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कबीर, रैदास और बुद्ध

Rajendra Prasad Singh

Tuesday, December 14, 2021, 01:40 PM
Itihas pokhar

कबीर, रैदास और बुद्ध

कहे कबीर सुनो भाई साधो.....

कबीर बार - बार साधु को संबोधित करते हैं, साधु श्रमण परंपरा का शब्द है, साहित्य और पुरातत्व दोनों बताता है कि साधु श्रमण परंपरा का शब्द है, जिसका अर्थ सील - संपन्न है।

साधु! साधु!! साधु!!!

कबीर भक्त नहीं, भगत थे। भगत श्रमण परंपरा का शब्द है, भगत वस्तुतः भागवत का संक्षिप्त रूप है, बुद्ध को भगवत कहा जाता है, नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स।

कबीर वस्तुतः निर्गुण परंपरा के नहीं बल्कि श्रमण परंपरा के भगत हैं, इसीलिए वे बार - बार साधु को संबोधित करते हैं।

× × ×

बुद्ध के भीतर जब ज्ञान की आँधी आती है, तब वे क्या कहते हैं, धम्मपद में पढ़िए।

"गहकारक ! दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि।

सब्बा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसंखितं।

विसंखारगतं चितं तण्हानं खयमज्झगा।"

कबीर के भीतर जब ज्ञान की आँधी आती है, तब वे क्या कहते हैं, कबीरपद में पढ़िए।

"संतौ भाई आई ग्यांन की आँधी रे।

भ्रम की टाटी सभै उड़ांनी माया रहै न बाँधी रे।

दुचिते की दोइ थूँनि गिरांनी मोह बलेंडा टूटा।"

बुद्ध ने अज्ञान को शरीर रूपी घर का " कूट " कहा है और कबीर ने उसे " बलेंडा " कहा है।

बुद्ध के ज्ञान की आँधी में घर की " फासुका " धराशायी होती है और कबीर के ज्ञान की आँधी में घर की थूनी धराशायी होती है।

बुद्ध ने कहा कि अज्ञान रूपी कूट के टूटने से तृष्णा का क्षय हो जाता है और कबीर ने कहा कि मोह रूपी बलेंडा के टूटने से तृष्णा की छाजन का क्षय हो जाता है।

बुद्ध ने जिसे " तण्हा " कहा, कबीर ने उसे " त्रिसना" कहा।

इसीलिए आचार्य रजनीश ने कहा है कि जो बुद्ध ने कहा, वहीं बात कबीर ने अपनी भाषा में कही।

( गहकारक = घर को बनाने वाला। फासुका = शहतीर। गहकूटं = बड़ेर। बलेंडा = बड़ेर। तण्हा = तृष्णा। विसंखित = नष्ट किया गया। खय = क्षय। थूँनि = दो मुँह का खंभा। दुचिते = द्विविधा। )

× × ×

तब बुद्ध श्रावस्ती में थे......बहुभित्तक नामक भिक्खु को देशना करते हैं।

यह देशना धम्मपद में संकलित है.....धम्मपद प्राचीन रचना है।

1892 में फ्रांसीसी पर्यटक दुत्रुइलदाराॅ को खोतान में खरोष्ठी लिपि में लिखा धम्मपद मिला था।

खरोष्ठी में लिखा यह धम्मपद दूसरी सदी का है तो निश्चय ही धम्म लिपि का धम्मपद और प्राचीन होगा।

बुद्ध ने देशना में क्या कहा?

" न नग्गचरिया न जटा न पंका,

नानासका थंडिलसायिका वा।

रजोजल्लं उक्कुटिकप्पधानं,

सोधेन्ति मच्चं अवितिण्णकंखं।।"

अर्थात मन को साधो.....शरीर को यातना देने से कोई लाभ नहीं।

नंगा रहने से, जटा बढ़ाने से, पंक लपेटने से, उपवास करने से, कठिन आसन में बैठने से कोई फायदा नहीं।

बुद्ध की इसी बात को कबीर ने अपनी भाषा में कही।

" नगन फिरत जौ पाईऐ जोगु।

बन का मिरगु मुकति सभु होगु।"

अर्थात अगर नंगा घूमने से मुक्ति होती तो जंगल का हर पशु, जो नंगा घूमते हैं, मुक्त हो जाते।

बुद्ध वाणी की अगली कड़ी को कबीर ने एक दूसरी कविता में कही है।

"का जटा भसम लेपन किए, कहा गुफा में बास?

मन जीते जग जीतिए, जो विषया रहे उदास ।"

यही बात तो बुद्ध ने भी कही।

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कबीर की झीनी झीनी बीनी चदरिया!

कबीर ने चादर को ज्यों की त्यों रख दी....." दास कबीर जतन करि ओढ़ी, ज्यों की त्यों धरि दीनी चदरिया।"

वहीं चादर सुर, नर और मुनि ने मैला कर दी....." सो चादर सुर नर मुनि ओढ़ी, ओढ़ी कै मैली कीनी चदरिया।"

आखिर कबीर की चादर मैली क्यों नहीं हुई?

दरअसल कबीर की चादर अष्टांग मार्ग के चरखे पर बना हुआ सूत से बुनी थी।

" आठ कँवल दल चरखा डोलै। "

ये आठ कँवल दल का चरखा क्या है? वहीं अष्टांग मार्ग का प्रतीक। बुद्धिजम में चक्र के भीतर आठ पँखुड़ियों वाला कमल....आठ कँवल दल चरखा।

कबीर की चादर की बुनावट और बनावट कैसी है?

" पाँच तत्त गुन तीनी चदरिया। "

कबीर की चादर बुद्धिज्म के भौतिक और मानसिक पाँच तत्वों से बनी है-- रूप, संज्ञा, वेदना, विज्ञान और संस्कार।

तीन गुणों से बनी है ---प्रज्ञा, शील और समाधि।

इसीलिए कबीर ने ज्यों की त्यों बगैर मैला किए चादर रख दी।

यह निर्वाण की अवस्था है....जीते - जिंदगी जन्म - मरण के चक्कर से कोसों दूर ....न राग न द्वेष......इसीलिए " ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया। "

यदि कबीर की चादर सत्व, रज और तम से बनी होती तो मैली होनी तय थी।

मिट्टी आदि से बनी होती तो मिट्टी में मिलनी तय थी।

फिर कबीर अपनी चादर ज्यों की त्यों नहीं रख पाते।

× × ×

कबीर के पुरखे कोरी थे, कबीर ने खुद ही कहा है - " कहै कबीरा कोरी"।

कबीर के परिवार को जुलाहा हुए बहुत दिन नहीं हुए थे, इसलिए कहीं वे अपने को जुलाहा तो कहीं कोरी कहा है।

कोरी कौन है?

क्षत्रिय से जैसे क्षत्री बना, वैसे कोलिय से कोली बना, फिर कोली से पूरबी क्षेत्र में कोरी बना, जैसे हल्दी - हरदी, कटहल - कटहर, साला - सार आदि, र-ल का परस्परांतरण....

