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स्वास्तिक बौद्ध संस्कृति का प्रतीक

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Saturday, August 24, 2019, 08:21 AM
Swastik

स्वास्तिक बौद्ध संस्कृति का प्रतीक
    विश्व को विभिन्न संस्कृतियों में विभिन्न समस्याओं के रूप में स्वास्तिक चिन्ह मंगल कामना का प्रतीक माना गया है। स्वास्तिक कितना प्राचीन है विश्व में इसका जन्म कहा और कैसे हुआ तथा प्रसार एवं विकास कैसे हुआ ? यह एक शोध का विषय है। अमेरिका के प्रसिद्ध विद्धान थामस विल्सन का मत है कि स्वास्तिक का जन्म यदि भारत में हुआ है। तो यह निश्चय है कि अमेरिका और यूरोप में इसका प्रचार बौद्ध धम्म के उदय से पहले 1600 ई. पूर्व में हुआ होगा। ड़ाॅ. श्री वाकणकर एवं अमेरिका के प्रसिद्ध पुरातत्वविद ड़ाॅ. बु्रक ने लिखा है कि आज से पच्चीस हजार वर्ष पूर्व होमो सेपियन मानव के शैलाश्रयों में चित्र बनाना प्रारम्भ कर दिया था। आदि मानव ने विनाशकारी भयंकर पशुओं एवं विभिन्न आक्रतियों पूजा उपसना प्रारंभ कर दी थी। ड़ाॅ. वाकणकर को भीम बैठिका (भोपाल के पास बुधनी पहाड़ी) में ऐसे बहोत से चित्र मिले है जिनमें स्वास्तिक भी है। यह अनुमान सत्याश्रित ही है कि मनुष्य का जब जन्म हुआ, तो प्रकृति के चमत्कार क्रिया कलापों, भयंकर अग्निकांडों में भयभीत होकर इस अदृश्य शक्ति के सामने उसे नतमस्तक होना पड़ा हो। पूर्व वर्षों के वानरवास मानवों में से होमों सेपियन शैलाश्रयों में निवास करने लगा और कालातंर में अपने चारों ओर से देखता उसे चिन्हित करने लगा।
    प्रागैतिहासिक मानव के रूप मंे गुफा भिŸिायों पर चित्रकला के जो बीज उकेरे थे उनमें सीधी रेखाएं और आड़ी रेखाएं, त्रिकोणीय आकृतियां थी। यही आकृतियां उस युग की लिपी थी। हर रेखा का कोण अलग-अलग था जो हर दिशा पर अपनी अलग-अलग धारणदा व्यक्त करती है। स्वास्तिक का चिन्ह भी ऐसा ही था। लेकिन सबाहु स्वास्तिक का विकास हुआ है जो धन चिन्ह और गुणन चिन्ह दोनों रूपों में है व प्रगैतिहासिक कालीन गुफा चित्रों में मिले है। भोपाल से पुरातत्वविद श्याम सुंदर सक्सेना को लालघाटी गुफा मंदिर भोपाल की गुफा नंबर एलर.ए.जी. 9 में लगभग एक मीटर लंबा-चैडा लाल गेहु रंग से चित्रित अबाहु स्वास्तिक चिन्ह प्राप्त हुआ है। इन दोनों चिन्हों को अंग्रेजी में क्रस की संज्ञा दी गई है। मगर इसके लिए भारतीय समझ से स्वास्तिक नाम दिया गया है।
    कल्पवृक्ष की तरह अकल्पनात्मक एवं अलंकृत स्वास्तिक मिला है जिसके संबंध में ड़ाॅ. वाकणकरकृत पेन्टेडराक शेल्ट आॅफ इंडिया पृष्ठ 240 पर लिखा है कि स्वास्ति का यह अलंकृत रूपमाला ताम्राशय युगीन में हो सकता है। पंचमढ़ी क्षेत्र की बनिया बेरी नामक गुफाओं की भीतरी एवं बाहरी भाग में पूजा के दृश्य चित्रित है। स्वास्तिक पूजा के दृष्टिकोण से यह गुफा सर्वाधिक महत्व की है। बाहरी दृश्य में पूजा का प्राचिनतम रूप प्रस्तुत हुआ है। यह उपासक स्वास्तिक के दोनों तरफ सह-नतर्क की मुद्रा में प्रदश्रित है। भीतरी भाग में उपासक अत्यंत विनम्र भाव से छत्र चढ़ाते है।
