उसका स्वभाव उसके माता-पिता, उसकी आर्थिक दशा, उसका खाना-पीना, सोना, रहना, जीने का तरीका बिल्कुल मालूम नहीं होता। उसकी घरेलु मजबुरी, जिम्मेदारी, कमजोरी भावुकता, जिद्द, इतिहास आदि के संबंध में कई बार तो मामुली सी जान-पहचान भी नहीं होती। किन्तु जब जल्दबाजी में विवाह फैसला हो जाता है तो इस तरफ सोचने के स्थान पर सपने अधिक मनमोहक होते हैं। फिर अपना फैसला कायम रखने कि जिद्द, ‘इज्जत’ का गर्व भी उन्हें विवाह में जल्दबाजी करवाते हैं। नतीजा वास्तविक रूप मेें नुकसानदायक ही होता हैं। अधिकतर जल्दबाजी में किये गए प्यार-विवाह या तो तलाक में ही खत्म होते हैं या घुट-घुट कर, अंदर रो-रो कर जिन्दगी बितानी पड़ती है। सैकड़ो में से एक आध विवाह ही कामयाब होते हैं। विवाह के पहले वायदे पलों में ही भुला दिये जाते हैं क्योंकि वे भावुकता से पैदा हुए होते हैं तथा कुछ समय के लिए ही होते हैं। आधुनिक प्यार-विवाह और सिक्ख विवाह में बड़ा अन्तर यह है कि (1) आधुनिक प्यार-विवाह प्यार से शुरू होता है तथा विवाह पर आ रूक जाता है। इसके बाद इसका प्रतिकर्ष (।दजप बसपउंग) है दूसरी ओर सिक्ख विवाह, विवाह से शुरू होता है तथा प्यार यहाँ से शुरू होता है। (2) दूसरा आधूनिक प्यार विवाह में गारंटी तथा मदद किसी अन्य की नहीं बल्कि दोनों, लड़का-लड़की की होती है। किन्तु सिक्ख विवाह में गुरू की गारंटी है, सिक्ख भाईचारे की गारंटी है, रिश्तेदारों की गारंटी है। आधुनिक प्यार-विवाह में सहायता की जरूरत के समय कम ही कोई आगे आता है, किन्तु सिक्ख विवाह में सभी नातेदार तथा संबंधी प्रत्येक कठिन परिस्थिति में प्रायः मददगार होता है। (3) तीसरे, आधुनिक प्रेम विवाह में दोस्ती, स्नेह, प्यार तथा कुछ हालत में सैक्स भी स्वीकार किया चुका होता है। विवाह के बाद इससे ज्यादा या कोई नया मिल सकने की उम्मीद नहीं होती। किन्तु सिक्ख विवाह में तो दो अजनबी, जिन्होने भाईचारे तथा वाहिगुरू के आशिर्वाद से, साथी चुना होता है, प्यार से शुरू करते हैं तथा इस प्यार का समय बीतते कई वर्ष गुजर जाते हैं तथा संबंध इतने मजबुत हो गए होते हैं की टूटने की गुजांईश ही नहीं रह जाती। इस कारण माता-पिता के आशिर्वाद से किये विवाह की सफलता, खुशी तथा सुख कथित प्रेम-विवाह से बहुत अधिक है। अनंद कारज की रस्म सिक्ख विवाह ’अनंद कारज‘ कहलाता हैं। अनंद कारज कब शुरू हुआ होगा; इस सबंध मे इतिहास में कोई विवरण नहीं मिलता किन्तु गुरू साहिब के अपने बच्चों के विवाह ’अनंद कारज’ सें हुए थे। गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब तों स्पष्ट हुक्म हैं कि सिक्ख अपने बच्चो का विवाह केवल अनंद कारज द्धारा करे। गुरू साहिब का यह आदेश भी था कि सिक्ख स्त्री/पुरूष का विवाह सिर्फ सिक्ख स्त्री/ पुरूष सें ही हों। यह परम्परा भी हैं कि गैर सिक्ख की बेटी से विवाह कर सकता है किन्तु किसी सिक्ख लडकी का विवाह़ किसी गैर सिक्ख से नही हो सकता। यदि कोई सिक्ख लड़की किसी गैर-सिक्ख से विवाह करती हैं और वह गैर - सिक्ख लड़का यदि सिक्ख नही बनता तो उस लड़की का धर्म ’सिक्ख’ नहीं माना जायेगा। उस लड़की का वही धर्म होगा जो उसके पति का होगा। अंनद कारज गुरू ग्रंथ साहिब की उपस्थ्तिि में होता हैं। विवाह गुरूद्धारे में, लड़के या लड़की के घर में या किसी पंडाल में भी हों सकता है। साधारणतः विवाह से पहले आशा दी वार का कीर्तन होता है। इसके बाद कुछ अन्य शब्द भी पड़े जाते हैं। इस समय तक लड़का तथा लड़की दोनो गुरू ग्रंथ साहिब की उपस्थिति में आकर बैठ चुके होते है। साधारणतः लड़की, लड़के बाई तरफ बैठती है ( यह पुरानी रस्म हैं, यँू इसका कोई महत्व नही हैं )। यह आशा की जाती हैं कि दोनो प्राणी साधारण वस्त्रो में हो। अनंद कारज अरदास से शुरू होंता है। अरदास में लड़का- लड़की तथा उनके माता पिता खड़े होते है। तथा अन्य सभी बैठे रहते हैं। इसके बाद ‘अनंद कारज’ शुरू हो जाता है। पहले ग्रंथी सिक्ख एक लावं (विवाह में पढ़ी जाने वाली बाणी) पढ़ता है फिर रागी उसको गाते हैं तथा साथ ही गुरू ग्रंथ साहिब की परिक्रमा आरंभ हो जाता है। चोैथी लांव के बाद अरदास की जाती है आरदास के बाद ग्रंथी या कोई अन्य सिक्ख विवाह के दर्शन, लड़का लड़की के कर्तव्य पर प्रकाश डालता है। कई स्काॅलर लाखों के दौरान गुरू ग्रंथ साहिब की परिक्रमा को अग्नि के चारों तरफ फेरा लेने की हिन्दु प्रथा की नकल समझते हैं। अनंद कारजं के बाद कुछ लोग गुरू ग्रंथ साहिब की उपस्थिति में लड़का लड़की को फूलों के तथा अन्य हार डालते है। यह गुरू ग्रंथ साहिब का अपमान है। यह रस्म किसी अन्य कमरे में कि जानी चाहिए। हालांकि इस रस्म का भी सिक्ख संस्कृति के साथ कोई संबंध नहीं है। अनंद कारज की लांव लड़का लड़की के विवाह के लिए नहीं लिखी गई थी; यह व्यक्ति (जीवात्मा) तथा वाहिगुरू (परमात्मा) के मिलन के लिए लिखी गई थी। अनंद कारज के समय इन लांवो के पढ़ने का अभिप्राय है कि जिस तरह जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का एक रास्ता है उसी तरह पुरूष तथा स्त्री के मिलन के भी पड़ाव हैं। सिक्ख दर्शन के अनुसार यह पड़ाव हैं: पहचान (परमात्मा के साथ मिलन की जरूरत की पहचान), उसके निर्मल भय में रहना तथा अपने अहंकार को छोड़ना तथा स्वयं को उसके अस्तित्व में मिला देना और चतुर्थ पड़ाव है मिलन होना अर्थात सहज की अवस्था। तलाक तलाक का सिक्ख धर्म में कोई स्थान नहीं हैं। सिक्ख अनंद कारज एक पंक्ति रस्म है तथा कोई भी अदालत इसको तोड़ नहीं सकती। आजकल दुनियां के लगभग हर देश में तलाक की कानुनी छुट हैं तथा हर तरफ बाढ़ सी आई हुई हैं। किन्तु सिक्ख दर्शन कें अनुसार यह गलत हैं। सिक्ख धर्म के अनुसार औरत-मर्द ’दो शरीर तथा एक आत्मा’ हैं। सिक्ख दर्शन के अनुसार विवाह गुरू ग्रंथ साहिब की आशीर्वाद से हुआ होता हैं, इस कारण तलाक अकाल पुरख से मुहँ मोड़ना हैं। सिक्ख दर्शन के अनुसार स्त्री तथा पुरूष एक दूसरे के लिए ऐसे हैं जैसे परमात्मा तथा भक्त। दोनो में एक दूसरे के लिए हर समय कुर्बानी करने का प्रयत्न करते रहना चाहिए। उनको अपने अन्तर के अंहकार को समाप्त करने का प्रयत्न करते रहना चाहिए। उन को अपना ‘अस्तित्व’ तथा ‘अपमान’ एक दूसरे में देखना चाहिए तथा यह इच्छा स्त्री तथा पुरूष दोनो में बराबर होनी चाहिए। दोनों को यह समझना चाहिए कि एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। दोनों में एक दूसरे का निर्मल भय होना चाहिए। यह भी वास्तव में ‘भय’ नहीं बल्कि एक दूसरे के लिए प्यार, बलिदान, लगाव, पहचान, मोह, तड़प की भावना है। जब सिक्ख विवाह में औरत मर्द का रिश्ता इतना गहरा और पक्का है तो की सोच वास्तव में गलत ही होगी। अर्बाशन (गर्भपात) तलाक की तरह ही अर्बाशन भी सिक्ख दर्शन के विपरीत है। बच्चे को माँ के गर्भ में मार देना परम्परा के आदेश से मुँह मोड़ना हैं। साधरणः लड़का पैदा करने की इच्छा से होते हैं। अर्बाशन जन्म लेने वाले बच्चें के लिंग को टैस्ट मशीनो के कारण अधिक बड़ गया हैं। यानि अर्बाशन में जो बेटीयों को ही मारते हैं। सिक्ख मर्यादा के अनुसार बेट़ी का कत्ल करने वाला (बेटी मार) तनखा़हीया है तथा धार्मिक सजा का अधिकारी हैं। मृत्यु सिक्ख दर्शन में मृत्यु शोक का अवसर नही होता। यह वाहिगुरू की इच्छा है। मरने के बाद आत्मा शरीर को छोड़ कर चली जाती हैं बचा हुआ शरीर मिट्टी होता हैं जिसका कोई महत्व नही होता। सिक्ख की मृत्यु के पश्चात उसके शरीर को नहलाने के बाद कपड़े पहना कर, दस्तार सजा कर अरदास के बाद संस्कार वाले स्थान पर लाया जाता हैं। वहाँ जाकर अंतिम संस्कार से पहले अरदास की जाती हैं। अरदास के बाद शरीर को चिता पर रख कर आग लगा दी जाती है। इसके बाद कीर्तन होता हैं तथा फिर सोहिला का पाठ करके सभी घर को लौट जाते हैं। पूरी तरह के बाद अस्थियों इकट्ठा करके नजदीक के चलते पानी (नदी, दरीया आदी) में बहा दिया जाता हैं। कुछ दिनो के बाद पाठ का भोग डाल कर अंतिम अरदास की जाती हैं। इसके साथ ही व्यक्ति संबंधी सभी रस्में खत्म हो जाती हैं। बरसी या श्राध्द मनाना, मुर्दों की समाधिया बनाना, सिक्ख दर्शन के विपरीत हैं। मरने के बाद रोना, विलाप करना, सिक्ख धर्म में मना हैं। मृत्यु पर शोेक मनाना अकाल पुरख की इच्छा को स्वीकार न करना हैं। पंजाब में एक प्रथा हैं की अंतिम अरदास के समय मरने वाले के सबसे बड़े