कबीर के पुरखे कोलिय थे, वहीं कोलिय जिनके घर गौतम बुद्ध का विवाह हुआ था।

संदेश रासक के मुस्लिम कवि अब्दुल रहमान को याद कीजिए, रहमान ने तो सीधे - सीधे अपने को कोलिय लिख दिया है - " पवित्थरणु मणुयजम्मि कोलिय पयासिउ"....

अधिक सबूत की जरूरत नहीं है, जैसे अब्दुल रहमान के पुरखे कोलिय थे, वैसे कबीर के पुरखे भी कोलिय थे, वहीं कोलिय जिनके घर गौतम बुद्ध का विवाह हुआ था।

× × ×

बात 1640 की है, तब शाहजहाँ का शासन था।

रैदास और कबीर के ज्ञान की तब बड़ी शोहरत थी।

ज्ञान पिपासु दारा शिकोह रैदास और कबीर के ज्ञान से प्रभावित थे।

तब शाहजहाँ के समय में फकीर उल्ला बड़े चित्रकार थे।

दारा शिकोह ने फकीर उल्ला से आग्रह किया कि आप रैदास और कबीर की संयुक्त पेंटिंग बनाइए।

आखिरकार फकीर उल्ला ने 1640 में रैदास और कबीर की संयुक्त पेंटिंग बनाई।

वर्तमान में यह पेंटिंग नेशनल म्यूजियम, नई दिल्ली में मौजूद है। ( चित्र 6 )

पेंटिंग का खूबसूरत किनारा है, धूसर रंग का सर्वाधिक प्रयोग है।

पेंटिंग में कबीर की झोंपड़ी के बाहर रैदास पधारे हैं, दोनों के सिर पर पगड़ी है।

कबीर बुनाई का कार्य कर रहे हैं और रैदास चटाई पर बैठे हैं, बौद्धिक विमर्श जारी है।

कहने का मतलब यह है कि रैदास और कबीर की सत्रहवीं सदी में भी बड़ी शोहरत थी।

कबीर का परिवार तो मुस्लिम हो चुका था, लेकिन रैदास बगैर मुस्लिम हुए मुसलमानों के दिल में छा गए थे।

दारा शिकोह ने फकीर उल्ला से रैदास और कबीर की जो संयुक्त पेंटिंग बनवाई है, वह मुगल कालीन चित्रकला का मास्टरपीस है।

पूरी चित्रकारी में शांति का अखंड साम्राज्य है, सर्वत्र शांति मानो बुद्ध फिर से धरती पर उतर आए हों।

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गोस्वामी तुलसीदास ने संत रैदास का नाम कहीं नहीं और कभी नहीं लिया है, लेकिन वे संत रैदास के विचारों से वाकिफ थे।

संत रैदास ने लिखा:

रैदास बाभन मत पूजिए जो होवे गुन हीन।

पूजिए चरन चंडाल के जो हो गुन परवीन।।

तुलसीदास ने संत रैदास के इस विचार के प्रतिवाद में लिखा:

पूजहि बिप्र सकल गुन हीना।

सुद्र न पूजहु वेद प्रवीना ।।

तुलसीदास ने महान कवि रैदास को जानते हुए भी नोटिस में नहीं लिया कि वे हाईलाईट हो जाएंगे।

लेकिन लाख कोशिश के बाद भी रैदास का व्यक्तित्व दबाया नहीं जा सका।

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आदर्श राज्य के रूप में यूटोपिया की परिकल्पना थाॅमस मोर ने 1516 में की थी, खूब ताली बजी।

लेकिन आदर्श राज्य के रूप में बेगमपुरा और अमरदेसवा की परिकल्पना थाॅमस मोर से पहले रैदास और कबीर ने की थी, खामोशी रही।

दिमाग अभी गुलाम बना हुआ है।

रैदास का बेगमपुरा और कबीर का अमरदेसवा ये दोनों की परिकल्पना बुद्ध के सिद्धांतों पर की गई है।

1. थेर, थेरी तथा थेरवाद

साधु - मुनि बौद्ध ही थे, इसलिए गौतम बुद्ध को शाक्यमुनि कहा जाता है।

साधु और मुनि से बुद्धिज्म में अधिक लोकप्रिय थेर है, जेठ भिक्खु को थेर कहते हैं।

थेर पूज्य होते हैं, आदरणीय होते हैं। मराठी का जो " थोर " है, वह इसी का विकसित रूप है, मराठी में आदरणीय को थोर कहते हैं।

प्राचीन काल में थेर महिंद भारत से श्रीलंका गए, बौद्ध धम्म के लिए वहाँ संघर्ष किए और वहीं महाप्रयाण कर गए।

आधुनिक काल में अनागरिक धम्मपाल श्रीलंका से भारत आए, बौद्ध धम्म के लिए यहाँ संघर्ष किए और यहीं महाप्रयाण कर गए।

थेर महिंद एवं अनागरिक धम्मपाल दोनों को महाप्रयाण के वक्त अपने - अपने देश की मिट्टी नसीब नहीं हुई, नहीं घर की स्मृति आई।

सवा दो हजार साल पहले श्रीलंका में बोधिवृक्ष की शाखा रोपी गई थी और वहाँ धम्म - विचार फैला।

धम्म - विचार से प्रेरित होकर उसी श्रीलंका के अनागरिक धम्मपाल ने भारत आकर उसी बोधिवृक्ष सहित संबोधि - स्थल को बचाने का आंदोलन छेड़ा और सफल हुए।

ईसा पूर्व का रोपा हुआ धम्म- विचार 20 वीं सदी में काम आया।

रोपा हुआ विचार आज, कल या हजारों साल बाद भी फल दे सकता है।

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थेरी इसका स्त्रीरूप है। जेठ भिक्खुणी को थेरी कहते हैं।

अशोक पुत्री संघमित्ता थेरी ही थीं। यदि राजदूत का प्राचीन अर्थ स्वीकार हो तो भारत की पहली ज्ञात महिला राजदूत संघमित्ता ही हैं।

सम्राट अशोक की एक बेटी चारुवती थी। वह नेपाल के राजकुमार देवपाल खत्तिय से ब्याही गई थी।

पति - पत्नी दोनों बुद्धमार्गी थे। काठमांडू से सटे चाबहिल में चारुवती का स्तूप है।

इसे आम तौर पर " धन्दो चैत्य " कहा जाता है।

लेकिन यह स्तूप चारुवती का ही है....इसका सटीक प्रमाण उपलब्ध नहीं था।

साल 2003 में इस स्तूप का मरम्मत- कार्य हो रहा था, तब 8.6 किलोग्राम की एक ईंट मिली।

ईंट पर लिखा था ---- " चारुवती थूप " अर्थात यह चारुवती का स्तूप है।

लिखावट के ऊपर धम्म - चक्र बना है....चारुवती के जीवन के आखिरी दिन यहीं बीते थे।

फिलहाल यह ईंट नेशनल म्यूजियम, छाउनी ( नेपाल ) में रखी है।

जो वस्तुतः थे, उनके हर सबूत मिल रहे हैं।

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स्त्री - साहित्य का पहला ज्ञात संग्रह थेरीगाथा है, स्त्री - विमर्श की पहली आवाज यहीं से उठती है।