    ड़ाॅ. जगदीश गुप्त ने अपने शोध ग्रंथ प्रागैतिहासिक भारतीय चित्र कला में लिखा है कि वृक्ष पूजा की तरह स्वास्तिक की पूजा की परंपरा प्रौगैतिहासिक शिक्षा चित्रों, लालघाटी की शिलों, बौद्ध, जैन एंव हिन्दूओं के प्रतिकों और लोकसभा के अभिप्रायों, सभी को एक बिन्दु पर लाकर मिलाती है। भारतीय शिलाचित्रों में प्राथमिक व्यवस्था केवल सिंघनपुर केवल अबाहु स्वास्तिक चिन्ह चित्रित मिलता है। इस काल कि चित्रों में सिंघनपुर एवं बनिया बेरी की पूजा दृश्यों में प्रमुखता से धारणा यह भी है कि स्वास्तिक केवल ओम का प्रतीक है। अपितु ओम् का मूल रूप भी है। ईश्वर प्राचीनतम रूप है।
    ताम्रश्म युगीन पात्रों पर चित्रित स्वास्तिक चिन्ह निम्न स्थानों पर प्राप्त हुए है:- विश्व विख्यात पदम श्री ड़ाॅ. वाकणकर ने कायथा, आजाद नगर, इंदौर, मंदसौर, उज्जैन, भीम बैठका, दंगवनाडा आदि स्थलों का उल्खनन किया है।
    श्री श्याम सुदंर सक्सेना की खोज में भोपाल में बेतवा की सहायता दी हलाली के तट पर पिपरिया, जुन्नारदेव आदि में उत्खनन किया है। इन स्थानों से जो मिट्टी के पात्र मिले है, उन पर सुदंर चित्रकारी भी मिली है, जिन पशु आकृतियां, सुदंर रेखांकन के साथ स्वास्तिक के चिन्ह भी चित्रित है। महेश्वर एवं नावडाटोकोडी से प्राप्त पात्रों पर स्वास्तिक के चिन्ह विभिन्न रूप से प्राप्त हुआ है। इसके अतिरिक्त टम्प, हस्तीनापुर, अहिछत्र, कोशाम्बी में ड़ाॅ. बी.बी.लाल को ऐसे पात्र मिले है। जिनमें स्वास्तिक के चिन्ह अंकित है। महेश्वर, नावाडाटोडी से प्राप्त हुए पात्रों पर स्वास्तिको का चिन्ह दक्षिण वृताकार एवं वामवृत्ताकार दोनों ही रूप में प्राप्त हुआ है। 
    उक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि इसके अर्थ को लेकर हो सकता है मान्य की आस्था में अलग-अलग मान्यता हो बौद्ध अनुयायी स्वास्तिक का वार्म वृताकार मानता है अर्थात हिन्दू ओम या ईश्वर में जिस स्वास्तिक को मानता है उसके विपरित बौद्ध स्वास्तिक को बुद्ध संस्कृति का प्रतीक रूप मानते है बौद्धों द्वारा ऐसा मानने के जो कारण है उसके भी निम्न कारण दर्शाते है एक कारण यह है कि बुद्ध महापरिनिवार्ण के पश्चात जो अवशेषों पर स्तुप निमार्ण किये जाते थे वह स्वास्तिक चिन्हों पर वृतानुसार गोलाकार में बनाये जाते थे। पुरातत्वविद श्याम सुंदर सक्सेना मौर्य कालिन पुरावेश में भोपाल के आस-पास सांकल गुदावल के स्तुप बाबत् लिखते है खेड़ा सतधारा के विशाल स्तुप जो जगत विख्यात है कि परंतु भोपाल के निकट सांकल बुद्धावल ने लेखक को (श्याम सुंदर सक्सेना) बहुत से स्तुप प्राप्त हुए है। इन स्तुपों का आकार एवं प्रकार नागार्जुन कोंडा से प्राप्त स्तुपों के समान है केवल अंतर इतना है कि नागार्जून कोंड़ा से प्राप्त स्तुप के बीच में से चार भागों में इंटो के द्वारा विभाजित करते उसमें मिट्टी भरकर गोलाकार का निर्माण किया जाता था। किंतु भोपाल से प्राप्त स्तुपों को इंटों से विभाजित नहीं किया अपितु चारों तरफ शिलाओं से गोलाकार बनाकर उसके बीच में मिट्टी के द्वारा बनाया गया होगा। काल चक्र की गती से जिसकी मिट्टी बह चुकी है।