पुत्र की दस्तार बंदी की रीती की जाती हैं। इसका अर्थ यह हैं की घर की जिम्मेदारी आगे से बड़े पुत्र की हो गई। यह रस्म सिक्ख-पंजाब की हैं किन्तु इसकी गैर सिक्ख भी नकल करते हैं। सिक्ख होमलैंड पंजाब सिक्खों का होमलैंड हैं। चनाब नदी तथा यमुना नदी के बीच का इलाका सिक्ख-पंजाब माना जाता हैं। सिक्ख धर्म के साथ संबंध रखने वाली जगह नानकाणा साहिब हैं। गुरू नानक साहिब का जन्म यहाँ हुआ था। कुछ नगर गुरू साहिब ने स्वयं बसाये थेः करतारपुर (पाकिस्तान), गोइंदवाल, गुरू दा चक्क (अमृतसर), तरन तारन, करतारपुर (जालंधर), किरतपुर, चक्क नानकी अनंदपुर साहिब, पाऊंटा साहिब। इसके अतिरिक्त कुछ स्थानो पर गुरू साहिब कई-कई महिने/साल रहे थे जैसे सुलतानपुर, खडूर साहिब, पटना, तलवंडी साबो, नंदेड़। कुछ स्थान गुरू इतिहास में महत्व रखते हैं: दिल्ली, चमकौर, फतहगढ़, मुक्तसर आदी। इन सभी स्थानो पर गुरूद्वारे बने हुए हैं। सिक्ख इन गुरूद्वारों के दर्शन के लिए प्राय: जाते हैं। किन्तु यात्री इन स्थानो पर तीर्थ यात्रा के लिए नही जाते बल्कि उस स्थान के साथ संबंधित याद ताजा करने जाते हैं। सिक्ख दर्शन के अनुसार प्रत्येक गुरूद्वारे का एक सा महत्व होता हैं। नानकाणा सहिब नानकाणा साहिब पाकिस्तान के शेखूपुरा जिला में एक कस्बा है। पहले इसको राये भोइ दी तलवंडी कहते थे। यह गाँव राय बुलार के पिता, राय भोइ जो भट्टी राजपूत था से मुसलमान बना ने बसाया था। सिक्ख पंथ के संस्थापक गुरू नानक साहिब का जन्म 20 अक्टूबर 1469 के दिन यहाँ था। आपने अपनी उम्र के 35 से अधिक वर्ष यहाँ बिताए थे। नानकाणा साहिब में गुरू नानक साहिब की याद में कई गुरूद्वारे बने हुए हैं:गुरूद्वारा जन्म स्थान (इस स्थान पर गुरू नानक साहिब के पिता का घर था तथा गुरू साहिब का जन्म यही पर हुआ था), गुरूद्वारा बाल लीला (गुरू साहिब बचपन में यहाँ खेला करते थे), गुरूद्वारा पट्टी साहिब (यहाँ स्कूल था जहाँ गुरू साहिब पढ़ते थे), गुरूद्वारा किआरा साहिब (यहाँ खेत होते थे जहाँ गुरू साहिब बचपन में भैंसे चराया करते थे), गरूद्वारा तम्बू साहिब (यहाँ वृक्षों का झंुड, तम्बु की तरह छाया करता था। गुरू साहिब धूप के समय यहाँ बैठा करते थे)। नानकाणा साहिब में गुरू अर्जुन साहिब तथा गुरू हरिगोबिन्द साहिब भी गए थे। गरूद्वारा हरिगोबिन्द छटे पातिशाह की याद में बना हुआ है। नानकाणा साहिब के साथ 130 से अधिक सिक्खों की शहिदी भी जुड़ी हुई है। 20 फरवरी 1921 के दिन सिक्खों के एक दल को हिन्दू महंत, नारायण दास, ने अपने किराये के गुण्डों की सहायता से मरवा डाला था। उनकी यादगार भी गुरूद्वारा जन्म स्थान के अंदर बनी हुई है। 15 अगस्त 1947 के दिन पंजाब का बंटवारा होने से नानकाणा साहिब पाकिस्तान में चला गया। उस समय से इसका प्रबंध ‘औकाफ़’ के हाथ में है। नगर की 90/ जायदाद तथा लगभग 500 एकड़ जमीन तथा और हजारों एकड़ जमीन गुरूद्वारे के नाम है। किन्तु इसको कोड़ियों के मूल्य पर ठेके पर दिया जाता है। सिक्ख 1947 से ही प्रयत्न कर रहें हैं कि नानकाणा साहिब को कैथोलिक ईसाईयों के वैटीकन की तरह स्वतंत्र दर्जा दे दिया जाये। प्रत्येक वर्ष हजारों सिक्ख यहाँ की यात्रा के लिए जाते हैं। करतारपुर (पाकिस्तान) करतारपुर गाँव रावी नदी कें किनारे पर हैं। यह अमृतसर से लगभग 60 किलोमीटर तथा बटाला से 36 किलोमीटर हैं। डेरा बाबा नानक नदी के इस पार वाले किनारे पर हैं तथा करतारपुर (पाकिस्तान में) दुसरे किनारे पर। गाँव करतारपुर गुरू नानक साहिब ने 1522 में बसाया था। एक सिक्ख दुनी चंद करोड़या ने यहाँ गुरू नानक साहिब के रहने के लिए घर तथा संगतो के लिए सराय बनाई थी। गुरू अंगत साहिब को गुरूगद्दी इसी गाँव में मिली थी। गुरू नानक साहिब नें अपनी आयु के अंतिम सत्रह वर्ष यहीं बिताये थे। 1870 में संगतों ने सीमेन्ट और पत्थरो का एक बाँध बना कर गुरू नानक साहिब कें गुरूद्वारे को नदी की मार से बचाया गया था। इस गाँव का सबसे पुराना तथा ऐतिहासिक स्थान देहरा साबित हैं। इस स्थान पर गुरू नानक साहिब का संस्कार हुआ था। 1947 से 200/तक यह गुरूद्वारा जनता के लिए नहीं खुलता रहा क्योकि यह भारत-पाक सीमा पर महत्वपूर्ण स्थिति रखता हैं। वैसे भी यह काफी बुरी हालत में हैं तथा इसकी देखभाल नही होती। करतारपुर में गुरू नानक साहिब केें संस्कार कें बाद उनके पुत्र श्री चंद ने उनकी याद में समाधी बनाई थी। किन्तु सिक्ख धर्म में इसकी अनुमति नहीं हैं तथा गुरू साहिब ने स्वयं भी ऐसा करने से रोका था। कुछ समय बाद इस समाधि को नदी बहा कर ले गई। इसके बाद श्री चंद नदी की दूसरी तरफ लगभग चार किलोमीटर दूर, पक्खो के गाँव की भुमि में एक समाधी बना ली। बाद में इसका नाम देहरा साहिब पड़ गया। धीरे-धीरे गाँव का नाम भी ’डेरा बाबा नानक’ के नाम से प्रसिध्द हो गया। लोग 1947 के बाद डेरा बाबा नानक जाने लगें। डेरा बाबा नानक में एक अन्य गुरूद्धारा चोला हैं। यह गुरूद्धारा बेदी खानदान के एक परिवार का हैं। यहाँ एक चोला हैं जिस पर कुरान की कुछ आइतें लिखी हुई हैं। बेदी खानदान का दावा है की यह चोला गुरू नानक साहिब की अरब यात्रा के समय उनको भेंट किया गया था। बहुत से स्कोलर इसकी प्रमाणीकता पर शक करते हैं। डेरा बाबा नामक अमृतसर से 35 किलोमीटर दूर हैं तथा रेल और बस के रास्ते अमृतसर से जुड़ा हुआ हैं। सुलतानपुर लोधी यह कपूरथला जिला का एक पुराना कस्बा हैं। इतिहास के अनुसार यह कस्बा पंजाब के गर्वनर वली मुहम्मद खां के पुत्र सुलतान खां ने 1322 में बसाया था। जालंधर सूबा के गर्वनर दौलत खां लोधी (16वीं सदी में) का यह मुख्यालय था। गुरू नानक साहिब नवम्बर 1504 से अक्टूबर 1507 तक यहाँ रहे थे। गुरू साहिब यहाँ नवाब दौलत खां के मोदी खाने (अनाज गृह) में मोदी (मंत्री) बनाये गये थे। गुरू अर्जून साहिब और गुरू हरिगोबिन्द साहिब भी एक बार इस नगर में आये थे। किसी समय में सुलतानपुर एक खूबसूरत कस्बा होता था। 1739 में नादिरशाह कें आक्रमण के समय इसका काफी हिस्सा तबाह हो गया। नवम्बर 1753 में सरदार जस्सा सिघ आहलूवालिया ने इस नगर पर अधिकार कर लिया। सुलतानपुर में कई गुरूद्वारे हैं: (1) गुरूद्वारा बेर साहिब-बेदी नदी के किनारे इस बेर के नीचे गुरू साहिब अक्सर बैठा करते थे तथा यहाँ स्नान किया करते थे। ( 2 ) गुरूद्वारा हट्ट साहिब -यह मोदीखाना था। जहाँ गुरू साहिब काम किया करते थे। ( 3 ) गुरूद्वारा संत घाट- यहाँ गुरू साहिब ने अपने कपड़े उतार कर उदासी वस्त्र धारण कर लिये थे तथा अपनी पहली उदासी आरंभ की थी। (4) गुरूद्वारा कोठड़ी साहिब- यहाँ गुरू साहिब ने मोदिखाने का हिसाब किताब दिया था। (5) गुरूद्वारा गरू का बाग- बेबे नानकी और गुरू नानक साहिब अपने बेटे गुरू हरिगोबिन्द साहिब का विवाह करने के लिए, गाँव डल्ला जाते हुए यहाँ रूके थे। सुलतानपुर जालंधर से 45 किलोमिटर तथा कपुरथला से 25 किलोमिटर हैं। खडूर साहिब यह जिला अमृतसर का एक गाँव है। गुरू अंगद साहिब यहाँ लगभग 13 वर्ष (1539-52) तक रहे। गुरू अमरदास साहिब यहि पर गुरू अंगत साहिब को मिले थे तथा वे भी यहाँ दस वर्ष से अधिक रहे थे। एक प्रथा के अनुसार गुरू नानक भी खडूर साहिब आये और यहां के एक सिक्ख भाई योध्दे को मिले थे। खडूर साहिब में बहुत से गुरूद्वारे है: (1) गुरूद्वारा तपिआणा साहिब - यह गुरू नानक साहिब की याद में बना हुआ है (2) गुरूद्वारा तपस्थान गुरू अंगद साहिब - यहाँ गुरू अंगद साहिब पाठ किया करते थे (3) गुरूद्वारा दरबार साहिब - यहाँ गुरू अंगद साहिब का संस्कार किया गया था (4) गुरूद्वारा खड्डी साहिब - यहाँ एक जुलाहे का खड्डी करघा था। एक बार गुरू अमर दास साहिब गुरू अंगद साहिब के स्नान के लिए पानी लाते समय इस करघे की किल्ली से अटक कर गिर गए थे (5) गुरूद्वारा थड़ा साहिब गुरू अमर दास साहिब - यहाँ गुरू अमरदास साहिब पाठ किया करते थे (6) गुरूद्वारा मल्ल अखाड़ा - यहाँ गुरू अंगद साहिब बच्चों और जवानों को कुश्तियाँ करवाते थे। यहाँ स्कुल भी लगता था, जहाँ बच्चे गुरमुखी पढ़ना-लिखना सीखा करते थे। (7) गुरूद्वारा माई भिराई- गुरू अंगद साहिब की बहन (कुछ लेखकों ने उसे बूआ भी लिखा है) माई भिराई की याद में बना गुरूद्वारा। एक प्रथा के अनुसार जब गुरू नानक साहिब का देहान्त हुआ उस समय गुरू अंगत साहिब यहाँ रह रहे थे। बाबा बुड्डा जी आपको यहाँ से लेकर गये थे। (8) बीबी अमरो जी का