इसमें पीड़ा है, तड़प है और स्त्री - मुक्ति की उत्कट अभिलाषा है। थेरीगाथा में आम्रपालि की भी रचनाएँ शामिल हैं।

गणिका मायने गण की स्त्री, आम्रपालि को गणिका से वेश्या बना दिया गया, शुक्र कीजिए कि गणराज्य का अर्थ वेश्यालय नहीं बना।

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थेरगाथा भी है, खुद्दक निकाय का 8 वाँ ग्रंथ है। इसमें 264 थेरों के उदान संगृहीत हैं।

जो मन को थिर रखे, वह थेर है, इसी थिर से स्थिर बना है।

थेर से थारू संबंधित है, थारू लोग मूलतः कभी थेरवादी बौद्ध थे।

थारू लोग बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और नेपाल में रहते हैं।

थारूओं की गढ़ी माई स्तूप का रूप है।

थेरवाद थेरों का सिद्धांत है।

गौतम (सुकिति) बुद्ध का थेरवाद ही अंग्रेजी में थियरी ( सिद्धांत,Theory ) है। बुद्ध का यही थेर यूरोप में पहुंचकर थियरी (Theory) बन गया। बुद्ध एकमात्र भारतीय व्यक्तित्व थे जिनके विचारों को सिद्धांत (थेर, थियरी या Theory) कहा जाता है।

सिद्धान्त या थ्योरी एक तरह से दृढ़ / स्थिर ही होता है, इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि थिर से स्थिर बना।

2. बौद्ध - स्थलों की नई खुदाइयाँ

बिहार के लखीसराय की लाली पहाड़ी पर खुदाई चल रही है, गंगा घाटी में पहली बार पहाड़ी की चोटी पर बौद्ध विहारिका मिली है, वरना बौद्ध विहार जमीन पर मिलते हैं।

संभव है कि दुनिया के कोलाहल से दूर साधना के लिए ऐसा निर्माण किया गया हो, मैंने इसे विहारिका इसलिए कहा कि यहाँ से मिट्टी की बनी दो जली हुईं मुहरें मिली हैं, जिस पर सिद्धमातृका लिपि में लिखा है --- श्रीमदधर्माविहारिका।

लिपि और भाषा पालकालीन है, एक और अभिलेख से इसकी पुष्टि होती है, जिस पर लिखा है कि पाल वंश की रानी मल्लिका देवी ने इसे बौद्ध भिक्खुणी विजयश्री भद्र को दान दिया था।

ऐसा लगता है कि बौद्ध भिक्खुणी विजयश्री भद्र ही तब इस विहारिका की प्रमुख थीं, साथ में अनेक बौद्ध भिक्खुणी यहाँ रहा करती थीं, बड़े पैमाने पर मिलीं धातु की चूड़ियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं।

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लाॅकडाउन के बीच गुजरात के वडनगर में खुदाई चल रही है।

बौद्ध विहार के दो कमरे... चार दीवारें मिली हैं...दीवारें एक मीटर चौड़ी....दो मीटर ऊँची हैं।

आश्चर्य कि एक नरकंकाल मिला है.....पद्मासन की मुद्रा में बैठा हुआ ....ठीक जैसे बुद्ध बैठते थे।

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पाल कालीन एक बौद्ध विहार झारखंड के बहोरनपुर में भी दबा है, जिसकी खुदाई चल रही है।

झारखंड का बहोरनपुर बौद्ध स्थल है, वहाँ खुदाई में बुद्ध और तारा की प्रतिमाएँ मिली हैं। ( चित्र 7 )

बहोरनपुर बौद्धों का बड़ा केंद्र है, अभी बौद्ध विहार की पूरी संरचना मिलनी बाकी है।

पुरातत्व विभाग ने 27 जनवरी, 2020 को बजट के अभाव में खुदाई का काम बंद कर दिया था।

फिर 1 फरवरी, 2021 से हजारीबाग की जुलजुल पहाड़ी पर स्थित बहोरनपुर में खुदाई जारी है।

अबकी बार ताबड़तोड़ माँ तारा की एक और बुद्ध की पाँच मूर्तियाँ मिली हैं।

पुरातत्ववेत्ता बड़े बौद्ध केंद्र को देखकर हैरान हैं, बड़ी संख्या में रिसर्च स्कालर ट्रेनिंग ले रहे हैं।

रिसर्च स्कालर अभी तक खुदाई के बारे में पढ़े थे, अब देख रहे हैं कि कैसे और किन औजारों तथा तकनीक से खुदाई होती है।

खुदाई के दौरान एक दुखद घटना घटी। यहाँ की खुदाई से प्राप्त गौतम बुद्ध की दो बेशकीमती और बेहतरीन मूर्तियाँ दो दिन पहले 20 मार्च, 2021 की रात्रि में चोरी चली गईं।

क्षेत्र में हड़कंप मच गया और पुलिस मूर्तियों को बरामद करने की भरपूर कोशिश करने लगी।

संतोषप्रद की बात है कि हजारीबाग के बहोरनपुर से चोरी हुई गौतम बुद्ध की दोनों बेशकीमती मूर्तियाँ राँची से बरामद कर ली गईं।

20 मार्च, 2021 को रात में बुद्ध की दोनों मूर्तियाँ चोरी हुईं थीं, एसआईटी का गठन हुआ, 2 डीएसपी, 4 इंस्पेक्टर और 5 थाना प्रभारी लगाए गए और आखिरकार दोनों मूर्तियाँ बरामद कर ली गईं।

ऐसी घटनाएँ पहले भी घटती रही हैं, जिनके कारण कई महत्वपूर्ण साक्ष्य मिट गए।

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अनेक बौद्ध स्थलों की खुदाई चल रही हैं। एक नया बौद्ध भारत का प्राचीन परिदृश्य उभर रहा है। अनेक स्थलों से बौद्ध अवशेष मिलना जारी है।

घर की नींव खोदते, पोखर की सफाई करते, मछली मारते, मंदिरों का जीर्णोद्धार करते तो कभी जंगल - पहाड़ में बिखरे बौद्ध अवशेष बरबस ध्यान खींच रहे हैं।

बैतूल जिले में आमला के निकट गाँव कजली कनौजिया में जगह - जगह बौद्ध अवशेष बिखरे पड़े हैं।

कहीं बुद्ध के सिर तो कहीं पद्म - पदक, फिर कहीं बुद्ध के चरण - चिह्न तो कहीं बौद्ध इमारतों के आमलक, अष्टदल कमल, स्तूपों की निशानियाँ।

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सिरोही के भारजा गाँव ( राजस्थान ) से बुद्ध की एक अजूबा प्रतिमा मिली है।

काँसे की है, जंग खाई कहीं लाल तो कहीं हरी है।

बुद्ध कमल पर पद्मासन में बैठे हैं, चीवर धारण किए ध्यान की मुद्रा में हैं।

प्रतिमा खोखली है, ऊँचाई 24.4 सेंमी और वजन 4 किलो है।

प्रतिमा अजूबा है और अजूबा इसलिए कि चीवर तथा कमल के पृष्ठ भाग पर बुद्धचरित की सुंदर चित्रकारी है।