    लेखक:- लं. श्री वाकणकर लिपिकार मुबंई 4 काल 1 रविवारीय लोकसŸाा 10-09-1972 को हिचती गणेश विद्या शिर्षक से प्रकाशित है। उसमें वे कहते है कि जेम्स प्रिसेंस लंदन आदि  के लेख छपवाये है ऐसे असंख्य आप्हत (पंचमार्क) सिक्के (नानी) उपलब्ध है। जिसमें स्वास्तिक के जोडी में त्रिशेल चन्द्रल बिन्दुयुक्त चिन्ह रहता है। परंतु यह चिन्ह सौंगड के (ई. पू. 6 सती) तामपत्र में मध्यभाग में शिर्ष स्थान पर कोरा हुआ दिखा है तात्पर्य यह है कि स्वस्तिक का चिन्ह बौद्धों ने माना और आकर को बैदिक हिन्दूओं ने माना परंतु वे विपरित दिशा वाला स्वस्तिक भी उपयोग करते है।
    स्पष्ट है कि नागार्जून कोडा के ही नहीं और भी स्तुपों के उदाहरण दिये जा सकते है। मध्यप्रदेश के (अब छŸाीसगड़) महासमुन्द जिले में महानदी के तट पर सिरपुर का बौद्ध विहार सवस्तिक चिन्ह पर बना स्वस्तिक नाम से प्रसिद्ध है। गोलाई के बिच में दो रेखाएं धन के रूप में खिंच दे तो स्वस्तिक का रूप देखा जा सकता है वह दक्षिण या वाम दोनों हो सकते है। बौद्ध में वैद्यानिक आधार को मानते हुए स्वस्तिक को अपनाया धरती जिस दिशा में घुमती है या इलेक्ट्रीक पंखे का ही घुमना देखीये उचाहे वह कही पर भी हो दिशा एक ही तरफ घुमते पायेगें। यह उनका दूसरा कारण है। क्योंकि बौद्ध ईश्वर आदि अलौकिक धर्म को मानते नहीं है। सांची के स्तूप का ही उदाहरण लें। सांची के स्तूप के चारों ओर चार तोरण द्वार बने है। एक द्वार से चलकर उपासक तीसरे द्वार के पास पहूंचा हैं तब ऊपर चढ़ने की सिढियों से स्तूप की प्रदक्षिणा पुरी करता है। इस प्रकार यह स्वास्तिक चिन्ह के आधार पर ही बना है।
    बुद्ध के सिंद्धांत से स्वास्तिक चिन्ह का संबंध जोडा गया है। बुद्ध के सिंद्धांत को देखें। दुःख, दुख समुदाय, दुःख निरोध और दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा। इन चार आर्य सत्यों में ही प्रतीत्यसमुत्पाद है। प्रतीत्यसमुत्पाद बुद्ध के दर्शन दका प्रतीत्यसमुत्पाद कहते है। इस कार्य कारण को बुद्ध विच्छित प्रवाह मानते है।
    महापंडित राहुल सांकृत्यायवन के अनुसार बौद्ध अनात्मवाद को मानते है। अनात्मवाद ही शुन्यवाद है- य प्रतीत्यसमुत्पाद शुन्यता सैवते मता। अर्थ:- जो प्रतीत्यसमुत्पाद वही शुन्यता है। प्रतीत्यसमुत्पाद का दार्शनिक चक्र विस्तारमय से नहीं दिया गया।
    बुद्ध ने सर्वप्रथम सारनाथ में उपदेश देते हुए धम्मचक्र शब्द का प्रयोग किया था, जिसे पवित्र धम्मग्रंथ (त्रिपिटक) में धम्मचक्र प्रर्वतन सुत्त कहा गया है। धम्मचक्र शब्द का अर्थ (चाईल्डस् के कथानुसार) शक्ति पर न्याय परायणता का राज्य या विधान का शासन अथवा सत्य का नियम जिसे बुद्ध स्थापित करने के लिए कृत संकल्प और सन्नद्ध थे। इसी समर्थन में एक पत्रिका का लेख देखें, बुद्ध ने सारनाथ में पहली बार योगियों को जीवन जगत के 24 सिंद्धांत को समझाया था। इसी घटना को धम्मचक्र परिवर्तन के नाम से जाना जाता है। इन्हीं 24 प्राक्रतिक नियम सिद्धांतों के प्रतीक धर्मचक्र को राष्ट्रीय ध्वज में शामिल किया गया है। क्योंकि ये प्रकृति के नियम सिद्धांत है और सुख व विश्व शांति के प्रतीक है।