खूह (कुआँ)- यह गुरूद्वारा किल्ली साहिब के साथ ही हैं। एक प्रथा के अनुसार बीबी अमरो, पुत्री गुरू अंगत साहिब, इस कुएँ से पानी भरा करते थेे। खडूर साहिब अमृतसर से 55 किलोमीटर और तरन तारन से 30 किलोमीटर दूर हैं। गोइंदवाल इसके बिल्कुल पास 5 किलोमीटर दूरी पर हैं। गोइंदवाल साहिब यह गाँव ब्यास नदी के किनारे पर है। इस गाँव की नींव भाई गोइंदा की प्रार्थना पर गुरू अमर दास साहिब ने 1546 में (एक स्रोत के अनुसार 1551 में) रखी थी। गुरू अमरदास साहिब और गुरू राम दास साहिब यहाँ कई वर्ष रहे थे। गुरू अर्जन साहिब का जन्म भी यहीं हुआ था। गुरू हरिगोबिन्द यहाँ साहिब और गुरू हरि राय साहिब भी यहीं रहते थे। गोइंदवाल साहिब में कई गुरूद्वारे हैं: (1) बाउली साहिब- यह गुरूद्वारा बाउली पर बना हुआ है। उन दिनों उस क्षेत्र में पानी की बहुत कमी थी। गुरू अमरदास साहिब ने काफी गहरी खुदाई करवा कर यह बाउली बनवाई थी। यह बाउली 1556 में तैयार हुई थी। इसके पानी की सतह तक पहुँचने के लिए 84 सिढ़ीयाँ नीचे उतरनी पड़ती हैं। पंथ के कुछ दुश्मनों ने यह गलत प्रचार किया हुआ है कि इन चैरासी सीढ़ीयों पर 84 पाठ जपुजी साहिब करने पर चैरासी लाख योनियों का चक्कर कट जाता है। यह बात सिक्ख दर्शन के विपरीत है। सिक्ख धर्म में मुक्ति ऐसे नहीं मिलती। 1906 में इस गुरूद्वारे पर संगमरमर लगाया गया और गुम्बद पर सोना चढ़ाया गया था। (2) खूह गुरू राम दास साहिब- यह खूह (कुँआं) गुरू राम दास साहिब ने बनवाया था। भाई गुरूदास जी का देहांत इसी स्थल पर हुआ था। (3) चोैबारा साहिब- यह गुरू अमरदास साहिब और गुरू राम दास साहिब का निवास था। गुरू अमरदास साहिब यहाँ दीवान सजाया करते थे। गुरू अर्जन साहिब का यहाँ जन्म हुआ था। अब इसके साथ ही गुरूद्वारा जन्म स्थान पातशाहि पाचँवा भी बनाया गया है। गुरू राम दास साहिब का देहांत भी इसी स्थान पर हुआ था। यहाँ एक रथ पड़ा है जिसके संबंध में कहा जाता है यह अर्जन साहिब के समय का है। (4) गुरूआयी स्थान-यहाँ गुरू रामदास साहिब को गुरग६ी दी गई थी। (5) ज्योति जोत स्थान पातशाही तीसरी- यह गुरूग६ी स्थान के बिल्कुल पास ही है यहाँ गुरू अमर दास जी का देहांत हुआ था। (6) थड़ा साहिब गुरू अमर दास साहिब- बाउली की खुदवाई के समय गुरू अमरदास यहाँ बैठ कर निगरानी किया करते थे। (7) किल्ली साहिब- एक प्रथा के अनुसार गुरू अमर दास साहिब ‘तप’ करते समय इस किल्ली (खूँटी) को पकड़ कर खड़े करते थे। एक पुरानी खूँटी, जिस पर अब चाँदी लगी हुई है, अभी तक कायम है। यह खूँटी गुरूद्वारा चोैबारा साहिब में लगी हुई है। सिक्ख दर्शन के अनुसार ऐसे ‘तप’ जैसी कोई चीज नहीं होती। ऐसा लगता है कि यह कहानी बाद में बनाई गई होगी। इन गुरूद्वारों के अतिरिक्त बाबा आनंद (बाबा मोहरी का पुत्र तथा गुरू अमर दास का पोता) तथा बाबा मोहन (गुरू अमर दास साहिब का दूसरा पुत्र) की यादगारें बनी हुई हैं। गाँव से तीन किलोमीटर दूर गुरूद्वारा दमदमा साहिब भी है जिसके संबंध में कहा जाता है कि गुरू अमर दास साहिब नदी से पानी लाते समय यहाँ कुछ पल रूका करते थे। यह बात भी बाद में बनाई गई लगती है क्योंकि गोइंदवाल से ब्यास नदी 10 किलोमिटर दूर है तथा यह असम्भव है कि 10 किलोमिटर के इलाके में पानी न हो किन्तु लोग बसते हो। बादशाह अकबर और उसका मंत्री अबू फजल इस गाँव में गुरू अर्जन साहिब के पास 24 नवम्बर 1598 के दिन आये थे। (एक प्रथा के अनुसार अकबर गुरू अमरदास साहिब के समय भी यहाँ आया था।) बादशाह जहाँगीर भी यहाँ 27 जनवरी 1620 को आया था तथा यहाँ गुरू हरिगोबिंद साहिब के साथ कलानौर गया था। गोइंदवाल खडूर साहिब से लगभग 5 किलोमिटर, तरन तारन से 25 किलोमिटर पर अमृतसर से 50 किलोमिटर दूर है। अंग्रेजो द्वारा 1850 के पश्चात बनाई गई वर्तमान जी.टी. रोड पहले यहां से गुजरती थी। दिल्ली से लाहौर जाने वाले लोग दिल्ली-सरहिंद, दोराहा-तलवन, नूर महल, नकोदर, सुल्तानपुर, गोईंदवाल, पट्टी होकर लाहौर पहुंचा करते थे। वे गोइंवाल के स्थान पर ब्यास दरिया पार किया करते थे। अमृतसर अमृतसर शहर आज कल सिक्ख कौम का सबसे बड़ा केन्द्र हैं। यह पहला नगर है जिसे गुरू साहिब ने सिक्ख माॅडल (प्रतिमान) नगर के रूप में बसाया था। अमृतसर का पहला नाम ‘गुरू दा चक्क’ था। इसको बनाने के लिए गुरू रामदास साहिब ने सुलतानविंड, तुग व गिलवाली गाँवों के जमींदारो को 700 अकबरी रुपये देकर 500 एकड़ भूमि खरीदी थी। यह नगर 1564 में बनाना शुरू किया गया था और सबसे पहले संतोखसर सरोवर की खुदाई शुरू की गई थी जो गुरू साहिब के गोइंदवाल वापिस चले जाने के कारण पूरी तरह तैयार न हो सका। 1574 में गुरू अमरदास के देहान्त के कुछ समय बाद गुरू रामदास साहिब यहाँ आकर स्थाई रूप से रहने लगे। 1577 में अमृतसर सरोवर की खुदाई शुरू हो गई। 1581 तक यह सरोवर तैयार हो गया। इसी साल गुरू रामदास साहिब का देहान्त हो गया। गुरू अर्जन साहिब ने इस सरोवर को पक्का करवाया और इसके साथ ही संतोखसर सरोवर भी तैयार करवा लिया। 1587 में दोनों सरोवर तैयार हो चुके थे। 27 दिसम्बर 1587 के दिन गुरू अर्जन साहिब ने अमृतसर सरोवर के बीच हरिमंदर सहिब (दरबार साहिब) की नींव रखी। (बाद में एक मुसलिम लेखक बूटे शाह ने अपनी किताब में यह प्रचार कीया की दरबार साहिब की नींव सांई मीयां मीर ने रखी थी। कुछ भोले सिक्ख लेखकों ने इस ऐंटी सिक्ख प्रचार को सत्य मानकर प्रचार करना शुरू कर दिया)। 1601 तक दरबार साहिब पुरी तरह तैयार हो चुका था। इसी नगर में गुरूद्वारा रामसर में 1601-04 में गुरू साहिब का पहला स्वरूप तैयार किया गया था। गुरू ग्रथ साहिब का यह स्वरूप 31 जुलाई 16़04 के दिन तैयार हुआ था तथा 16 अगस्त 1604 के दिन इसका प्रकाश दरबार साहिब में किया गया था। जुलाई 1608-09 में गुरू हरिगोबिन्द साहिब ने दरबार साहिब कें सामने अकाल तख़्त साहिब की नीव रखी। गुरू साहिब ने मीरी और पीरी की दो तलवारें डाल कार मीरी-पीरी एक होने का ऐलान भी किया। गुरू हरिगोबिन्द साहिब यहाँ 1613 तक रहे। 1613 सें 1619 तक आप ग्वालियर किला में कैद रहे। इसके बाद आप ग्वालियर, गोइंदवाल, डरोली भाई तथा अमृतसर में अलग-अलग समय पर रहे। 13 अप्रैल 1634 के दिन मुरतजा खां के नेतृत्व में मुगलो ने यहाँ आक्रमण कर दिया किन्तु बुरी तरह हारे। 1635 से 1696 तक दरबार साहिब कि सेवा-संभाल मिहरबान (पुत्र पृथ्वी चंद मीणा ) तथा उसके परिवार के पास रही। मई 1698 में भाई मनी सिघ यहाँ का मुख्य सेवादार बन कर आये तथा 1734 तक सेवा करते रहें। इस दौरान अप्रैल 1709 में मुगलो ने अमृतसर पर दो आक्रमण किये किन्तु बुरी तरह हारे। बंदा सिघ बहादर शाह ने अजीत सिंघ पालित को बंदा सिघ कें विरूद्ध प्रयोग करने के लिए 30 दिसम्बर 1711 के दिन अमृतसर का प्रबंध उसे दे दिया। फरवरी 1712 में बहादर शाह की मृत्यु कें बाद अजित सिंघ पालित फिर दिल्ली चला गया इसके बाद फिर नए मुगल बादशाह फर्खसीयर के जुल्म का दौर चल पड़ा। इन दिनो भाई मनी सिंघ जी भी कही और चले गये। जब कुछ शांति हुई तो 1721 में भाई मनी सिंघ फिर अमृतसर आ गये। किन्तु 1726 के बाद फिर जूल्म का दौर चल पड़ा जो 1732 तक जारी रहा। 29 मार्च 1733 के दिन अकाल तख्त़ साहिब पर मुगल गर्वनर की तरफ से प्रतिनिधी ने उपस्थित होकर सिक्खों को अर्ध-प्रभूसता की पेशकश की। जागीर की इस पेशकश पर अकाल तख्त साहिब के दरबार में विचार किया गया। प्रयोग के लिए इस पेशकश को स्वीकार कर लिया गया। यह वातावरण केवल कुछ महिने ही कायम रहा। अक्टूम्बर 1733 में भाई मनी सिंघ ने मुगल गर्वनर से दिवाली के मौके पर सम्मेलन करने की अनुमती मांगी। कुछ हजार रूपये के लगान (कर) की शर्त पर इसकी मंजूरी दी गई। दूसरी तरफ मूगलो ने सिक्खो का कत्ले आम करने की अफवा फैला कर सिक्खों के सम्मेलन में रूकावट डाली जिससे लोग कम आये और पैसे जमा ना हो सका और भाई मनी सिंघ लगान ना दे सके। उन्होने वैसाख की पहली तारिख को नया समागम करके पैसे देने का वायदा किया। अप्रैल में पहली वैसाख के दिन भी चड़ावा काफी ना हो सकने के कारण भाई मनी सिंघ रूपये ना दे सके मुगल गर्वनर तो पहले ही बहाना ढूंढ़ रहा था। उस ने भाई मनी सिंघ और उनके दर्जन के लगभग रिस्तेदार तथा साथि गिरफ्तार करके लाहौर में कष्ट दे दे कर शहिद कर दिये। 1740 में मुगल सरकार ने अमृतसर पर अधिकार करके एक बादशाह और अय्याश व्यक्ति मस्सा रंघड़ को यहाँ बैठा दिया। उसने इस स्थान पर बदमाशी की नीच कार्यवाही करनी आरम्भ कर दी। 