कहीं गोतम का गृह - त्याग है तो कहीं सारनाथ में बुद्ध, फिर कहीं बुद्ध और बिंबिसार का मिलन है तो कहीं मार का दृश्यांकन है।

मगर प्रतिमा मिलने की जगह के आस -पास में कोई बौद्ध- स्थल होने की संभावना नगण्य है। लगता है कि प्रतिमा कहीं से लाई गई है।

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2020 के अंत में बड़ी खबर गुजरात से आई थी कि सोमनाथ मंदिर के नीचे तीन मंजिला इमारत और बौद्ध गुफाएँ मिली हैं।

पुरातत्व विभाग ने जाँच के बाद पुष्टि की है।

यह जाँच जमीन के नीचे करीब 12 मीटर GPR इन्वेस्टिगेशन द्वारा की गई थी।

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छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के उचेहरा गाँव में मिट्टी में दबी बुद्ध की अनेक मूर्तियाँ मिली हैं।

अजूबा घटना तब घटी, जब ग्रामीण नंदलाल बैगा घर बनाने के लिए मिट्टी की खुदाई कर रहे थे।

कि अचानक मिट्टी में दबा हुआ पत्थर का बना पैर मिला।

खबर आग की तरह गाँव में फैल गई और लोग इकट्ठा हुए।

लोगों ने और गहरे में खुदाई कर डाली, बुद्ध की अनेक मूर्तियाँ जमीन के बाहर आ गईं।

अब लोगों का मानना है कि यहाँ कभी बुद्धिज्म की पताका फहरती होगी।

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मऊ जिले के गढ़वा कोट से 128 प्राचीन सिक्के, मृदभांड के टुकड़े और बुद्ध की मूर्ति मिली है। बात 2020 के दिसंबर माह की है।

सिक्स लेन के निर्माण के दौरान यह इतिहास उभरकर सामने आया है।

कभी यहाँ कोट था, कोट अर्थात किला, बाद में गढ़ के कारण भोजपुरी टोन में गढ़वा हुआ, लेकिन सरकारी रिकाॅर्ड में इसका नाम भीटा है।

भीटा का मतलब टीला, यह नाम तब दिया गया होगा, जब किला ध्वस्त हो गया होगा।

ऐसे भी जिन गाँवों के नाम में कोट, गढ़, भीटा आदि लगे हैं, वहाँ अमूमन खुदाई में प्राचीन किलों या अन्य प्रकार के ध्वसांवशेष मिलेंगे।

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बौद्ध पर्व छठ - 2020 की घटना है। घाट की सफाई चल रही थी। तभी बौद्ध - स्थल मिला।

बिहार के जिला बाँका के भदरिया गाँव में चाँदन नदी की धारा में छठ घाट की सफाई के दौरान प्राचीन भवनों के अवशेष मिले हैं।

आज के भदरिया गाँव का उल्लेख बौद्ध ग्रंथों में भद्दिय गाँव के रूप में है ( अंगुत्तर निकाय)।

भद्दिय गाँव का उल्लेख डाॅ. अंबेडकर, राहुल सांकृत्यायन और हवलदार त्रिपाठी ने किया है।

कभी गोतम बुद्ध वैशाली से चारिका करते हुए लगभग 1200 भिक्खुओं को साथ लिए भद्दिय गाँव पधारे थे।

तब भद्दिय गाँव के एक बड़े श्रेष्ठी मेण्डक हुआ करते थे।

मेण्डक ने अपनी पोती विशाखा को बुद्ध के सत्कार में अगवानी के लिए भेजा था, जिन्हें मिगार माता विशाखा कहा जाता है।

प्राचीन भवन के अवशेष में कई कमरे दिख रहे हैं, ईंटें हाथ से थापकर बनाई गई हैं, फिर पकाई गईं हैं।

भदरिया गाँव के लोग पहले से ही मानते रहे हैं कि हमारे गाँव में बुद्ध कभी पधारे थे।

अब बौद्ध पर्व छठ के अवसर पर उन्हें पुरातात्विक सबूत मिले हैं।

घटना के बाद मुख्यमंत्री भदरिया पहुँचे और चाँदन नदी की धारा में डूबे बौद्ध स्थल को देखकर बोले कि इसे बचाने के लिए नदी की धारा मोड़ी जाएगी।

कभी पटना में मेट्रो की खुदाई पर मुख्यमंत्री ने कहा था कि ज्यादा गहरे में नहीं खोदना है, राजधानी पटना के नीचे एक और राजधानी है, जिसे बचाना है।

भारत के इतिहास में ऐसी घटना पहली बार हुई है, जब बौद्ध पुरावशेषों की खोज के लिए सरकार ने नदी की धारा मोड़ दी है।

बौद्ध भारत की खोज के लिए इतिहासकार अब इतिहास की धारा मोड़ें।

पोकलेन और जेसीबी ने नदी की धारा मोड़ दी, अब कलम को भी इतिहास की धारा को मोड़ने में लग जाना चाहिए।

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ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार वैशाली में दुनिया का पहला गणतंत्र स्थापित हुआ था, बुद्ध का बड़ा प्रिय नगर था।

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने वैशाली राज्य का बड़ा मनोहारी वर्णन किया है, 5 हजार ली में फैला है, लोग आचरण में शुद्ध और सच्चे हैं।

वैशाली की जमीन बड़ी उपजाऊ है, फल - फूल बहुत होते हैं, आम और केले की बड़ी कद्र है।

कई सौ संघारामों के खंडहर हैं, ढेर सारे स्तूप हैं, अंबपाली के अंबवन के निकट स्तूप है, अशोक का स्तंभ है, द्वितीय बौद्ध - संगीति का यहाँ स्थल है।

सम्राट अशोक ने यहाँ सिंह स्तंभ खड़ा कराया था, अब बिहार सरकार यहाँ बुद्ध स्मृति स्तूप और बुद्ध सम्यक दर्शन संग्रहालय तैयार करा रही है।

पत्थरों का बुद्ध स्मृति स्तूप 150 करोड़ की लागत से 17317 वर्ग मीटर में तथा बुद्ध स्मृति सम्यक दर्शन संग्रहालय 72 एकड़ में 350 करोड़ की लागत से तैयार हो रहा है।

गौतम बुद्ध की पटना म्यूजियम में मौजूद पवित्र अस्थियाँ वैशाली म्यूजियम में स्थापित होंगी।

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बुद्ध का भिक्खा - पात्र

बुद्ध का भिक्खा - पात्र फिलहाल नेशनल म्यूजियम काबुल में है, कभी वैशाली में था।

इसके पहले यह भिक्खा - पात्र कंधार में था। डाॅ. बेले ने 19 वीं सदी में इसे कंधार में देखा था।

कंधार से पहले यह भिक्खा - पात्र पुरुषपुर ( पेशावर ) में था। 5 वीं सदी में फाहियान ने इसे पुरुषपुर में देखा था।