    अशोक स्तंभ के चक्र का संबंध मुलतः बुद्ध से ही मानना चाहिए, जिन्होंने अपने राजनीतिक आदर्शवादी के प्रतीक रूप में सर्वप्रथम इसकी कल्पना की थी। अतएव अशोक का इससे संबंध गौण रूप में ही माना जाना चाहिए। अर्थात बुद्ध ने जिस आदर्श न्याय परायण साम्राज्य की कल्पना की थी उसे साकार बनाने के लिए ही अशोक ने उक्त विचारों का प्रयत्न किया था। उस आदर्श को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने जो उपाय अपनाए थे उनमें प्रमुख रूप से उपाय था पश्चिमी प्रशांत सागरीय राज्याके से चुन कर उसमे सभी दृष्टियों से साधन संपन्न चिकित्सक प्रतिनिधि मंडल भेजना, जिन पर प्राणी मात्र को कष्ट में सहायता पहूंचाने की जिम्मेदारी थी। इसका उल्लेख शिलालेख 2 और 13 में हुआ है। यह एक सक्रिय समाजवादी राज का प्राचीनतम उदाहरण है।
    अशोक चक्रवर्ती ने सिंहासन के ऊपर उठे हुए अशोक के ध्वज और प्रशस्तियों आज भी साक्षी है। उनके धम्म घोष का चक्र सारे आकास में वितान बनकर छा गया था। धर्म के चक्र को व्यापक करते हुए धर्मायुक्त और धर्म महामात्य सिरीया, मिश्र, यूनान, पेरू, खोतान, सुदूर देशों तक पहूंचे थे। प्रसिद्ध इतिहासकार एच.जी.वेल्स ने अशोक की गणना विश्व इतिहास के महानतम सम्राटों में की। क्योंकि विश्व विख्यात है कि विश्व शांति, सहनशिलता तथा बंधुत्व के विचारों से प्रेरित अशोक ने अपने वृहद साम्राज्य पर शासन किया। इतिहासकार रमेशचन्द्र दत्त के शब्दों में अशोक इसलिए महान नहीं हुए की उन्होंने अपना राज्य विस्तार बढ़ाया बल्कि उनको महान बताया उनकी व्यक्ति मात्र की स्वतंत्रता तथा सर्वव्यापी तेजस्विता, स्वदेशनीति, और विदेश नीति और सत्य के प्रति प्रेम तथा सत्य के प्रचार ने। इसी कारण से वे साइबेरीया से लंका तक के हित चिंतक माने गये। भारत के किसी भी सम्राट का यश न इस प्रकार फेला औरन दूसरे किसी राजा का प्रभाव इतिहास पर पडा अशोक बोद्ध सम्राट थे। उनके शिलालेख और शिलास्तभ स्पष्ट भाषा में बोलते है- मैं लगभग ढ़ाई वर्ष से उपासक बना हूं। ब्रहागिरी के प्रथम शिलालेख में भी वे स्वयं दको उपासक कहते थे। लिखते है - एक साल तक मैंने अच्छी तरह प्रगती नहीं की, एक वर्ष पूर्व जब मैं संघ से भेंट करने गया तो ज्ञात हुआ कि मैं भली प्रकार उन्नति कर रहा हूं। आंध्र प्रदेश के कर्नुल जिले में स्थित येरागुड़ी का 31 वां शिलालेख ंकलिंग ने विजय किया था। इदसके बाद उन्होंने धर्म का अध्ययन, धर्म का प्रेम और धर्म का अनुशासन तीव्र गति से हुआ। शिलालेाख के अनुसार कहते है अपने राज्य के कि नीचे (दक्षिण में) चाँडू, पांड्या तथा ताम्रपर्णी (श्रीलंका में) तक (धर्म विजय प्राप्त की है।) यहां राजा के राज्य में, यवनों, कंबोंजों में, नाभिकों में, भोजों में, पितिनिकी में, आन्ध्र में ओर पुलिंदों में सब जगह लोग देवताओं के प्रिय के धर्मशासन का अनुशरण करते है। जहां-जहां देवताओं के दूत नहीं पहंच सकते वंहा-वंहा लोग भी देवताओं के प्रिय के धर्मानुचरण, धर्म विधान और धर्मानुशासन सुनकर धर्म का आचरण करते है। और करते रहेगें। देवनाप्रिय चाहते है कि सब प्राणियों के साथ संयम समानता और मृदुता का व्यवहार किया जाए। उक्त इतिहाकारों के समर्थनीय अशोक के कार्यों के बौद्ध सिद्धांत लिए शिलालेख प्रमाण स्वरूप उद्धत कर दिया है। अब मुख्य प्रश्न को देखते है।