11 अगस्त 1740 के दिन भाई सुक्खा सिंघ और भाई महिताब सिंघ ने बीकानेर से आ कर इस मस्सा रंघड़ का सिर काटा और संगतों के सामने पेश किया। 1757 में जब अफगान सैनिकों ने अमृतसर पर अधिकार करके यहाँ अपमानजनक कार्य किये तब बाबा दीप सिंघ के नेतृत्व में सिक्खों ने इस ओर कूच किया और अफगान सैनिकों के साथ यु़द्ध किया। 11 नवम्बर 1757 के दिन भीषण लड़ाई में बाबा दीप सिंघ भी शहिद हुए। अफगान सैनिकों ने दरबार साहिब तोड़ की इमारत को नष्ट कर दिया। इसके बाद सिक्खों ने इसे फिर से बना लिया। फरवरी 1762 में अहमद शाह दुरानी ने फिर दरबार साहिब पर आक्रमण कर दिया और इसे बारूद से उड़ा दिया। 16 नवम्बर 1762 के दिन अमृतसर के बाहर सिक्खों ने अहमद शाह दुरानी की बड़ी सेना को बुरी तरह हराया। 1 दिसम्बर 1764 के दिन फिर अब्दाली की सेना ने आक्रमण किया। उस समय यहाँ पर जत्थेदार गुरबख्श सिंघ के नेतृत्व में उपस्थित 30 सिक्खों ने सैकड़ों अफगान सैनिकों को मार कर शहीदी प्राप्त की। 1765 में सरदार जस्सा सिंघ आहलूवालिया के नेतृत्व में दरबार साहिब का फिर से निमार्ण शुरू हुआ।1776 तक इस का केन्द्रीय हिस्सा तैयार हो चुका था। 1780 से 1830 में महाराजा रणजीत सिंघ तथा अन्य सिक्खों ने दरबार साहिब पर सोने के पतरे चढ़ाऐ। इसका एक नुकसान हुआ कि दरबार साहिब को हरिमन्दिर के स्थान पर गोल्डन टेम्पल (ळवसकमद ज्मउचसम) अर्थात स्वर्ण मंदिर कहा जाने लगा। 1845-46 की लड़ाई के बाद लाहौर में ब्रिटिश रैजीडैंट रहने लगा ओर वह अमृतसर भी अक्सर अक्सर आने लगा। 24 मार्च 1887 के दिन उसने एक पत्र जारी कर बर्तानवी अफिसरों को कहा कि अमृतसर शहर में प्रवेश करते समय इस पवित्र शहर की मर्यादा का पालन किया गया। 1849 में पंजाब को अंग्रजो ने अपने राज में पूरी तरह मिला लिया। 1858 में अमृतसर में नगरपालिका स्थापित कर दी गई। 1862 में अमृतसर और लाहौर के बीच गाड़ी चलने लगी। 1892 में यहाँ खालसा कालेज बन गया। (1969 में यहाँ यूनिवर्सिटी भी बन गई)। 1879 में यहाँ सिंघ सभा बन चुकी थी। 1902 में यहीं चीफ खालसा दीवान बनां। 1899 की 13 अप्रैल को जलियां वाले बाग में जनरल डायर ने गोली चला कर 379 व्यक्ति मार दिये तथा सैकड़ों को घायल कर दिये। इसी साल के अंत में यहाँ सिक्ख लीग बनी। 12 अक्टूबर 1920 को सिक्खों ने अकाल तख़्त साहिब और दरबार साहिब को महंतो से स्वतंत्र करा लिया। 15-16 नवम्बर 1920 के दिन शिरोमणी गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी तथा 14 दिसम्बर 1920 के दिन शिरोमणी अकाली दल भी यहाँ बना। अमृतसर से बहुत से पंथक आंदोलन भी चले। 1920-25 तक गुरूद्वारा सुधार लहर (चाबीयों का मोर्चा, गुरू दा बाग मोर्चा, जैतो मोर्चा आदि), पंजाबी सूबा मोर्चा (1955 और 1960), ज. दर्शन सिंघ फेरूमान का मरन उपवास (1969), धर्म युद्ध मोर्चा (1982-84) आदि। 13 अपै्रल 1978 के दिन नकली निरंकारियों ने यहाँ भाई फौजा सिंघ और 12 अन्य सिंघ शहिदी कर दिये। इसके बाद पंजाब में खालिस्तान लहर का दौर शुरू हो गया। कुछ कत्लों, जलुसों, समारोहों, और बंब धमाकों के बाद पंजाब में एक तरह का सिक्ख शासन सा शुरू हो गया था। 4 जून 1984 के दिन भारतीय सैनिकों ने दरबार साहिब और 40 अन्य गुरूद्वारों पर आक्रमण कर के हजारों सिक्खों का संहार कर दिया। बाबा जरनैल सिंघ भिंडरांवाले, जनरल सुबेग सिंघ तथा भाई अमरीक सिंघ भी इन शहीदों में थे। सैनिक आक्रमण में अकाल तख्त साहिब बुरी जरह नष्ट हों गया। बाकी परिक्रमा का भी गोलीबारी में बहुत ही नुकसान हुआ। लेखागार तथा कार्यालय जला दिये गये और और संपंती लूट ली गई। सिक्ख रैफरैंस लायबरेरी का सारा बेश-कीमती सामान भारती सेना उठा कर ले गई। गुरद्वारों पर सैनिकों का अधिकार हो गया। सितम्बर 84 के बाद भले ही सैनिक परिक्रमा से बाहर हो गये किन्तु वास्तव में उनका ही अधिकार था। इस दौरान भारत सरकार ने कुछ सिक्ख अपने हाथें में लेकर अकाल तख्त साहिब की मरम्मत करवाई। किन्तु 26 जनवरी 1986 को सिक्ख नौजवानों ने सरकार द्वारा बनाई गई ईमारत का तोड़कर नई तैयारी शुरू करवाई। इस दौरान 29 अपै्रल 1986 को यहाँ ‘खालिस्तान सरकार’ का ऐलान हो गया। सुरजीत बरनाले ने 30 अपै्रल को दरबार साहिब में पुलिस भेजकर अधिकार जमा लिया। फिर 9 मई 1988 को राजीव गांधी ने फिर आक्रमण करके दरबार साहिब पर अधिकार जमा लिया। अमृतसर गुरूसाहिब ने अपने हाथों से बनाया था। इस शहर का प्रत्येक कण-कण सिक्ख शहीदों के रक्त में सिंचा हुआ है। कम से कम एक लाख सिक्ख केवल अमृतसर में ही शहीद हो चुके हैं। इस शहर में गुरू साहिब तथा सिक्खों के हाथो की गई सेवा से बने बहुत से गुरूद्वारे और यादगारें हैं: पांच सरोवर: (1) अमृतसर (1577), (2) संतोखसर (1587), (3) रामसर (1602-03), (4) कौलसर (1627), (5) बिबेकसर (1628) । गुरूद्वारे: (1) दरबार साहिब (1577-1601), (2) गुरू दे महल (यहाँ गुरू रामदास साहिब, गुरू अर्जन साहिब अैर गुरू हरिगोबिंद साहिब रहे थे। गुरू तेग बहादर साहिब का जन्म यहीं हुआ था। ) (3) दर्शनी डिओढ़ी (गुरू बाजार के नजदीक। गुरू अर्जन साहिब की याद में) (4) गुरूद्वारा थड़ा साहिब (गुरू तेग बहदर साहिब की याद में । गुरू साहिब यहाँ 22 नवम्बर 1664 के दिन आये थे) (5) गुरूद्वारा दमदमा साहिब (गुरू तेग बहादर की याद में), (6) पिपली साहिब (गुरू अर्जन साहिब और गुरू हरिगोबिंद साहिब की याद में), (7) गुरूद्वारा टाहली साहिब (गुरू रामदास साहिब की याद में), (8) गुरूद्वारा चुरस्ती अटारी (गुरू हरिगोबिंद साहिब की याद में), (9) गुरूद्वारा लोहगढ़ किला (1609-12 में यहाँ गुरू हरिगोबिंद साहिब ने किला तैयार करवाया था), (10) गुरूद्वारा शहीद बाबा दीप सिंघ (यहां 11 नवंबर 1757 के दिन की लड़ाई में बाबा दीप सिंघ की गर्दन बुरी तरह कट गई थी। उन्होनें अमृतसर सरोवर के निकट प्राण छोड़े थे) (11) शहीद गंज बाबा गुरबख्श सिंघ (अकाल तख़्त साहिब के पीछे), (12) बाबा अटल (गुरूहरिगोबिन्द साहिब के सपुत्र बाबा अटल की याद में जहां उनका संस्कार हुआ था) आदि। सिक्ख पंथ का तख़्त अकाल तख़्त साहिब इसी शहर में ही है। इसके अतिरिक्त शहर में कम ये कम 69 बुगे भी थे जहां पर यात्री रहा करते थे। इनमें से कुछ तो अभी भी कायम हैं। शिरोमणी अकाली दल, शिरोमणी गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी, सिक्ख स्टूडैंट फेडरेशन, चीफ़ खालसा दीवान के कार्यालय भी यहीं हैं। केन्द्रीय सिक्ख अजायब घर भी यहीं है। दरबार साहिब के साथ अब पांच सराय भी हैं जिनमें हजारों यात्री एक ही समय ठहर सकते हैं। तरनतारन साहिब तरनतारन साहिब शहर की नींव गुरू अर्जन साहिब ने 13 अप्रैल 1590 को रखी थी। उन्होने सबसे पहले सिर्फ सरोवर ही बनवाया था। शहर 19 मार्च 1596 से बनना शुरू हुआ। इस सरोवर को पक्का करने के लिए ईटे तैयार करने के लिए बहुत से भट्ठे लगाये गये उस ईलाके के चैधरी नूरउद्दीन के पुत्र अमीरउद्दी्न ने आक्रमण करके सभी इटे जबददस्ती उठा लीं और उनसे अपनी हवेली बना ली (1766 में सरदार जस्सा सिंध रामगड़ीया और बुध्द सिघ फैजलापुरिया ने यह हवेली गिरा दी तथा इसकी इटें तरन तारन लाकर सरोवर के दोनांे तरफ लगा दी)। तरनतारन का मुख्य गुरूद्वारा शहर के बीच हैं। यह गुरूद्वारा दरबार साहिब अमृतसर की तरह सरोवर के बीच नहीं बल्की एक किनारे पर बना हुआ हैं। तरनतारन का सरोवर आकर में अमृतसर के सरोवर से लगभग दो गुणा बड़ा हैं। गुरू अर्जन साहिब ने तरनतारन में कोढ़ियों के लिए एक केन्द्र भी कायम किया था 1860 से 1921 तक तकरनतारन का गुरूद्वारा महंतो के अधिकार में रहा था। जब कुछ सिक्ख नेता 27 जनवरी 1921 को महंतों के साथ बातचीत करने गये तो महंतो ने किराये के गुण्डों द्वारा आक्रमण करवाकर बहुत से सिक्ख घायल कर दिये। इन घायलों में भाई हजारा सिंघ गांव अलादिनपुर और भाई हुक्म सिंघ गांव वजाऊकोट गहरें घावों के कारण शहीद हो गये। तरनतारन कस्बे में गुरू अर्जुन साहिब के अतिरिक्त गुरू हरिगोंविद साहिब और गुरू तेग बहादुर साहिब भी गये थे। तरनतारन के अंदरूनी हिस्से के बाहर दो यादगारें भी हैः गुरू दा खूह और माता भानी दा खूह। तरनतारन अमृतसर से लगभग 24 किलोमिटर हैं। करतारपुर (जालंधर) करतारपुर शहर की नींव गुरू अर्जुन साहिब ने 24 नवम्बर 1594 के दिन एक स्तम्भ गाड़ कर रखी थी। गुरू अर्जुन साहिब, गुरू हरिगोविन्द साहिब और गुरू जेग बहादुर साहिब कुछ समय यहाँ रहे थे। गुरू तेग बहादुर साहिब और उनके भाई बाबा सूरज मल्ल का विवाह यहीं हुआ था। गुरू हरिगोबिन्द साहिब जब यहाँ थे तो पैंदे खां द्वारा लाई गई मुगल सेना ने 26 अप्रैल 1635 के दिन आक्रमण कर दिया। तीन दिन की इस लड़ाई में बहुत से मुगल सैनिक मारे गये और कई सिक्ख शहीद हुए। इसके बाद गुरू साहिब कीरतपुर साहिब चले गए किन्तु धीर मल्ल (बाबा गुरदिता का पुत्र और गुरू हरिगोबिन्द साहिब का पोता) यहाँ रहा। बाद में 1664 में धीर मल्ल भी कुछ समय के लिए कीरतपुर भी गया लेकिन शीघ्र ही बकाले चला गया। धीर मल्ल को 1676 मे बन्दी किया गया। वह 1677 मे रणथंभैर किला जेल में ही मर गया। 