पुरुषपुर बौद्ध राजा कनिष्क की राजधानी थी। श्रीधर्मपिटकनिदान के चीनी अनुवाद से पता चलता है कि कनिष्क इसे पाटलिपुत्र से पुरुषपुर ले गए थे।

पाटलिपुत्र से पहले यह भिक्खा - पात्र वैशाली में था, जहाँ इतने बड़े भिक्खा - पात्र को वहाँ बुद्ध को समर्पित किया गया था।

भिक्खा - पात्र हरे - भूरे ग्रेनाइट पत्थर का है, जिसका व्यास 1.75 मीटर है। यह लगभग 4 मीटर ऊँचा और लगभग 400 किलो भारी है।

आप सोच रहे होंगे कि इतना विशाल भिक्खा - पात्र भला बुद्ध कैसे उठाते होंगे। दरअसल यह उन्हें सम्मान में दिया गया था, जैसे आज के नेताओं को टनों भारी माला समर्पित किया जाता है।

इतिहासकार पर्शियन में इस पर लिखा देख इसकी प्रामाणिकता को नकारते हैं। फिर मुगलकालीन लिखावट देखकर प्रयाग किले के अशोक स्तंभ को क्यों नहीं नकारते कि यह मुगल काल का है।

दरअसल यह भिक्खा - पात्र कनिष्क से पहले का है। कारण कि कनिष्क कालीन गंधार शैली में इसके दृश्यांकन के अनेक पुरातात्विक प्रमाण मिलते हैं। बाद में इस पर पर्शियन अभिलेख लिखा गया है।

आप देख सकते हैं कि भिक्खा - पात्र के तल - भाग में बौद्ध कमल बना हुआ है, जिसमें 24 दल हैं, स्वस्तिक के निशान भी है।

फाहियान ने पुरुषपुर में मौजूद जिस बड़े भिक्खा - पात्र के बारे में विवरण दिए हैं, गंधार शैली में इसका जो विविध दृश्यांकन मिलते हैं, वे आश्चर्यजनक रूप से काबुल म्यूजियम में रखे भिक्खा - पात्र से मेल खाते हैं।

भिक्खा - पात्र काल्पनिक नहीं है। 2 री सदी के एक दृश्यांकन में दो कुषण सैनिक इसे उठाकर पुरुषपुर ले जा रहे हैं। इससे प्राचीन भारत में इसके वजन तथा अस्तित्व में होने का पता चलता है।

फिलहाल यह दृश्यांकन नेशनल म्यूजियम टोक्यो में सुरक्षित है। चित्र 8 )

एलेक्जेंडर कनिंघम ने अपनी पुस्तक " रिपोर्ट आॅफ टूर्स इन नार्थ एंड साउथ बिहार इन 1880 - 81" के खंड 16 में भिक्खा - पात्र का चित्र देते हुए बताया है कि बुद्ध का यह भिक्खा - पात्र पुराने कंधार में है।

कनिंघम के जमाने में यह भिक्खा - पात्र पुराने कंधार में ही था। 20 वीं सदी के आखिर में राष्ट्रपति मो. नजीबुल्लाह ने इसे नेशनल म्यूजियम काबुल में संरक्षित करा दिए। तब से यह काबुल में है।

भारत की पार्लियामेंट में इसे काबुल से वैशाली लाए जाने की माँग माननीय रघुवंश प्रसाद सिंह ने की थी। मगर इतिहासकारों के भ्रम के कारण मामला वहीं लटक गया।

3. इतिहास - लेखन की जन - शैली

जे. एफ. फ्लीट ने " दी रुम्मिनदेई इंस्क्रिप्शन एंड दी कन्वर्शन आॅफ असोक टू बुद्धिज्म " (अप्रैल, 1908) में लिखा कि अशोक के रुम्मिनदेई स्तंभ के पास एक टीला है, टीला के ऊपर एक देवी का स्मारक है, जिनका नाम रुम्मिनदेई है....अर्थात रुम्मिन देवी है।

जनता का इतिहास बुद्ध की माँ का नाम रुम्मिनदेई बताता है।

यहीं रुम्मिनदेई ( लुंमिनि ) बुद्ध की माँ का असली नाम था...वैशाख पूर्णिमा को इनकी विशेष पूजा होती है....इसी दिन बुद्ध का जन्म हुआ था।

रुम्मिनदेई की यह प्रतिमा अशोक कालीन है...इसमें जो पत्थर लगे हैं....वे वहाँ मौजूद अशोक स्तंभ के पत्थर से मेल खाते हैं।

यह प्रतिमा बुद्ध की माँ की है....दाएँ हाथ से शाल वृक्ष पकड़े और बाएँ तीन परिचारिकाएँ साथ हैं.....यह प्रतिमा बुद्ध के जन्म- प्रसंग पर आधारित है।

रुम्मिनदेई पुरातत्व के हिसाब से प्राचीन नाम है.....अशोक ने " लुंमिनि " लिखवाया.....फाहियान ने " लुंमिन " कहा....ह्वेनसांग ने " ला- फा- नी " कहा.....ये सभी नाम रुम्मिनदेई के अलग - अलग उच्चारण हैं।

रुम्मन देई ( लुंमिनि/ लुंबिनी) के बेटा बुद्ध थे।

कोलिय राजा अञ्जन की दो बेटियाँ थीं ---बड़ी रुम्मन और छोटी रूप्पन।

साहित्य में रुम्मन को महामाया और रूप्पन को महाप्रजापति कहा गया है।

रुम्मन सुकिति की माँ थी और रूप्पन मौसी थी।

रुम्मन ( लुंमिनि ) के नाम पर रुम्मिन देई ( लुंबिनी ) है और रूप्पन के नाम पर रूपनदेही ( रूप्पन देई ) जिला का नाम पड़ा है।

लुंबिनी नेपाल के इसी रूपनदेही जिले में है।

सुद्धोदन का विवाह पहले रुम्मन से हुआ, फिर उनकी मृत्यु के बाद सुद्धोदन ने सुकिति ( बुद्ध) के पालन-पोषण के लिए दूसरी शादी रुम्मन की छोटी बहन रूप्पन से की थी।

कनिष्ककालीन एक स्तूप पर नवजात शिशु सुकिति को गोद में लिए पालकी पर जाती हुईं रुम्मिन देई का बड़ा सुंदर दृश्यांकन मिलता है।

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भरहुत स्तूप पर एक राजा का नाम तस्वीर सहित उत्कीर्ण है।

राजा का नाम है ---चकवाक नागराज, लिखा है चकवाको नागराज।

जाहिर है कि ये नागवंशीय राजा थे और सिर पर गण का टोटम नाग धारण करते थे।

यही नागवंशी राजे बुद्ध के संरक्षक थे, सो अनेक बुद्ध प्रतिमाओं के सिर पर यह टोटम दिखाई पड़ता है।

कहाँ है भारत के राजनीतिक इतिहास में राजा चकवाक का इतिहास? आपने तो उन्हें साँप समझकर छोड़ दिया है।