    संविधान सभा की कार्यवाही में 22 जुलाई 1947 को ड़ाॅ. भीमराव अंबेडकर ने राष्ट्रीय तिरंगे झडे़ का अनुमोदन किया। जब यह प्रश्न आया की झड़े में अशोक चक्र अथवा चरखा का चिन्ह हो तब उन्होंने अशोक चक्र के पक्ष मंे सारा जोर लगा दिया। चूंकि ड़ाॅ. अंबेडकर इस समय तक बौद्ध संस्कृति से प्रभावित हो चुके थे। उन्होंने गांधी चर्खा के स्थान पर अशोक चक्र को ही पंसद किया। इससे महात्मा गांधी को बडा दुख हुआ और अपन तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, यदि झंडे के मौलिक स्वरूप को खादी तथा चर्खा का कोई स्थान नहीं है तो मेरा कोई लेना देना नहीं। संविधान सभा ने गांधी को कृतज्ञ नहीं किया और उसने भारत के राष्ट्रीय झंडे के रूप में अशोक चक्र सहित तिरंगे झंडे को स्वीकार कर लिया। संविधान सभा में इस अवसर पर दिये प्रस्तुति भाषण को याद करना असंगत न होगा। 22 जुलाई 1947 के दिन संविधान सभा में ध्वज के रूप में प्रस्ताव रखते हुए पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था हमने अपने मन में अनेकों चक्रों का विचार किया, किंतु उन सबमें अशोक स्तंभ के ऊपर जो चक्र है, वहीं हमें जचां। वह चक्र भारत वर्ष की प्राचिन संस्कृति का प्रतीक है। यह उन अनेको तत्वों का प्रतिक है जिनका समर्थन भारत ने युग युगांत तक किया। अतएव हमने निश्चय किया की वही चक्र राष्ट्र के ध्वज के साथ हमारा संबंध हो गया अपितु अशोक का नाम भी इसके साथ जुड गया है, जो नाम न केवल भारतीय इतिहास में बल्कि विश्व के इतिहास में अत्यंत महिमाशाली है। यह उचित ही है कि संघर्ष और सहिष्णुता के समय हमारा ध्यान अशोक की सहिष्णुता और संप्रीति की नीति पर जाये। इस अवसर पर बोलते हुए ड़ाॅ. राधाकृष्णन ने भी कहा, जहां तक अशोक चक्र का संबंध हैं स्वेत पट्टी के बीच में स्थित अशोक सम्राट की धूरी अथवा धम्मचक्र है। उपरोक्त विवरण सेे यह स्पष्ट हो गया की अशोक स्तंभ का शिखर भाग, जिसमें की शेरों के कंधों पर चक्र होने का प्रमाण बताया गया और यह भी कहा गया की उस बडे चक्र में तीलियों की मूल संख्या 32 थी जबकि चैकोर पत्थर पर अंकित छोटे चक्र की 24 तीलियां है। सांची स्तूप को शिल्पकारी वाले क्रमों में चक्रों की जो नकल की गई है उसमें भी इस बात की पुष्टि होती है कि बडा चक्र अशोक स्तंभ के शिखर का अंग था। इस चक्र की 32 तीलियां है। बुद्ध जन्म से 32 लक्षणों से युक्त थे अतः चक्र बुद्ध का प्रतीक ही सिद्ध होता है। जो उनके आदर्श विचारधारा का संदेश चक्र या संचालन शक्ति व नीति का प्रतिक होगा। परंतु हमारे राष्ट्रीय चिन्ह में यह चक्र जो शेरों के कंधों पर बताया जाता है नहीं लिया गया। अर्थात अशोक स्तंभ के चैकोर पत्थर पर अंकित 24 तीलियों के छोटे चक्र सहित चार सिंह वाला ही अशोक स्तंभ का शीर्ष भाग हमारा राष्ट्रीय चिन्ह है जो अशोक द्वारा साकार बुद्ध का धम्मचक्र ही है।
- स. ख़ज़ान सिंह

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