1678 में धीर मल्ल के बड़े पुत्र रामचंद को भी बंदी बना कर दिल्ली ले जाकर कत्ल कर दिया गया। इसके बाद उसका छोटा पुत्र भार मल्ल बकाला से करतारपुर चला आया। गुरू ग्रंथ साहिब का पहला स्वरूप, जिसको भाई गुरदास ने अपने हाथों से लिखा था, 1631 के बाद करतारपुर में ही रहा। कुछ समय, जब धीर मल्ल बकाले रहा, वह गुरू ग्रंथ साहिब का स्वरूप वहाँ ले गया। 1678 के बाद फिर यह स्वरूप करजारपुर लाया गया। 1757 मे जालंधर के नवाब नासिर अली ने करतारपुर पर आक्रमण कर इसको तोड़ डाला और थम्म साहिब को आग लगा दी थी। ऐसा लगता है कि इसी समय (या अहमद शाह दुरानी के हमले के दौरान) यह स्वरूप नष्ट हो गया। अब उसकी एक प्रतिलिपी करतारपुर में पड़ी हैै सिक्खों ने इस अपराध की सजा बाद मंे नासिर अली को दी थी। करतारपुर में कई गुरूद्वारे हैं: (1) थम्म साहिब- यहाँ गुरू अर्जुन साहिब ने 24 नवम्बर 1594 के दिन स्तम्भ गाड़ कर शहर की नींव रखी थी इसकी ईमारत 1757 में नासिर अली ने आग लगा दी थी। वर्तमान इमारत रणजीत सिंघ के राज के समय बनाई गई थी। (2) गंगसर- यहाँ गुरू अर्जून साहिब ने 1599 में एक कुँआं बनवाया था। लोगो का विश्वास है कि इस कुँए का पानी गंगा नदी के पानी से अधिक पवित्रता रखता है। (3) शीश महल- यह गुरू अर्जुन साहिब का घर था। गुरू हरिगोबिन्द साहिब भी यहाँ रहते थे। गुरू ग्रंथ साहिब का पहला स्वरूप यहीं पर था। यहाँ गुरू अर्जुन साहिब, गुरू हरिगोबिन्द साहिब, गुरू हरि राय साहिब और बाबा गुरदिता की कुछ यादगार वस्तुएं पड़ी हैं। इस स्थान पर धीर मल्ल के वंशजो का अधिकार है तथा सिक्खों को इस खानदान के साथ रोटी-बेटी का संबंध रखने की अनुमति नहीं है। (4) दमदमा साहिब- गुरू हरिगोबिन्द साहिब ने 26-28 अप्रैल 1635 के युद्ध के बाद कुछ समय यहाँ आराम किया था। (5) दमदमा साहिब पातशाही सातवीं- इसको टाहली साहिब भी कहते हैं। 1658 में किरतपुर से गोइंदवाल जाते समय गुरू हरिराय साहिब यहाँ ठहते थे। (6) विवाह स्थान गुरू तेग बहादुर साहिब- गुरू तेग बहादुर साहिब और माता गुजरी का विवाह 14 सितम्बर 1632 के दिन यहाँ हुआ था। (7) चुब्बचा साहिब पातिशाही छठी- बाबा गरदिता और भाई गुरदास की याद में। करतारपुर जालंधर से लगभग 15 किलोमीटर दूर है। किरतपुर साहिब किरतरपुर कि नींव बाबा श्रीचंद ने 1624 दिन रखी थी। इस कस्बे के लिए भूमि गुरू हरिगोबिन्द साहिब ने बिलासपुर के राजा कल्याण चंद से खरीदी थी। श्री चंद की मृत्यु यहीं पर 9 नवम्बर 1626 के दिन हुई थी। मई 1635 में गुरू हरिगोबिन्द साहिब यहाँ आकर रहने लगे थे। 1664 तक किरतपुर सिक्खों का मुख्यालय बना रहा। गुरू हरिगोबिन्द साहिब और गुुुरू हरिराय साहिब का देहांत यहीं पर हुआ था। गुरू हरिराय साहिब और गुरू हरिकृष्ण साहिब का जन्म यहीं पर हुआ था। गुरू हरिराय साहिब और गुरू हरिकृष्ण साहिब को गुरगद्दी इसी स्थान पर ही दी गई थी। गुरू नानक साहिब, गुरू तेग बहादुर साहिब और गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब भी यहाँ आये। किरतपुर साहिब में कई गुरूद्वारे हैं:(1) चरन कंवल साहिब -(यह गुरूद्वारा गुरू नानक साहिब की याद में बना हैैं। गुरू नानक साहिब अपनी उदासी के दौरान यहाँ से गुजरे थे और साई बुड्ढण शाह ने उनको दूध पिलाया था।) (2) शीश महल- गुरू हरगोबिंद और गुरू हरी राय साहिब यहाँ रहे थे। गुरू हरी राय और गुरू हरीकृष्ण साहिब का जन्म यही हुुआ था। (3) तख़्त कोट साहिब- यह सिक्खो का तख्त़ था। गुरू हरगोबिन्द साहिब यहा से अकाल तख्त साहिब की कार्यवाही चलाया करते थे। गुरू हरि राय साहिब और गुरू हरिकृष्ण साहिब को गुरूगद्दी यहाँ दी गई थी। (4) दमदमा साहिब-गुरू हरिकृष्ण साहिब यहाँ दिवान सजाया करते थे। (5) पातालपुरी-सतलुज नदी कभी यहा से गुजरती थी। गुरू हरिगोेबिन्द साहिब तथा गुरू हरि राय साहिब का यहाँ संस्कार हुआ था। कुछ नासमझ सिक्ख अपने संबंधितो की अस्थिया यहाँ लाकर डालते हैं। यह सिक्ख दर्शन के विपरित है। सिक्ख को आदेश है कि वह अस्थियों को पास के बहते पानी (नदी, नहर, आदि) में जल प्रवाहित करें। (6) बबाण गढ़ - भाई जैता (जीवन सिंघ) तथा अन्य सिक्ख गुरू तेग बहादुर साहिब का सीस 16 नंवबर 1675 के दिन चक्क नानकी (अनंदपुर) को ले जाते समय कुछ देर यहां रूके थे। (7) हरिमंदर साहिब पातिशाही छठी तथा सातवीं- गुरू हरिगोबिन्द साहिब यहां पाठ किया करते थे। उन दिनों यहां एक अगीचा था। एक बार गुरू हरि राय साहिब यहां भ्रमण कर रहे थे तो उनके लम्बे कुर्ते के साथ अटक कर एक फूल की पत्तियां टूट कर बिखर गईं। इस पर गुरू हरि राय साहिब बहुत भावुक हो गए। गुरू हरगोबिन्द साहिब ने उन को दिलासा देते हुए आगे से अधिक ध्यान रखने के लिए कहा। (8) चुबच्चा साहिब- यहाँ गुरू साहिब ने घोड़ों के पानी पीने के लिए बहुत बड़ा चुबच्चा बनवाया था। गुरू साहिब के पास 2200 घोड़े थे। उनके घोड़ों के दो बड़े अस्तबल थे। दुसरा अस्तबल चनौली गांव में था। (9) मंजी साहिब- यहां बीबी रूप कौर, पुत्री गुरू हरि राय साहिब का घर था। बीबी रूप कौर का विवाह पसरूर (गुजरांवाला) के भाई खेम करन के साथ 4 नवम्बर 1662 के दिन हुआ था किन्तु वह ससुराल केवल तीन दिन ही रही थी। उसके बाद वह किरतपुर के पड़ोस में कोट कल्याणपुर आ गई और फिर किरतपुर, इस घर में रहने लगी। इस गुरूद्वारे में कुछ ऐतिहासिक वस्तुएं पड़ी थी: बाबा श्री चंद कि सेली-टोपी, एक हस्तलिखित पोथी जिसमें कुछ शब्द तथा हुक्म आदेश हैं, एक पंखी तथा एक कढा़ई किया हुआ रूमाल। इनमें से पहली दो चीजे बीबी रूप कौर को दहेज में मिली थीं। अन्य दो भी उनकी यादगारें हैं। जून 2000 में यह पोथी किसी सेवादार ने भारी रकम लेकर किसी को बेच दी। अब पता नहीं ये किसके पास है। (10) देहरा बबा गुरदिता- यहाँ बाबा गुरदिता रहा करते थे। (11) तीर साहिब- यहाँ गुरू हरिगोबिन्द साहिब तलवार चलाना तथा गतका आदि सिखाया करते थे। एक बार गरू साहिब ने यहाँ तीर चलाया था, जो सतलुज नदी के पास गुरूद्वारा पातालपुरी के पास जा गिरा था। (12) बाउली साहिब- यह बाउली बाबा गुरदिता ने बनवाई थी। इसकी खुदवाई का पहला टक्क बाबा श्री चन्द ने लगाया था। (13) गुरू दा खूह- (कुँआ) यह कुँआ गुरू साहिब ने लगवाया था। किरतपुर साहिब में गुरूनानक साहिब, गुरू हरिगोबिन्द साहिब, गुरू तेगबहादुर साहिब तथा गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब कि यादगारें है। जब गुरू नानक साहिब यहाँ आये थे तभी यह गाँव बसा ही नहीं था। दसवें पातिशाह यहाँ रहे नहीं थे किन्तु कई बार यहाँ रूक कर गये थे। किरतपुर अनंदपुर साहिब से 9 किलोमिटर दूर है। चक्क नानकी तथा अनंदपुर साहिब चक्क नानकी की नींव भाई गुरदिता (बाबा बुड्ढा की पीढ़ी से) ने गुरू तेगबहादुर साहिब के कहने पर 19 जून 1665 के दिन रखी थी। चक्क नानकी के लिए लोदीपुर, मीयाँपुर व सहोटा गाँवो की भूमि के कुछ भाग किये गए। यह भूमि गुरू साहिब ने बिलासपुर की रानी चंपा से उस समय के 500 रूपए देकर खरीदी थी। गुरू साहिब ने इसका नाम अपनी माता नानकी जी के नाम पर रखा था। गुरू तुग बहादूर साहिब कुछ सप्ताह यहाँ रहे थे तथा फिर बिहार, बंगाल, आसाम की लम्बी यात्रा पर चले गये थे। 