राजा मुचलिंद को साँप बनाकर, राजा महिस को भैंसा बनाकर, किसी - किसी को राक्षस तो लंगूर बनाकर प्राचीन भारत का प्रायः राजनीतिक इतिहास खत्म कर दिया गया है, लेकिन जनता के बीच चाहें जिस रूप में भी, आज भी जिंदा हैं।

भरहुत स्तूप पर एक पाँच मुख वाला नाग है और इस नाग की छत्रछाया में चक्र अंकित दो पदचिह्न हैं।

चक्र अंकित दो पदचिह्न गौतम बुद्ध के प्रतीक हैं, जिन्हें नागराज मुचलिंद रक्षा कर रहे हैं।

जहाँ पदचिह्न है, वहाँ गौतम बुद्ध की उपस्थिति है और जहाँ पंचफण है, वहाँ मुचलिंद राजा की उपस्थिति है।

राजा मुचलिंद का नाम लिखा है--- मुचिलि नागराज।

मगर इतिहासकारों ने राजा मुचलिंद को साँप मानकर इनका इतिहास छोड़ दिया है।

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शेषनाग का पूरा नाम शेषदात नाग था। उनके पूरे नाम की जानकारी हमें ब्रिटिश म्यूजियम में रखे सिक्कों से मिलती है।

शेषनाग ने विदिशा को राजधानी बनाकर 110 ई.पू. में शेषनाग वंश की नींव डाली थी।

शेषनाग की मृत्यु 20 सालों तक शासन करने के बाद 90 ई. पू. में हुई। उसके बाद उनके पुत्र भोगिन राजा हुए, जिनका शासन - काल 90 ई. पू. से 80 ई. पू. तक था।

फिर चंद्राशु ( 80 ई. पू. - 50 ई. पू. ), तब धम्मवर्म्मन ( 50 ई. पू. - 40 ई. पू. ) और आखिर में वंगर ( 40 ई. पू. - 31ई. पू. ) ने शेषनाग वंश की बागडोर संभाली।

शेषनाग की चौथी पीढ़ी में वंगर थे। इस प्रकार शेषनाग वंश के कुल मिलाकर पाँच राजाओं ने कुल 80 सालों तक शासन किए।

इन्हीं पाँच नाग राजाओं को पंचमुखी नाग के रूप में अमरावती स्तूप पर दर्शाया गया है।

शेषनाग बड़ा विचारशील राजा थे, इसीलिए गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि मैं नागों में अनंत ( शेषनाग) हूँ।

शेषनाग बड़ा शक्तिशाली राजा थे, इसीलिए लक्ष्मण को शेषावतार कहा जाता है।

शेषनाग बड़े साम्राज्य के मालिक थे, इसीलिए कहा जाता है कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है।

यह इतिहास - लेखन की जन - शैली है कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है।

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जनता में मानसरोवर का जिक्र खूब होता है। संतों ने आध्यात्मिक अर्थ में इसका बखूबी प्रयोग किया है। क्या है मानसरोवर?

चितौड़ के राजा मान मौर्य ने मानसरोवर बनवाने की भारत में रीति चलाई, जिसे बाद के अनेक राजाओं ने अनुगमन किया।

मानसरोवर में जो मान है, वह मान मौर्य के मान नाम का द्योतक है।

मानसरोवर का संक्षिप्त रूप मानसर है, जिसका प्रयोग सूफी कवि जायसी ने पद्मावत में किया है।

कबीर ने भी लिखा है कि मानसरोवर सुभर जल.....

भारत का पहला मानसरोवर 8 वीं सदी के प्रारंभ में बनवाने का श्रेय मान मौर्य को है, जिसे चितौड़गढ़ के निकट पुठोली में बनवाया था।

मान मौर्य द्वारा बनवाए गए मानसरोवर का प्रमाण हमें पुठोली से जेम्स टाॅड को मिले एक अभिलेख में मिलता है।

इस अभिलेख का विवरण जेम्स टाॅड लिखित पुस्तक एनल्स एंड एंटीक्विटीज आॅफ राजस्थान में दर्ज है।

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औरंगजेब के समकालीन चेरो राजवंश ( पलामू ) के प्रतापी राजा मेदिनी राय ( 1658 - 1674 ) थे।

मेदिनी राय का साम्राज्य झारखंड के पलामू, लोहरदगा और हजारीबाग से लेकर छत्तीसगढ़ के सरगुजा तथा बिहार के शेरघाटी तक फैला था।

राजा मेदिनी राय और उनके राजवंश का इतिहास मुगल काल से लेकर आज तक बाकायदे नहीं लिखा गया।

मगर पलामू की जनता ने अपने प्रिय राजा मेदिनी राय का इतिहास अपनी जुबान में लिखा।

पलामू का किला मेदिनी राय का था--- भव्य, विराट और ऊँचा। कितना ऊँचा था, इतिहास - लेखन की जन - शैली से जानिए।

" ऊँचति गढ़ पलमुआँ हो, नीचहीं गढ़ रूईदास।"

अर्थात पलामू का किला रोहतासगढ़ किले से ऊँचा था।

राजा मेदिनी राय की शासन - व्यवस्था कैसी थी, इतिहास - लेखन की जन - शैली से जानिए।

"राजा मेदनिया के राज, न गउए छान न प्रजा डाँड़।"

अर्थात राजा मेदिनी राय की शासन - व्यवस्था में न तो गायों के पैर में रस्सी बाँधी जाती थी और न प्रजा पर दंड लगाया जाता था।

राजा मेदिनी राय का राज्यकाल जनता की नजर में स्वर्णकाल था। इसे इतिहास - लेखन की जन - शैली से जानिए।

" धनि - धनि राजा मेदनिया, घर - घर बजले मथनिया।

अन्नवा से भर गइले खेत -खलिहनवा, साँच भइले सबके सपनवा।"

अर्थात राजा मेदिनी राय धन्य - धन्य हैं, जिनके राज्यकाल में घर - घर मथानी ( दही मथने का उपकरण ) बजने लगी, अनाज से खेत - खलिहान भर गया, जनता का सपना साकार हुआ और लोग खुशहाल हो गए।

डाल्टनगंज ( पलामू का मुख्यालय) का नाम 1861 में पदस्थापित छोटा नागपुर के अंग्रेज कमिश्नर कर्नल डाल्टन के नाम पर पड़ा, मगर राजा मेदिनी राय की इस क्षेत्र में महिमा को देखते हुए अब इसे बदलकर मेदिनीनगर कर दिया गया है।

धनि धनि राजा मेदनिया!!!

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इतिहास में दफन कोमल पहलवान उर्फ कोमल यादव का लोकगीतों में जिंदा है शौर्य - इतिहास !