1670 में गुरू साहिब वापिस लौट आये तब ब्रकाला में रहे। वहाँ मार्च 1672 में चक्क नानकी को आ गए और 10 जूलाई 1675 तक यहाँ रहे। गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब अपै्रल 1672 से मार्च 1685 तथा 1688 से दिसम्बर 1705 तक (लगभग 30 साल) यहाँ रहे। जहाँ गुरूद्वारा गुरू दे महल साहिब है वह वास्तव में चक्क नानकी गाँव है। अनंदपुर गाँव की नींव गुरू गोबिन्दि सिंघ साहिब ने 30 मार्च 1689 के दिन रखी थी। यह उस जगह है जहाँ केसगढ़ साहिब है। अब अनंदपुर तथा चक्क नानकी दोनों इकट्ठे अनंदपुर साहिब कहलाते हैं। अब मीयांपुर, लौदीपंर, सहोटा, मटौर तथा कई और गाँव भी बहुत अनंदपुर साहिब का हिस्सा हैं। अनंदपुर साहिब में कई गुरूद्वारे हैं। पहले यहाँ पाँच किले ही थे। यह किले अनंदगढ़, लोहगढ़, तारागढं़, अगंमगढ़ तथा फतहगढ़, अपै्रल 1689/1690 में बनने आरम्भ हुए थे। 29 मार्च, 1998/99 के दिन गुरूसाहिब केशगड के स्थान पर ने खालसा प्रगट किया तथा खंडे का अमृत बनाया। सबसे पहले पाँच प्यारों ने अमृत छका (पीया) तथा फिर पंथ ने अनंदपर साहिब पर कई बार आक्रमण हुये थे। सबसे पहला बडा़ आक्रमण 19 अगस्त 1695 को दिन दिलावर खां (गर्वनर लाहौर) के पुत्र रूसतम खां ने किया था। इसके बाद चार-दिना आक्रमण 29 अगस्त 1700 के दिन अजमेर चंद बिलासपुरी राजा ने किया था। यह लड़ाई चार दिन, पहली सितम्बर 1700 तक, होती रही। पहली सिंतबर के दिन पहाड़ी सेनापति केसरी चंद के मरने के बाद पहाड़ी सैनिक भाग गए। पहली अक्तूबर 1700 के दिन अजमेर चंद के प्रार्थना करने पर गुरू साहिब 7 अक्तूबर को अनंदपुर साहिब से निरमोहगढ़ चले गये। अजमेर चंद ने यहाँ भी आक्रमण कर दिया। 12 से 14 अक्तूबर तक युद्ध हुआ। 14 अक्तूबर को बसाली के राजा काली फूला सिंघ की शहीदी के बाद सभी गुरूद्वारे धीरे-धीरे महन्तों के सलाही चंद (अजमेर चंद की दादी का जीजा) द्वारा मध्यस्ता करने पर युद्ध समाप्त हुआ। 29 अक्टूम्बर को गुरू साहिब बसाली से अनंदपुर लौट आये । 24 फरवरी 1702 के दिन सिक्खों ने होला महल्ला मनाना शुरू किया। अक्तूबर 1702 को राजा सनाही चंद का देहांत हो गया। इसके बाद 16 जनवरी 1704 के दिन अजमेर चंद ने आनंदपुर साहिब पर फिर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण के दौरान ही गुरू साहिब ने फर्रा (दस्तार में निशान साहिब) की प्रथा शुरू की। इस आक्रमण में हारने के बाद अजमेंर चंद डेढ़ साल चुपचाप रहा। किन्तु 1705 की गर्मी के दिनों में उसने फिर शरारत शुरू का दी। इस बार उसने मुगल गवर्नर वजीर खां (सरहिंद) तथा रोपड़ के नवाब को भी साथ मिला लिया। इन सभी ने 3 मई 1705 के दिन अनंदपुर साहिब को घेर लिया। छोटी-छोटी झड़पें चलती रहीं। 4 दिसम्बर 1705 को गुरू सिंघ साहिब को औरंगजेब का पत्र मिला। दूसरे दिन की रात को गुरू साहिब ने अनंदपुर छोड़ने का फैसला कर लिया। रास्ते में पहाड़ी सैनिकों तथा मुगल सैनिकों ने गुरू साहिब और सिक्खों पर आक्रमण कर दिया। परन्तु गुरू साहिब तथा कुछ सिक्ख सही सलामत वहाँ से चले गये किन्तु अन्य रास्ते मेें युद्ध करते हुए शहीद हो गए। दिसम्बर 1711 में बंदा सिंघ बहादूर ने अनंदपुर साहिब आकर बिलासपुर की ओर कूच किया। अजमेर चंद ने पहले तो युद्ध किया किन्तु बाद में अधीनता स्वीकार कर ली। इसके बाद सिक्खों पर जुल्म का दौर चल पड़ा। सिक्ख पहाड़ो तथा जंगलों मेें रहते रहे। इस दौरान 5 मार्च 1748 के दिन सर्वत खालसा का एक सम्मेलन हुआ। फिर मार्च 1753 में यहाँ सिक्खों के सम्मेलन पर अदीना बेग ने आक्रमण कर कई सिक्ख शहीद कर दिये। फिर कई वर्ष बीत गए। 1812 में बिलासपुरी राजा महाचंद ने एक बार फिर आक्रमण किया और बुरी तरह हार कर भाग गया। इसके बाद अनंदपुर साहिब अकाली फूला सिंघ के अधिन आ गया। फिर किसी ने भी इस तरफ आँख न उठाई। अकाली फूला सिंघ की शहीदी के बाद सभी गुरूद्वारे धीर-धीरे महन्तों के हाथें में आ गए, सिर्फ किरतपुर साहिब के गुरूद्वारे उनसे बचे रहे। इनका प्रबंध बाबा सूरज मल्ल के परिवार के पास रहा। 1920 में अकाली लहर चल पड़ी । 15 मार्च 1923 के दिन भाई राम नारारयण सिंघ (बाबा सूरज मल्ल के वंश से) ने किरतपुर साहिब के गुरूद्वारे अपने आप शिरोमणी कमेटी के अधीर कर दिये। शिरोमणी कमेटी ने अनंदपुर साहिब तथा किरतरपुर साहिब की स्थानिक कमेटी बनाकर यहां के सभी गुरद्वारों का प्रबंध भाई रामनारायण सिंघ को ही सौंप दिया। इसके बाद 1966 में पंजाबी सूबा तथा सिक्ख होमलैंड के नाम पर संघर्ष के दौरान डायरैक्ट ऐक्शन (क्पतमबज ।बजपवद) यहीं से ही शुरू की गई थी। 16-17 अक्तूबर 1973 को प्रसिद्ध ‘अनंदपुर साहिब का मता’ भी यहीं पास हुआ था। 4 जून 1984 को जब दरबार साहिब पर धावा हुआ तब भारतीय सैनिकों ने यहाँ भी आक्रमण किया तथा कुछ समय इसे अपने अधीन रखा। 26 मार्च 1986 के दिन सुरजीत बरनाला के आदेश पर पुलिस ने गोली चलाकर यहां पर बहुत सारे सिक्ख मार डाले। 1998-99 में यहाँ खलसा प्रगट करने के 300 साला दिन के नाम पर यहां कुछ नई यादगार ईमारतंे बनीं। अनंदपुर साहिब के बहुत सारे गुरूद्वारे है:(1) तख़्त केसगढ़ साहिब- यहां पर गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब ने पांच सर मांग कर खालसा प्रकट करने का कौतक किया था। वह खंडा जिस से गुरू साहिब ने 29 मार्च 1698/1699 को अमृत तैयार कर के पिलाया था तथा कुछ अन्य शस्त्र भी यहाँ पड़े हैं। (2) अकाल बुंगा- यहाँ गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब ने गुरू तेग बहादुर साहिब के शीश के संस्कार के बाद पहला व्याख्यान दिया था। (3) सीसगंज- यहाँ गुरू तेग बहादुर साहिब के सीस का संस्कार किया गया था। (4) गुरू दे महल- यह गुरू तेग बहादुर साहिब तथा गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब का घर था। दसवें पातिशाह के छोटे तीनों साहिबजादे यहाँ पैदा हुए थे। (5) मंजी साहिब पहला- यहाँ गुरू तेग बहादुर साहिब दीवान लगाया करते थे। (6) मंजी साहिब दूजा- यहाँ गुरू गोबिन्द सिंघ दीवान लगाया करते थे। गुरू साहिब के साहिबजादे यहाँ तलवार चलाना तथा गतका सीख करते थे। इसको गुरद्वारा दमालगढ़ भी कहते हैं। फर्रा की परंपरा यहां से ही शुरू हुई थी। (7) दमदमा साहिब- यहाँ पर गुरू साहिब संगतों को दर्शन दिया करते थे। यहाँ पर ही 1678 में भाई मनी सिंघ ने गुरू ग्रंथ साहिब वर्तमान का स्वरूप तैयार किया था। इसलिए इसको ‘दमदमा वाली बीड़’ कहा जाता था। (8) थड़ा साहिब- यहाँ 25 मई 1675 के दिन भाई किरपा राम तथा उसके साथी गुरू तेग बहादुर साहिब के पास फरयाद लेकर आये थे। (9) भोरा साहिब- गुरू तेग बहादुर साहिब यहाँ पाठ किया करते थे। (10) किला अनंदगढ़ साहिब- 1689 में यहाँ किला था। यहाँ एक बाउली भी है जिसकी 135 सीढ़ियां हैं। यह बावली सरदार जस्सा सिंघ आहलूवालिया ने बनवाई थी। (11) किला फताहिगढ़ साहिब- यहाँ पर किला फतहिगढ़ था। (12) होलगढ़ साहिब- (यहाँ किला होलगढ़ था। यह केसगढ़ साहिब से लगभग 2 किलोमिटर अगंमगड़ गांव दूर है। ‘होला महल्ला’ मनाना गुरू साहिब ने यहां पर हीे शुरू किया था। (13) लोहगढ़ साहिब- (यहाँ किला लोहगढ़ था। यह केसगढ साहिब से डेढ़ किलिोमीटर दूर है। भाई बचित्र सिंघ ने बरछा मार कर शराबी हाथी यहीं से भगाया था। यहां पर ही भाई उदय सिंघ ने राजा केसरी चंद को मारा था। (14) माता जीत कौर जी का गुरूद्वारा- केसरगढ़ साहिब से लगभग 2 अगंमगड़ गांव में किलोमीटर दूर है। माता जीतो जी का संस्कार यहीं हुआ था। अनंदपुर साहिब किरतरपुर से 9 किलोमिटर दूर है। पाउंटा साहिब पाउंटा साहिब यमुना नदी के किनारे एक बड़ा गाँव है। इसकी नींव भाई राम कंवर (बाद में भाई गुरबख़्श सिंघ) जो, बाबा बुड्ढा जी की पाँचवीं पीढ़ी थी, ने 28 अपै्रल 1685 के दिन रखी थी। यहाँ गुरू साहिब ने एक किला बनाया था। यहाँ गुरू साहिब के दरबार में 52 कवि ओर अन्य कई कलाकार थे। नाहन का राजा मेदनी प्रकाश (जिसके कहने पर गुरू साहिब ने यहाँ रहना स्वीकार किया था) कई बार उनके दर्शन करने आया था। गुरू हरि राय साहिब का पुत्र राम राय, जिसको गुरू साहिब ने 1660 में पुथ से निकाल दिया था, भी 11 मई 1685 के दिन यहाँ आया और अपनी भूल पर क्षमा मांगी। 3 साल तक पाउंआ साहिब सिक्खों का केन्द्र बना रहा तथा हजारें सिक्ख दर्शन करने आते थे। 18 सितम्बर 1688 के दिन गड़वाल का राजा फतहि शाह ने गुरू साहिब पर अकारण आक्रमण कर दिया। गुरू साहिब ने पाँवटा से 11 किलोमिटर दूर भंगानी गांव में उसका सामना किया। हारने के बाद फतहि शाह फिर कभी वापिस नहीं लौटा। 27 अक्तूबर 1688 के दिन गुरू साहिब पाउंटा साहिब से अनंदपुर साहिब की तरफ चल पडे़। नंदेड़ (हजुर साहिब) नंदेड़ गोदावरी नदी के किनारे (महाराष्ट्र में) एक नगर है। यह औरंगाबाद से 235 किलोमीटर और हैदराबाद से 278 किलिोमीटर है। गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब यहाँ जुलाई 1708 में आये थे। आपको यहाँ बंदा सिंघ बहादूर (उस समय माधो दास बैरागी) मिला। आपने तीन सितम्बर को उसको अमृत छका कर सिक्ख पंथ में शामिल किया। 