" सहुआकोल में कोमल तपले, फूँकले चौरा थाना।

ठीक दुपहरिया चौरा जर गइल,कोई मरम नहीं जाना। "

जी हाँ, चौरी चौरा कांड। 4 फरवरी 1922 । एक ब्रिटिश पुलिस चौकी पर स्वाधीनता आंदोलनकारियों का धावा। 22 पुलिसकर्मी जिंदा जलाए गए और गाँधी जी का असहयोग आंदोलन वापस। इन्हीं आंदोलनकारियों में से एक थे कोमल पहलवान।

कोमल पहलवान उर्फ कोमल यादव। यदि लोकगीतों पर भरोसा करें तो चौरी चौरा कांड के आरोपी कोमल पहलवान कुसम्ही जंगल से गिरफ्तार किए गए।

" साथी गद्दार हो गइले, गोरा दिहले रुपइया हो।

कुसम्ही जंगल में, पकड़इले कोमल भइया हो। "

अंततः चौरी चौरा कांड के जुर्म में 1924 की गर्मियों में उन्हें फाँसी दे दी गई।

" देश में केतना गोरा अइहें, केतना कोमल झुलिहें फँसिया।

माई रहबू ना गुलाम , ना बहइबू अँसुवा ।। "

( संदर्भ : चौरी चौरा विद्रोह और स्वाधीनता आंदोलन , सुभाषचंद्र कुशवाहा , पेंगुइन बुक्स , पृष्ठ 95 - 96 )

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प्राकृत का एक शब्द " धम्मिक " है, विद्वानों ने इसका अनुवाद तथा अर्थ " धार्मिक " किया है।

लेकिन " धम्मिक " का धार्मिक ( Religious ) अनुवाद तथा अर्थ सही नहीं है।

अनेक ग्रीक - भारतीय राजाओं ने " धम्मिक " का अनुवाद ग्रीक भाषा में कराए हैं।

मीनेण्डर के सिक्कों के पृष्ठभाग पर प्राकृत भाषा और खरोष्ठी लिपि में लिखा है ---- "महरजस ध्रमिकस मिनद्रस" ।

अब इस सिक्के के अग्रभाग पर ग्रीक भाषा और लिपि में इसका अनुवाद प्रस्तुत किया गया है और लिखा है----" बैसिलियास डिकाइओ मिनम्ड्राय " ।

प्राकृत " महरजस " ( महाराजा ) का अनुवाद ग्रीक में " बैसिलियास " (सम्राट ) ठीक है, लेकिन प्राकृत " ध्रमिकस " का ग्रीक अनुवाद " डिकाइओ " विचारणीय है।

ग्रीक में " डिकाइयो " का अर्थ Righteous, Lawful और Genuine होता है, इसलिए ध्रमिक / धम्मिक का अर्थ Religious नहीं होगा।

ग्रीक में Religious के लिए Thriskeftikos शब्द चलता है।

इसलिए मैं बार - बार कहता हूँ कि बौद्ध कोई Religion अर्थात धर्म नहीं है, यह धम्म है।

लोक जनता आज भी काम - धाम बोलती है तो काम के साथ धाम का जुड़ना आकस्मिक नहीं है।

काम कीजिए, लेकिन Lawful कीजिए, Genuine कीजिए। धाम दरअसल धम्म का रूपांतरण है, जनता इसे सहेज रखी है।

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बिहार ( विहार ) में एक शब्द प्रचलित है --- संघतिया, मित्र या साथी को संघतिया कहते हैं।

बौद्ध संघ से जुड़ा शब्द है संघतिया, संघ में जो मित्र - भाव से रहते थे, वे आपस में संघतिया थे, अब इसका विस्तार हो गया है।

भोजपुरी - मगही - मैथिली तीनों में प्रचलित है, कहीं- कहीं संघाती ( साथी ) भी है, ब्रजभाषा में संघाती है, अनेक कवियों ने इसका प्रयोग किया है।

गया के आसपास मगही में मित्रता के लिए संघाजोरी है, भोजपुरी में मैत्री के लिए संघत है।

संघत से अधिक व्यापक संगत है, सोहबत को संगत बोलते हैं, लेकिन आज भी अनेक संप्रदाय के साधुओं के मठ को संगत कहते हैं।

संघाटी ( चीवर ) का संक्षिप्त रूप " गाँती " है, गाँती चादर आदि ओढ़ने का एक ढंग है, बौद्ध परंपराएँ आज भी वेश बदलकर जीवित हैं।

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कर्नाटक इतिहास अकादमी ने रिसर्च किया है कि कर्नाटक के कुछ भागों में बुद्ध की माँ की पूजा Bananthi Kallu के रूप में होती है।

जिस परिवार जब किसी बच्चे का जन्म होना होता है, तब गजलक्ष्मी के रूप में पूजित बुद्ध की माँ की मूर्ति चेहरा नीचे कर रखी जाती है।

फिर जब बच्चे का जन्म सफलतापूर्वक हो जाता है, तब पुनः मूर्ति को अपने मूल स्वरूप में रख दिया जाता है।

आप जो सोचते हैं कि बुद्धिज्म की परंपरा मिट गई है तो सही नहीं है, अनेक बुद्धिज्म की परंपराएँ सतह के नीचे आज भी जारी हैं।

आज सतह के नीचे प्रवाहित बुद्धिज्म की परंपरा को पकड़ने की जरूरत है, पकड़ना आसान तो नहीं है, मगर पकड़ी जा सकती हैं।

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बुद्ध का अनेक रूपों में लोक देवता के रूप में अंगीकरण भी हुआ है।

नालंदा के पास बड़गाँव में " तेलिया बाबा " के नाम से हैं।

ओबरा के पास मनोरा में " मोरवा बाबा " के नाम से हैं।

एकंगरसराय के पास कुंडवापर में " गोरेया बाबा " के नाम से हैं।

बुद्ध को न जाने कितने लोगों ने कितने रूपों में देखा है, जाने कितने रूपों में लोक मानस में पूजे जाते हैं।

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जनता में कलियुग की भयावहता क्यों थी? कलयुग का संकट क्या था?

जो प्राचीन काल में बौद्ध थे, वहीं संस्कृत साहित्य में शूद्र हैं।

हरिवंश पुराण में लिखा है कि - शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति शाक्यबुद्धोपजीविनः ....

इसीलिए इयोथी थास ने कहा कि शूद्र मूल रूप से बौद्ध हैं।

शूद्रों का वास्तविक नाम - ठिकाना बौद्ध तथा धम्म ही है और बौद्ध काल में ये सर्वोपरि थे।

पुलकेशिन द्वितीय की सातवीं सदी का एक अभिलेख है --- ऐहोल प्रशस्ति।

ऐहोल प्रशस्ति सातवीं सदी की है या बाद की, संदिग्ध है, इसे लिखा है किसी और ने।

जो भी हो, इतना तय है कि कलियुग संवत का उल्लेख पहली बार इसी में है।

सातवीं सदी के इस अभिलेख से पहले कलियुग संवत भारत के किसी अभिलेख में नहीं मिलता है।

हम सोच सकते हैं कि छठीं - सातवीं सदी के आस-पास ही कलियुग नामक युग की कल्पना की गई होगी या इसके बाद कभी।

परंपरा बताती है कि कलियुग का आरंभ 3102 ई. पू. में शुक्रवार को हुआ था, विचार कीजिए कि तब शुक्रवार की अवधारणा नहीं थी, कारण कि वार में दिन गिनने का उल्लेख शिलालेखों में 485 ई. के एरण प्रस्तर - लेख में मिलता है।

और 3102 ई. पू. में सिंधु घाटी की सभ्यता थी, कलियुग नहीं।

इसलिए कलियुग के आरंभ की परिकल्पना छठीं - सातवीं सदी के पहले की नहीं हो सकती।

छठीं सदी के राजा मिहिरकुल का समय और कार्य, जैन ग्रंथों में वर्णित कल्कि से मेल खाता है।

मिहिरकुल का दूसरा नाम कल्किराज था।

संभव है कि मिहिरकुल ही कलियुग का कल्कि अवतार हो।

कल्कि अवतार चाहें जिनके लिए भी सुखद रहा हो, लेकिन श्रमणों के लिए वह काल बनकर आया।

कल्कि पुराण के अनुसार कल्कि अवतार हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिए सफेद घोड़े पर सवार होकर श्रमणों ( जैन - बौद्ध ) का नाश करेगा।

जयदेव और चंडीदास ने लिखा है कि कल्कि अवतार हो चुका है।

तब,कौन है कल्कि अवतार?