5 अक्टूबर को आपने बंदा सिंघ को पंथ का जत्थेदार बनाकर पंजाब भेजा। 6 अक्टुबर को आपके जमशेद बेद ने छुरों से वार करके बुरी तरह घायल कर दिया। उसी दिन गुरू साहिब ने गुरू ग्रंथ साहिब को गुरगद्दी दी और दूसरे दिन आपका देहांत हो गया। आपका संस्कार नदी के किनारे करके अस्थियाँ जल प्रवाहित कर दी गईं। नंदेड़ में अनेक गुरूद्वारे हैं: (1) हजुर साहिब, सचखंड साहिब- इसके केन्द्र स्थल को अंगीठा साहिब भी कहते हैं। गुरू साहिब का संस्कार यहाँ किया गया था। (2) संगत घाट- यहाँ गुरू साहिब दीवान लगाया करते थे। (3) नगीना घाट, हीरा घाट- बहादुर शाह द्वारा भेंट किये गये हीरे को गुरू साहिब ने यहाँ नदी में फेंक दिया था। (4) शिकार घाट- यहां पर जंगल सा था और यहां गुरू साहिब शिकार किया करते थे। (5) गोबिन्द बाग- यह गुरू साहिब के समय एक बगीचा था। (6) माल टेकरी- यहां पर गुरू साहिब ने ख़जाना बांटा था। (7) बंदा घाट- यह बाबा बंदा सिंघ बहादुर का डेरा था। (8) माता साहिब कौर- यहां माता साहिब कौर रहती रही थी। (9) लंगर साहिब (10) और (11) दो गुरूद्वारे भाई दया सिंघ और भई धरम सिंघ की याद में और माई भाग कौर की याद में बने हैं। हजूर साक के मुख्य गुरद्वारे का इंतजाम अभी तक पंथ के हाथ में नहीं है। पटना साहिब पटना साहिब बिहार की राजधानी है। इसके पास का कस्बा हाजीपुर पहले गुप्त सामराज्य की राजधानी थी। वह नगर 2500 वर्ष पुराना था। गुरू गोबिन्द सींघ साहिब का जन्म यहाँ 18 दिसम्बर 1661 के दिन हुआ था। गुरू साहिब ने अपनी आयु के पहले 9 से अधिक साल यहाँ बिताये थे। गुरू नानक साहिब भी यहाँ आये थे तथा गुरू तेग बहादुर साहिब भी काफी समय यहाँ रहें थे। इस शहर में चार मुख्य गरूद्वारे हैंः(1) हरिमंदर साहिब-गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब का जन्म 18 दिसंबर 1661 को यहीं हुआ था। वर्तमान ईमारत 19वीं सदी के पहले मध्य की है। यहाँ गरू साहिब के बचपन की कुछ ऐतिहासिक यादें रखी हुई हैं। (2) गुरू का बाग- गुरू तेग बहादुर साहिब की याद में बना हुअ है। यह बाग गुरू साहिब को उनके एक श्रद्धालु काजी ने उपहार रूप में दिया था। (3) गोबिन्द घाट- गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब यहाँ खेला करते थे। (4) बड़ी संगत- यहाँ भाई जीत मल्ल रहता था वह एक साहूकार था। गुरू तेग बहादंर साहिब जब पहली बार पटना साहिब आयें तो यहीं ठहरे थे। यहां पर संगत के बड़े इक्ट्ठे हुआ करते थे। इस कारण इसको गुरूद्वारा बड़ी संगत कहा जाता है। गुरू नानक साहिब भी पटना के तास हालीपुर से गुजरे थे। वहाँ पर गुरू नानक साहिब की याद में गुरूद्वारा बना हुआ हैं। चमकौर साहिब चमकौर साहिब रोपड़ जिले में है। 5 से 6 दिसम्बर के बीच की रात को जब गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब ने आनंदपुर छोड़ा तो वह स्वयं, दो बड़े साहिबजादे तथा 45 सिक्ख कीरतपुर ओर कोट निहंग खां से होते हुए 7 दिसम्बर की सुबह यहाँ पहुँचे थे। वह बुद्धी चंद रावत के गढ़ (छोटा किले में ठहरे थे। किसी दुश्मन ने इसकी सूचना रोपड़ की पुलिस थाने में दे दी। शाम तक मुगलों की एक बड़ी सेना ने गढ़ को घेर लिया। गुरू साहिब, दो साहिबजादों, पाँच प्यारों और चालीस सिक्खों ने सिक्ख इतिहास कि एक बड़ी महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ी। शाम से सुबह तक हाथो - हाथ लड़ाई में दोनों साहिबजादे, पाँच प्यारो में से 3 और 40 में से 38 सिंघ शहीद हो गए। रात के समय भाई नबी खां और भाई गनी खां की मदद से गुरू साहीब गढ़ से निकल कर माछीवाड़ी पहुँचने में सफल हो गए। उनके अतिरिक्त पाँच और सिंघ भी बचकर माछीवाड़ा आ पहुँचे। पीछे रहे दो सिक्ख अगले दिन की सुबह को शहीद हो गए। चमकौर साहिब में पहले तो कुछ भी नहीं था केवल थोड़े से घर थे। अब यह एक अच्छा कस्बा बन गया है तथा यहाँ कई गुरूद्वारे हैं:(1) कत्लगढ़- यह चमकौर साहिब का मुख्य गुरूद्वारा है । इसको शहीद गंज भी कहते हैं। यहाँ सिक्खों और मुगलों के बीच हाथो-हाथ लड़़ाई हुई थी। यहाँ साहिबजादे अजीत सिंघ और जुझार सिंघ, भाई मोहकम सिंघ, हिम्मत सिंघ, धर्म सिंघ और 37 और सिंघ शहीद हुए थे। (2) गढ़ी साहिब- यहाँ सिक्खों ने मोर्चे सम्भाले थे। इसको तिलक स्थान भी कहते हैं। एक प्रथा के अनुसार गुरू साहिब ने यहाँ पंथ खालसा को गुरूता प्रदान की थी। (3) दमदमा साहिब- गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब एक बार (1702-03 में) कुरूक्षेत्र जाते हुए यहाँ ठहरे थे। (4) रणजीतगढ़- गुरू साहिब कुरूक्षेत्र से आते यहाँ रूके थे। (5) शहीद गंज- भाई जीवन सिंघ की शहीदी की याद में बना है। भाई जीवन सिंघ गाँव झक्खीयां में शहीद हुए थे पर उन का स्मारक यहां पर बना हुआ हैं चमकौर साहिब रोपड़ से 16 किलोमीट और मुरिंडा से 14 किलोमीटर है। फतहिगढ़ साहिब फतहिगढ़ साहिब सिक्खं इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब के छोटे साहिबजादे जोरावर सिंघ और फतहि सिंघ और माता गुजरी यहाँ शहीद हुए थे। साहिबजादों को पहले दीवारों में चुनवा दिया गया था किन्तु दीवार गिर जाने पर दोनों बच गए थे तथा दूसरे दिन उनको कत्ल कर दिया गया था। दिसम्बर 1705 को माता गुजरी भी कष्ट सहन करते शहीद को गई थी। फतहिगढ़ साहिब के स्थान के पास ही सरहिंद का किला था। अब किले के कुछ निशान ही दिखाई पड़ते हैं। 1711 में बाबा बंदा सिंघ ने आक्रमण करके इस किले को तोड़ डाला था। साहिबजादों की शहीदी की सबसे पहली यादगार यहाँ बाबा बंदा सिंघ बहादुर ने बनाई थी और इसका नाम फतहिगढ़ साहिब रखा था। वर्ममान ईमारत 1765 में बनी थी तथा 1813, 1944, 1955, में मरम्मत की गई थी तथा कुछ हिस्से का नव निर्माण भी हुआ था। यहाँ का मुख्य स्थान भेरा साहिब है। यह वह स्थान है जहाँ साहिबजादे दीवार में चिने गये थे। इसके अतिरिक्त यहाँ और भी अनेक गुरूद्वारे हैं:(1) बूर्ज माता गुजरी- यहाँ किले का बुर्जथा तथा माता जी औैर बच्चों को यहाँ बुदी बना कर रखा गया था। माता जी यहीं पर शहीद हुई थी। (2) विमानगढ़- दोनो साहिबजादों और माता जी की देह संस्कार से पहले यहीं रखी गई थी। (3) जोती स्वरूप- यह गुरूद्वारा मुख्य स्थान से लगभग डेढ़ किलोमीटर है। यहाँ उनका सस्कार किया गया था। (4) शहीद गंज पहला- बाबा बंदा सिंघ ने मई 1710 में सरहिंद पर आक्रमण किया तो कई सिक्ख शहीद हुए थे, उनका संस्कार किया गया था। (5) शहीद गंज दूसरा-मुगल बादशाह के आदेश से सिक्खों को मारकर उनके सर काट कर ईनाम प्राप्त करने के लिये उन्हें बैल गाड़ियों में भर कर दिल्ली ले जाया जा रहा था। सिक्खों को यह सूचना मिली तो उनहोंने सरहिंद के पास हमलाकर के शहीद सिक्खो के सर छीन कर उन का संस्कार किया था। (6) शहीद गंज जत्थेदार सुक्खा सिंघ - जनवरी 1764 कि लड़ाई में शहीद होने वाले सिक्खों के संस्कार यहाँ किये गये थे। (7) शहीद गंज मल्ला सिंघ- फतहिगढ़ से आधा किलोमीटर दूर हैं। यहाँ भी जनवरी 1764 के शहीद सिक्खों का संस्कार किया गया था। (8) थड़ा पातिशाही छठी- गुरू हरिगोबिन्द साहिब एक बार यहाँ से गुजरे थे। पटियाला के राजा करम सिंघ ने सरहिंद का नाम फतहिगढ़ रख दिया था किन्तु पुराना नाम ही चलता रहा। बाद में फतहिगढ़ साहिब जिला बन गया। फतहिगढ़ साहिब नये सरहिंद नगर से पाँच किलोमीटर दूर है। मुक्तसर मुक्तसर का पहला नाम ‘खिदराणे की ढाब’ था। यहाँ 29 दिसम्बर 1705 के दिन एक बड़ी मुगल सेना का सामना करते हुए 40 सिक्खों ने शहीदी प्राप्त की थी। चमकौर के 40 मुक्तों की तरह गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब ने इनको भी मुक्ते कहा था। इस लड़ाई के समाप्त होने पर 37 सिक्ख शहीद हो चुके थे और भाई राय सिंघ, भाई महां सिंघ, भाई शीतल सिंघ और माई भागो (भाग कौर) बुरी तरह घायल थे। उस समय गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब भी वहाँ पँहुचे। भाई राय सिंघ ने गुरू साहिब को बेदावे का कागज फाड़ने के लिए प्रार्थना की। कुछ ही समय बाद भाई शीतल सिंघ का भी देहांत हो गया। फिर भाई राय सिंघ के पुत्र भाई महां सिंघ भी शहीद हो गए। केवल माई भाग कौर बची। (एक श्रोत में