इतिहासकार के. बी. पाठक ने अपनी पुस्तक " Commemorative Essays, New Light On Gupta Era And Mihirkula " में लिखा है कि हूण सम्राट मिहिरकुल ही कल्कि अवतार है।

प्रमाण के तौर पर उन्होंने बताया है कि जैन आचार्य गुणभद्र ( 9 वीं सदी ) द्वारा वर्णित कल्किराज ही मिहिरकुल है।

गुणभद्र के अनुसार कल्किराज का जन्म महावीर के निर्वाण के हजार साल बाद होगा।

मिहिरकुल ( 6 वीं सदी ) का आविर्भाव ठीक महावीर के निर्वाण के हजार साल बाद होता है।

जिनसेन ने " उत्तर पुराण " में लिखा है कि कल्किराज 40 सालों तक शासन करेगा।

मिहिरकुल ( 502 - 542 ई. ) ठीक 40 सालों तक शासन करता है।

जैन ग्रंथों के अनुसार कल्किराज का उत्तराधिकारी अजितांजय था और मिहिरकुल का भी उत्तराधिकारी अजितांजय ही था।

कोई शक नहीं कि मिहिरकुल का ही नाम श्रमण ग्रंथों में कल्किराज है।

कल्किराज को श्रमण ग्रंथों ने भारी अत्याचारी और दुष्ट बताया है।

ह्वेनसांग ने लिखा है कि मिहिरकुल ने केवल गंधार प्रदेश में ही 1600 स्तूपों और संघारामों को नष्ट कर दिया था।

न केवल बौद्ध ग्रंथों ने बल्कि जैन ग्रंथों ने भी कल्किराज के अत्याचारों की अनेक बातें लिखी हैं।

मिहिरकुल के पिता का नाम तोरमाण था, ये लोग वाराहपूजक थे और यहीं कारण है कि तोरमाण ने एरण में वाराह की विशाल प्रतिमा स्थापित की।

एरण में स्थापित वाराह प्रतिमा की छाती पर तोरमाण का नाम लिखा है।

एरण का नाम विचारणीय है। एरण को अंग्रेजी में " Eran " लिखा जाता है और आश्चर्य कि मिडिल पर्शियन में ईरान को भी " Eran " लिखा जाता था।

पार्थियन शासकों के जमाने में ईरान के लिए एरान का प्रयोग किया गया है और भारत में एरण इसी की प्रतिच्छवि है।

मिहिरकुल हूणों की दूसरी शाखा का था और हूणों की दूसरी शाखा बहुत पहले ईरान में बस गई थी।

छठी सदी में कल्कि अवतार हो चुका था, इसीलिए सातवीं सदी में पहली बार कलि संवत हमें मिलता है।

निष्कर्ष यह कि श्रमण युग का अंत करना ही कल्कि अवतार का ध्येय था।

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सिरि पंचमी ( श्री पंचमी ) में जो सिरि है, वह बुद्धिज्म का द्योतक है।

विद्यापति, सूरदास, जायसी जैसे कवियों ने सीरी पंचमी का प्रयोग किया है।

उत्तर भारत में जो सिरि है, वहीं दक्षिण में तिरु है।

उत्तर भारत का समय दक्षिण भारत में बदलकर तमय है, संतति बदलकर तंदति है, सत्वम् बदलकर तत्तुवम् है, उत्तर का सिरि दक्षिण में तिरु है।

दक्षिण के तिरुपति, तिरुवनंतपुरम या फिर उत्तर के सिरिनगर ( श्रीनगर ), सिरिपुर ( सिरपुर ) आदि इसी बुद्धिज्म के द्योतक सिरि से जुड़े हैं।

सातवाहन और इखाकु वंश के तमाम बौद्ध राजा - रानी अपने नाम में बुद्धिज्म के प्रतीक इसी सिरि को धारण करते हैं।

बौद्ध नरेशों के बहुतेरे शिलालेख - ताम्रपत्र - सिक्के इसी " सिरि " से भरे पड़े हैं।

सिरि पंचमी का सिरि बुद्धिज्म का द्योतक है।

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कपिलवस्तु में ईख की खेती बहुत होती थी। छठ में ईख की महिमा जग जाहिर है। छठ बौद्ध पर्व है। इक्ष्वाकु लोगों का नाम ही इक्षु ( ईख ) के आधार पर पड़ा है।

जो संस्कृत में इक्ष्वाकु है, वहीं शिलालेखों में इखाकु है। इक्ष्वाकु ( इखाकु) मूलतः ईख की खेती करने वाले खत्तिय थे।

हल चलाते गोतम बुद्ध के पिता सुद्धोदन का शिल्पांकन हमें मिलता है ।....बुद्ध का परिवार मूल रूप से खेतिहर था।

इसीलिए इन्हें खत्तिय कहा गया है।

आज भी खेत से संबंधित जो कागजात होते हैं.....खेत से संबंधित जो बही होती है....उन्हें खतियान, खतौनी कहा जाता है।

तलवार धारक नहीं, खतियान धारक ही खत्तिय थे।

पहली बार शक्कर बौद्ध भारत ने बनाया था।

बौद्ध भारत शक्कर को " सक्कर " बोलता था।

फारस वालों ने इसे " शकर " कहा। अरबी - फारसी के शकरकंद में यह शकर है।

अरबी जबान ने " सुक्कर " कहा। रूसी में साखार, जर्मनी में जुकर और फ्रेंच में सकर है।

अंग्रेजों ने " शुगर " कहा।

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न केवल उत्तरी भारत में बल्कि दक्षिणी भारत में भी अनेक गाँवों के नाम बुद्ध के नाम पर पड़े हैं।

आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में एक गाँव का नाम बुद्दम है, जो बुद्ध से जुड़ा है।

बुद्दम से काँसे की बनी हुई बुद्ध की मूर्तियों का खजाना मिला था।

काँसे की बनी बुद्ध की मूर्तियाँ, सिर, टूटे हाथ, स्तूप......

सब ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित हैं।

उत्तरी भारत के बुधनी क्षेत्र में भी स्तूप मिला है।

नामों की परंपरा इतिहास खोलती है।





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