बेदावा फड़वाने की कारवाई भाई महां सिंघ के कहने पर हुई लिखा गया है। हो सकता है कि क्योंकि भाई महां सिंघ सबके बाद शहीद हुए इसलिए उनका नाम लिख दिया गया हो) इन 40 शहीदों के नाम पर इस स्थान को मुक्तसर कहा जाता है। मुक्तसर का मुख्य गुरूद्वारा दरबार साहिब है जोे कि शहर के अंदर है। इसके अतिरिक्त अन्य गुरूद्वारे हैंः टिब्बी साहिब- यहाँ लड़ाई लड़ी गई थी। शहीद गंज-यहाँ गुरू साहिब ने अपने हाथों से सिक्खों का संस्कार किया था। तम्बु साहिब- यहाँ सिक्खों ने कुछ देर आराम करने के लिए तम्बू गाड़े थे। मुक्तसर फरीदकोट से 45 किलोमीटर और जलालाबाद से 28 किलोमीटर दूर है। तलवंडी साबो तलवंडी साबो भी सिक्ख पंथ का एक महत्वपूर्ण केन्द्र है। यहाँ गुरू हरि राय साहिब 11 दिन, गुरू तेग बहादुर साहिब एक महीने से अधिक और गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब 9 महिने से अधिक रहे। एक प्रथा के अनुसार गुरू नानक साहिब भी यहाँ आये थे। तलवंडी साबो में सबसे पुरानी सिक्ख यादगार गुरूसर सरोवर है। यह सरोवर सिंघ साहिब अनंदपुर, चमकौर, माछाीवाड़ा, दीना, कांगड़, से होते हुए 16 जनवरी 1706 को यहाँ पहुँचे थे तथा 30 अक्टूबर को यहाँ से चले थे। तलवंडी साबो का मुख्य गुरूद्वारा दमदमा साहिब है (इस कारण तलवंडी साबों का दूसरा नाम दमदमा साहिब भी प्रसिद्ध है)। गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब यहां पर दरबार सजाया करते थे। आप अकाल तख़्त साहिब की कार्यवाई भी यहां से चलाया करते थे। इसीलिए इसे तक्ष्त भी कहते हैं। यहाँ बाबा दीप सिंघ ने भाई मनी वाली बीड़ (जो उन्होंने दमदमा साहिब, अनंदपुर साहिब में तैयार कि थी) की चार नक्ल यहाँ पर तैयार करवाई थी। दमदमा साहिब में गुरू गं्रथ साहिब का एक पुराना स्वरूप पड़ा हुआ है। जिसके संबंध में कहा जाता है कि यह बाबा दीप सिंघ जी द्वारा की गई नक्ल है। तलवंडी साबों में और भी कई गुरूद्वारे हैं: (1) नानकसर- गुरू नानक साहिब की याद में बना गुरूद्वारा: पहले यहाँ केवल सरोवर ही था । (2) मंजी साहिब गुरू तेग बहादुर साहिब- यहाँ गुरू तेग बहादुर साहिब दीवान सजाया करते थे। (3) मंजी साहिब पातिशाही नौवीं और दसवीं- यह नौवीं और दसवीं पातिशाही की याद में बना हुआ है। (4) गुरूद्वारा निवास स्थान दमदमा साहिब पातिशाही दसवीं- गुरू गोबिन्द सिंघ यहाँ 9 महिने रहे थे। (5) गुरूद्वारा माता सुन्दर कौर और साहिब कौर- गुरू गोबिन्द साहिब की दोनो सुपत्नियाँ यहाँ ठहरी थीं। यह भाई डल्ला सिंघ का घर था। (6) जंडसर- यहाँ गुरू साहिब ने अपने सिपाहियों को वेतन दिया थां जिस जंड के साथ गुरू साहिब ने अपना घोड़ा बाँधा था। वह अभी तक मौजूद है। (7) टिब्बी साहिब- यहाँ गुरू साहिब सिक्खों को तलवार चलाना और गतकाबाजी सिखाया करते थे। (8) लिखणसर- यहाँ गुरू साहिब कलमें तैयार किया करते थे तथा कहा करते थे कि कभी सिक्ख यहा अपनी शैक्षिक केन्द्र कायम करेगे। (9) बुर्ज बाबा दीप सिंघ- यहाँ बाबा दीप सिंघ कइ्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र वर्ष रहे थे। तलवंडी साबों बठिंडा से 28 किलोमीटर और रामा स्टेशन से केवल 8 किलोमीटर है। तलवंडी साबो मे भाई उल्ला सिंघ का परिवार एक हुक्मनामा भी है जो गुरू साहिब का नहीं लगता। दिल्ली इतिहास बताता है कि दिल्ली कई शताब्दियों तक भारत की राजधानी रही है किन्तु आज की दिल्ली लगभग 1000 साल पुरानी है। भले ही 1857 तक यहाँ मुगल बादशाहों का शासन रहा था किन्तु 1803 से अंगे्रजों ने इस पर अधिकार जमा लिया था। लेकिन अंगे्रजों ने कलकत्ता को ही राजधानी बनाये रखा था। 12 दिसम्बर 1911 के दिन जार्ज पंचम ने दिल्ली को राजधानी बनाने का ऐलान किया। उसने 15 दिसम्बर 1911 के दिन ‘नई दिल्ली’ का नींव पत्थर भी रखा। दिल्ली में गुरू नानक साहिब भी अपनी यात्रा के समय गए थे। इस कारण सिक्ख उस समय से ही दिल्ली में रहते है। फिर छठी पातिशाह के समय भी सिक्खो का वहाँ होने का पता चलता है क्योंकि 1660 मंे जब गुरू हरि राय साहिब ने राम राय को दिल्ली भेजा था तो सिक्ख भाई कलियाण कि धर्मशाला में ठहरे थे। आठवें, नौवें और दसवें पाशिाह भी दिल्ली गए थे। 1947 के बाद दिल्ली में सिक्खों की जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ी थी। 1921 मे दिल्ली में 2669 सिक्ख थे, 1971 में यह जनसंख्या 2 लाख 91 हजार, 123 थी, 1981 में 3 लाख 93 हजार 921 और 1991 में 4 लाख 55 हजार 657 हो गई थी। आज यह जनसंख्या 7-8 लाख से अधिक हैं। गुरू हरिकृष्ण साहिब का 30 मार्च 1664 के दिन दिल्ली में देहांत हुआ थां। गुरू तेग बहादुर साहिब, भाई दयाल दास, भाई मती दास और सती दास यहीं पर 11 नवम्बर 1675 के दिन शहीद हुए थे। फिर 11 मार्च 1783 के दिन बाबा बघेल सिंघ, स.जस्सा सिंघ आहलूवालीया, स.जस्सा सिंघ रामगढ़ीया, जय सिंघ भंगी और स.गुरदित सिंघ लाडवा ने लाल किले पर खालसाही नीला झंडा लहराया था तथा दिल्ली की चंुगी से 37.5 प्रतिशत हिस्सा लेने का समझौता किया गया था। 14 जनवरी 1914 के दिन अंग्रेज सरकार ने वायसराय की कोठी की सड़क सीधी रखने के लिए रकाब गंज की दीवार तोड़ डाली। इस के खिलाफ प्रचार से सरकार हिल गई और इस दीवार को फिर से बना दिया। 1930 में गुरूद्वारा सीस गंज पुलिस फाइरिंग का निशाना बाना था। 12 जून 1960 के जलूस में गुरूद्वारों को घेरा डाल कर सिक्ख जलूस रोकने का प्रयत्न किया गया था। सिक्खों पर लाठी चार्ज किया गया। कई सिक्ख घायल और कुछ शहीद हो गए। 1978 में जनता सरकार ने भी दिल्ली गुरूद्वारों के रास्ते सील कर दिये थे। 1984 में इंदिरा को कत्ल के बाद कांग्रेस के नेताओं ने 1 से 6 नवम्बर तक हजारों सिक्खों को जालिम और घिणौने तरीके से कष्ट दे-दे कर मार डाला। 6 जनवरी 1989 को भाई सतवंत सिंघ और भाई केहर सिंघ को इन्दरा कत्ल केस में दिल्ली जेल में फांसी दी गई थी। 1994 में कांग्रेस का साथ देने वाली डी.डी.ए ने गुरूद्वारा मजनू टिल्ला की मरम्मत का एक हिस्सा तोड़ डाला। दिल्ली में बहुत सारे गुरूद्वारे हैं, जिनमें से निम्नलिखित ऐतिहासिक हैं: (1) मजनू टिल्ला- (तीमारपुर कालोनी के पास, यमुना नदी के किनारे, गुरू नानक साहिब की याद में बना गुरूद्वारा। गुरू हरिगोबिन्द साहिब भी यहाँ आऐ थे/उनको यहीं से बंदी बना कर ग्वालियर के किले में कैद किया गया था।) (2) नानक पिआओ (जी. टी. रोड़ पर पुरानी सब्जी मंडी के पास गुरू नानक साबिह की याद में बना गुरूद्वारा हैं)। (3) बंगला साहिब- यह राजा जै सिंह मिर्जा का बंगला था। गुरू हरिकृष्ण साहिब और गुरू तेग बहादंर साहिब यहा ठहरे थे। गुरू हरिकृष्ण साहिब का देहांत यहीं पर हुआ था। (4) बाला साहिब (रिंग रोड पर महारानी बाग कालोनी के पास बना गुरूद्वारा) गुरू हरिकृष्ण साहिब, माता सुन्दर कौर और माता साहिब कौर का संस्कार यहीं पर किया गया था। पहले यमुना नदी इस स्थान से गुजरती थी। (5) सीस गंज (चांदनी चैक में)- इस स्थान पर गुरू तेग बहादूर साहिब, भाई दयाल दास, भाई मती दास और भाई सती दास शहीद किये गये थे। (6) रकाब गंज- यह भाई लक्खी राय यादव वणजारा का घर था। गुरू तेग बहादूर के धड़ के संस्कार के लिए उसने अपने घर को आग लगा दी थी। (7) मोती बाग (रिंग रोड पर धौला कुआं और शांति पंथ के बीच गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब की याद मेें बना गुरूद्वारा) (8) दमदमा साहिब (यमुना नदी के किनारे, हुमायूं के मकबरे के पास गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब की याद में बना गुरूद्वारा) (9) गुरद्वारा माता सुन्दर कौर (यह तुरकमान गेट के पास, गालिब अकादमी के साथ है। इस स्थान पर माता सुन्दर कौर कई वर्ष रहे थे)। इन ऐतिहासिक गुरूद्वारों के अतिरिक्त दिल्ली मे और भी अनेक बड़े बडे़ गुरूद्वारे है। कुतब मीनार के पास, ख्वाजा बख़्तीयार काकी की दरगाह के पास (महरौली में) बाबा बंदा सिंघ की याद में गुरूद्वरा बना हुआ है। 9 जून 1916 के दिन बाबा बंदा सिंघ को यहा शहीद किया गया था। उससे पहले 700 अन्य सिंघ भी यहा शहीद किये गये थे। यहां एक 50 फूट लम्बा पत्थर का स्तम्भ है जिसके साथ एक स्टील की हूक लगी है जिसके संबंध में कहा जाता है कि बाबा बंदा सिंघ बहादूर की पूरी खाल उतारने के लिए उसको इस हुक के साथ लटकाया गया था। दिल्ली में भी हजारो सिक्खों ने शहीदी पाई है। Tags : District Guru Nanak Sahib foundation